शनिवार, 4 जुलाई 2015
शुक्रवार, 12 जून 2015
परिकल्पनाओं में ‘स्मार्ट शहर’
इन दिनों भारत सरकार स्मार्ट शहरों के न केवल ख्वाब देख रही है बल्कि इसका ढिंढोरा भी जमकर पीटा जा रहा है। मोदी सरकार को यह सपना देखने का अधिकार है लेकिन शहर स्मार्ट बनाने से पहले हमें अपने जनमानस को इसमें रहने लायक बनाना होगा। भारत सरकार द्वारा स्मार्ट सिटी योजना का अब तक प्रस्तुत खाका बहुत उत्साहजनक नहीं है। इसमें निजी निवेश को वित्तीय स्रोत का मुख्य आधार बनाया गया है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि निजी निवेशक केवल वहीं अपने धन का निवेश करता है, जहां उसे निश्चित रिटर्न की गारंटी हो। नागरिक सेवाओं का क्षेत्र अत्यंत अनिश्चितताओं से भरा है, जहां हर कदम पर जोखिम है।
बाजार का अर्थशास्त्र कहता है कि शहरी अधोसंरचना में निजी निवेश की संभावनाएं बहुत कम हैं, क्योंकि निवेशकों को उनके द्वारा लगाए गए धन की ब्याज और मुनाफे सहित समय पर वापसी की इसमें कोई गारंटी ही नहीं है। ऐसी दशा में हमें सरकार और निकायों के वित्तीय स्रोतों पर मुख्य रूप से निर्भर रहना होगा, जो कि अपेक्षित निवेश की तुलना में मात्र 5 से 10 फीसदी की भरपाई कर सकेगा। ऐसे में सौ शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना देखने के स्थान पर हमें सबसे पहले हमारी मेगा सिटीज को स्मार्ट बनाने की पहल करना चाहिए। यदि आने वाले दस वर्षों में हम दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, बंगलुरु जैसे कुछ शहरों पर ही ध्यान केंद्रित करें तो बेहतर होगा। स्मार्ट क्षेत्रों में परिवहन, ऊर्जा, स्वास्थ्य देखभाल, पानी और अपशिष्ट प्रबंध जैसी नागरिक सेवाओं का प्रभावी मुहैया कराया जाना शामिल है। इसके अनुसार एक स्मार्ट शहर और उसके नागरिकों के मध्य ऐसा सुगम रिश्ता जो तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। स्मार्ट शहरों में सार्वजनिक, वित्त, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक पुनर्गठन, मनोरंजन, बढ़ती आबादी के दबाव जैसी प्रमुख चुनौतियों से निबटने की क्षमता होना जरूरी है। स्मार्ट शब्द के मायने देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होंगे। हम सिंगापुर, दुबई या शंघाई के प्रयोगों को देश में कभी लागू नहीं कर पाएंगे। यह नकल देश के शहरों के लिए घातक साबित होगी। हम स्मार्ट शहर की अपनी स्वयं की परिभाषा विकसित करनी होगी। एक ऐसी परिभाषा जो हमारे शहरों की क्षमता, प्रकृति और उनकी पहचान को ध्यान में रखकर बनाई जाए। ऐसा करने के लिए हमें अपने शहरों को भली-भांति समझना होगा। शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना लागू करने से पहले हमें शहरी विकास की अब तक लागू की योजनाओं के परिणामों का विश्लेषण करना होगा। शहरों में करीब एक लाख करोड़ के निवेश के दावों के साथ लागू की गई जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी मिशन योजना का अंत कुछ अच्छा नहीं रहा। यह योजना अपने अच्छे उद्देश्य के बावजूद स्थानीय निकायों की उदासीनता और निष्क्रियता की भेंट चढ़ गई।
अधोसंरचना विकास से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट दस वर्ष की लम्बी अवधि के बावजूद अधूरे पड़े हैं। परिणामत: परियोजना की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और इसके लिए जिम्मेदारी निर्धारित करने में किसी की रुचि नहीं दिखती। योजना के दूसरे घटक स्लम हाउसिंग की कहानी तो और भी निराशाजनक रही है। राज्यों और निकायों ने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट स्वीकृत तो करा लिए, पर उन्हें पूरा करने की कोशिश बहुत ही कम शहरों में हो पाई हैं। निर्माण की गुणवत्ता, हितग्राहियों के चयन और आवासों के आवंटन प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार अपने चरम पर रहा। बहुत ही कम ऐसी परियोजनाएं होंगी, जिनमें वास्तविक जरूरतमंदों को योजना का लाभ मिला हो। मैदानी स्तर पर दक्ष और समर्पित अमले के अभाव के साथ ही राज्यों की सतही मॉनीटरिंग इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। नतीजा यह है कि 2012 में समाप्त होने वाली मिशन के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र को 2017 तक का वक्त देना पड़ रहा है। योजना के इस चित्र के परिणाम विचलित करने वाले हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में शहरों को स्मार्ट बनाने की क्या कही, तुरंत लाभ कमाने में रुचि रखने वाली गैर भरोसेमंद कंपनियों ने शहरों में लुभावने सपने दिखाने वाली कॉन्सेप्ट बेचना शुरू कर दिया, वहीं जमीन की खरीद-फरोख्त के बाजार में तेजी आ चुकी है। यह वही भू-माफिया हैं, जो पर्दे के पीछे शहरों में जमीन की कीमत निर्धारित करने में अहम भूमिका रखता है। हम शहरों को स्मार्ट बनाना चाहते हैं, पर यह गांवों और कृषि भूमि के अस्तित्व को खतरे में डालने की कवायद न बन जाए, इसकी हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। इस पृष्ठभूमि में हम यदि ईमानदारी से प्रयत्न करें कि हमारे शहर स्मार्ट बनें तो सबसे पहले हमें अपनी सरकारी मशीनरी को पूरी तरह से ओवरहालिंग करना होगी। यह तभी संभव है, जब हम डिजिटल प्रौद्योगिकी का पूरी तरह प्रशासन में इस्तेमाल करें। निश्चित समय सीमा में सेवाओं के प्रदाय में चूक के लिए जिम्मेदारी नियत हो और चूक करने वालों पर नकेल कसने की ठोस व्यवस्था हो। हमारे शहर तभी स्मार्ट बन सकेंगे, जब हम नियोजन और विकास के फैसले लेने में नागरिकों की अहम भूमिका निर्धारित कर दें।
बाजार का अर्थशास्त्र कहता है कि शहरी अधोसंरचना में निजी निवेश की संभावनाएं बहुत कम हैं, क्योंकि निवेशकों को उनके द्वारा लगाए गए धन की ब्याज और मुनाफे सहित समय पर वापसी की इसमें कोई गारंटी ही नहीं है। ऐसी दशा में हमें सरकार और निकायों के वित्तीय स्रोतों पर मुख्य रूप से निर्भर रहना होगा, जो कि अपेक्षित निवेश की तुलना में मात्र 5 से 10 फीसदी की भरपाई कर सकेगा। ऐसे में सौ शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना देखने के स्थान पर हमें सबसे पहले हमारी मेगा सिटीज को स्मार्ट बनाने की पहल करना चाहिए। यदि आने वाले दस वर्षों में हम दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, बंगलुरु जैसे कुछ शहरों पर ही ध्यान केंद्रित करें तो बेहतर होगा। स्मार्ट क्षेत्रों में परिवहन, ऊर्जा, स्वास्थ्य देखभाल, पानी और अपशिष्ट प्रबंध जैसी नागरिक सेवाओं का प्रभावी मुहैया कराया जाना शामिल है। इसके अनुसार एक स्मार्ट शहर और उसके नागरिकों के मध्य ऐसा सुगम रिश्ता जो तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो। स्मार्ट शहरों में सार्वजनिक, वित्त, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक पुनर्गठन, मनोरंजन, बढ़ती आबादी के दबाव जैसी प्रमुख चुनौतियों से निबटने की क्षमता होना जरूरी है। स्मार्ट शब्द के मायने देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होंगे। हम सिंगापुर, दुबई या शंघाई के प्रयोगों को देश में कभी लागू नहीं कर पाएंगे। यह नकल देश के शहरों के लिए घातक साबित होगी। हम स्मार्ट शहर की अपनी स्वयं की परिभाषा विकसित करनी होगी। एक ऐसी परिभाषा जो हमारे शहरों की क्षमता, प्रकृति और उनकी पहचान को ध्यान में रखकर बनाई जाए। ऐसा करने के लिए हमें अपने शहरों को भली-भांति समझना होगा। शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना लागू करने से पहले हमें शहरी विकास की अब तक लागू की योजनाओं के परिणामों का विश्लेषण करना होगा। शहरों में करीब एक लाख करोड़ के निवेश के दावों के साथ लागू की गई जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी मिशन योजना का अंत कुछ अच्छा नहीं रहा। यह योजना अपने अच्छे उद्देश्य के बावजूद स्थानीय निकायों की उदासीनता और निष्क्रियता की भेंट चढ़ गई।
अधोसंरचना विकास से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट दस वर्ष की लम्बी अवधि के बावजूद अधूरे पड़े हैं। परिणामत: परियोजना की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और इसके लिए जिम्मेदारी निर्धारित करने में किसी की रुचि नहीं दिखती। योजना के दूसरे घटक स्लम हाउसिंग की कहानी तो और भी निराशाजनक रही है। राज्यों और निकायों ने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट स्वीकृत तो करा लिए, पर उन्हें पूरा करने की कोशिश बहुत ही कम शहरों में हो पाई हैं। निर्माण की गुणवत्ता, हितग्राहियों के चयन और आवासों के आवंटन प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार अपने चरम पर रहा। बहुत ही कम ऐसी परियोजनाएं होंगी, जिनमें वास्तविक जरूरतमंदों को योजना का लाभ मिला हो। मैदानी स्तर पर दक्ष और समर्पित अमले के अभाव के साथ ही राज्यों की सतही मॉनीटरिंग इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। नतीजा यह है कि 2012 में समाप्त होने वाली मिशन के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र को 2017 तक का वक्त देना पड़ रहा है। योजना के इस चित्र के परिणाम विचलित करने वाले हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में शहरों को स्मार्ट बनाने की क्या कही, तुरंत लाभ कमाने में रुचि रखने वाली गैर भरोसेमंद कंपनियों ने शहरों में लुभावने सपने दिखाने वाली कॉन्सेप्ट बेचना शुरू कर दिया, वहीं जमीन की खरीद-फरोख्त के बाजार में तेजी आ चुकी है। यह वही भू-माफिया हैं, जो पर्दे के पीछे शहरों में जमीन की कीमत निर्धारित करने में अहम भूमिका रखता है। हम शहरों को स्मार्ट बनाना चाहते हैं, पर यह गांवों और कृषि भूमि के अस्तित्व को खतरे में डालने की कवायद न बन जाए, इसकी हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। इस पृष्ठभूमि में हम यदि ईमानदारी से प्रयत्न करें कि हमारे शहर स्मार्ट बनें तो सबसे पहले हमें अपनी सरकारी मशीनरी को पूरी तरह से ओवरहालिंग करना होगी। यह तभी संभव है, जब हम डिजिटल प्रौद्योगिकी का पूरी तरह प्रशासन में इस्तेमाल करें। निश्चित समय सीमा में सेवाओं के प्रदाय में चूक के लिए जिम्मेदारी नियत हो और चूक करने वालों पर नकेल कसने की ठोस व्यवस्था हो। हमारे शहर तभी स्मार्ट बन सकेंगे, जब हम नियोजन और विकास के फैसले लेने में नागरिकों की अहम भूमिका निर्धारित कर दें।
