मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

सूर्य आराधना का पर्व छठ

किसी मानव-समूह अथवा देश की सांस्कृतिक एकता का निर्माण वहाँ के मूल्यों, आदर्शों, प्रेरक सिद्धान्तों एवं प्रेरक मान्यताओं से होता है। ये जितने सुदृढ़, व्यापक, उदार एवं चैतन्य होंगे, उस देश अथवा मानव-समूह की सांस्कृतिक एकता भी उतनी ही सुदृढ़, स्थिर एवं अविचल होगी। इस दृष्टि से उत्सव, त्योहार एवं व्रत संस्कृति के आवश्यक अंग-उपांग हैं। ये तत्व मनुष्य के चारों ओर भावनाओं, विश्वासों, विचारों एवं धार्मिक व्यवहारों का विस्तार करते हैं और मनुष्य समूह रूप में स्वत: ही मन एवं आत्मा की एकता में सूत्र में बँधने लगता है। यह संस्कृति ही मनुष्य को व्यष्टि इकाई की सीमित परिधि से हटाकर सामूहिक अथवा समष्टिसम्पन्न बनाती है। भारत के बिहार प्रान्त का सर्वाधिक प्रचलित एवं पावन पर्व है-सूर्यषष्ठी। ‘सूर्यषष्ठी’ प्रमुख रूप से भगवान सूर्य का व्रत है। इस व्रत में सर्वतोभावेन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। पुराणों तथा धर्मशास्त्रों में विभिन्न रूपों में ईश्वर की उपासना के लिए प्राय: पृथक-पृथक दिन एवं तिथियों का निर्धारण किया गया है। जैसे गणेश की पूजा के लिए चतुर्थी तिथि की प्रसिद्धि है। श्रीविष्णु के लिये एकादशी तिथि प्रशस्त मानी गयी है। इसी प्रकार सूर्य के साथ सप्तमी तिथि की संगति है। यथा-सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी इत्यादि। किंतु बिहार के इस व्रत में सूर्य के साथ षष्ठी तिथि का समन्वय विशेष महत्व का है।
हमारी परम्पराओं की जड़ें बहुत गहरी हैं। अत: जितनी भी भारतीय परम्पराएँ प्रचलित हैं, प्राय: उन सभी का मूल स्रोत कहीं-न-कहीं पौराणिक कथाओं में अवश्य उपलब्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में परमात्मा की माया को ‘प्रकृति’ और माया के स्वामी को ‘मायी’ कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, मायामयी और सनातनी है। प्रकृति के ‘प्र’ का अर्थ है प्रकृष्ट और ‘कृति’ का अर्थ है सृष्टि अर्थात् प्रकृष्ट सृष्टि। दूसरी व्याख्या के अनुसार ‘प्र’ का सवगुण, ‘कृ’ का रजोगुण और ‘ति’ का तमोगुण अर्थ किया गया है। इन्हीं तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है-
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 1।6)
उपर्युक्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री यही प्रकृति देवी स्वयं को पाँच भागों में विभक्त करती हैं-दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं। प्रकृति देवी के एक प्रधान अंश को ‘देवसेना’ कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती हैं। ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक नाम ‘षष्ठी’ भी है।
षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा॥
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्घियोगिनी॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 43।4, 6)
ब्रह्मवैवर्तपुराण के इन श्लोकों से ज्ञात होता है कि विष्णुमाया षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं। षष्ठी देवी के पूजन का प्रचार पृथ्वी पर कब से हुआ, इस संदर्भ में एक कथा इस पुराण में आयी है- प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान न थी। एक बार महाराज ने महर्षि कश्यप से अपना दु:ख व्यक्त किया और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने महाराज को पुत्रेष्टियज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महाराज की मालिनी नामक महारानी ने यथावसर एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था। महारानी को मृत-प्रसव हुआ है, इस समाचार से हर्ष का स्थान अवसाद ने ले लिया। पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया। महाराज प्रियव्रत के ऊपर तो मानो वज्रपात ही हुआ हो। वे शिशु के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये प्रलाप कर रहे थे। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभी ने देखा कि आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वी की ओर आ रहा है। विमान के समीप आने पर स्थिति और स्पष्ट हुई, उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा के द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा-मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री षष्ठी देवी हूँ। मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूँ एवं अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ-‘पुत्रदाऽहम् अपुत्राय’। इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा। महाराज के प्रसन्नता की सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे। देवी ने भी प्रसन्न होकर राजा से कहा-तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे पृथ्वी पर सभी हमारी पूजा करें। तदनन्तर राजा ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक देवी की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया और अपने राज्य में ‘प्रतिमास के शुक्लपक्ष की ‘षष्ठी’ तिथि को षष्ठी-महोत्सव के रूप में मनाया जाये’-ऐसी राजाज्ञा प्रसारित करायी। तभी से लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभ अवसरों पर षष्ठी पूजन प्रचलित हुआ।
भविष्यपुराण में प्रतिमास के तिथि-व्रतों के साथ षष्ठी व्रत का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-षष्ठी नाम से किया गया है। इस ग्रंथ में षष्ठी व्रत की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह ही वर्णित है। यहाँ भी नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूतजी लोककल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत का महात्म्य, विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं। यहाँ उक्त कथा के अनुसार एक राजा हैं, जो कुष्ठरोगग्रस्त एवं राज्यविहीन हैं, वे किसी विद्वान ब्राह्मण के आदेशानुसार इस व्रत को करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे रोगमुक्त होकर पुन: राज्यारूढ़ एवं समृद्ध हो जाते हैं। पंचमीयुक्त षष्ठी का यहाँ सर्वथा निषेध किया गया है। यथा स्कन्दपुराण में ‘नागविद्धा न कर्तव्या षष्ठी चैव कदाचन’ इसके प्रमाणस्वरूप राजा सगर की कथा का भी उल्लेख किया गया है। सगर ने एक बार पंचमीयुक्त सूर्यषष्ठी व्रत को किया था, जिसके फलस्वरूप कपिलमुनि के शाप से उनके सभी पुत्रों का विनाश हो गया। उक्त दृष्टान्त से इस व्रत की प्राचीनता भी द्योतित होती है।
सम्प्रति इस व्रत का सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्य में दिखायी पड़ता है। संभव है, इसका आरंभ भी यहीं से हुआ हो और अब तो बिहार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है। इस व्रत को सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैं। सूर्यार्ध्य के बाद व्रतियों के पैर छूने और उनके गीले वस्त्र धोने वालों में प्रतिस्पर्धा की भावना देखते ही बनती है। इस व्रत का प्रसाद माँगकर खाने का विधान है। सूर्यषष्ठी व्रत के प्रसाद में ऋतु-फल के अतिरिक्त आटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है, ठेकुआ पर लकड़ी के साँचे से सूर्य भगवान के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है। षष्ठी के दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशय के तट पर मध्याह्न से ही भीड़ एकत्र होने लगती है। सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकों से सुसज्जित होकर फल, मिष्ठान्न और पकवानों से भरे हुए नये बाँस से निर्मित सूप और दौरी (डलिया) लेकर षष्ठी माता और भगवान सूर्य के लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरों से निकलती हैं। भगवान के अर्ध्य का सूप और डलिया ढोने का भी महत्व है। यह कार्य पति, पुत्र या घर का कोई पुरुष सदस्य ही करता है। घर से घाट तक लोकगीतों का क्रम चलता ही रहता है और यह क्रम तब तक चलता है जब तक भगवान भास्कर सायंकालीन अर्घ्य स्वीकार कर अस्ताचल को न चले जाएं। सूपों और डलियों पर जगमगाते हुए घी के दीपक नदी या सरोवर के तट पर बहुत ही आकर्षक लगते हैं। पुन: ब्रह्ममुहूर्त में ही नूतन अर्घ्य सामग्री के साथ सभी व्रती जल में खड़े होकर हाथ जोड़े हुए भगवान भास्कर के उदचाचलारूढ़ होने की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही क्षितिज पर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मंत्रों के साथ भगवान सविता को अर्घ्य समर्पित किये जाते हैं। यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणा के पश्चात् पूर्ण होता है। सूर्यषष्ठी व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आह्वान एवं पूजन करते हैं। पुन: प्रात: अर्घ्य के पूर्व षष्ठी देवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है। इसीलिए लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।
भगवान् सविता प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टों को प्रदान करने में समर्थ हैं- ‘किं किं न सविता सूते’। समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान सविता से हो जाती है, किंतु वात्सल्य का महत्व माता से अधिक और कौन जान सकता है? परब्रह्म की शक्तिस्वरूपा प्रकृति और उन्हीं के प्रमुख अंश से आविर्भूता देवी षष्ठी, संतति प्रदान करने के लिये ही मुख्यतया अधिकृत हैं। अत: पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से करना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। इन्हीं पुराणोक्त कथाओं के भाव सूर्यषष्ठी पर्व के अवसर पर बिहार में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले लोकगीतों में भी देखने को मिलते हैं-
काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमंदिर) हो।
काहे लागी, करेलू छठी के बरतिया हो, काहे लागी़.
अन-धन सोनवा लागी पूजीं देवलघरवा हो,
पुत्र लागी, करीं हम छठी के बरतिया हो, पुत्र लागी़.
इस गीत में समस्त वैभवों की कामना तो भगवान भास्कर से की गयी है, किंतु पुत्र की कामना भगवती षष्ठी से ही की जा रही है। इन पुराणसम्मत तथ्यों को हमारी ग्रामीण साधु महिलाओं ने गीतों में पिरोकर अक्षुण्ण रखा है।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

