किसी मानव-समूह अथवा देश की सांस्कृतिक एकता का निर्माण वहाँ के मूल्यों, आदर्शों, प्रेरक सिद्धान्तों एवं प्रेरक मान्यताओं से होता है। ये जितने सुदृढ़, व्यापक, उदार एवं चैतन्य होंगे, उस देश अथवा मानव-समूह की सांस्कृतिक एकता भी उतनी ही सुदृढ़, स्थिर एवं अविचल होगी। इस दृष्टि से उत्सव, त्योहार एवं व्रत संस्कृति के आवश्यक अंग-उपांग हैं। ये तत्व मनुष्य के चारों ओर भावनाओं, विश्वासों, विचारों एवं धार्मिक व्यवहारों का विस्तार करते हैं और मनुष्य समूह रूप में स्वत: ही मन एवं आत्मा की एकता में सूत्र में बँधने लगता है। यह संस्कृति ही मनुष्य को व्यष्टि इकाई की सीमित परिधि से हटाकर सामूहिक अथवा समष्टिसम्पन्न बनाती है। भारत के बिहार प्रान्त का सर्वाधिक प्रचलित एवं पावन पर्व है-सूर्यषष्ठी। ‘सूर्यषष्ठी’ प्रमुख रूप से भगवान सूर्य का व्रत है। इस व्रत में सर्वतोभावेन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। पुराणों तथा धर्मशास्त्रों में विभिन्न रूपों में ईश्वर की उपासना के लिए प्राय: पृथक-पृथक दिन एवं तिथियों का निर्धारण किया गया है। जैसे गणेश की पूजा के लिए चतुर्थी तिथि की प्रसिद्धि है। श्रीविष्णु के लिये एकादशी तिथि प्रशस्त मानी गयी है। इसी प्रकार सूर्य के साथ सप्तमी तिथि की संगति है। यथा-सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी इत्यादि। किंतु बिहार के इस व्रत में सूर्य के साथ षष्ठी तिथि का समन्वय विशेष महत्व का है।
हमारी परम्पराओं की जड़ें बहुत गहरी हैं। अत: जितनी भी भारतीय परम्पराएँ प्रचलित हैं, प्राय: उन सभी का मूल स्रोत कहीं-न-कहीं पौराणिक कथाओं में अवश्य उपलब्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में परमात्मा की माया को ‘प्रकृति’ और माया के स्वामी को ‘मायी’ कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, मायामयी और सनातनी है। प्रकृति के ‘प्र’ का अर्थ है प्रकृष्ट और ‘कृति’ का अर्थ है सृष्टि अर्थात् प्रकृष्ट सृष्टि। दूसरी व्याख्या के अनुसार ‘प्र’ का सवगुण, ‘कृ’ का रजोगुण और ‘ति’ का तमोगुण अर्थ किया गया है। इन्हीं तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है-
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 1।6)
उपर्युक्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री यही प्रकृति देवी स्वयं को पाँच भागों में विभक्त करती हैं-दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं। प्रकृति देवी के एक प्रधान अंश को ‘देवसेना’ कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती हैं। ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक नाम ‘षष्ठी’ भी है।
षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा॥
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्घियोगिनी॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 43।4, 6)
ब्रह्मवैवर्तपुराण के इन श्लोकों से ज्ञात होता है कि विष्णुमाया षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं। षष्ठी देवी के पूजन का प्रचार पृथ्वी पर कब से हुआ, इस संदर्भ में एक कथा इस पुराण में आयी है- प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान न थी। एक बार महाराज ने महर्षि कश्यप से अपना दु:ख व्यक्त किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने महाराज को पुत्रेष्टियज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महाराज की मालिनी नामक महारानी ने यथावसर एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था। महारानी को मृत-प्रसव हुआ है, इस समाचार से हर्ष का स्थान अवसाद ने ले लिया। पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया। महाराज प्रियव्रत के ऊपर तो मानो वज्रपात ही हुआ हो। वे शिशु के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये प्रलाप कर रहे थे। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभी ने देखा कि आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वी की ओर आ रहा है। विमान के समीप आने पर स्थिति और स्पष्ट हुई, उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा के द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा-मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री षष्ठी देवी हूँ। मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूँ एवं अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ-‘पुत्रदाऽहम् अपुत्राय’। इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा। महाराज के प्रसन्नता की सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे। देवी ने भी प्रसन्न होकर राजा से कहा-तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे पृथ्वी पर सभी हमारी पूजा करें। तदनन्तर राजा ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक देवी की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया और अपने राज्य में ‘प्रतिमास के शुक्लपक्ष की ‘षष्ठी’ तिथि को षष्ठी-महोत्सव के रूप में मनाया जाये’-ऐसी राजाज्ञा प्रसारित करायी। तभी से लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभ अवसरों पर षष्ठी पूजन प्रचलित हुआ।