शनिवार, 16 मई 2015
सपनों का महल
क्या सचमुच ही
हँसी ठिठोली करते हैं
शहर में उग आए महलों के जंगल
लेकिन नेपथ्य में रोटी और अन्न के
अवरोध को ढोते-ढोते
एक असमर्थ मजदूर
अपनी आंखों के विश्वास में
जम रही बर्फ को हटाते-हटाते
सोचता है और टटोलता है
अपनी जेबों में पड़े
चन्द सिक्के को।
सचमुच मात्र
निराशा और कुंठाओं के अभिलेख पर
उसके सपनों का संवाद लिख तो दिए गए हैं
लेकिन प्रकृति का कोई कोना
उसके नजदीक नहीं आया
फिर भी बीते कल को
वो छोड़ना चाहता है और
विस्मय होकर देखता है
अपनी हथेलियों को
अपनी स्मृतियों में
जमी धूल की परतें
उघार कर रस्क करता है
ऊँची इमारतों को देखकर जिसे
उसने ही श्रम के लहू से बनाया है
लेकिन अब वह जोड़ना चाहता है
अपने सपनों का महल
इन ऊँची हवेलियों के समानान्तर।
हँसी ठिठोली करते हैं
शहर में उग आए महलों के जंगल
लेकिन नेपथ्य में रोटी और अन्न के
अवरोध को ढोते-ढोते
एक असमर्थ मजदूर
अपनी आंखों के विश्वास में
जम रही बर्फ को हटाते-हटाते
सोचता है और टटोलता है
अपनी जेबों में पड़े
चन्द सिक्के को।
सचमुच मात्र
निराशा और कुंठाओं के अभिलेख पर
उसके सपनों का संवाद लिख तो दिए गए हैं
लेकिन प्रकृति का कोई कोना
उसके नजदीक नहीं आया
फिर भी बीते कल को
वो छोड़ना चाहता है और
विस्मय होकर देखता है
अपनी हथेलियों को
अपनी स्मृतियों में
जमी धूल की परतें
उघार कर रस्क करता है
ऊँची इमारतों को देखकर जिसे
उसने ही श्रम के लहू से बनाया है
लेकिन अब वह जोड़ना चाहता है
अपने सपनों का महल
इन ऊँची हवेलियों के समानान्तर।
शनिवार, 2 मई 2015
बदलते सामाजिक सरोकार
मनुष्य जीवन ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसे व्यर्थ न जाने देने की हमेशा नसीहतें दी जाती हैं। अफसोस आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में मनुष्य के लिए नसीहतों का कोई मूल्य नहीं रहा। अर्थ प्रधान युग में जीवन पर अर्थ इस कदर हावी हो गया है कि एक पढ़ा-लिखा, शिक्षित-समझदार, स्वावलम्बी हर तरह की सुविधाओं से पूर्ण व्यक्ति भी आत्मघाती कदम उठाने से नहीं हिचकता। आज का इंसान बिल्कुल अकेला है। उसका यही एकाकीपन और मानसिक संत्रास उसे आत्मघाती निर्णय लेने को प्रेरित करता है।
कहने को मनुष्य योनि को समस्त प्राणि जगत की सर्वश्रेष्ठ योनि माना जाता है। इस सर्वश्रेष्ठता के कारण ही इंसान मनुष्य जन्म को लेकर गौरवान्वित महसूस करता है। मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता का आधार उसकी सद्बुुद्धि और विवेकशीलता है। मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार है कि उसने कितना स्वार्थ छोड़ा है। वेद-शास्त्रानुसार वह कितना मनुष्य बन पाया, उसने कितना जीवन परमार्थ में लगाया है। इस जगत के कल्याण में वह कितना निमित्त बना, पीड़ा से कराह रहे कितने व्यक्तियों में अपनत्व देखकर उन पर अपनी ओर से कितनी करुणा बिखेरी, भूख-प्यास से बिलखते लोगों की चीत्कार सुनकर कितनों के आंसू पोंछकर गले से लगाया, कितने भूखे-प्यासों के काम आकर अपने धनी होने का परिचय दिया। दरअसल, जीवन भर काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा, छल, कपट तथा ठगी करता इंसान जब स्वयं को समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ योनिधारी होने का अहंकार पालता है, तब अफसोस और हैरत होती है। पशु-पक्षी स्वावलम्बी हैं। मनुष्य परावलम्बी है। पशु-पक्षी अपना आहार स्वयं खोज लेते हैं जबकि मनुष्य को एक अच्छा जीवन निर्वाह करने के लिए कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उसे पथ-प्रदर्शक चाहिए। पशु-पक्षी बीमार हो जाते हैं तो अपनी चिकित्सा भी स्वयं खोज लेते हैं, आदमी पराश्रित है, चिकित्सा के अभाव में वह मर भी सकता है। पशु-पक्षी अपना पेट भर जाने के बाद बचे भोजन की तरफ आंख फेर कर भी नहीं देखते जबकि आदमी पेट भर जाने के बाद भी भूखा है। इंसान की यही अर्थ भूख उसे न केवल कमजोर कर रही है बल्कि आत्महत्या का प्रमुख कारण भी है। समस्या और कारण जो भी हों पर समाज में आत्महत्या की बढ़ती वारदातें कई सवालों को जन्म दे रही हैं। बदलते समाज का कटु सत्य यह है कि आज इंसान समस्याओं के सामने असहाय है, उसकी यही लाचारी और विवशता उसे आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर रही है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी समस्या मूल्यवान जीवन से भी जटिल हो सकती है जिसे वह व्यक्ति सहन ही न कर सके। आत्महत्या व्यक्ति तीन कारणों से करता है। एक तो तब जब उसके हालात की वजह से उसके इर्द-गिर्द के लोग दुखी हों और उस दुख के लिए वह खुद को या खुद के हालात को कसूरवार मानता हो। दूसरा तब जब किसी भी हालत में हालात के बदलने की गुंजाइश नहीं बचे। तीसरा यह कि अगर वो खुद स्वतंत्र रूप से फैसला ले तो भी उसे जिनको वह अपना मानता है, उनके दुखी हो जाने या खो देने का भय उसे स्वतंत्र फैसला लेने नहीं दे। कारण जो भी हो मन जब कुंठित होता है और व्यक्तिस्वयं को असहाय महसूस करने लगे तो भावावेश में आकर इस तरह का फैसला लेने की सोच बैठता है। सुनने में आता है व्यक्ति समाज के भय से ऐसा फैसला ले लेता है। ये कैसा समाज और कैसी सामाजिकता? यदि समाज ही सब कुछ है तो फिर कैसा डर, किसका डर? क्या समाज हमें अपनी गलतियों को सुधारने का मौका नहीं दे सकता? क्या वह हमारे कमजोर क्षणों में हमें आत्मबल प्रदान नहीं करा सकता? जिस समाज के बारे में हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि ऐसा न करो समाज के लोग क्या कहेंगे। तो फिर क्यों हमारा समाज हमें अपने विचारों के साथ जीने नहीं देता। जीवन में बहुत सारी मुश्किलें आती हैं और जो इन मुश्किलों में धैर्य और साहस के साथ अपने मानसिक उथल-पुथल की अवस्था में भी अपने को मजबूत और सकारात्मक सोच के साथ जीने के लिए तैयार कर लेता है वही बहादुर है। उसके पास ही जीने की कला है। कोई खुशी-खुशी हर हाल में जी लेता है और कोई छोटी सी तकलीफ भी सहन नहीं कर पाता और मौत को गले लगा लेता है। ये अलग बात है कि मरने के बाद हम उसे कायर, बुजदिल तो कभी संवेदनशील न जाने किन-किन नामों से सम्बोधित करते हैं। यह भी समाज की एक विडम्बना ही तो है कि जीते जी किसी की व्यथा को सुनने और सुलझाने भर का समय आज किसी के पास नहीं है। हर व्यक्तिअपने में मशगूल है। उसे दूसरों की फिक्र ही नहीं है, क्या इसी का नाम समाज है जहां उसके भय से लोग मौत को गले लगा लेते हैं। यदि हर आत्महत्या के पीछे सामाजिक सरोकार ही जिम्मेदार हैं तो फिर हमें ऐसे समाज को बदलना होगा। एक नये समाज की स्थापना करनी होगी जहां व्यक्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझे, उसके दु:ख-दर्द को सुने और आत्मघाती कदम उठाते लोगों का आत्मबल बढ़ाये। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी तभी माना जाएगा जब वह प्रेम, दया, उदारता, सहानुभूति, सहयोग, परहित, करुणा, संवेदना, मानवता, परोपकार आदि मानवीय मूल्यों के साथ जिए और मानवीय दुर्बलताओं को अपने दैनिक जीवन में कोई स्थान न दे।
कहने को मनुष्य योनि को समस्त प्राणि जगत की सर्वश्रेष्ठ योनि माना जाता है। इस सर्वश्रेष्ठता के कारण ही इंसान मनुष्य जन्म को लेकर गौरवान्वित महसूस करता है। मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता का आधार उसकी सद्बुुद्धि और विवेकशीलता है। मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार है कि उसने कितना स्वार्थ छोड़ा है। वेद-शास्त्रानुसार वह कितना मनुष्य बन पाया, उसने कितना जीवन परमार्थ में लगाया है। इस जगत के कल्याण में वह कितना निमित्त बना, पीड़ा से कराह रहे कितने व्यक्तियों में अपनत्व देखकर उन पर अपनी ओर से कितनी करुणा बिखेरी, भूख-प्यास से बिलखते लोगों की चीत्कार सुनकर कितनों के आंसू पोंछकर गले से लगाया, कितने भूखे-प्यासों के काम आकर अपने धनी होने का परिचय दिया। दरअसल, जीवन भर काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा, छल, कपट तथा ठगी करता इंसान जब स्वयं को समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ योनिधारी होने का अहंकार पालता है, तब अफसोस और हैरत होती है। पशु-पक्षी स्वावलम्बी हैं। मनुष्य परावलम्बी है। पशु-पक्षी अपना आहार स्वयं खोज लेते हैं जबकि मनुष्य को एक अच्छा जीवन निर्वाह करने के लिए कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उसे पथ-प्रदर्शक चाहिए। पशु-पक्षी बीमार हो जाते हैं तो अपनी चिकित्सा भी स्वयं खोज लेते हैं, आदमी पराश्रित है, चिकित्सा के अभाव में वह मर भी सकता है। पशु-पक्षी अपना पेट भर जाने के बाद बचे भोजन की तरफ आंख फेर कर भी नहीं देखते जबकि आदमी पेट भर जाने के बाद भी भूखा है। इंसान की यही अर्थ भूख उसे न केवल कमजोर कर रही है बल्कि आत्महत्या का प्रमुख कारण भी है। समस्या और कारण जो भी हों पर समाज में आत्महत्या की बढ़ती वारदातें कई सवालों को जन्म दे रही हैं। बदलते समाज का कटु सत्य यह है कि आज इंसान समस्याओं के सामने असहाय है, उसकी यही लाचारी और विवशता उसे आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर रही है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी समस्या मूल्यवान जीवन से भी जटिल हो सकती है जिसे वह व्यक्ति सहन ही न कर सके। आत्महत्या व्यक्ति तीन कारणों से करता है। एक तो तब जब उसके हालात की वजह से उसके इर्द-गिर्द के लोग दुखी हों और उस दुख के लिए वह खुद को या खुद के हालात को कसूरवार मानता हो। दूसरा तब जब किसी भी हालत में हालात के बदलने की गुंजाइश नहीं बचे। तीसरा यह कि अगर वो खुद स्वतंत्र रूप से फैसला ले तो भी उसे जिनको वह अपना मानता है, उनके दुखी हो जाने या खो देने का भय उसे स्वतंत्र फैसला लेने नहीं दे। कारण जो भी हो मन जब कुंठित होता है और