उचित नहीं तालाबों की अनदेखी

जल ही जीवन है। इस कटु सत्य पर हमारी नजरअंदाजी के चलते ही हर साल ग्रीष्म ऋतु में देश भर में पानी को लेकर त्याहि-त्याहि मच जाती है। प्यास लगने के बाद कुंआ खोदना हमारी फितरत में शुमार हो गया है। पानी की समस्या से आज शहर ही नहीं गांव भी मुश्किल में हैं। शहरों में मांग और पूर्ति के बीच खींचतान से हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। कहने को हम चांद पर रहने का सपना देख रहे हैं लेकिन कुदरत ने धरती पर हमें जीवन-यापन को जो कुछ भी दिया है उसकी लगातार अनदेखी हो रही है। अतीत पर नजर डालें तो हमारे अधिकांश प्राचीन मन्दिर तालाबों के किनारे ही विद्यमान हैं। तालाबों की अपनी गरिमा है, तभी तो इसे ताल-तलैया, गहड़ी, पोखर, चेवर, आहर, हौजी-हौदा, तरिया, झील और बावड़ी के नाम से अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है।
देश में जल संकट के मौजूदा हालातों को देखते हुए हमें जल आपूर्ति के दूसरे विकल्प के रूप में तरण-तारण तालाब के महत्व को नजरअंदाज करने से बचना चाहिए। जब देश में बड़े बांध अस्तित्व में नहीं थे, तब यही तालाब सिंचाई का एकमात्र साधन हुआ करते थे। वायु प्रवाह और पर्यावरण के संतुलन की भूमिका में भी तालाबों की अपनी अहमियत है। आज जल प्रबंधन एवं जल संचय के लिए हार्वेस्टिंग सिस्टम की जो दलीलें दी जा रही हैं वह तालाब की ही संरचना है। सनातन समय से तालाब हमारे जल सरोकार के परम्परागत साधन रहे हैं, आज उन्हें विकसित करने की बजाय हम उनसे आंखें फेर रहे हैं। तालाबों की इसी अनदेखी का परिणाम है कि आज शहर ही नहीं बल्कि गांव भी प्यासे हैं। आधुनिक जीवन शैली के हिमायतियों ने जिस तरह जंगल की उपयोगिता को नकार दिया है कुछ वैसे ही तालाबों के प्रति भी उदासीनता बरती जा रही है।
पानी की मांग एवं पूर्ति के बीच प्रति व्यक्ति जल खपत की तुलना करें, तो शहर की तुलना में ग्रामीण लोग आठ गुना कम पानी का उपयोग करते हैं, जो तालाब के निस्तारी से ही सम्भव हो पाता है। देश को पानी की समस्या से निजात दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की नदी जोड़ो परियोजना को मूर्तरूप देने की आज महती आवश्यकता है। देश में तालाबों पर ध्यान देकर 30 से 35 प्रतिशत जल बचाया जा सकता है। देश में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए यदि जल आपूर्ति का वास्तविक चिन्तन करें तो हम तालाबों को सुविधा के सागर के रूप में देख सकते हैं। शहरों और महानगरों में स्वीमिंग पूलों का जो क्रेज इन दिनों हम देख रहे हैं, वह गांव के तालाबों का ही एक परिमार्जित रूप है।
नदी, तालाब एवं सागर सिर्फ हमारी प्यास ही नहीं बुझाते बल्कि इनके पास से गुजरने वाली हवायें बेहतर स्वास्थ्य के लिये आयुर्विज्ञान से कम नहीं हैं। तालाब के किनारे पेड़ के नीचे बैठना, नदी अथवा सागर के किनारे खड़ा होना, लहरों की अठखेलियों को देखना, जलधार में उतर कर इसके आनन्द को महसूस करना अपने आप में सुखानुभूति ही तो है। तालाब में सिर्फ जल ही नहीं होता अपितु इसमें लोकदर्शन के तत्व भी मौजूद होते हैं। ग्रामीण संस्कृति में लोक व्यवहार एवं ग्राम्य सूचना के दो ही केन्द्र हैं पहला चौपाल तो दूसरा हमारे तालाब। भारतीय संस्कृति, अपने दर्शन एवं अध्यात्म के आलोक से विश्व को चमत्कृत करती रही है। यहां लोकधर्म एवं लोकपर्वों का अपना अलग ही महत्व है। सूर्य, चन्द्रमा, नदी, पर्वत, आकाश सभी हमारे आराध्य हैं इसीलिये तालाबों में भी माह विशेष की पूर्णिमा व अन्य तिथियों में व्रत के निमित्त धर्म के सारे कर्मकाण्ड इनके तटों पर ही किये जाते हैं। गांवों के तालाब पर्व विशेष में किसी तीर्थ से कम नहीं लगते। कार्तिक माह के छठ पर्व पर तालाबों की महत्ता हमारे उल्लासपूर्ण माहौल को चार चांद लगा देती है। यह सब हमारे तालाबों की लोक संस्कृति का ही कमाल है कि हम बिना किसी शुल्क के सूर्यदर्शन व प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ उठा पाते हैं।
समय के साथ लोगों की सोच बदली है। तालाबों के प्रति हमारी उदासीनता  का ही नतीजा है कि आज तालाब पहले जैसे नहीं रहे। सरकार हर साल तालाबों के नाम पर अरबों रुपये खर्च कर रही है पर जो पहले से मौजूद हैं उनकी तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा। तालाबों के स्वरूप को सालों साल से चली आ रही मूर्ति विसर्जन की प्रक्रिया ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। लगातार मूर्ति विसर्जन से तालाबों का पटाव जारी है, जिससे जल धारण क्षमता प्रभावित हुई है। हमें देश को यदि पानी की समस्या से वाकई निजात दिलानी है तो पंचायत स्तर पर क्रियान्वयन होने वाली योजनाओं में तलाबों की सफाई व गहरीकरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इतना ही नहीं पशुओं के लिये अलग से तालाब बनाये जाने की व्यवस्था भी हो ताकि ग्रामीणों को संक्रामक रोगों से बचाया जा सके। चूंकि तालाब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं लिहाजा इनकी लगातार हो रही उपेक्षा पर अविलम्ब रोक लगनी चाहिए वरना ये एक न एक विलुप्त हो जाएंगे। देश को यदि जलसंकट से निजात दिलाना है तो हमारी सरकारों को तालाबों के समुन्नतीकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए तभी जल है, तो कल है की प्रासंगिकता सच साबित होगी।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