भविष्यपुराण में प्रतिमास के तिथि-व्रतों के साथ षष्ठी व्रत का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-षष्ठी नाम से किया गया है। इस ग्रंथ में षष्ठी व्रत की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह ही वर्णित है। यहाँ भी नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूतजी लोककल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत का महात्म्य, विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं। यहाँ उक्त कथा के अनुसार एक राजा हैं, जो कुष्ठरोगग्रस्त एवं राज्यविहीन हैं, वे किसी विद्वान ब्राह्मण के आदेशानुसार इस व्रत को करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे रोगमुक्त होकर पुन: राज्यारूढ़ एवं समृद्ध हो जाते हैं। पंचमीयुक्त षष्ठी का यहाँ सर्वथा निषेध किया गया है। यथा स्कन्दपुराण में ‘नागविद्धा न कर्तव्या षष्ठी चैव कदाचन’ इसके प्रमाणस्वरूप राजा सगर की कथा का भी उल्लेख किया गया है। सगर ने एक बार पंचमीयुक्त सूर्यषष्ठी व्रत को किया था, जिसके फलस्वरूप कपिलमुनि के शाप से उनके सभी पुत्रों का विनाश हो गया। उक्त दृष्टान्त से इस व्रत की प्राचीनता भी द्योतित होती है।
सम्प्रति इस व्रत का सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्य में दिखायी पड़ता है। संभव है, इसका आरंभ भी यहीं से हुआ हो और अब तो बिहार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है। इस व्रत को सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैं। सूर्यार्ध्य के बाद व्रतियों के पैर छूने और उनके गीले वस्त्र धोने वालों में प्रतिस्पर्धा की भावना देखते ही बनती है। इस व्रत का प्रसाद माँगकर खाने का विधान है। सूर्यषष्ठी व्रत के प्रसाद में ऋतु-फल के अतिरिक्त आटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है, ठेकुआ पर लकड़ी के साँचे से सूर्य भगवान के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है। षष्ठी के दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशय के तट पर मध्याह्न से ही भीड़ एकत्र होने लगती है। सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकों से सुसज्जित होकर फल, मिष्ठान्न और पकवानों से भरे हुए नये बाँस से निर्मित सूप और दौरी (डलिया) लेकर षष्ठी माता और भगवान सूर्य के लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरों से निकलती हैं। भगवान के अर्ध्य का सूप और डलिया ढोने का भी महत्व है। यह कार्य पति, पुत्र या घर का कोई पुरुष सदस्य ही करता है। घर से घाट तक लोकगीतों का क्रम चलता ही रहता है और यह क्रम तब तक चलता है जब तक भगवान भास्कर सायंकालीन अर्घ्य स्वीकार कर अस्ताचल को न चले जाएं। सूपों और डलियों पर जगमगाते हुए घी के दीपक नदी या सरोवर के तट पर बहुत ही आकर्षक लगते हैं। पुन: ब्रह्ममुहूर्त में ही नूतन अर्घ्य सामग्री के साथ सभी व्रती जल में खड़े होकर हाथ जोड़े हुए भगवान भास्कर के उदचाचलारूढ़ होने की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही क्षितिज पर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मंत्रों के साथ भगवान सविता को अर्घ्य समर्पित किये जाते हैं। यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणा के पश्चात् पूर्ण होता है। सूर्यषष्ठी व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आह्वान एवं पूजन करते हैं। पुन: प्रात: अर्घ्य के पूर्व षष्ठी देवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है। इसीलिए लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।
भगवान् सविता प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टों को प्रदान करने में समर्थ हैं- ‘किं किं न सविता सूते’। समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान सविता से हो जाती है, किंतु वात्सल्य का महत्व माता से अधिक और कौन जान सकता है? परब्रह्म की शक्तिस्वरूपा प्रकृति और उन्हीं के प्रमुख अंश से आविर्भूता देवी षष्ठी, संतति प्रदान करने के लिये ही मुख्यतया अधिकृत हैं। अत: पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से करना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। इन्हीं पुराणोक्त कथाओं के भाव सूर्यषष्ठी पर्व के अवसर पर बिहार में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले लोकगीतों में भी देखने को मिलते हैं-
काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमंदिर) हो।
काहे लागी, करेलू छठी के बरतिया हो, काहे लागी़.