व्यक्तिस्वयं को असहाय महसूस करने लगे तो भावावेश में आकर इस तरह का फैसला लेने की सोच बैठता है। सुनने में आता है व्यक्ति समाज के भय से ऐसा फैसला ले लेता है। ये कैसा समाज और कैसी सामाजिकता? यदि समाज ही सब कुछ है तो फिर कैसा डर, किसका डर? क्या समाज हमें अपनी गलतियों को सुधारने का मौका नहीं दे सकता? क्या वह हमारे कमजोर क्षणों में हमें आत्मबल प्रदान नहीं करा सकता? जिस समाज के बारे में हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि ऐसा न करो समाज के लोग क्या कहेंगे। तो फिर क्यों हमारा समाज हमें अपने विचारों के साथ जीने नहीं देता। जीवन में बहुत सारी मुश्किलें आती हैं और जो इन मुश्किलों में धैर्य और साहस के साथ अपने मानसिक उथल-पुथल की अवस्था में भी अपने को मजबूत और सकारात्मक सोच के साथ जीने के लिए तैयार कर लेता है वही बहादुर है। उसके पास ही जीने की कला है। कोई खुशी-खुशी हर हाल में जी लेता है और कोई छोटी सी तकलीफ भी सहन नहीं कर पाता और मौत को गले लगा लेता है। ये अलग बात है कि मरने के बाद हम उसे कायर, बुजदिल तो कभी संवेदनशील न जाने किन-किन नामों से सम्बोधित करते हैं। यह भी समाज की एक विडम्बना ही तो है कि जीते जी किसी की व्यथा को सुनने और सुलझाने भर का समय आज किसी के पास नहीं है। हर व्यक्तिअपने में मशगूल है। उसे दूसरों की फिक्र ही नहीं है, क्या इसी का नाम समाज है जहां उसके भय से लोग मौत को गले लगा लेते हैं। यदि हर आत्महत्या के पीछे सामाजिक सरोकार ही जिम्मेदार हैं तो फिर हमें ऐसे समाज को बदलना होगा। एक नये समाज की स्थापना करनी होगी जहां व्यक्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझे, उसके दु:ख-दर्द को सुने और आत्मघाती कदम उठाते लोगों का आत्मबल बढ़ाये। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी तभी माना जाएगा जब वह प्रेम, दया, उदारता, सहानुभूति, सहयोग, परहित, करुणा, संवेदना, मानवता, परोपकार आदि मानवीय मूल्यों के साथ जिए और मानवीय दुर्बलताओं को अपने दैनिक जीवन में कोई स्थान न दे।
गुरुवार, 16 अप्रैल 2015
वियोग में आँखों का रोना
जार-जार रोती हैं आँखें
एक बियावान दृश्य सामने उभरता है
जिसकी परिक्रमा में
नींद आँखों से विदा नहीं माँगती
बल्कि परित्याग कर अनायास
दूर चली जाती है।
इस तलाश में कल जो नींद में आया था
और कुछ जो अपनी आहट से
मेरे एहसास पर हल्की-हल्की थपकी
देकर चला गया था,
उसी के वियोग में आँखों का रोना
निरंतर जारी है।
वह सपनों में आने वाला कौन था
जिसे मैं बार-बार समझने
और उसके आने के औचित्य को,
अपनी आंखों की सतह पर
उभर आए पदचिन्हों को
व्याख्यायित करने की
कोशिश कर रही हूँ क्योंकि
सपनों में किसी का आना
दुर्भाग्य और सुखद संयोग का
एक संकेत होता है।
मैं सपनों में आए उस
संकेत के साथ जीना चाहती हूँ ।
एक निश्चित अपने दायित्व की
नींव रखने हेतु।।
-रीभा तिवारी
एक बियावान दृश्य सामने उभरता है
जिसकी परिक्रमा में
नींद आँखों से विदा नहीं माँगती
बल्कि परित्याग कर अनायास
दूर चली जाती है।
इस तलाश में कल जो नींद में आया था
और कुछ जो अपनी आहट से
मेरे एहसास पर हल्की-हल्की थपकी
देकर चला गया था,
उसी के वियोग में आँखों का रोना
निरंतर जारी है।
वह सपनों में आने वाला कौन था
जिसे मैं बार-बार समझने
और उसके आने के औचित्य को,
अपनी आंखों की सतह पर
उभर आए पदचिन्हों को
व्याख्यायित करने की
कोशिश कर रही हूँ क्योंकि
सपनों में किसी का आना
दुर्भाग्य और सुखद संयोग का
एक संकेत होता है।
मैं सपनों में आए उस
संकेत के साथ जीना चाहती हूँ ।
एक निश्चित अपने दायित्व की
नींव रखने हेतु।।
-रीभा तिवारी
प्रतीक्षा की धूप में
तप-तप कर
अनुभूतियों की अतल गहराइयों में
तैर रहे प्रश्नों को पकड़ने की कोशिश में
तुम्हारी निराकृत तस्वीर से पूछती हूँ
शब्दों के फ्रेम में,
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
चैन की सम्पूर्ण परिधियों को तोड़ते हुए
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
रह-रह कर याद आना
समझ में तो आता है
लेकिन अनायास विस्मृतियों के
दरीचे में खो जाना यह क्या है?
कहीं मेरी यादों की ग्रन्थियों को
चीरने की कोशिश तो नहीं?
अगर मैं पूछूं कि क्या तुम्हारा भी
नींद की गहराइयों से एकाएक
चौंक कर जाग उठना
मुझे याद करना जारी है।
अपनी यादों की चुप्पी के बारे में
कुछ सोचा नहीं है
अगर तुमने कुछ सोचा है तो बता देना
सुबह की पहली किरण के साथ
सुबह की पहली किरण के साथ।
-रीभा तिवारी
अनुभूतियों की अतल गहराइयों में
तैर रहे प्रश्नों को पकड़ने की कोशिश में
तुम्हारी निराकृत तस्वीर से पूछती हूँ
शब्दों के फ्रेम में,
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
चैन की सम्पूर्ण परिधियों को तोड़ते हुए
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
रह-रह कर याद आना
समझ में तो आता है
लेकिन अनायास विस्मृतियों के
दरीचे में खो जाना यह क्या है?
कहीं मेरी यादों की ग्रन्थियों को
चीरने की कोशिश तो नहीं?
अगर मैं पूछूं कि क्या तुम्हारा भी
नींद की गहराइयों से एकाएक
चौंक कर जाग उठना
मुझे याद करना जारी है।
अपनी यादों की चुप्पी के बारे में
कुछ सोचा नहीं है
अगर तुमने कुछ सोचा है तो बता देना
सुबह की पहली किरण के साथ
सुबह की पहली किरण के साथ।
-रीभा तिवारी
गुरुवार, 2 अप्रैल 2015
अभिव्यक्ति की दुश्वारियां
आईटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वाभाविक ही चौतरफा स्वागत हुआ है। यह कानून इण्टरनेट और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का जरिया बन गया था। ऐसे कई मामले सामने आए जब इस कानून के तहत महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में मनमाने ढंग से गिरफ्तारियां हुर्इं। बात सिर्फ इतनी नहीं थी। देश में अन्य कानूनों के भी बेजा इस्तेमाल के अनेकों उदाहरण हैं। अभिव्यक्ति की आजादी ने साइबर क्षेत्र से जुड़े लोगों के चेहरे पर मुस्कान तो ला दी पर इसकी अति के गम्भीर परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति की आजादी चाहना बुरी बात नहीं है लेकिन इसका आजकल जिस तरह दुरुपयोग हो रहा है, वह अखरने वाली बात जरूर है।
यह सच है कि हमारी हुकूमतों ने जब-जब नागरिक अधिकारों को कुचलने के कदम उठाए गए हैं, न्यायपालिका ने नागरिकों का ही पक्ष लिया है। सर्वोच्च अदालत का ताजा फैसला इसी परिपाटी की ही एक कड़ी है। 2008 में बने आईटी अधिनियम के मुताबिक इण्टरनेट या सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और आहत करने वाली सामग्री डालना अपराध था। इस प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि किसी भी बात को आहत पहुंचाने वाला करार देकर धड़ाधड़ पुलिस में शिकायतें दर्ज कराई जाने लगीं। जो शिकायतें राजनीतिज्ञों या रसूख वाले लोगों की तरफ से आर्इं उन पर पुलिस ने फौरन कथित आरोपियों को गिरफ्तार भी किया। इस मामले में सर्वोच्च अदालत का मानना है कि जो बात किसी को आपत्तिजनक या आक्रामक लग सकती है, वह किसी और को कहने लायक भी लग सकती है, उसे पसंद भी आ सकती है। अगर महज चिढ़ाने या आहत करने के आरोप में कार्रवाई की जाएगी, तो असहमति का इजहार करना असम्भव हो जाएगा और फिर अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ भी नहीं रहेगा। संविधान की धारा 19 (1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल है। यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान ने धारा 19 (2) के तहत कुछ मर्यादाएं तय की हैं। मसलन, राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर आंच आने, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होने, समुदायों के बीच वैमनस्यता पैदा करने की स्थितियों में सम्बन्धित सामग्री को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, यानि ये मर्यादाएं ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। इसी तरह मानहानि से सम्बन्धित कानून पहले की ही तरह प्रभावी रहेगा। अगर किसी वेबसाइट को लेकर धारा 19 (2) के तहत तय की गई मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायत हो, तो उसे बंद करने का सरकार को अधिकार होगा। जो भी हो सर्वोच्च न्यायालय ने असहमति और आलोचना को साइबर अपराध का रंग देकर नागरिकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गुंजाइश जरूर समाप्त कर दी है।
आज संचार क्रांति का युग है और यह बहुत तेजी से दुनिया भर में अपने पैर पसार रहा है। सोशल मीडिया की पहुंच हर घर की चौखट तक है। हर व्यक्ति अपने स्तर से इसका उपयोग कर रहा है। यह हमारे जीवन की आवश्यकता बन चुका है। इसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है। वजह पलक झपकते ही देश-दुनिया को जान लेने की इसकी सहूलियत है। सोशल मीडिया से हम वस्तुगत स्थिति से घर बैठे ही परिचित हो जाते हैं जो हमारे ज्ञान वृद्धि में मददगार साबित होता है। इसमें अच्छाइयां हैं तो बुराइयां भी कम नहीं हैं। कई बार नकारात्मक सूचनाएं हमारे मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं तो दिल दहला देने वाली हिंसक वारदातें कई दिनों तक हमें अशांत रखती हैं। इंटरनेट ने एक-दूसरे को आपस में जोड़ने का काम किया है। हम अपनों से दूर और दूसरों के बहुत करीब पहुंच गए हैं। यह जान और सुनकर अटपटा जरूर लगता है, पर सच यही है। जो समय हमें अपने परिवार और घर के अन्य सदस्यों के बीच साझा करना चाहिए, उनके सुख-दु:ख के बारे में जानना-सुनना चाहिए उसे हम हम नेट, मोबाइल, फोन, फेसबुक, व्हाट्सएप को दे रहे हैं। क्या बच्चे, युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग जिसे देखिए वही इण्टरनेट के मोहपाश से बंधा हुआ है। सुध-बुध खोते इंसान को अपनों ही नहीं, अपने भी सोने-जगने की सुध नहीं रही। सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने कई सवालों को जन्म दिया है। मसलन, जब समाज में इंटरनेट या सोशल मीडिया का चलन नहीं था तब क्या हमारा समाज नहीं जीता था? क्या हममें जानकारी का अभाव था? क्या हम अपनी प्रतिभा को निखारने में पीछे थे?