उसकी याद

तुम्हारी याद आ गई
आकर  रुला  गई
तुम  दूर  ही  सही
मगर पास हो, ऐसा लगा
झूठा  ही  सही
सच्चा  लगा
ऐसा   लगा,
कानों  में  कुछ  गुनगुना  सा  गए
जिसे  कुछ  देर  तक  गाती  रही
खुद  को  समझाती  रही
नहीं  वो  नहीं
जो  कुछ  भी  हुआ
वो सच था कहीं?
नहीं  वो  नहीं
आना  ही  था  उसे तो
इस  कदर  रुलाता  क्यों?
 सपनों  में  आकर जगाता क्यों?
 नींद  मेरी  आँखों से
 दूर   उड़ाता  क्यों?
नहीं  वो  नहीं।।

ऐसा प्यार, कैसा प्यार

ऐसा  प्यार  वैसा  प्यार
कैसा  प्यार  बोल  न
छुप- छुप  के मिलना
लुक- छुप कर बातें करना
ऐसा  कब  तक  चलेगा
बोल  न।
मैं  क्या  करूँ
तुम  कुछ  करो
एक-दूसरे से कहना
अपनी-अपनी  जगह पर
अडिग रहना
कब  तक  चलेगा
बोल न।
ऐसा प्यार, वैसा प्यार
कैसा  प्यार
बोल  न ।।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

आभास

ए नारी
कहने को भले ही तू
आज बहुत आगे निकल आयी
चाँद तारे को छू आयी
फिर भी तू सुलझ नहीं पायी
जिन्दगी क्या है तेरी?
एक उलझी कहानी
कहने को हो स्वतंत्र
लेकिन घर हो या दफ्तर
टेबल हो या बिस्तर
तू हर जगह है परतंत्र
बचपन हो या जवानी
तेरी कौन सुने कहानी
तेरे पग-पग पर घटती हैं घटनाएं
कुछ कहती सुनती हो तो
समझाते हैं लोग ‘तुम कुछ मत कहो’
इसमें होगी सिर्फ तेरी बदनामी
बदनामी के ओट में
लोग करते हैं उपयोग/ उपभोग/मनमानी
ऐ नारी तेरी पहचान है
तू वस्तु नहीं जो भोगा जाए
फिर कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दिया जाए
तुम निर्जीव नहीं जो बार-बार
तेरी इच्छाओं का दमन हो।
क्यों समझती हो तुम अपने आपको कमजोर
तुम आगे आओ, आवाज लगाओ।
फिर कई आवाज तेरी
आवाज में समाहित होंगी
तेरे साथ-साथ कईयों की समस्या सामने होंगी
जिसका हल ढूंढ़ना होगा आसान,
तभी तो लोगों को तेरे सजीव
होने का होगा ज्ञान।
जो कहते हैं तुझे अज्ञान या फिर नादान
अपने को समझते हैं महान,
उनको तेरी औकात, तेरी ताकत
तेरे हौसले का
हो जाएगा आभास।

आस्था और उपासना के निहितार्थ

भारतीय जनजीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से रहते चले आ रहे हैं और यही कारण है कि पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी हंै जिसे भारत के कोने कोने में श्रद्धा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है और उन्हीं में से एक है नवरात्र। देश भर में आदिशक्ति मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और उनकी उपासना का क्रम जारी है। हम प्रतिवर्ष मां शक्ति से खुशहाली की मन्नत मांगते हैं, पर अपने अंतस के दोषों को दूर करने की पहल नहीं करते। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के आरम्भिक नौ दिन मां दुर्गा के नौ रूपों महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती या चामुण्डा, योगमाया, भ्रामरी, रक्तदैतिका, शाकम्भरा, श्रीदुर्गा और चण्डिका के रूप में जाने जाते हैं। मां दुर्गा के समस्त स्वरूपों की उपासना ही नवरात्र कहलाती है।
भारतीय संस्कृति में शारदीय नवरात्र अर्थात मां शक्ति की आराधना का विशेष महत्व है। भारतीय दर्शन में प्रकृति को ही आद्या शक्ति माना गया है। मां दुर्गा ही विश्व की आधारभूत शक्ति हैं, जो विष्णु में सात्विक, ब्रह्मा में राजसी और महेश में तामसी शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। आद्याशक्ति के रूप में ब्रह्मा की सृष्टि, विष्णु की पोषक तथा महेश की संहारक शक्ति के अलावा सूर्य, अग्नि और वायु में भी दुर्गा अपनी शक्ति का संचार करती हैं। उन्हें ही अम्बिका, महिषासुरमर्दिनी, गौरी, नारायणी, काली आदि नामों से स्मरण किया जाता है। जनश्रुति है कि कलिकाल के पूर्व, द्वापर के अन्त में भगवती योगमाया दुष्ट कंस के हाथों से छूटकर भगवान की सहायता और कलिकाल में भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु विविध रूपों व नामों को धारण कर विभिन्न स्थानों पर विराजित हो गर्इं। उनके अवतरण का मुख्य उद्देश्य समाज व राष्ट्र का अनभल करने वाली आसुरी शक्तियों का विनाश कर जन-जन के हृदय में शान्ति, करुणा, पवित्रता, विद्या, बुद्धि, क्षमा, धैर्य और अक्रोध रूप धर्म को स्थापित करना है। मां दुर्गा की कृपा से आसुरी शक्तियों का नाश तो होता ही है, विपदाएं भी टल जाती हैं और मानव के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। प्राचीन परम्परा के अनुसार नवरात्र में दुर्गा ही नहीं, महालक्ष्मी एवं मां सरस्वती की भी प्रतिमाओं की अस्थायी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और अलौकिक शक्ति को जीवन्त रूप प्रदान किया जाता है। व्रत रखकर षोडशोपचार से पूजन करके नैवेद्य अर्पित किया जाता है और उक्त तीनों देवियों का आह्वान कर शक्ति, धन एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में उन्हें प्रसन्न करने हेतु सभी तरह के जतन किए जाते हैं। नवरात्र में अष्टमी एवं नवमी तिथि को महागौरी एवं सिद्धिदात्री रूप की उपासना की जाती है। नवमी को सिद्धिदात्री माता से सौभाग्य, आरोग्य और कल्याण की कामना हरेक साधक के मन में होती है। दुर्गा जी दुर्गुणनाशिनी हैं, उन्हें सिंह पर सवार अष्टभुजाधारिणी रूप में दर्शाया जाता है। उनकी अष्ट भुजाएं अष्ट शक्तियों का प्रतीक हैं। शक्ति सर्वोपरि है, उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं। वस्तुत: शक्ति आदि-अनादि, सर्वज्ञ, अनन्त और सर्वत्र है। यह मनुष्य की आस्था पर निर्भर है कि वह उन्हें किस रूप में स्वीकारे और किस विधि से प्रसन्न करे। दरअसल, जब हम अपने जीवन में काम-क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष, हिंसा, लोभ आदि विकारों और दुगुर्णों से मुक्त होंगे तभी मां शक्ति प्रसन्न होंगी और हमें अष्ट शक्ति और नौ निधियों का वरदान प्राप्त हो सकेगा। मनुष्य जब तक अपने अंतस के विकारों को दूर नहीं करेगा तब तक पूजा-अर्चना, नवरात्र उपासना और जागरण सब के सब व्यर्थ हैं। भारतीय दर्शन में नौ निधियों को नवदुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है। अष्ट शक्तियों और नौ निधियों को देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने का आशय यह है कि जैसे नारी स्वभाव से कोमल व चंचल होती है अत: उसे वश में करना कठिन है, उसी प्रकार धन-वैभव, बल-बुद्धि, यश आदि निधियों पर अधिकार कर पाना कठिन है क्योंकि ये सभी नारी के समान स्वभाव वाले अर्थात कोमल, चंचल व अस्थिर होते हैं। उपासक अत्यंत श्रद्धापूर्वक नवदेवियों की पूजा-अर्चना कर वरदानस्वरूप समस्त निधियों या शक्ति की प्राप्ति तभी कर सकता है जब उसके संस्कारों में सच्ची निष्ठा, पवित्रता, कोमलता एवं दिव्यता समाहित हो। नवरात्र का कालखण्ड अपनी आन्तरिक शक्ति की पहचान, परिवार व समाज में स्त्री के सम्मान तथा अपने आत्मिक बल के विकास हेतु प्रेरणा देता है। यह सोचने की बात है कि भारतीय संस्कृति में स्त्री देवी के रूप में पूजी जाती है और अधिकतर पुरुष वर्ग ही उसे पूजता है किन्तु देवी स्वरूपा स्त्री अपने घर, परिवार, समाज में उसी की हिंसा, उपेक्षा और यातनाओं का शिकार है। वर्तमान परिवेश में नारी दया, त्याग, करुणा, ममता आदि की प्रतिमा मात्र नहीं है, वह घर-बाहर के दोहरे दायित्व का भलीभांति निर्वाह करती हुई पुरुषों से कहीं आगे निकल चुकी है। यह सर्वविदित है कि वह भी देवी की तरह मां के रूप में सृजन, पालन और संरक्षण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाती है, ऐसे में वह भी सम्मान, विश्वास, आदर और स्नेह की अधिकारिणी है। नवरात्र सिर्फ उपासना का ही पर्व नहीं है, इससे हमें नसीहत लेने की दरकार है। विवेक, अज्ञान और विकारों में लिप्त समाज जब तक जीवन की अधिष्ठात्री स्त्री स्वरूपा देवी की अवहेलना और अनादर करता रहेगा, वह सुखानुभूति नहीं कर सकेगा। शक्ति उपासकों को आडम्बर से परे अपने े स्थायी विकारों और दुगुर्णों से मुक्त होने का संकल्प लेना चाहिए। यदि इंसान अपने अंंतस के विकारों को दूर करने का मन बना ले तो वह स्वयं शक्तिमान तो होगा ही उसे कभी किसी शक्ति की याचना नहीं करनी होगी।

