शुक्रवार, 12 जून 2015

परिकल्पनाओं में ‘स्मार्ट शहर’

इन दिनों भारत सरकार स्मार्ट शहरों के न केवल ख्वाब देख रही है बल्कि इसका ढिंढोरा भी जमकर पीटा जा रहा है। मोदी सरकार को यह सपना देखने का अधिकार है लेकिन शहर स्मार्ट बनाने से पहले हमें अपने जनमानस को इसमें रहने लायक बनाना होगा। भारत सरकार द्वारा स्मार्ट सिटी योजना का अब तक प्रस्तुत खाका बहुत उत्साहजनक नहीं है। इसमें निजी निवेश को वित्तीय स्रोत का मुख्य आधार बनाया गया है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि निजी निवेशक केवल वहीं अपने धन का निवेश करता है, जहां उसे निश्चित रिटर्न की गारंटी हो। नागरिक सेवाओं का क्षेत्र अत्यंत अनिश्चितताओं से भरा है, जहां हर कदम पर जोखिम है।
बाजार का अर्थशास्त्र कहता है कि शहरी अधोसंरचना में निजी निवेश की संभावनाएं बहुत कम हैं, क्योंकि निवेशकों को उनके द्वारा लगाए गए धन की ब्याज और मुनाफे सहित समय पर वापसी की इसमें कोई गारंटी ही नहीं है। ऐसी दशा में हमें सरकार और निकायों के वित्तीय स्रोतों पर मुख्य रूप से निर्भर रहना होगा, जो कि अपेक्षित निवेश की तुलना में मात्र 5 से 10 फीसदी की भरपाई कर सकेगा। ऐसे में सौ शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना देखने के स्थान पर हमें सबसे पहले हमारी मेगा सिटीज को स्मार्ट बनाने की पहल करना चाहिए। यदि आने वाले दस वर्षों में हम दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, बंगलुरु जैसे कुछ शहरों पर ही ध्यान केंद्रित करें तो बेहतर होगा। स्मार्ट क्षेत्रों में परिवहन, ऊर्जा, स्वास्थ्य देखभाल, पानी और अपशिष्ट प्रबंध जैसी नागरिक सेवाओं का प्रभावी मुहैया कराया जाना शामिल है। इसके अनुसार एक स्मार्ट शहर और उसके नागरिकों के मध्य ऐसा सुगम रिश्ता जो तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। स्मार्ट शहरों में सार्वजनिक, वित्त, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक पुनर्गठन, मनोरंजन, बढ़ती आबादी के दबाव जैसी प्रमुख चुनौतियों से निबटने की क्षमता होना जरूरी है। स्मार्ट शब्द के मायने देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होंगे। हम सिंगापुर, दुबई या शंघाई के प्रयोगों को देश में कभी लागू नहीं कर पाएंगे। यह नकल देश के शहरों के लिए घातक साबित होगी। हम स्मार्ट शहर की अपनी स्वयं की परिभाषा विकसित करनी होगी। एक ऐसी परिभाषा जो हमारे शहरों की क्षमता, प्रकृति और उनकी पहचान को ध्यान में रखकर बनाई जाए। ऐसा करने के लिए हमें अपने शहरों को भली-भांति समझना होगा। शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना लागू करने से पहले हमें शहरी विकास की अब तक लागू की योजनाओं के परिणामों का विश्लेषण करना होगा। शहरों में करीब एक लाख करोड़ के निवेश के दावों के साथ लागू की गई जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी मिशन योजना का अंत कुछ अच्छा नहीं रहा। यह योजना अपने अच्छे उद्देश्य के बावजूद स्थानीय निकायों की उदासीनता और निष्क्रियता की भेंट चढ़ गई।
अधोसंरचना विकास से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट दस वर्ष की लम्बी अवधि के बावजूद अधूरे पड़े हैं। परिणामत: परियोजना की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और इसके लिए जिम्मेदारी निर्धारित करने में किसी की रुचि नहीं दिखती। योजना के दूसरे घटक स्लम हाउसिंग की कहानी तो और भी निराशाजनक रही है। राज्यों और निकायों ने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट स्वीकृत तो करा लिए, पर उन्हें पूरा करने की कोशिश बहुत ही कम शहरों में हो पाई हैं। निर्माण की गुणवत्ता, हितग्राहियों के चयन और आवासों के आवंटन प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार अपने चरम पर रहा। बहुत ही कम ऐसी परियोजनाएं होंगी, जिनमें वास्तविक जरूरतमंदों को योजना का लाभ मिला हो। मैदानी स्तर पर दक्ष और समर्पित अमले के अभाव के साथ ही राज्यों की सतही मॉनीटरिंग इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। नतीजा यह है कि 2012 में समाप्त होने वाली मिशन के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र को 2017 तक का वक्त देना पड़ रहा है। योजना के इस चित्र के परिणाम विचलित करने वाले हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में शहरों को स्मार्ट बनाने की क्या कही, तुरंत लाभ कमाने में रुचि रखने वाली गैर भरोसेमंद कंपनियों ने शहरों में लुभावने सपने दिखाने वाली कॉन्सेप्ट बेचना शुरू कर दिया, वहीं जमीन की खरीद-फरोख्त के बाजार में तेजी आ चुकी है। यह वही भू-माफिया हैं, जो पर्दे के पीछे शहरों में जमीन की कीमत निर्धारित करने में अहम भूमिका रखता है। हम शहरों को स्मार्ट बनाना चाहते हैं, पर यह गांवों और कृषि भूमि के अस्तित्व को खतरे में डालने की कवायद न बन जाए, इसकी हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। इस पृष्ठभूमि में हम यदि ईमानदारी से प्रयत्न करें कि हमारे शहर स्मार्ट बनें तो सबसे पहले हमें अपनी सरकारी मशीनरी को पूरी तरह से ओवरहालिंग करना होगी। यह तभी संभव है, जब हम डिजिटल प्रौद्योगिकी का पूरी तरह प्रशासन में इस्तेमाल करें। निश्चित समय सीमा में सेवाओं के प्रदाय में चूक के लिए जिम्मेदारी नियत हो और चूक करने वालों पर नकेल कसने की ठोस व्यवस्था हो। हमारे शहर तभी स्मार्ट बन सकेंगे, जब हम नियोजन और विकास के फैसले लेने में नागरिकों की अहम भूमिका निर्धारित कर दें।