दरअसल आज हमारा समाज अति का शिकार है, उसे कोई बंदिश पसंद नहीं है। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद हम गर्वोक्ति महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया का उपयोग सही है और आज के परिवेश में जरूरी भी लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में भी चौकस रहने की जरूरत है। जिस इंटरनेट के बिना जीवन थम सा जाता है वही हमारी रातों की नींद और दिन का चैन भी हराम कर रहा है। सोशल मीडिया दुरुपयोग के मामले आये दिन सामने आ रहे हैं। हम न केवल इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि शब्दों पर भी संयम और शुद्धता नहीं रही। एसएमएस के जरिए हम जिन अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे भाषा विसंगति को ही बढ़ावा मिल रहा है। इंटरनेट में अश्लीलता भी कम नहीं है। लोग अश्लील वीडियो डाउनलोड कर अपना ही नहीं समाज के लिए भी बुरा कर रहे हैं। कुसंगत के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। अतीत में बच्चा अपनी किसी भी जिज्ञासा को लेकर माता-पिता या अभिभावक से सवाल किया करता था। अपनी हर छोटी से छोटी बात को पूछता या शेयर करता था लेकिन अब तो उसे भी मालूम है कि हर प्रश्न का उत्तर इण्टरनेट में मौजूद है। गाहे-बगाहे कोई बच्चा यदि अपने अभिभावक से कोई सवाल भी करता है तो वे नेट पर ही सर्च करने की सलाह देते हैं। मानो नेट मैजिक स्टिक बन गया हो, हर समस्या का समाधान उसी में हो।
आज का यंगिस्तान अपनी ऊर्जा किसी सकारात्मक कार्य में लगाने की बजाय अपना छह-सात घण्टे का बहुमूल्य समय सोशल मीडिया को दे रहा है। इण्टरनेट नशा बन गया है। दो-चार लोग कहीं मिलने-जुलने भी जाते हैं तो वहां भी आपस में बात करने की बजाय नेट पर ही मशगूल हो जाते हैं। एक जगह बैठकर काम करने, बिना पलक झपकाए टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर पर लगे रहने से मानसिक और शारीरिक बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इन उपकरणों से निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें हमारे लिए नुकसानदेह साबित होती हैं। इससे हमारी आंखों और मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जरूरी है कि इन उपकरणों का हम उचित तरीके से जरूरत के हिसाब से ही उपयोग करें वरना यह सोशल मीडिया अनचाही बीमारियों की गिरफ्त में ला देगा।
यह सच है कि हमारी हुकूमतों ने जब-जब नागरिक अधिकारों को कुचलने के कदम उठाए गए हैं, न्यायपालिका ने नागरिकों का ही पक्ष लिया है। सर्वोच्च अदालत का ताजा फैसला इसी परिपाटी की ही एक कड़ी है। 2008 में बने आईटी अधिनियम के मुताबिक इण्टरनेट या सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और आहत करने वाली सामग्री डालना अपराध था। इस प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि किसी भी बात को आहत पहुंचाने वाला करार देकर धड़ाधड़ पुलिस में शिकायतें दर्ज कराई जाने लगीं। जो शिकायतें राजनीतिज्ञों या रसूख वाले लोगों की तरफ से आर्इं उन पर पुलिस ने फौरन कथित आरोपियों को गिरफ्तार भी किया। इस मामले में सर्वोच्च अदालत का मानना है कि जो बात किसी को आपत्तिजनक या आक्रामक लग सकती है, वह किसी और को कहने लायक भी लग सकती है, उसे पसंद भी आ सकती है। अगर महज चिढ़ाने या आहत करने के आरोप में कार्रवाई की जाएगी, तो असहमति का इजहार करना असम्भव हो जाएगा और फिर अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ भी नहीं रहेगा। संविधान की धारा 19 (1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल है। यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान ने धारा 19 (2) के तहत कुछ मर्यादाएं तय की हैं। मसलन, राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर आंच आने, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होने, समुदायों के बीच वैमनस्यता पैदा करने की स्थितियों में सम्बन्धित सामग्री को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, यानि ये मर्यादाएं ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। इसी तरह मानहानि से सम्बन्धित कानून पहले की ही तरह प्रभावी रहेगा। अगर किसी वेबसाइट को लेकर धारा 19 (2) के तहत तय की गई मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायत हो, तो उसे बंद करने का सरकार को अधिकार होगा। जो भी हो सर्वोच्च न्यायालय ने असहमति और आलोचना को साइबर अपराध का रंग देकर नागरिकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गुंजाइश जरूर समाप्त कर दी है।
आज संचार क्रांति का युग है और यह बहुत तेजी से दुनिया भर में अपने पैर पसार रहा है। सोशल मीडिया की पहुंच हर घर की चौखट तक है। हर व्यक्ति अपने स्तर से इसका उपयोग कर रहा है। यह हमारे जीवन की आवश्यकता बन चुका है। इसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है। वजह पलक झपकते ही देश-दुनिया को जान लेने की इसकी सहूलियत है। सोशल मीडिया से हम वस्तुगत स्थिति से घर बैठे ही परिचित हो जाते हैं जो हमारे ज्ञान वृद्धि में मददगार साबित होता है। इसमें अच्छाइयां हैं तो बुराइयां भी कम नहीं हैं। कई बार नकारात्मक सूचनाएं हमारे मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं तो दिल दहला देने वाली हिंसक वारदातें कई दिनों तक हमें अशांत रखती हैं। इंटरनेट ने एक-दूसरे को आपस में जोड़ने का काम किया है। हम अपनों से दूर और दूसरों के बहुत करीब पहुंच गए हैं। यह जान और सुनकर अटपटा जरूर लगता है, पर सच यही है। जो समय हमें अपने परिवार और घर के अन्य सदस्यों के बीच साझा करना चाहिए, उनके सुख-दु:ख के बारे में जानना-सुनना चाहिए उसे हम हम नेट, मोबाइल, फोन, फेसबुक, व्हाट्सएप को दे रहे हैं। क्या बच्चे, युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग जिसे देखिए वही इण्टरनेट के मोहपाश से बंधा हुआ है। सुध-बुध खोते इंसान को अपनों ही नहीं, अपने भी सोने-जगने की सुध नहीं रही। सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने कई सवालों को जन्म दिया है। मसलन, जब समाज में इंटरनेट या सोशल मीडिया का चलन नहीं था तब क्या हमारा समाज नहीं जीता था? क्या हममें जानकारी का अभाव था? क्या हम अपनी प्रतिभा को निखारने में पीछे थे?
दरअसल आज हमारा समाज अति का शिकार है, उसे कोई बंदिश पसंद नहीं है। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद हम गर्वोक्ति महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया का उपयोग सही है और आज के परिवेश में जरूरी भी लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में भी चौकस रहने की जरूरत है। जिस इंटरनेट के बिना जीवन थम सा जाता है वही हमारी रातों की नींद और दिन का चैन भी हराम कर रहा है। सोशल मीडिया दुरुपयोग के मामले आये दिन सामने आ रहे हैं। हम न केवल इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि शब्दों पर भी संयम और शुद्धता नहीं रही। एसएमएस के जरिए हम जिन अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे भाषा विसंगति को ही बढ़ावा मिल रहा है। इंटरनेट में अश्लीलता भी कम नहीं है। लोग अश्लील वीडियो डाउनलोड कर अपना ही नहीं समाज के लिए भी बुरा कर रहे हैं। कुसंगत के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। अतीत में बच्चा अपनी किसी भी जिज्ञासा को लेकर माता-पिता या अभिभावक से सवाल किया करता था। अपनी हर छोटी से छोटी बात को पूछता या शेयर करता था लेकिन अब तो उसे भी मालूम है कि हर प्रश्न का उत्तर इण्टरनेट में मौजूद है। गाहे-बगाहे कोई बच्चा यदि अपने अभिभावक से कोई सवाल भी करता है तो वे नेट पर ही सर्च करने की सलाह देते हैं। मानो नेट मैजिक स्टिक बन गया हो, हर समस्या का समाधान उसी में हो।
आज का यंगिस्तान अपनी ऊर्जा किसी सकारात्मक कार्य में लगाने की बजाय अपना छह-सात घण्टे का बहुमूल्य समय सोशल मीडिया को दे रहा है। इण्टरनेट नशा बन गया है। दो-चार लोग कहीं मिलने-जुलने भी जाते हैं तो वहां भी आपस में बात करने की बजाय नेट पर ही मशगूल हो जाते हैं। एक जगह बैठकर काम करने, बिना पलक झपकाए टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर पर लगे रहने से मानसिक और शारीरिक बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इन उपकरणों से निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें हमारे लिए नुकसानदेह साबित होती हैं। इससे हमारी आंखों और मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जरूरी है कि इन उपकरणों का हम उचित तरीके से जरूरत के हिसाब से ही उपयोग करें वरना यह सोशल मीडिया अनचाही बीमारियों की गिरफ्त में ला देगा।
शनिवार, 28 मार्च 2015
कभी बादल डराते हैं....
मुकम्मल जिंदगी का मैं कोई एहसास होती हूँ
अँधेरी रात में जब भी तुम्हारे पास होती हूँ ।
कभी जुगनू चमकते हैं कभी बादल डराते हैं
सफर में जब भी चलती हूँ तेरा विश्वास होती हूँ।
मिला है जब कभी मुझसे तो इतना याद है मुझको
मैं उसके पास होती हूँ मैं उसकी खास होती हूँ ।
चले आओ कभी दिल से मेरे आँगन में तुम एक दिन
अभी सपनों में मैं हर दिन तुम्हारे पास होती हूँ ।
मेरी जुल्फों के सावन में मेरा दिल भीग जाता है
किसी टूटे हुए दर्पण का मैं एहसास होती हूँ ।
शनिवार, 21 मार्च 2015
कोई शिकायत नहीं....
तुझे पास आने की फुर्सत नहीं है
मुझे भी मनाने की आदत नहीं है ।
अभी ख्वाब की एक दुनिया है मेरी
अभी नींद से कोई शिकायत नहीं है।
कभी सोचना याद आने से पहले
तुझे क्या हमारी जरूरत नहीं है ।
सही है इसे याद रखना हमेशा
दिलों से बड़ी कोई दौलत नहीं है ।
वजह दुश्मनी की रहे दिल में जो भी
बताने की तुझको जरूरत नहीं है ।
जमाना भले चाहे जो भी ये समझे
मोहब्बत नहीं है तो नफरत नहीं है ।
मुझे भी मनाने की आदत नहीं है ।
अभी ख्वाब की एक दुनिया है मेरी
अभी नींद से कोई शिकायत नहीं है।
कभी सोचना याद आने से पहले
तुझे क्या हमारी जरूरत नहीं है ।
सही है इसे याद रखना हमेशा
दिलों से बड़ी कोई दौलत नहीं है ।
वजह दुश्मनी की रहे दिल में जो भी
बताने की तुझको जरूरत नहीं है ।
जमाना भले चाहे जो भी ये समझे
मोहब्बत नहीं है तो नफरत नहीं है ।
शनिवार, 14 मार्च 2015
चांद की पनाहों में
दिल चाहता है
कैद करूं मैं
आसमां को बाहों में
और सिमट जाऊं
चांद की पनाहों में ।
चांद ने नर्म लहजे में
कुछ कहा इस तरह,
कैद न कर मुझे बाहों में
मैं रोज ही आ जाऊंगा
खुद तेरी पनाहों में ।
ताज्जुब में मैं पड़ी
कैद करूं या रिहा फिर
तेरा फैसला मंजूर करूं
या अपनी अना की बात सुनूं
उलझ रहे हैं मेरे
फैसले के रेशम फिर।
रीभा तिवारी
कैद करूं मैं
आसमां को बाहों में
और सिमट जाऊं
चांद की पनाहों में ।
चांद ने नर्म लहजे में
कुछ कहा इस तरह,
कैद न कर मुझे बाहों में
मैं रोज ही आ जाऊंगा
खुद तेरी पनाहों में ।
ताज्जुब में मैं पड़ी
कैद करूं या रिहा फिर
तेरा फैसला मंजूर करूं
या अपनी अना की बात सुनूं
उलझ रहे हैं मेरे