समय की मांग बच्चे बनें नैतिकवान

आज हर माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है। कोई उसे अनपढ़ नहीं रखना चाहता। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों सहित देश की साक्षरता प्रतिशत में वृद्धि हुई है। वर्ष 2011 के अनुसार भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है, जिनमें महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है। यही वर्ष 2001 में क्रमश: 65 एवं 54 प्रतिशत थी। यहां हम देखते हैं कि पिछले 10 वर्षों में जिस रफ्तार से शिक्षा की दर बढ़ी, उसी रफ्तार से बच्चों में नैतिक गिरावट भी आई है। हम आये दिन अपने आसपास में घट रही घटनाओं पर नजर डालें तो यह एहसास आसानी से होने लगता है। इस भौतिकवादी युग में अधिकतर लड़के-लड़कियां अपने माता-पिता या गुरुजनों के प्रति सम्मान व समर्पण भाव नहीं दिखा रहे। उनका आदरभाव एवं ध्यान बड़े-बुजुर्गों के प्रति कम होता जा रहा है। वे संस्कार एवं अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।
हम जानते हैं कि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति प्राचीनकाल से ही विश्व में सिरमौर रही है। हमारा देश हर मामले में विश्व गुरु रहा है। बच्चों में नैतिक गिरावट होने के कारण हम इस क्षेत्र में पिछड़ते जा रहे हैं। अत: आज जरूरत है कि बच्चों में नैतिकता का पाठ घर से लेकर बाहर तक पढ़ाया जाए। हमें अपने नौनिहालों को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाना होगा। माता-पिता एवं गुरुजनों को भी इस पर विशेष रूप से विचार करना चाहिए क्योंकि बच्चे ही हमारा भविष्य हैं। यदि हमें बच्चों का भविष्य सुधारना है तो इनके वर्तमान को हर हाल में सुधारना होगा। यदि वे पथ से विचलित हुए तो इसका खामियाजा अगली पीढ़ी को भुगतना होगा। आज जरूरत है कि उनकी शिक्षा मूल्यपरक हो। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल्यपरक शिक्षा द्वारा हम उन्हें जीवन जीने की कला सिखाकर उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। जिसकी शुरुआत हम घर-परिवार से ही कर सकते हैं। जन्म के बाद बच्चा घर में ही सीखना शुरू करता है। वह घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, माता-पिता, बड़े भाई-बहनों आदि से बहुत कुछ सीखता है। अगर परिवार के सभी लोग बच्चों से प्यार करते हैं तो बच्चों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। परिवार में ही बच्चे उठना-बैठना, मीठी वाणी बोलना, सच बोलना, बड़ों का सम्मान करना, घर में गंदगी न फैलाना, सफाई का महत्व, किसी जीव को कष्ट न देना, बड़ों का अभिवादन करना आदि सीखते हैं। चूंकि अनुकरण बच्चों का स्वभाव होता है। उसके सामने परिवार के लोग जैसा नमूना रखेंगे, वह वैसा ही सीखेगा। अत: परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वह भी अपना आचरण शुद्ध रखें। उनकी कथनी और करनी में अंतर न हो। परिवार के सदस्यों के उठने-बैठने एवं पहनावे के तौर-तरीके को भी बच्चे सीखते हैं। इन सबका बच्चों के बाल मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। उनका स्वत: आंतरिक विकास होता रहता है। बच्चों में स्वस्थ आदतों एवं नैतिक गुणों के विकास का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को मूल्य आधारित कहानियां सुनाना चाहिए। साथ ही उनको प्रकृति एवं पर्यावरण से भी सीखने को प्रेरित करना चाहिए। इस प्रकार बच्चे की नींव परिवार में ही अच्छे ढंग से पड़ सकती है एवं उसका जीवन नैतिकतापूर्ण एवं मूल्यपरक हो सकता है। बच्चों से ही विद्यालय है और शिक्षक भी। अगर बच्चे न हों तो शायद इनकी भी जरूरत न हो। चूँकि बच्चे ही हमारे समाज एवं राष्टÑ के भावी नागरिक हैं। अत: इनकी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वे अच्छी बातें सीख सकें जिससे उनमें मूल्यों का विकास हो सके। इसके लिए सबसे पहले हमें ‘मूल्यपरक’ पाठ्यक्रम बनाना होगा एवं दूसरे आदर्श, शिष्ट, गुणवत्तापूर्ण एवं विद्वान शिक्षकों की बहाली करनी होगी।
हम सभी जानते हैं कि माता-पिता के बाद हर बच्चे का आदर्श गुरु ही होता है। गुरु का अर्थ है अज्ञान रूपी अंधकार दूर करने वाला। बच्चे भी वही काम करते हैं जो गुरु से सीखते हैं। गुरु का व्यवहार, आचरण अच्छा होगा तभी वह उदाहरण पेश कर सकता है। कहावत भी है कि उपदेश से उदाहरण श्रेष्ठ होता है। अत: गुरु का आचरण बच्चों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें ‘राष्टÑ का निर्माता’ कहा जाता है। गुरु जिस आसन पर बैठे होते हैं अगर चाहें तो वे बच्चों में प्राण फूंक सकते हैं। वे उनमें सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, सहयोग, समाज सेवा, त्याग एवं देशप्रेम आदि नैतिक मूल्य विकसित कर सकते हैं। अच्छे गुरु होंगे तभी विद्यालय का वातावरण भी अच्छा होगा और तभी बच्चे भी गुणी बनेंगे।
व्यक्ति से ही समाज बनता है। समाज और व्यक्ति में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। अत: जैसा व्यक्ति होगा वैसा समाज बनेगा और जैसा समाज होगा वैसा देश बनेगा। आज हमारे खेत-खलिहान का स्थान पक्के मकानों एवं कल-कारखानों ने ले लिया है। पूरे समाज पर भौतिकता का प्रभाव है। अत: ऐसे समय में समाज विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का आयोजन कर बच्चों में मूल्यों का विकास करने के लिए अवसर प्रदान कर सकता है। हमारा समाज अच्छे लोगों से भरा हुआ है, बस जरूरत है उनके कला-कौशल का उपयोग करने की। इनका उपयोग बच्चों के मार्गदर्शन हेतु बखूबी किया जा सकता है ताकि उनमें सद्गुणों का विकास हो सके और हमारी अगली पीढ़ी भी गुणवान और नैतिकवान बन सके। अत: समय की माँग के अनुसार हम सभी का दायित्व है कि हमारे बच्चे, हमारी पीढ़ियां नैतिक गुणों को लेकर आगे बढ़ें तो निश्चित ही पुन: हमारा समाज और देश विश्व गुरु की गरिमा को पा सकेगा।
           