अन-धन सोनवा लागी पूजीं देवलघरवा हो,
पुत्र लागी, करीं हम छठी के बरतिया हो, पुत्र लागी़.
इस गीत में समस्त वैभवों की कामना तो भगवान भास्कर से की गयी है, किंतु पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से ही की जा रही है। इन पुराणसम्मत तथ्यों को हमारी ग्रामीण साधु महिलाओं ने गीतों में पिरोकर अक्षुण्ण रखा है।
हमारी परम्पराओं की जड़ें बहुत गहरी हैं। अत: जितनी भी भारतीय परम्पराएँ प्रचलित हैं, प्राय: उन सभी का मूल स्रोत कहीं-न-कहीं पौराणिक कथाओं में अवश्य उपलब्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में परमात्मा की माया को ‘प्रकृति’ और माया के स्वामी को ‘मायी’ कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, मायामयी और सनातनी है। प्रकृति के ‘प्र’ का अर्थ है प्रकृष्ट और ‘कृति’ का अर्थ है सृष्टि अर्थात् प्रकृष्ट सृष्टि। दूसरी व्याख्या के अनुसार ‘प्र’ का सवगुण, ‘कृ’ का रजोगुण और ‘ति’ का तमोगुण अर्थ किया गया है। इन्हीं तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है-
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 1।6)
उपर्युक्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री यही प्रकृति देवी स्वयं को पाँच भागों में विभक्त करती हैं-दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं। प्रकृति देवी के एक प्रधान अंश को ‘देवसेना’ कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती हैं। ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक नाम ‘षष्ठी’ भी है।
षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा॥
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्घियोगिनी॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 43।4, 6)
ब्रह्मवैवर्तपुराण के इन श्लोकों से ज्ञात होता है कि विष्णुमाया षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं। षष्ठी देवी के पूजन का प्रचार पृथ्वी पर कब से हुआ, इस संदर्भ में एक कथा इस पुराण में आयी है- प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान न थी। एक बार महाराज ने महर्षि कश्यप से अपना दु:ख व्यक्त किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने महाराज को पुत्रेष्टियज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महाराज की मालिनी नामक महारानी ने यथावसर एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था। महारानी को मृत-प्रसव हुआ है, इस समाचार से हर्ष का स्थान अवसाद ने ले लिया। पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया। महाराज प्रियव्रत के ऊपर तो मानो वज्रपात ही हुआ हो। वे शिशु के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये प्रलाप कर रहे थे। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभी ने देखा कि आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वी की ओर आ रहा है। विमान के समीप आने पर स्थिति और स्पष्ट हुई, उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा के द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा-मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री षष्ठी देवी हूँ। मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूँ एवं अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ-‘पुत्रदाऽहम् अपुत्राय’। इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा। महाराज के प्रसन्नता की सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे। देवी ने भी प्रसन्न होकर राजा से कहा-तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे पृथ्वी पर सभी हमारी पूजा करें। तदनन्तर राजा ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक देवी की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया और अपने राज्य में ‘प्रतिमास के शुक्लपक्ष की ‘षष्ठी’ तिथि को षष्ठी-महोत्सव के रूप में मनाया जाये’-ऐसी राजाज्ञा प्रसारित करायी। तभी से लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभ अवसरों पर षष्ठी पूजन प्रचलित हुआ।