फैसले के रेशम फिर।
रीभा तिवारी
शनिवार, 7 मार्च 2015
नारी मुक्ति
एक बार नहीं कई बार हुआप्रथम द्वितीय वर्ल्ड वार हुआ
लेकिन तेरे हक की खातिर
ना ही कोई आंदोलन चला
ना ही कोई लड़ाई
क्योंकि इसमें हो जाती है
तेरी ही जगहँसाई
तू एक भारतीय नारी है
युग-युग से पुरुषों की आभारी है।
तू होना चाहती है स्वतंत्र
चलाना चाहती है नारी मुक्ति आंदोलन
बदलना चाहती है उनकी स्थितियों को
जो मौन रहती है
किसी मिट्टी बर्तन के भाव
बाजारों में बिकती है।
उनकी भावनाओं का कत्ल होता देख
चलाना चाहती है
तू आंदोलन
नारी मुक्ति आंदोलन
मुक्ति-मुक्ति
यह शब्द बन जाएंगे
महज एक युक्ति।
गुरुवार, 5 मार्च 2015
अस्तित्व तलाशती नारी
मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि स्त्री-पुरुष के मध्य विवेक सम्मत सम्बन्धों के आधार पर ही सृष्टि का विकास एवं विस्तार निर्भर करता है किंतु सत्ता वर्चस्व एवं अधिकार लिप्सा की प्रबलता के कारण प्राय: इन दोनों के मध्य संतुलित समीकरण का अभाव है। कहने को तो यहाँ तक कहा जाता है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता किन्तु व्यावहारिक संदर्भों में यह स्पष्ट है कि नारी वर्ग की नैसर्गिक कोमलता, समर्पण भावना एवं सृजनात्मकता की अविवेकपूर्ण व्याख्या द्वारा उसे पुरुष वर्ग की अधीनस्था एवं उपभोग्या माना गया है। इस दुराग्रह ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में अनिष्टकारी असंतुलन उत्पन्न किया है।
जीवन के हर प्रसंग और परिप्रेक्ष्य में उसके प्रति दोहरे मापदण्ड का अवलोकन किया जाता रहा है। शिक्षा, संस्कार एवं संघर्ष के अवसरों पर स्त्री वर्ग को पीछे धकेले रहना पुरुष वर्ग की वैश्विक विशेषता रही है। लेकिन आखिर कब तक नारी को सिर्फ दोहन और शोषण के अधिकार तक सीमित रखा जा सकता है। कहा जाता है कि नैसर्गिक प्रतिभा को भले ही कुछ देर के लिए दबाया या रोका जाए लेकिन उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। महिलाओं के साथ भी यही हुआ। उसके दहलीज के बाहर कदम रखने पर पाबंदी लगी रही लेकिन जब भी उसने इसे ताक पर रखकर बाहर की खुली हवा में सांस ली, अपने को उन्मुक्त किया और अपने को स्थापित किया तो कई पुरुषों को पीछे छोड़ गई। नारी दुर्गा, शक्ति, वीरांगना, अर्द्धांगिनी, वामांगी, सहचरी जैसे अनेक उपमाओं से महज विभूषित ही नहीं इसके सारे गुण उनमें विद्यमान हैं। उनमें वो जज्बा, कार्यकुशलता और प्रबंधन क्षमता है जो सिर्फ एक मौका तलाशता है जिसे सिर्फ एक मौके की जरूरत है न कि सहारे की। लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज ने इसे नकारने की भरपूर कोशिश की है। वह बार-बार यही बताने का प्रयास करते हैं कि जो महिलाएं अपनी दहलीज लांघती हैं उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ता है। अपनी हस्ती, अपनी अस्मिता तक मिटानी होती है, जैसी तमाम बातें की जाती हैं। जबकि सच्चाई कुछ और है। पुरुष हो या महिला प्रकृति ने मानवशक्ति का विभाजन करके इनके वैशिष्ट्य का निरूपण किया है। जिसमें स्त्री-पुरुष को परस्पर-पूरक माना गया है न कि परस्पर-विरोधी। वर्तमान समय में विश्व भर में स्त्री वर्ग के प्रति चेतना जागृत करने के प्रयास जारी हैं। आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानव के सम्बन्धों के निर्धारण आदि क्षेत्रों में स्त्रियों की निर्णायक भूमिका की अपेक्षा की जा रही है। महिला सशक्तीकरण का अर्थ है शोषण, दमन एवं उत्पीड़न के विरुद्ध महिला वर्ग में चेतना का संचार करना। उनमें उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना तथा उनकी प्रतिभा एवं दक्षता में निखार लाकर मानव कल्याण के व्यापक क्षेत्र में उनकी भूमिका का रचनात्मक विनियोग करना। इसके लिए विभिन्न स्तरों से प्रयास किये जा रहे हैं। महिला सशक्तीकरण का प्रथम सोपान है महिलाओं का स्वावलम्बन। आर्थिक एवं मानसिक रूप से आत्मनिर्भर होकर स्त्रियां अपने प्रति बरती जाने वाली दुरंगी नीतियों का प्रतिकार कर सकती हं,ै इसके लिए उन्हें अपनी इच्छाशक्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। अपनी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना होगा। अपनी सृजनात्मकता को भौतिक विकास- धारा से जोड़ने होगा। तभी महिलाएं अपना वास्तविक महत्व सिद्ध कर सकती हैं। कहा भी गया है कि स्वावलम्बन ही स्वतंत्रता की जननी है। रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास महिला वर्ग के लिए सबसे ज्यादा घातक रहा है। अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण महिला बिना सोचे-विचारे ही अनेक आत्मघाती बातों को अंगीकार कर लेती है। इससे उसकी चेतना का स्वस्थ विकास नहीं होता। मेरा मानना है कि महिला का शिक्षित होना, स्वावलम्बी होना अति आवश्यक है। जब-जब वह अपने परिवार के साथ परिवार की खुशी के लिए घर में रहना चाही तो यह उसकी कमजोरी समझा गया। उसे हर समय आरोप- प्रत्यारोप का सामना करना पड़ा। उसकी क्षमता और कार्यकुशलता को कम आंका गया। उसे घर की शोभा बढ़ाने वाली वस्तुओं तक की उपमा से नवाजा गया। नारी ने जब इन भ्रामक बातों से बाहर निकलने के प्रयास किए तो न केवल उसकी तरफ उंगलियां उठीं बल्कि उसके चरित्र पर भी सवाल उठाए जाने लगे। क्या सचमुच नारी इतना अस्तित्वविहीन है कि उसे किसी और के द्वारा दिए गए चरित्र प्रणाम पत्र की जरूरत है। अगर ऐसा है तो घर से बाहर जाकर काम करने वाले उन सभी पुरुषों के चरित्र प्रमाण पत्र क्यों नहीं बनते या बनाए जाते? महिलाओं से जुड़े सवाल एक नहीं अनेक हैं और जवाब एक है जीवन मेरा है, जीना हमें है, फिर कब तक, आखिर कब तक हम किसी और के सहारे और सहानुभूति का इंतजार करें। आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं अपने स्वरूप को पहचानें, अपनी शक्ति और अस्मिता का उचित मूल्यांकन कर प्रगति की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं। सुनी-सुनाई और रटी-रटाई बातों के पीछे भागते रहने से उनका विकास कदापि सम्भव नहीं है। इस दृष्टि से महिला साक्षरता का विशेष महत्व है। निरक्षर महिलाएं साक्षर बनकर ही अपने कौशल और अंत:करण का विकास कर सकती हैं। इसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं का आर्थिक स्वनियोजन भी महिला सशक्तीकरण की एक आवश्यक शर्त है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में कई तरह की योजनाएं महिला हित के लिए चलाई जा रही हैं लेकिन यह तब तक पूर्णत: सफल नहीं होंगी जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलेगी। आज अर्द्धनारीश्वर की भावना विकसित कर समाज में वह माहौल बनाने की दरकार है जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच समानता और सहयोग की भावना विकसित हो। स्त्री को अबला औरत न समझ कर उसे सामाजिक दर्जा दिया जाए। महिला किसी खास दिवस की मोहताज नहीं बल्कि हर दिन की हकदार है। सशक्तीकरण मूलत: महिलाओं के स्वचिंतन और स्वप्रेरणा का विषय है लिहाजा उसे बिना किसी बाह्य प्रेरणा अथवा प्रोत्साहन की प्रतीक्षा किये स्वयं के सशक्तीकरण के काम में लग जाना चाहिए।
जीवन के हर प्रसंग और परिप्रेक्ष्य में उसके प्रति दोहरे मापदण्ड का अवलोकन किया जाता रहा है। शिक्षा, संस्कार एवं संघर्ष के अवसरों पर स्त्री वर्ग को पीछे धकेले रहना पुरुष वर्ग की वैश्विक विशेषता रही है। लेकिन आखिर कब तक नारी को सिर्फ दोहन और शोषण के अधिकार तक सीमित रखा जा सकता है। कहा जाता है कि नैसर्गिक प्रतिभा को भले ही कुछ देर के लिए दबाया या रोका जाए लेकिन उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। महिलाओं के साथ भी यही हुआ। उसके दहलीज के बाहर कदम रखने पर पाबंदी लगी रही लेकिन जब भी उसने इसे ताक पर रखकर बाहर की खुली हवा में सांस ली, अपने को उन्मुक्त किया और अपने को स्थापित किया तो कई पुरुषों को पीछे छोड़ गई। नारी दुर्गा, शक्ति, वीरांगना, अर्द्धांगिनी, वामांगी, सहचरी जैसे अनेक उपमाओं से महज विभूषित ही नहीं इसके सारे गुण उनमें विद्यमान हैं। उनमें वो जज्बा, कार्यकुशलता और प्रबंधन क्षमता है जो सिर्फ एक मौका तलाशता है जिसे सिर्फ एक मौके की जरूरत है न कि सहारे की। लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज ने इसे नकारने की भरपूर कोशिश की है। वह बार-बार यही बताने का प्रयास करते हैं कि जो महिलाएं अपनी दहलीज लांघती हैं उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ता है। अपनी हस्ती, अपनी अस्मिता तक मिटानी होती है, जैसी तमाम बातें की जाती हैं। जबकि सच्चाई कुछ और है। पुरुष हो या महिला प्रकृति ने मानवशक्ति का विभाजन करके इनके वैशिष्ट्य का निरूपण किया है। जिसमें स्त्री-पुरुष को परस्पर-पूरक माना गया है न कि परस्पर-विरोधी। वर्तमान समय में विश्व भर में स्त्री वर्ग के प्रति चेतना जागृत करने के प्रयास जारी हैं। आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानव के सम्बन्धों के निर्धारण आदि क्षेत्रों में स्त्रियों की निर्णायक भूमिका की अपेक्षा की जा रही है। महिला सशक्तीकरण का अर्थ है शोषण, दमन एवं उत्पीड़न के विरुद्ध महिला वर्ग में चेतना का संचार करना। उनमें उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना तथा उनकी प्रतिभा एवं दक्षता में निखार लाकर मानव कल्याण के व्यापक क्षेत्र में उनकी भूमिका का रचनात्मक विनियोग करना। इसके लिए विभिन्न स्तरों से प्रयास किये जा रहे हैं। महिला सशक्तीकरण का प्रथम सोपान है महिलाओं का स्वावलम्बन। आर्थिक एवं मानसिक रूप से आत्मनिर्भर होकर स्त्रियां अपने प्रति बरती जाने वाली दुरंगी नीतियों का प्रतिकार कर सकती हं,ै इसके लिए उन्हें अपनी इच्छाशक्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। अपनी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना होगा। अपनी सृजनात्मकता को भौतिक विकास- धारा से जोड़ने होगा। तभी महिलाएं अपना वास्तविक महत्व सिद्ध कर सकती हैं। कहा भी गया है कि स्वावलम्बन ही स्वतंत्रता की जननी है। रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास महिला वर्ग के लिए सबसे ज्यादा घातक रहा है। अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण महिला बिना सोचे-विचारे ही अनेक आत्मघाती बातों को अंगीकार कर लेती है। इससे उसकी चेतना का स्वस्थ विकास नहीं होता। मेरा मानना है कि महिला का शिक्षित होना, स्वावलम्बी होना अति आवश्यक है। जब-जब वह अपने परिवार के साथ परिवार की खुशी के लिए घर में रहना चाही तो यह उसकी कमजोरी समझा गया। उसे हर समय आरोप- प्रत्यारोप का सामना करना पड़ा। उसकी क्षमता और कार्यकुशलता को कम आंका गया। उसे घर की शोभा बढ़ाने वाली वस्तुओं तक की उपमा से नवाजा गया। नारी ने जब इन भ्रामक बातों से बाहर निकलने के प्रयास किए तो न केवल उसकी तरफ उंगलियां उठीं बल्कि उसके चरित्र पर भी सवाल उठाए जाने लगे। क्या सचमुच नारी इतना अस्तित्वविहीन है कि उसे किसी और के द्वारा