भेदभाव मिटाएं, बेटियां बचाएं

समय परिवर्तनशील है। समय के साथ-साथ सब कुछ तेजी से बदलता जाता है। हमारी सोच, हमारा रहन-सहन, वातावरण सब कुछ। बदलाव का मूल कारण शिक्षा भी है। जो समाज जितना शिक्षित होगा, उसमें उतनी ही तेजी से बदलाव और विकास होगा। हमारे यहां शिक्षा का प्रचार-प्रसार तेजी से हो रहा है और हम बदलाव भी महसूस कर रहे हैं। फिर भी कुछ जगहों पर कुछ लोगों की संकुचित मानसिकता की वजह से लिंगभेद आज भी हमारे समाज में व्याप्त है जोकि गंभीर बात है। बेटा-बेटी जब एक ही माता-पिता की संतान हैं तो भेदभाव क्यों? एक ही परिवार में उत्पन्न बेटा-बेटी में भेदभाव घर-घर में तो नहीं पर कुछ घरों में आज भी व्याप्त है, जोकि काफी दु:खद और निंदनीय है।
आज हमारे समाज के कुछ हिस्सों में कन्या भ्रूणहत्या बदस्तूर जारी है। पहले जहां नवदम्पति अपनी संतान के आने की खुशखबरी सुन फूला नहीं समाता था, वहीं आज संतान की खुशखबर सुनते ही पहले जांच करवाता है। जांच-परीक्षण में अगर लड़का आया तो ठीक, अगर लड़की आई तो एक नया नाटक शुरू। इसमें अगर  गर्भवती महिला विरोध करती है तो उस पर पूरे परिवार की तरफ से दबाव बनाया जाता है। इससे अन्याय और दुर्भाग्यपूर्ण बात दूसरी क्या हो सकती है? कुछ लोग मानते हैं कि लड़का ही घर का चिराग है और लड़की तो पराया धन है। लड़का ही वंश को आगे ले जाने में सक्षम है, लड़की बोझ है, उसके सयानी होने से शादी-विवाह तक अनेक जोखिम हैं। यह सोच न केवल गलत है बल्कि जोखिमपूर्ण भी है। आज हम देखें तो हर क्षेत्र में बेटियां आगे निकल रही हैं। चाहे वह क्षेत्र कला का हो, खेल का हो, व्यवसाय, तकनीक या राष्ट्रीय-अंतरराष्टÑीय स्तर पर प्रतियोगिता की ही बात हो, हर जगह बेटियां बेटों से कहीं अधिक कामयाब हैं। अंतरिक्ष में जाने की बात हो या फिर एवरेस्ट पर पहुंचने की, बेटियां हर जगह परचम लहरा रही हैं, फिर भी बहुत सारे ऐसे राज्य हैं जहां लड़कियों की संख्या बहुत कम है। इसका प्रमुख कारण कन्या भ्रूणहत्या ही है। बेटा हो या बेटी, वह स्वस्थ हो, संस्कारी हो यही काफी है। बेटियां तो वैसे भी घर की खिलखिलाहट होती हैं। उनके बिना घर-घर नहीं लगता। बेटे से ज्यादा बेटियां रिश्तों को समझती हैं। जरूरत पड़ने पर मां-बाप की सेवा करती हैं। उनमें बचपन से ही सहयोग की भावना होती है। घर के छोटे-छोटे कामों में वे अक्सर मां का हाथ बंटाती हैं। यह  भी सच है कि वे कम उम्र में ही घर की पूरी जिम्मेदारी सम्हालने में भी पीछे नहीं रहतीं।
बेटा हो या बेटी, हैं तो मां-बाप का अंश ही, बावजूद बेटियों के साथ भेदभाव हो रहा है। हम और आप जब तक अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तब तक कुछ भी हासिल नहीं होगा। किसी भी समाज के विकास में महिला और पुरुष का बराबर योगदान होता है फिर हम बेटियों को क्यों इस दृष्टि से देख रहे हैं? बहू तो हर किसी को चाहिए पर बेटी नहीं। जब बेटी ही नहीं रहेगी तो बहू कहां से लाएंगे। हर घर में बेटा हो तो उस घर को एक बहू भी चाहिए। बिना किसी के घर से बेटी लाए क्या बहू की आवश्यकता पूरी की जा सकेगी। मुल्क में लिंगभेद का मुख्य कारण अशिक्षा है। हम जब शिक्षित होते हैं तो हमारी सोच भी विस्तृत हो जाती है। हमें सही और गलत का बोध होने लगता है। वहीं गांवों में आज भी अंधविश्वास जडें जमाए हुए है, जिससे हमें बाहर निकलना होगा। ऐसा नहीं कि शिक्षित समाज में लिंगभेद नहीं है, पर तुलनात्मक दृष्टि से कम है। आज राज्यों और केन्द्र सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनमें बालिकाओं को समान अवसर मिल रहे हैं। बालिका शिक्षा योजना, बालिका पोशाक योजना, साइकिल योजना और बालिका विवाह जैसी योजनाओं का मकसद बेटियों को शिक्षित कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। अब तो सरकारें उन्हें मैट्रिक और इंटर में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने पर छात्रवृत्ति भी दे रही हैं। सरकार की यह पहल वाकई सराहनीय है। इन तमाम योजनाओं का लाभ हम तभी उठा सकेंगे जब हमारे आसपास भी ऐसा ही माहौल बने। घर में जब समानता का वातावरण रहेगा, कहीं कोई भेदभाव नहीं रहेगा तभी हमारी बेटियां खुलकर सांस ले पाएंगी वरना तमाम योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। बेटियों को बचाना है तो हमें अपने आसपास के लोगों को जागरूक कर उन्हें लिंगभेद के दुष्परिणाम से अवगत कराना होगा। एक स्वस्थ समाज के लिए भेदभाव का मिटना और मिटाना अति आवश्यक है। तभी हम अर्द्धनारीश्वर की कल्पना को साकार कर पाएंगे।
         