भविष्यपुराण में प्रतिमास के तिथि-व्रतों के साथ षष्ठी व्रत का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-षष्ठी नाम से किया गया है। इस ग्रंथ में षष्ठी व्रत की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह ही वर्णित है। यहाँ भी नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूतजी लोककल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत का महात्म्य, विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं। यहाँ उक्त कथा के अनुसार एक राजा हैं, जो कुष्ठरोगग्रस्त एवं राज्यविहीन हैं, वे किसी विद्वान ब्राह्मण के आदेशानुसार इस व्रत को करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे रोगमुक्त होकर पुन: राज्यारूढ़ एवं समृद्ध हो जाते हैं। पंचमीयुक्त षष्ठी का यहाँ सर्वथा निषेध किया गया है। यथा स्कन्दपुराण में ‘नागविद्धा न कर्तव्या षष्ठी चैव कदाचन’ इसके प्रमाणस्वरूप राजा सगर की कथा का भी उल्लेख किया गया है। सगर ने एक बार पंचमीयुक्त सूर्यषष्ठी व्रत को किया था, जिसके फलस्वरूप कपिलमुनि के शाप से उनके सभी पुत्रों का विनाश हो गया। उक्त दृष्टान्त से इस व्रत की प्राचीनता भी द्योतित होती है।
सम्प्रति इस व्रत का सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्य में दिखायी पड़ता है। संभव है, इसका आरंभ भी यहीं से हुआ हो और अब तो बिहार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है। इस व्रत को सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैं। सूर्यार्ध्य के बाद व्रतियों के पैर छूने और उनके गीले वस्त्र धोने वालों में प्रतिस्पर्धा की भावना देखते ही बनती है। इस व्रत का प्रसाद माँगकर खाने का विधान है। सूर्यषष्ठी व्रत के प्रसाद में ऋतु-फल के अतिरिक्त आटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है, ठेकुआ पर लकड़ी के साँचे से सूर्य भगवान के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है। षष्ठी के दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशय के तट पर मध्याह्न से ही भीड़ एकत्र होने लगती है। सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकों से सुसज्जित होकर फल, मिष्ठान्न और पकवानों से भरे हुए नये बाँस से निर्मित सूप और दौरी (डलिया) लेकर षष्ठी माता और भगवान सूर्य के लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरों से निकलती हैं। भगवान के अर्ध्य का सूप और डलिया ढोने का भी महत्व है। यह कार्य पति, पुत्र या घर का कोई पुरुष सदस्य ही करता है। घर से घाट तक लोकगीतों का क्रम चलता ही रहता है और यह क्रम तब तक चलता है जब तक भगवान भास्कर सायंकालीन अर्घ्य स्वीकार कर अस्ताचल को न चले जाएं। सूपों और डलियों पर जगमगाते हुए घी के दीपक नदी या सरोवर के तट पर बहुत ही आकर्षक लगते हैं। पुन: ब्रह्ममुहूर्त में ही नूतन अर्घ्य सामग्री के साथ सभी व्रती जल में खड़े होकर हाथ जोड़े हुए भगवान भास्कर के उदचाचलारूढ़ होने की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही क्षितिज पर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मंत्रों के साथ भगवान सविता को अर्घ्य समर्पित किये जाते हैं। यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणा के पश्चात् पूर्ण होता है। सूर्यषष्ठी व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आह्वान एवं पूजन करते हैं। पुन: प्रात: अर्घ्य के पूर्व षष्ठी देवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है। इसीलिए लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।
भगवान् सविता प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टों को प्रदान करने में समर्थ हैं- ‘किं किं न सविता सूते’। समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान सविता से हो जाती है, किंतु वात्सल्य का महत्व माता से अधिक और कौन जान सकता है? परब्रह्म की शक्तिस्वरूपा प्रकृति और उन्हीं के प्रमुख अंश से आविर्भूता देवी षष्ठी, संतति प्रदान करने के लिये ही मुख्यतया अधिकृत हैं। अत: पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से करना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। इन्हीं पुराणोक्त कथाओं के भाव सूर्यषष्ठी पर्व के अवसर पर बिहार में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले लोकगीतों में भी देखने को मिलते हैं-
काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमंदिर) हो।
काहे लागी, करेलू छठी के बरतिया हो, काहे लागी़.
अन-धन सोनवा लागी पूजीं देवलघरवा हो,
पुत्र लागी, करीं हम छठी के बरतिया हो, पुत्र लागी़.
इस गीत में समस्त वैभवों की कामना तो भगवान भास्कर से की गयी है, किंतु पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से ही की जा रही है। इन पुराणसम्मत तथ्यों को हमारी ग्रामीण साधु महिलाओं ने गीतों में पिरोकर अक्षुण्ण रखा है।
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