दिए गए चरित्र प्रणाम पत्र की जरूरत है। अगर ऐसा है तो घर से बाहर जाकर काम करने वाले उन सभी पुरुषों के चरित्र प्रमाण पत्र क्यों नहीं बनते या बनाए जाते? महिलाओं से जुड़े सवाल एक नहीं अनेक हैं और जवाब एक है जीवन मेरा है, जीना हमें है, फिर कब तक, आखिर कब तक हम किसी और के सहारे और सहानुभूति का इंतजार करें। आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं अपने स्वरूप को पहचानें, अपनी शक्ति और अस्मिता का उचित मूल्यांकन कर प्रगति की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं। सुनी-सुनाई और रटी-रटाई बातों के पीछे भागते रहने से उनका विकास कदापि सम्भव नहीं है। इस दृष्टि से महिला साक्षरता का विशेष महत्व है। निरक्षर महिलाएं साक्षर बनकर ही अपने कौशल और अंत:करण का विकास कर सकती हैं। इसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं का आर्थिक स्वनियोजन भी महिला सशक्तीकरण की एक आवश्यक शर्त है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में कई तरह की योजनाएं महिला हित के लिए चलाई जा रही हैं लेकिन यह तब तक पूर्णत: सफल नहीं होंगी जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलेगी। आज अर्द्धनारीश्वर की भावना विकसित कर समाज में वह माहौल बनाने की दरकार है जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच समानता और सहयोग की भावना विकसित हो। स्त्री को अबला औरत न समझ कर उसे सामाजिक दर्जा दिया जाए। महिला किसी खास दिवस की मोहताज नहीं बल्कि हर दिन की हकदार है। सशक्तीकरण मूलत: महिलाओं के स्वचिंतन और स्वप्रेरणा का विषय है लिहाजा उसे बिना किसी बाह्य प्रेरणा अथवा प्रोत्साहन की प्रतीक्षा किये स्वयं के सशक्तीकरण के काम में लग जाना चाहिए।
रविवार, 22 फ़रवरी 2015
संतति सुख का संत्रास
एक कहावत है कि लड़की जन्म से लता के समान होती है, उसे पुरुष के मजबूत कंधों की जरूरत होती है यानी वह अपने आप में कुछ भी नहीं है। पुरुष सहारे के बिना वह भू-लंठित कमजोर लता के समान है। समाज में कैसी-कैसी बेतुकी बातें गढ़कर स्त्री के पैरों में बेड़ियां डालने की साजिश रची गई है। जहां परिवार किसी भी समाज की बुनियाद है वहीं परिवार और शादी समाज के दो अहम स्तम्भ। शादी -विवाह का मतलब ही होता है वंश उत्पति। विवाहित इंसान खासतौर पर महिलाओं के लिए बच्चे का होना जीवन में संतुष्ट होने का प्रमाण माना जाता है। शादी होने के कुछ समय पश्चात अगर कोई संतान न पैदा हो तो उस दम्पति की पीड़ा उससे बेहतर कोई और समझ ही नहीं सकता। महिलाओं को तो कुछ समय बीतते ही कई तरह के ताने-उलाहने मिलने लगते हैं। घर-परिवार ही नहीं नात-रिश्तेदारी में भी चर्चा का विषय बना दिया जाता है। हर तरफ से महिलाओं पर उंगलियां उठने लगती हैं।
संतति सुख का यह संत्रास पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ही भोगना पड़ता है। शादी के कुछ समय पश्चात बच्चा न होने पर पुरुष समाज दूसरी और तीसरी शादी को स्वतंत्र है। समाज में राजा-महाराजाओं से लेकर रंक तक को मानो इसकी आजादी मिली हो, मानो छूट दी गई हो। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद संतान के आने की खबर बेशक एक सुखद अहसास है। एक नन्ही सी जान के साथ जिंदगी की शुरुआत किसी परीलोक की कहानी से कम रोचक और सुखद नहीं। फिर दूसरी और तीसरी संतान तक स्वाभाविक है कि हमारा आकर्षण पहले पहल मां बनने की खुशी से थोड़ा कम होने लगता है। इन सब के साथ शारीरिक क्षमता भी कम होने लगती है। पहली संतान को लेकर जो आकर्षण, जो अनुभव होता है वह दूसरी संतान के आने के समय सामान्य सी बात लगने लगती है। हमारे समाज में ऐसी माताएं भी हैं, जिनके दर्जन भर बच्चे होते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थितियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। कितना मुश्किल होता होगा इतने बच्चों का लालन-पालन और उनकी जिम्मेदारी सम्हालना। इन स्थितियों में एक औरत कई हिस्सों में बंट सी जाती है। उसका हर बार प्रसव पीड़ा से जूझना, गुजरना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार तो प्रसव के दौरान उचित देख-रेख के अभाव में महिला की जान तक चली जाती है तो कई महिलाएं खान-पान में अनियमितता और लापरवाही की वजह से अनचाही बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं।
नारी को यूं ही महान नहीं कहा गया है। उसमें कुछ क्षमताएं ईश्वर प्रदत्त हैं तभी तो वह जननी है, वंदनीय है। साइंस का मानना है कि संतानोत्पत्ति में 80 फीसदी मामलों में पुरुषों में कमी होती है। इसके बावजूद भी महिलाओं को कई शारीरिक, मानसिक यातनाओं से हर रोज रूबरू होना पड़ता है। समाज वंश का मतलब बेटा मानता है। भले ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने कुछ हद तक यह भ्रम तोड़ा हो लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता पूर्णत: बदली नहीं है। यह सवाल जेहन में बार-बार उठता है क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है? हम शिक्षित हो रहे हैं? क्या विचार बदल रहे हैं? अगर जवाब हां में है तो फिर ऐसा क्यों नहीं देखने और सुनने को मिलता कि शादी के बाद अगर एक दम्पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हो तो लोग पुरुषों की ओर भी उंगली उठाएं। ऐसा क्यों होता है कि बार-बार एक नारी को ही दोषी ठहराया जाता है। डॉक्टर की रिपोर्ट में बिल्कुल स्पष्ट होने के बावजूद पुरुष सामान्य रूप से अपनी कमी को क्यों नहीं स्वीकारता? वह और उसका परिवार औरत को दूसरी शादी की इजाजत क्यों नहीं देता? सच तो यह है कि समाज में जितने भी कायदे-कानून हैं, वे सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए ही बने हंै।
पुरुष कभी अपने को नारी से कम आंकने की कल्पना मात्र से टूट जाता है लेकिन जो स्त्री पल-पल टूटती है, चुपचाप सब कुछ सहती है उसके समर्पण, उसके दर्द के बदले उसे प्यार के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते। यहां अपवादों को देखें तो भी आंकड़े एक-दो फीसदी ही हैं। सवाल यह उठता है कि पुरुष सच से भयभीत है या खुद की कमियों से? क्या एक स्त्री का जीवन पुरुष के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और समर्पित होने के लिए ही बना है या बच्चा पैदा करके संतान सुख की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है? क्या उसके स्वयं के सपने साकार नहीं होने चाहिए। क्या वह आजाद नहीं, क्या उसे खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आज उन महिलाओं की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को भी देखने की जरूरत है जिनके पास संतान तो हैं लेकिन सिर्फ बेटियां। तीन-चार बेटियों के बावजूद भी उनका परिवार उनसे बेटे की इच्छा रखता है। क्या यह शारीरिक शोषण की श्रेणी में नहीं आता? उस महिला की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई पुरुष महसूस कर सके।
एक महिला के मां बनते ही उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह सब कुछ भूलकर बच्चे में ही खुद को देखने लगती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठती है। शादी और वंश तक ही एक महिला का घूमते रहना कहां तक उचित है? समाज में शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह की महिलाओं के साथ यातनाएं हो रही हैं। पहले यह आम धारणा थी कि गरीब-गुरबे, अनपढ़ लोग ही महिला की संवेदना को नहीं समझ पाते और उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं। यह सच नहीं है। आज की नारी सड़क से अधिक घर के भीतर असुरक्षित है। शिक्षित महिलाओं को अशिक्षित महिलाओं से भी ज्यादा अत्याचार सहन करना पड़ता है। घर और बाहर की दोहरी भूमिका निभाने के साथ दोहरा शोषण और कई समस्याओं से हर क्षण दो चार होना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
कहते हैं शिक्षा हमारी सोच को विकसित कर देती है। स्वाभाविक है शिक्षा से हमारी सोचने की क्षमता बढ़ती है तो किसी समस्या के बारे में बखूबी समझ भी। यही समझ शिक्षित लोगों की सबसे बड़ी तकलीफ भी है। किसी कम पढ़े-लिखे गांव के व्यक्ति को कोई भयंकर बीमारी हो जाए तो वह नहीं डरता, मस्ती में जीता है क्योंकि उसे उसकी विशेष जानकारी नहीं होती लेकिन एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सिर्फ इसकी भनक तक लग जाए तो वह बीमारी से कम और उसके भय, दुष्परिणामों के बारे में सोच-सोच कर नई बीमारियों गले लगा लेता है। यही बातें शिक्षित महिलाओं के साथ भी होती हैं। उसकी समस्या अनपढ़ महिलाओं से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती है। समय बदल रहा है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। तमाम योजनाएं शिक्षा को लेकर चलाई जा रही हैं, नारी हित की बातें की जा रही हैं लेकिन कोई भी योजना तभी सार्थक और कारगर होगी जब हम स्वयं बदलें तथा हमारे सोचने का दृष्टिकोण भी बदल जाए। हमारा समाज जन्म से लेकर आखिरी सांस तक स्त्री को पुरुषों पर निर्भर माने जाने की परम्परा से ऊपर उठकर सोचें तभी एक स्त्री को हम वह सब कुछ दे सकते हैं जिसकी वह हकदार है।
संतति सुख का यह संत्रास पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ही भोगना पड़ता है। शादी के कुछ समय पश्चात बच्चा न होने पर पुरुष समाज दूसरी और तीसरी शादी को स्वतंत्र है। समाज में राजा-महाराजाओं से लेकर रंक तक को मानो इसकी आजादी मिली हो, मानो छूट दी गई हो। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद संतान के आने की खबर बेशक एक सुखद अहसास है। एक नन्ही सी जान के साथ जिंदगी की शुरुआत किसी परीलोक की कहानी से कम रोचक और सुखद नहीं। फिर दूसरी और तीसरी संतान तक स्वाभाविक है कि हमारा आकर्षण पहले पहल मां बनने की खुशी से थोड़ा कम होने लगता है। इन सब के साथ शारीरिक क्षमता भी कम होने लगती है। पहली संतान को लेकर जो आकर्षण, जो अनुभव होता है वह दूसरी संतान के आने के समय सामान्य सी बात लगने लगती है। हमारे समाज में ऐसी माताएं भी हैं, जिनके दर्जन भर बच्चे होते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थितियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। कितना मुश्किल होता होगा इतने बच्चों का लालन-पालन और उनकी जिम्मेदारी सम्हालना। इन स्थितियों में एक औरत कई हिस्सों में बंट सी जाती है। उसका हर बार प्रसव पीड़ा से जूझना, गुजरना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार तो प्रसव के दौरान उचित देख-रेख के अभाव में महिला की जान तक चली जाती है तो कई महिलाएं खान-पान में अनियमितता और लापरवाही की वजह से अनचाही बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं।