आधी आबादी को भी लगें पंख

अर्द्धांगिनी, वामांगी, सहचरी जैसी अनेक उपमाओं से विभूषित भारतीय महिलाएं आज भी अपने अस्तित्व को तलाशती नजर आ रही हैं। आधुनिक शिक्षा तथा बढ़ती चेतना के चलते वे घरों की चहारदीवारी लांघकर काम करने और परिवार की सुख-सुविधा में बढ़ोत्तरी के लिए सतत प्रयास कर रही हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी योग्यता और ईमानदारी से महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। बावजूद इसके, परम्परागत भारतीय समाज में बहुसंख्यक महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती।
बचपन से ही उन्हें भावी वैवाहिक जीवन के संबंध के बारे में समझाया जाता है कि मायके और ससुराल में बहुत अन्तर है। पिता के घर से डोली उठने के बाद ससुराल से उनकी अर्थी ही उठेगी। पति ईश्वर होता है और वही उसका मालिक भी। पति और ससुराल वालों की हर इच्छा का पालन करना ही उसका धर्म है। विवाह के बाद उसे ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए जो ससुराल वालों को पसंद न हो। इस तरह की बातें परम्परागत समाज का हिस्सा बन गई हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी बिना किसी रुकावट के आज भी चलन में हैं। विवाह से पहले उसकी शिक्षा-दीक्षा, कला-कौशल तथा अन्य सद्गुणों को देखा और सराहा जाता है। विवाह के कुछ ही दिनों बाद उसके सामने यह दृश्य उपस्थित हो जाता है मानों वह नौकरानी है। विवाह के बाद आमतौर पर भारतीय नवविवाहिताओं के लिए ससुराल कैदखाना बन जाता है। बात-बात में खरी-खोटी सुनाना, दहेज में मनचाहा सामान न लाने पर ताने, घर के हर छोटे-बड़े के ताने सुनना नववधू के लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं होता। बचपन से मिली शिक्षा और संस्कारों से बंधी महिलाएं किंकर्त्तव्यविमूढ़ बनी सारे अत्याचारों को चुपचाप झेलती रहती हैं। वह न तो अपने मायके वालों से ही कुछ कह पाती हैं और न ही ससुराल वालों का मुंह बंद करा सकती हैं। प्राय: वह मायके और ससुराल के बीच घड़ी के पेण्डुलम की तरह होती हैं। उसकी आहत भावनाओं को समझने वाला कोई नहीं होता। उसके सामने घुट-घुट कर जीने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं होता। यह स्थिति शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही वर्ग की है। शिक्षित महिलाओं के लिए इस तरह का जीवन बिताना कम कष्टकारी नहीं होता। उससे लोगों की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। पढ़-लिखकर वह व्यवसाय के लिए मानसिक रूप से तैयार होती हैं ताकि मुसीबत के समय पर वह परिवार की आर्थिक सहायता कर सकें। ऐसे समय में पिता या घर वाले उसे काम करने से मना कर दें या विवाह के बाद ससुराल पक्ष के लोग ही मना कर दें तो उसकी मनोदशा कैसी होती होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यहां यह तथ्य भी विचारणीय है कि बेटी से काम करवाने पर बिरादरी और समाज क्या कहेगा। जबकि बिरादरी और समाज को तो खुश होना चाहिए कि वह किसी संस्था में काम कर रही है।
कहा जाता है कि वैवाहिक जीवन एक गाड़ी है जिसमें पति और पत्नी रूपी दो पहिये हैं। इनसे आपसी तालमेल आवश्यक है। इस तरह की विचारधारा से प्रेरित होकर कोई नारी यदि पति की सहायता या पारिवारिक दायित्व को मिलकर हल करने की कोशिश करती है तो प्राय: पुरुष का अहं आहत होता है। सामान्यत: इसका अर्थ यही लगाया जाता है कि  नौकरी करने वाली महिला से विवाह कर लेने से उसका वैवाहिक जीवन नष्ट हो जाएगा। वे इन बातों को भी नहीं सोचते कि पारिवारिक दायित्व का निर्वहन करने के बाद उसे नौकरी भी करनी है। ससुराल वालों की सेवा, पति की सेवा और बाल-बच्चों का भी उस पर बोझ है। जिन्दा होने के कारण वह भी थकती जरूर है। स्थिति विकट और चिन्तनीय है। ढेर सारे महिला संगठन मिलकर भी इस तरह की परेशानियों का कोई हल तब तक नहीं निकाल सकते जब तक कि समाज के सोचने का तरीका नहीं बदले। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस या महिला सशक्तीकरण वर्ष मनाना तभी सार्थक होगा जब समाज उसकी भावना समझने को तैयार हो। जिस मुल्क में लोग आज भी अपनी परम्पराओं से जुडेÞ हों, नारी उत्पीड़न का गहरा माहौल हो वहां महिला संगठनों का वर्तमान स्वरूप पूर्णतया निरर्थक ही साबित होगा। आवश्यकता इस बात की है कि समाज को अपना स्वरूप और सदियों से चली आ रही प्रथाओं को बदलना होगा। अर्द्धनारीश्वर की भावना विकसित कर समाज में वह माहौल बनाना होगा जिसमें पति-पत्नी के बीच सम्मान, स्नेह और सहयोग की भावना हो। भारतीय नारी को उसके हिस्से का आकाश दिया जाये ताकि वह आसानी से उड़ सके।
               

शिक्षा और रास्ता भटकती युवा पीढ़ी

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके कर्म सिर्फ उसे ही नहीं बल्कि वृहद समाज को प्रभावित करते हैं जिसका वह अंग होता है। एक सभ्य समाज के विकास में प्रत्येक कर्म सहायक होते हैं। जो श्रेष्ठ शुभ और ज्ञानवर्धक पथ की ओर जाने के लिए संकेतक होते हैं।कर्म स्वार्थवश नहीं परमार्थवश होना चाहिए। हमारे कर्म सभी के कष्टों को दूर करें, न कि समाज को दूषित और कलंकित करें। अगर हम विद्यार्थी जीवन और उसके कर्म की चर्चा करें तो सच यह है कि उनके पूरे जीवन की कुंजी अनुशासन की पेटिका में बंद है। वस्तुत: उस जीवन संगीत की लय उसके भीतर बसी हुई है।
अगर विद्यार्थी जीवन से अनुशासन को निकाल दिया जाए तो वह कितना बदसूरत हो जाता है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन की एक अनुशासनहीनता हमें निरंतर उसी गलत रास्ते पर चलने को बाध्य कर देती है। एक बार गलत रास्ते पर जाने के बाद हर कदम गलत ही पड़ता है। जैसे कोट का एक बटन गलत लग जाने से कोट के सारे बटन गलत हो जाते हैं। बेतरतीब, नीचे ऊपर, देखने में बदसूरत दिखते हैं। प्रत्येक युवा किसी भी समाज के लिए एक अतीत का रिक्त स्थान और भविष्य का निर्माणकर्ता होता है। वह ज्यों-ज्यों बड़ा होता है त्यों-त्यों भविष्य के निर्माण के प्रति उसका उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है। स्वतंत्र विचारधारा अगर उसका अधिकार है तो पुरुषार्थ का प्रयोग उसका उत्तरदायित्व। प्रत्येक युवक भविष्य की आशा है, सिर्फ अपने मां-बाप की उम्मीद नहीं बल्कि राष्ट्र की उम्मीदें उससे उसी रूप में जुड़ी हैं। उसी प्रकार प्रत्येक युवती भविष्य की धात्री या धरित्री सदृश्य प्रतिमूर्ति है। यही कारण है कि अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए प्रत्येक समाज, प्रत्येक राष्ट्र की आंखें युवा वर्ग की ओर टकटकी लगाए रहती हैं। ऐसे में युवा वर्ग का कर्तव्य बनता है कि वह अपने समाज और राष्ट्र को केन्द्र में रखकर कर्तव्य और दायित्वों का निर्वहन करे। सच में यह कहना-लिखना एवं समझाना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है इसे अपनाना। युवा मन कल्पनाओं का पंख लगाकर उड़ना चाहता है। बिना किसी की परवाह किए। आजादी उसे अच्छी लगती है अंकुश नहीं। युवा मन दिवास्वप्न देखना पसंद करता है लेकिन कल्पनाओं को यथार्थ में परिवर्तित करना किसी चुनौती से कम भी तो नहीं। कहते हैं सपना देखना चाहिए तभी तो उसको पूरा करने के लिए हम प्रयासरत होेंगे। बशर्ते कल्पना थोथी न हो कल्पना अर्थहीन न हो, उर्वर हो, संकल्पपूर्ण हो। कहते हैं मनुष्य बहुत ताकतवर होता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी दृढ़इच्छा शक्ति होती है। अगर वह दिल से किसी काम को करने की ठान ले तो मुश्किल कुछ भी नहीं। युवावस्था वैसे भी काफी ऊर्जावान होती है फिर उसके लिए क्या मुश्किल और क्या नामुमकिन? युवा तो राष्ट्र की दिशा और दशा बदलने में समर्थवान है। उसकी ताकत की कोई सीमा नहीं, बशर्ते कि वह अपनी पूरी ऊर्जा को सही दिशा में लगाए अर्थात उसमें एक सुर, एक लक्ष्य और राष्ट्रप्रेम हो। कहते हैं कि जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते वे हर काम अलग ढंग से करते हैं। सफलता के लिए समय प्रबंधन की कला जानना बेहद जरूरी है जो व्यक्ति अपने जीवन में समय का महत्व देता है, वही एक समय आने पर महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाता है या कहें कि महत्वपूर्ण काम कर जाता है। किसी व्यक्ति की सफलता-असफलता उसके काम करने के तरीके और समय की पाबन्दी पर निर्भर है। समय प्रबंधन की कला जिसे मालूम है, उसकी सफलता न सिर्फ सुनिश्चित है बल्कि उसकी सफलता को कोई रोक नहीं सकता। व्यक्ति व्यर्थ के कार्यों में अपना मूल्यवान समय गंवा देता है? और समय बीतने के बाद पश्चाताप के सिवा उसके पास कुछ भी विकल्प नहीं होता। वहीं अगर आप सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़े, सुनें और देखें तो पाएंगे कि सफल व्यक्ति एक-एक पल का हिसाब रखते हैं। वह हर काम के लिए समय निर्धारित करते हैं और समय के दुरुपयोग से बचते हैं। मनुष्य की सफलता-असफलता उसकी मनोदशा पर भी निर्भर है। यदि आप महत्वाकांक्षी हैं तो आप अपनी शक्ति सामर्थ्य पर विश्वास करेंगे। तन-मन से उत्साहित रहेंगे तथा उस कार्य को करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे किंतु अतिशय महत्वाकांक्षा जीवन को सुपथ पर नहीं चलने देती।
महात्मा गांधी ने शिक्षा को जिस तरह से परिभाषित किया था, शरीर, मन और आत्मा, इन तीनों के विकास पर बल दिया था, वह आज पूर्णत: सही साबित नहीं हो रहा है क्योंकि समय के साथ अन्य क्षेत्रों की भांति शिक्षा के क्षेत्र में समस्त मर्यादाओं और मान्यताओं की इतिश्री हो गई है। युवा वर्ग के मन-मस्तिष्क पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी का भी काफी असर पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा के प्रति उनकी रुचि कम होती जा रही है। हालात ये हैं कि मीडिया धीरे-धीरे शिक्षक का स्थान ग्रहण करता जा रहा है। निरंतर बढ़ती जनसंख्या और कम होते रोजगार के अवसरों के कारण युवा वर्ग कुंठित है। दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था प्रतियोगितावादी होने के कारण बेहतर परिणाम लाने की होड़ काफी बढ़ चुकी है। आज जब युवा वर्ग यह देखता है कि किस प्रकार राजनीतिक एवं अन्य प्रभावों के चलते अयोग्य व्यक्तियों को भी मनचाहे स्थानों में दाखिला एवं पदों पर नियुक्ति प्राप्त हो जाती है तो सुयोग्य पात्रों के मन में निराशा और कुंठा की भावना उत्पन्न हो जाती है और वे धीरे-धीरे प्रयास करना छोड़कर अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। उनमें समाज के प्रति रोष एवं घृणा की भावना बढ़ती चली जाती है। इन सारी परिस्थितियों के लिए परिवार, समाज एवं शिक्षक वर्ग समान रूप से उत्तरदायी है। वहीं शिक्षा पद्धति भी कम दोषपूर्ण नहीं है। इन सभी में सुधार की जरूरत है।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