नारी को यूं ही महान नहीं कहा गया है। उसमें कुछ क्षमताएं ईश्वर प्रदत्त हैं तभी तो वह जननी है, वंदनीय है। साइंस का मानना है कि संतानोत्पत्ति में 80 फीसदी मामलों में पुरुषों में कमी होती है। इसके बावजूद भी महिलाओं को कई शारीरिक, मानसिक यातनाओं से हर रोज रूबरू होना पड़ता है। समाज वंश का मतलब बेटा मानता है। भले ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने कुछ हद तक यह भ्रम तोड़ा हो लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता पूर्णत: बदली नहीं है। यह सवाल जेहन में बार-बार उठता है क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है? हम शिक्षित हो रहे हैं? क्या विचार बदल रहे हैं? अगर जवाब हां में है तो फिर ऐसा क्यों नहीं देखने और सुनने को मिलता कि शादी के बाद अगर एक दम्पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हो तो लोग पुरुषों की ओर भी उंगली उठाएं। ऐसा क्यों होता है कि बार-बार एक नारी को ही दोषी ठहराया जाता है। डॉक्टर की रिपोर्ट में बिल्कुल स्पष्ट होने के बावजूद पुरुष सामान्य रूप से अपनी कमी को क्यों नहीं स्वीकारता? वह और उसका परिवार औरत को दूसरी शादी की इजाजत क्यों नहीं देता? सच तो यह है कि समाज में जितने भी कायदे-कानून हैं, वे सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए ही बने हंै।
पुरुष कभी अपने को नारी से कम आंकने की कल्पना मात्र से टूट जाता है लेकिन जो स्त्री पल-पल टूटती है, चुपचाप सब कुछ सहती है उसके समर्पण, उसके दर्द के बदले उसे प्यार के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते। यहां अपवादों को देखें तो भी आंकड़े एक-दो फीसदी ही हैं। सवाल यह उठता है कि पुरुष सच से भयभीत है या खुद की कमियों से? क्या एक स्त्री का जीवन पुरुष के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और समर्पित होने के लिए ही बना है या बच्चा पैदा करके संतान सुख की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है? क्या उसके स्वयं के सपने साकार नहीं होने चाहिए। क्या वह आजाद नहीं, क्या उसे खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आज उन महिलाओं की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को भी देखने की जरूरत है जिनके पास संतान तो हैं लेकिन सिर्फ बेटियां। तीन-चार बेटियों के बावजूद भी उनका परिवार उनसे बेटे की इच्छा रखता है। क्या यह शारीरिक शोषण की श्रेणी में नहीं आता? उस महिला की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई पुरुष महसूस कर सके।
एक महिला के मां बनते ही उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह सब कुछ भूलकर बच्चे में ही खुद को देखने लगती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठती है। शादी और वंश तक ही एक महिला का घूमते रहना कहां तक उचित है? समाज में शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह की महिलाओं के साथ यातनाएं हो रही हैं। पहले यह आम धारणा थी कि गरीब-गुरबे, अनपढ़ लोग ही महिला की संवेदना को नहीं समझ पाते और उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं। यह सच नहीं है। आज की नारी सड़क से अधिक घर के भीतर असुरक्षित है। शिक्षित महिलाओं को अशिक्षित महिलाओं से भी ज्यादा अत्याचार सहन करना पड़ता है। घर और बाहर की दोहरी भूमिका निभाने के साथ दोहरा शोषण और कई समस्याओं से हर क्षण दो चार होना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
कहते हैं शिक्षा हमारी सोच को विकसित कर देती है। स्वाभाविक है शिक्षा से हमारी सोचने की क्षमता बढ़ती है तो किसी समस्या के बारे में बखूबी समझ भी। यही समझ शिक्षित लोगों की सबसे बड़ी तकलीफ भी है। किसी कम पढ़े-लिखे गांव के व्यक्ति को कोई भयंकर बीमारी हो जाए तो वह नहीं डरता, मस्ती में जीता है क्योंकि उसे उसकी विशेष जानकारी नहीं होती लेकिन एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सिर्फ इसकी भनक तक लग जाए तो वह बीमारी से कम और उसके भय, दुष्परिणामों के बारे में सोच-सोच कर नई बीमारियों गले लगा लेता है। यही बातें शिक्षित महिलाओं के साथ भी होती हैं। उसकी समस्या अनपढ़ महिलाओं से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती है। समय बदल रहा है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। तमाम योजनाएं शिक्षा को लेकर चलाई जा रही हैं, नारी हित की बातें की जा रही हैं लेकिन कोई भी योजना तभी सार्थक और कारगर होगी जब हम स्वयं बदलें तथा हमारे सोचने का दृष्टिकोण भी बदल जाए। हमारा समाज जन्म से लेकर आखिरी सांस तक स्त्री को पुरुषों पर निर्भर माने जाने की परम्परा से ऊपर उठकर सोचें तभी एक स्त्री को हम वह सब कुछ दे सकते हैं जिसकी वह हकदार है।
शनिवार, 21 फ़रवरी 2015
सुखद अहसास
आंख खुली तोचिड़ियां दस्तक दे चुकी थीं
आंगन में।
मैंने ताका मैंने झाँका
क्या रखा है, आँगन में।
वह फुदक-फुदक के चलती
जैसे ढूँढ़ रही हो कुछ
न मिलने पर पूछ रही हो कुछ।
नजर पड़ी आंगन में रखे
कुछ गमलों पर
जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले थे
कुछ तितली, कुछ भौंरे
यूँ ही फूलों से गले मिले थे।
मन में कई खूबसूरत ख्याल आए
मन को कई एहसास हुए
मन जैसे भोर की ताजी हवा के साथ
मंद-मंद बहने लगा
खूबसूरत ख्याल दिल में आने लगा
मैं चिड़ियों को तकती
तो कभी खुशबू चुराते भौंरों को
तो कभी तितली को उड़ते देख
तो कभी फूलों को चूमते देख
मुग्ध होती रही,
दिल मुअत्तर होता रहा
उन खुशबुओं के बीच
जिसे तितली भौंरों ने
फूल रोज खिलते हैं आंगन में
पर ये नजारे कब मिलते हैं आंगन में
मैंने कहा ए तितली, ए भौंरे
तुम रोज चले आना मेरे आँगन में
और साथ में लाना वो खुशबू
जो फूलों में ही न समाये
रुह में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो ख्याल बन न रहे
दिल में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो मुझे भी अपने रंगों में रंग जाए
साथ लाना वो खुशबू
जिसमें मैं समा जाऊँ
वो मुझमें समा जाए।
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
प्रेम जीवन का आधार
हर दर्द की दवा इश्क में है,
जीने का मजा इश्क में है।
इधर-उधर जो ढूंढ़ते हैं खुदा को,
कोई उनसे कह दे कि खुदा इश्क में है।
व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ प्रेम ही चाहता है। रुपया-पैसा, धन-दौलत, इज्जत-शोहरत के बावजूद जीवन में प्रेम न हो तो सब बेईमानी है। शायद ही कोई हो जिसे प्रेम न हो और प्रेम न चाहता हो। इसके बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम ईश्वर है, प्रेम पूजा है। प्रेम वह स्पर्श है जो एक शिशु भी महसूस कर लेता है। प्रेम वह भाव है जो एक बालक भी पढ़ लेता है। प्रेम वह अभिव्यक्ति है जो बिना बोले ही सामने वाला महसूस कर लेता है। जब प्रेम होता है तो कुछ भी नहीं सूझता। प्रेम किसी को किसी से किसी भी समय किसी रूप में हो सकता है। प्रेम न जाति, न धर्म और न ही उम्र की सीमा देखता है, यह किसी भी परिस्थिति में हो सकता है। प्रेम की व्याख्या भले ही लोगों ने अलग-अलग तरीके से की हो लेकिन इसे पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। प्रेम सिर्फ देना जानता है यानि प्रेम समर्पण है। प्रेम खोना जानता है। सच तो यही है प्रेम वही समझ सकता है जो प्रेम के लिए जिया हो, प्रेम में जिया हो।
प्रेम, प्रीत, प्यार, इश्क, चाहत, आशिकी, अनुराग, दीवानगी, मुहब्बत जो भी नाम दें, प्रेम तो प्रेम है। एक बड़ा ही कोमल नाजुक सा एहसास जिसे सिर्फ प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम मानो जीवन हो प्रेम के बिना कैसा जीवन किसका जीवन किसके लिए जीना सब व्यर्थ। प्रेम पूर्णता का एहसास कराता है। जो व्यक्ति स्वयं प्रेम में पूर्ण हो, वही प्रेम दे सकता है। प्रेम स्व आत्मविश्वास को भी बढ़ता है और जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटने का हौसला भी देता है। प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। प्रेम आकर्षण से शुरू होता है, विचारों के मेल से बढ़ता है और दबता है तो सिर्फ मजबूरियों से।
रिश्तों की तपती मरुभूमि में शीतल जल की फुहार है प्यार। प्यार वह शै है जो हर दिल में जला करती है। यह एक अहसास है जिसे रुह से महसूस किया जा सकता है। यह नूर की वह बूंद है जो सदियों से इंसानी दिलों में बह रही है। यह एक मधुर, सुखद अनुभव है, जो जीवन को नई ऊर्जा से भर देता है। कल्पनाओं से परे प्रेम की एक अलग दुनिया होती है। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं होता, न कोई निर्धारित नियम है। न उम्र की सीमा होती है न रिश्तों का बंधन। यह एक भाव है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। प्यार सिर्फ 'प्रेमी' और 'प्रेमिका' के मध्य निर्धारित सम्बन्ध ही नहीं बल्कि हम अपने और पराए सबके लिए दिल के किसी कोने में कोई अलग सा अहसास महसूस करते हैं। जिसने एक बार यह भाव महसूस किया उसके लिए जीवन के मायने बदल जाते हैं। प्यार का केन्द्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती। प्यार करने वाले ने जाति, धर्म और देश की सीमाओं को हमेशा चुनौती दी है। शायद यही कारण है कि जाति और धर्म के रखवालों ने हमेशा ही प्रेम का विरोध किया है। प्रेम में वह क्षमता है जो हर बंधन को अपने प्रवाह में बहा ले। जब तक हम प्रेम को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगे तब तक समाज से नफरत और हिंसा खत्म नहीं होगी। प्यार ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इसके जैसी सृजनात्मक ऊष्मा किसी दूसरे सम्बन्धों में नहीं मिलती। स्वप्न, सौंदर्य, आनंद, उत्तेजना कुछ कर गुजरने की तमन्ना एक साथ न जाने कितनी धारायें हृदय में फूट पड़ती हैं। अभिव्यक्ति का कोष रिक्त हो जाए, विचारों में शून्यता आ जाए फिर भी मन के अंदर ये एहसास ऊर्जा कायम रखने में सक्षम है। हर इंसान के जीवन में कभी न कभी ऐसा क्षण जरूर आता है जब अचानक कोई उसे अच्छा लगने लगता है। दिल में उसकी तस्वीर उतर आती है। आंखें हर पल बस उसे ही देखना चाहती हैं। उसके ख्यालों में खोया रहना भला लगता है। शायद यही प्यार की शुरुआत है, लेकिन इन भावों की अभिव्यक्ति भारतीय समाज में सहज नहीं है। मन जिसकी ओर खिंचता है, बहुत कम लोग उसके समक्ष अपने हाल-ए-दिल का इजहार कर पाते हैं। ज्यादातर भावनाएं एक सुखद, कोमल अहसास की तरह दिल की गहराइयों में दफन कर दी जाती हैं।