नई राह, नई मंजिल

स्त्री शक्ति की प्रतीक दुर्गा या काली की पूजा-आराधना दरअसल इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की महत्ता और गौरव की सामुदायिक स्वीकृति को ही रेखांकित करता है। एक अर्थ में यह स्त्री-शक्ति क्षमता, योग्यता का सम्मान तो है ही साथ ही परिवार, सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों के सम्पोषण व योगदान के लिए समाज का उनके प्रति प्रकट कृतज्ञता भी है। परम्परागत छवि से परे व लीक से हटकर महिलाओं ने आज जीवन के तमाम क्षेत्रों में कामयाबी की नई बुलंदियों को छुआ है। चौतरफा अपनी जीत के परचम लहराये हैं।
आज इनकी जिन्दगी महज रसोई से घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि इससे बहुत आगे जा चुकी है। कारपोरेट सेक्टर से लेकर अंतरिक्ष की अनंत-अथाह ऊंचाइयों तक आज महिलाओं ने अपने अद्भुत साहस, प्रतिभा, जीवट, क्षमता और कुशलता के अनगिनत जौहर दिखाए हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, एज्यूकेशन, मैनेजमेंट, मीडिया से लेकर सेना, राजनीति, कला, प्रशासन, फिल्म, ग्लैमर व फैशन तक की दुनिया में अपने को साबित और स्थापित किया है। आज विकास और प्रगति का कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। अब इनकी छवि डरी-सहमी सी अबला महिला की नहीं बल्कि नए जमाने की तेज-तर्रार, कम्प्यूटर फ्रेंडली, नेट सर्फिंग करती व फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती स्मार्ट, बोल्ड और स्ट्रांग वूमेन की है। संवेदनशीलता उनकी कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है। गांव हो या शहर शिक्षा, आधुनिकता, ग्लोबलाइजेशन, मीडिया व इंटरनेट क्रांति से आज हर वर्ग की महिलाओं में पर्याप्त जागरूकता और जीवन में कुछ कर गुजरने की महत्वाकांक्षा पैदा हुई है। छोटे शहरों और कस्बों तक की लड़कियां अब सुनहरे करियर के सपने संजोने लगी हैं। एज्यूकेशन और सूचना तकनीक ने उनके इन सपनों को पंख भी लगाए हैं। नतीजन आज वे पहले से कहीं ज्यादा स्ट्रांग, सेल्फ डिपेंडेड, कंफीडेंट और सेफ हैं। अपने क्वालीफिकेशन और जॉब की वजह से अब वे किसी के एहसानों की मोहताज या कृपा पात्र नहीं बल्कि बोल्ड और एक्टिव हैं। अब इनसे असहमत तो हुआ जा सकता है पर उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
मॉर्डन महिलाओं की नई मंजिल अब सिर्फ हाउस वाइफ बनकर पूरी उम्र वह जिन्दगी गुजार देना नहीं है। किचेन, पति व बच्चों से आगे भी कुछ करने व बनने के सपने अब उनके भीतर हिलोरें लेने लगे हैं। अपनी एक स्वतंत्र पहचान और अलग वजूद अब बनाने-तलाशने लगी हैं ये। लड़कियों की पहली प्राथमिकता अब एज्यूकेशन और करियर है। काफी करियर कांसस हुई हैं अब लड़कियां। उनकी सोच पहले से कहीं अधिक प्रोफेशनल और जॉब ओरिएंटेड हुई है। सिर्फ हाउस वाइफ बनकर सारी उम्र गुजारना अब इन्हें गंवारा नहीं। अपनी एबिलिटी और टैलेंट निखारने-संवारने के लिए नए रास्ते बनाने-सोचने में किसी भी तरह आज ये लड़कों से पीछे नहीं बल्कि कई मामलों में उनसे अव्वल हैं। ‘जहां चाह, वहां राह’ की तर्ज पर इन्होंने अपनी मंजिल की राहों को खुद तराशा है। महिलाओं का सशक्तीकरण दरअसल सामाजिक विकास का ही एक अहम पार्ट है। चूंकि एक महिला पूरे परिवार की धुरी होती है। इसलिए स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए महिलाओं का विकसित, सक्षम और सुशिक्षित होना बेहद जरूरी है। मॉडर्न वूमेन के सपने महज कपोल कल्पना नहीं बल्कि ठोस हकीकत बन चुके हैं। अपनी क्रिएटिव एनर्जी का बखूबी सटीक इस्तेमाल का हुनर आज भी इन मॉडर्न महिलाओं में है तभी हर जगह इनकी धाक जमती जा रही है। आज बड़ी संख्या में डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर, जर्नलिस्ट, कम्प्यूटर प्रोफेशनल, फैशन डिजाइनर मॉडल, अफसर बनकर दौलत व शोहरत पा रही हैं। इससे अब ये परिवार के लिए बोझ नहीं, सम्मान की वजह साबित होने लगी हैं। लड़कियों को कामयाब होते देख समाज का नजरिया ही नहीं बदला वरन् एक जागरूकता आई है। सफल महिलाएं दूसरी अन्य लड़कियों के रोल मॉडल बनकर उन्हें मोटिवेट को कहीं ज्यादा अच्छे माहौल, वक्त और अवसर मिलने लगे हैं। इससे महिलाओं के पक्ष में एक नई सामाजिक क्रांति आई है। आज महिला सशक्तीकरण की सबसे बड़ी वजह महिलाओं का इकोनॉमिकली सेल्फ डिपेंडेड होना है। यह आर्थिक सुरक्षा ही उन्हें जीवन में किसी भी मुश्किल का सामना करने का हौसला और शक्ति देता है। आमतौर पर महिलाओं की एक खूबसूरत और अहम खासियत इनका जज्बाती होना माना जाता है। पर इनकी संवेदनाएं क्रिएटिव एनर्जी से भरपूर होती हैं। अमूमन महिलाएं अपने निश्च्छल, सेवा, दया व संयम जैसे गुणों से कितनों के लिए जीने की वजह और प्रेरणास्रोत बनती आई हैं। कहते हैं कि अगर सिर्फ महिलाएं हों तो कहीं कोई जंग न हो। वास्तव में स्त्रियां धरती पर मानव जाति को कुदरत से प्राप्त ऐसी नेमत और उपहार है जिसका यह पूरा संसार हमेशा आभारी रहेगा, तभी तो औरत मां और दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती जैसे विविध रूपों में पवित्र, पूजनीय और महान है। एक स्त्री के लिए सबसे बड़ी व गौरवपूर्ण बात उसका मां होना है। जो मां जन्म देने के साथ ही उम्र भर संतान के कल्याण और सुरक्षा की दुआएं देती है, उसका दर्जा सारे संसार में सबसे ऊंचा कैसे नहीं हो सकता। मां के रूप में दुर्गा पूरे संसार के कल्याण व सुरक्षा की प्रतीक मातृशक्ति है। इसलिए स्त्री-शक्ति का यह रूप हमेशा से ही श्रेष्ठ और श्रद्घेय रहा है तथा रहेगा।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

अजेय मातृशक्ति

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
मातृ या माता यानी सृष्टि को चलायमान रखने वाली दृश्य शक्ति। मनुष्य का जन्म लेने के साथ ही वह पहली शक्ति जिसका स्पर्श और अमृतपान कर वह जीवनयात्रा का शुभारंभ करता है। नवजात शिशु को कोई नहीं बताता पर उसकी उंगलियाँ स्वत: अपनी जन्मदात्री का स्पर्श पाने को व्याकुल हो जाती हैं और जन्मदात्री उसे अपने आँचल में समेटकर मानो उसके पोषण और संरक्षण का अटूट आश्वासन दे देती है। माँ है भी तो सृष्टि की सबसे कल्याणमयी, कल्याणकारी रूप। किसी अन्य रिश्ते में कभी नि:स्वार्थ त्याग, दयालुता और सहिष्णुता जैसे गुण इतने प्रबल रूप में समाहित नहीं होते, जितने माँ के रिश्ते में। शायद यही कारण है कि देवता भी धरती पर स्वत: प्रकट न होकर एक माता का सहारा लेते रहे, चाहे वह कौशल्या के रूप में हो या देवकी के रूप में।
मातृत्व नारी का सर्वश्रेष्ठ गुण है जिसके बिना नारी अधूरी मानी जाती है। लेकिन यह मातृत्व सिर्फ अपनी संतान के संदर्भ में प्रयुक्त नहीं होता, बल्कि व्यापक संदर्भ में पूरी मानव जाति एवं अन्य जीवों के प्रति दया, ममता, करुणा जैसे स्त्री सुलभ गुणों के लिए प्रयुक्त होता आया है। भारतीय संस्कृति में आरंभ से ही मातृत्व गुण से परिपूर्ण नारियाँ सम्मान की पात्र रही हैं, यही कारण है जब प्रकृति के विभिन्न रूपों को देवता मानकर उनकी उपासना शुरू हुई तब मातृशक्ति के रूप में आद्याशक्ति ऊषा और अदिति जैसी देवियों की भी कल्पना कर उनकी प्रार्थना की गई। यहाँ तक कि वैदिक युग से पूर्व की सैंधव संस्कृति में भी मातृदेवी की अनेक मूर्तियों की पहचान की गई है। धीरे-धीरे हिन्दू धर्म-संस्कृति ने इस मातृशक्ति को अपनी लंबी परम्परा में व्यापक रूप दिया। आज के अत्याधुनिक समय में मातृशक्ति की महानता कितनी है, इसका प्रमाण लगभग हर हिन्दू घर में होने वाले शारदीय नवरात्र का आयोजन दे देता है। परन्तु इससे भी अधिक महानता इस बात की है कि इस विविधधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में मातृशक्ति का विस्तार हम मदर टेरेसा जैसी करूणामयी संत में भी स्वीकार करते हैं। कुंवारी पूजन की प्रथा इस मान्यता का प्रतीक है।
आज जमाना हाईटेक हो गया है और जमाने के साथ हाईटेक हो चली हैं आज की नारियाँ। एक हाथ में मोबाइल और गोद में लैपटॉप मौजूद हैं तो दूसरा हाथ गाड़ी की स्टेयरिंग दृढ़ता से थामता है। जिम्मेदारी आज से 25 वर्ष पहले की नारी के अपेक्षा कई गुनी बढ़ गई है। पहले प्राय: केवल घर का मोर्चा संभालना होता था, आज बाहर के मोर्चे से भी जूझना है। या बेहतर शब्दों में यूं कहें कि इस दोहरी जिम्मेदारी से जूझना ही नहीं, बल्कि संतुलन कायम करना है। ऊपरी तौर पर यह नारी के अधिकारों की लड़ाई के रूप में दिखता है, पर गहराई में जाने पर घर-परिवार की उन्नति का उद्देश्य छिपा दिखता है। चाहे कितने भी बड़े पद पर महिला काबिज हो, उसकी प्राथमिकता घर-परिवार की सुख-समृद्घि ही होती है। बड़े से बड़े पद पर स्थापित आज की महिलाओं का महज बड़बोलापन नहीं होता है कि वे माँ पहले हैं और विशिष्ट व्यक्तित्व बाद में। यह तो उनका प्लस प्वाइंट है कि नारीत्व को कायम रखते हुए उन्होंने उस ऊँचाई को प्राप्त किया, जो कुछ समय पहले तक महिलाओं के लिए अप्राप्त माना जाता था।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उपभोक्तावाद ने नारी की स्थिति को चिंतनीय बना दिया है। कुरीतियों के उन्मूलन और विचारों के खुलेपन की बजाय देहमुक्ति अभियान को बढ़ावा देना अहम हिस्सा है। नारी देह के उपभोग की शुंभ-निशुंभ लालसा का सामना नारी साहस और बुद्घि से ही कर सकती है। पर बाजार से घिरी वही नारी इसमें सफलता प्राप्त कर सकती है, जिससे लालची प्रवृत्ति न हो। जिसने शार्ट-कट का रास्ता अख्तियार कर लिया, उसका इस्तेमाल भी तय है। परिश्रम, धैर्य और सहिष्णुता ही सच्ची और टिकाऊ  कामयाबी के साथ अपने अस्तित्व को कायम करने का मूलमंत्र है। मनुस्मृति का श्लोक ‘यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते’ का उदाहरण आज भी बार-बार दिया जाता है। लेकिन दूसरी तरफ घरेलू हिंसा से लेकर दफ्तर और सार्वजनिक स्थानों में आपराधिक घटनाओं की शिकार महिलाओं पर बढ़ती हुई संख्या किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में नौ दिनों तक पूरी श्रद्घा-भक्तिभाव से देवी माँ की गई पूजा पूरे समाज में स्त्री-शक्ति की वास्तविक स्थिति के बीच एक विरोधाभास खड़ा नजर आता है। इस विरोधाभास को खत्म करने के लिए क्या हम उस महाशक्ति से यह प्रार्थना नहीं कर सकते कि वह हमारे दर्प, अहंकार को दूर करने में हमारी मदद करे। समाज में व्याप्त असत्य पर विजय प्राप्त कर सकें। यदि ऐसा कर सकते हैं तो फिर ‘महिला सशक्तीकरण’ के आज के नए श्लोक नारे को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
रीभा तिवारी