वास्तव में सच्चे प्यार की अनुभूति ऐसी ही होती है जो रगों में लहू, दिल में धड़कन और सीने में सांसों की तरह समा जाती है, जिसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल सा जान पड़ता है। लेकिन आज जिस तरह से आधुनिकता का रंग हर तरफ सिर चढ़ कर बोलने लगा है तो प्रेम कैसे अछूता रह जाए। प्रेम को भी बाजारवाद ने अपने रंगों में रंग लिया है। एक सप्ताह ही प्रेम के नाम जिसमें रोज डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किश डे, वेलेंटाइन डे मानो सप्ताह के संडे, मंडे तो गायब ही हो गए हों, ऊपर हम जिस रुहानी प्रेम की बात कर रहे थे वह प्रेम बिना देखे, बिना छुए, बिना आलिंगन किये, बिना किसी उपहार के अदान-प्रदान किए ही हम एक-दूसरे से मीलों दूर बैठे भी महसूस कर लेते हैं लेकिन ऐसा प्यार जो बाजारवाद से प्रभावित होकर कुछ देर के लिए मौज-मस्ती के लिए, उपहारों के अदान-प्रदान के लिए किया जाता है, वह प्रेम रुहानी प्रेम जैसा हो ही नहीं सकता। प्रेम कुछेक दिनों में बंधने वाला नहीं, यह तो हर बंधन से परे है, उन्मुक्त है। यह किसी आलिंगन, किसी उपहार, किसी डे में बंधना नहीं जानता यह पल-पल सांसों में बसने वाला, धड़कनों के साथ लयबद्ध होकर चलने वाला होता है। यह ऐसा एहसास है जिसे कोई और नहीं प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम सिर्फ प्रेम है, यह न किसी दिन, न ही किसी दिवस का मोहताज, बस इसे रहती है सच्चे आशिकी की तलाश तभी तो कहते हैं इसे अबूझ प्यास।
जीने का मजा इश्क में है।
इधर-उधर जो ढूंढ़ते हैं खुदा को,
कोई उनसे कह दे कि खुदा इश्क में है।
व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ प्रेम ही चाहता है। रुपया-पैसा, धन-दौलत, इज्जत-शोहरत के बावजूद जीवन में प्रेम न हो तो सब बेईमानी है। शायद ही कोई हो जिसे प्रेम न हो और प्रेम न चाहता हो। इसके बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम ईश्वर है, प्रेम पूजा है। प्रेम वह स्पर्श है जो एक शिशु भी महसूस कर लेता है। प्रेम वह भाव है जो एक बालक भी पढ़ लेता है। प्रेम वह अभिव्यक्ति है जो बिना बोले ही सामने वाला महसूस कर लेता है। जब प्रेम होता है तो कुछ भी नहीं सूझता। प्रेम किसी को किसी से किसी भी समय किसी रूप में हो सकता है। प्रेम न जाति, न धर्म और न ही उम्र की सीमा देखता है, यह किसी भी परिस्थिति में हो सकता है। प्रेम की व्याख्या भले ही लोगों ने अलग-अलग तरीके से की हो लेकिन इसे पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। प्रेम सिर्फ देना जानता है यानि प्रेम समर्पण है। प्रेम खोना जानता है। सच तो यही है प्रेम वही समझ सकता है जो प्रेम के लिए जिया हो, प्रेम में जिया हो।
प्रेम, प्रीत, प्यार, इश्क, चाहत, आशिकी, अनुराग, दीवानगी, मुहब्बत जो भी नाम दें, प्रेम तो प्रेम है। एक बड़ा ही कोमल नाजुक सा एहसास जिसे सिर्फ प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम मानो जीवन हो प्रेम के बिना कैसा जीवन किसका जीवन किसके लिए जीना सब व्यर्थ। प्रेम पूर्णता का एहसास कराता है। जो व्यक्ति स्वयं प्रेम में पूर्ण हो, वही प्रेम दे सकता है। प्रेम स्व आत्मविश्वास को भी बढ़ता है और जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटने का हौसला भी देता है। प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। प्रेम आकर्षण से शुरू होता है, विचारों के मेल से बढ़ता है और दबता है तो सिर्फ मजबूरियों से।
रिश्तों की तपती मरुभूमि में शीतल जल की फुहार है प्यार। प्यार वह शै है जो हर दिल में जला करती है। यह एक अहसास है जिसे रुह से महसूस किया जा सकता है। यह नूर की वह बूंद है जो सदियों से इंसानी दिलों में बह रही है। यह एक मधुर, सुखद अनुभव है, जो जीवन को नई ऊर्जा से भर देता है। कल्पनाओं से परे प्रेम की एक अलग दुनिया होती है। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं होता, न कोई निर्धारित नियम है। न उम्र की सीमा होती है न रिश्तों का बंधन। यह एक भाव है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। प्यार सिर्फ 'प्रेमी' और 'प्रेमिका' के मध्य निर्धारित सम्बन्ध ही नहीं बल्कि हम अपने और पराए सबके लिए दिल के किसी कोने में कोई अलग सा अहसास महसूस करते हैं। जिसने एक बार यह भाव महसूस किया उसके लिए जीवन के मायने बदल जाते हैं। प्यार का केन्द्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती। प्यार करने वाले ने जाति, धर्म और देश की सीमाओं को हमेशा चुनौती दी है। शायद यही कारण है कि जाति और धर्म के रखवालों ने हमेशा ही प्रेम का विरोध किया है। प्रेम में वह क्षमता है जो हर बंधन को अपने प्रवाह में बहा ले। जब तक हम प्रेम को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगे तब तक समाज से नफरत और हिंसा खत्म नहीं होगी। प्यार ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इसके जैसी सृजनात्मक ऊष्मा किसी दूसरे सम्बन्धों में नहीं मिलती। स्वप्न, सौंदर्य, आनंद, उत्तेजना कुछ कर गुजरने की तमन्ना एक साथ न जाने कितनी धारायें हृदय में फूट पड़ती हैं। अभिव्यक्ति का कोष रिक्त हो जाए, विचारों में शून्यता आ जाए फिर भी मन के अंदर ये एहसास ऊर्जा कायम रखने में सक्षम है। हर इंसान के जीवन में कभी न कभी ऐसा क्षण जरूर आता है जब अचानक कोई उसे अच्छा लगने लगता है। दिल में उसकी तस्वीर उतर आती है। आंखें हर पल बस उसे ही देखना चाहती हैं। उसके ख्यालों में खोया रहना भला लगता है। शायद यही प्यार की शुरुआत है, लेकिन इन भावों की अभिव्यक्ति भारतीय समाज में सहज नहीं है। मन जिसकी ओर खिंचता है, बहुत कम लोग उसके समक्ष अपने हाल-ए-दिल का इजहार कर पाते हैं। ज्यादातर भावनाएं एक सुखद, कोमल अहसास की तरह दिल की गहराइयों में दफन कर दी जाती हैं।
वास्तव में सच्चे प्यार की अनुभूति ऐसी ही होती है जो रगों में लहू, दिल में धड़कन और सीने में सांसों की तरह समा जाती है, जिसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल सा जान पड़ता है। लेकिन आज जिस तरह से आधुनिकता का रंग हर तरफ सिर चढ़ कर बोलने लगा है तो प्रेम कैसे अछूता रह जाए। प्रेम को भी बाजारवाद ने अपने रंगों में रंग लिया है। एक सप्ताह ही प्रेम के नाम जिसमें रोज डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किश डे, वेलेंटाइन डे मानो सप्ताह के संडे, मंडे तो गायब ही हो गए हों, ऊपर हम जिस रुहानी प्रेम की बात कर रहे थे वह प्रेम बिना देखे, बिना छुए, बिना आलिंगन किये, बिना किसी उपहार के अदान-प्रदान किए ही हम एक-दूसरे से मीलों दूर बैठे भी महसूस कर लेते हैं लेकिन ऐसा प्यार जो बाजारवाद से प्रभावित होकर कुछ देर के लिए मौज-मस्ती के लिए, उपहारों के अदान-प्रदान के लिए किया जाता है, वह प्रेम रुहानी प्रेम जैसा हो ही नहीं सकता। प्रेम कुछेक दिनों में बंधने वाला नहीं, यह तो हर बंधन से परे है, उन्मुक्त है। यह किसी आलिंगन, किसी उपहार, किसी डे में बंधना नहीं जानता यह पल-पल सांसों में बसने वाला, धड़कनों के साथ लयबद्ध होकर चलने वाला होता है। यह ऐसा एहसास है जिसे कोई और नहीं प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम सिर्फ प्रेम है, यह न किसी दिन, न ही किसी दिवस का मोहताज, बस इसे रहती है सच्चे आशिकी की तलाश तभी तो कहते हैं इसे अबूझ प्यास।
रविवार, 8 फ़रवरी 2015
समझें नौनिहालों की भावना
कौन नहीं चाहता की हमारी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर पैसा, इज्जत और शोहरत कमाए। हजारों कल्पनाओं के बीच ही तो हम अपने लाड़ले को पालते हैं और वक्त के साथ-साथ हमारी उम्मीदें बढ़ती जाती हैं। उम्मीद करना सही बात है लेकिन किससे और कितनी उम्मीद की जाए इसका भी ख्याल रखना जरूरी है। हम कहीं अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद तो नहीं कर बैठते जो वे पूरा ही न कर सकें।कहने को तो जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं लेकिन हर काम हर किसी के लिए सम्भव हो यह भी तो जरूरी नहीं। सबकी अपनी-अपनी पसंद-नापसंद, रुचि-अरुचि होती है। हम बच्चों के बारे में बिना कुछ जाने-सोचे उसके ऊपर कुछ भी थोप दें, यह सही नहीं है। खासकर बच्चों से जब भी हम कुछ उम्मीद करें उनकी रुचि-अरुचि के बारे में जरूर जानकारी रखें क्योंकि बिना मन से किया हुआ कोई भी कार्य कभी पूर्ण नहीं होता। जिस काम में हमारी रुचि होती है, वह काम मानो बोलता है। जब काम बोलने लगता है तो आप किसी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते न ही किसी बाह्य दिखावे में उलझते हैं वरना उस काम को आप और तल्लीनता के साथ करने में जुट जाते हैं।
माता-पिता को अपने बच्चों से उम्मीद रखनी चाहिए लेकिन उम्मीद रखने से पहले बच्चों की राय भी जानना जरूरी है। उनसे इस विषय में खुलकर बात करें और किसी भी कार्य को बेहतर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं और उसके परिणाम-दुष्परिणाम के बारे में भी अवगत कराएं। अक्सर माता-पिता की यह शिकायत होती है कि उनके बच्चे खेलकूद तो बेहतर हैं लेकिन पढ़ाई का नाम लेते ही उनकी तबियत खराब हो जाती है। ऐसे में बच्चे को खेल-खेल में ही पढ़ना सिखाएं। जरूरी नहीं कि आप बच्चे को सिर्फ किताबी ज्ञान ही दें। पढ़ाई के बहाने उन्हें व्यावहारिक ज्ञान भी अवश्य दें। यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बच्चे से हर दिन किसी न किसी विषय पर चर्चा करें। इससे भी उसमें जानने-समझने की लालसा बढ़ेगी। वह हर दिन कुछ नया करने की कोशिश करेगा।
अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि माता-पिता अपने बच्चों में भी तुलना करने लगते हैं कि ये अच्छा है और ये नहीं। ऐसा करने से हमें बचना चाहिए। हर बच्चे में अलग-अलग प्रतिभा मौजूद रहती है। जरूरत है समय रहते उसे पहचान कर निखारा जाए । हर बच्चा महान बन सकता है बशर्ते कि उसकी प्रतिभा की पहचान सही समय पर कर ली जाए। माता-पिता और शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों को सही राह दिखाएं। उचित-अनुचित का संज्ञान कराएं। बच्चे को बात-बात पर झिड़कने की बजाय उसे प्रेम से अपनी बातें समझाएं और उनकी बातों को भी ध्यान से सुनें, ऐसा करने से बच्चे में न केवल समझ पैदा होगी बल्कि वह आपकी हर बात मान लेगा ।
देखने में आया है कि अभिभावक बच्चे का मूल्यांकन उसके कक्षा में प्राप्त अंकों से करने लगते हैं। अंकों से किसी बच्चे की बुद्धि और क्षमता का मूल्यांकन किया जाना सही नहीं है। एक कक्षा में अगर 50 से 100 बच्चे पढ़ते हैं तो यह जरूरी नहीं है कि सभी बच्चे टाप करें। हर बच्चे की अपनी काबिलियत और रुचि होती है। किसी में नेतृत्व क्षमता होती है तो कोई कला में विशेष रुचि रखता है। किसी का मन खेलों में लगता है तो कोई पठन-पाठन में ध्यान देता है। यह तय है कि जो बच्चा जिस विषय पर अधिक रुचि लेगा, उसे उसमें अन्य विषयों से बेहतर सफलता मिलेगी।
अफसोस, आज हर माता-पिता अपने नौनिहाल का मूल्यांकन उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट से करते हैं। उसके सामाजिक और भावनात्मक पक्ष का जरा भी ध्यान नहीं रखते। आज इसी वजह से रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है जिससे बच्चे अपनी रुचि के अनुरूप विषय का चयन कर सकें। आज मूल्यांकन की जो भी पद्धतियां हंै उनमें कई खामियां हैं। बच्चे के विषयगत ज्ञान का मूल्यांकन उसके रिपोर्ट कार्ड से तो जरूर किया जा सकता है लेकिन बच्चा अपने जीवन और भविष्य में कितना सफल होगा यह विषयगत मूल्यांकन नहीं बता सकता।
यह उसकी किसी काम के प्रति रुचि, उसका स्वयं का व्यवहार, उसका लोगों के साथ सम्बन्ध, कार्यकुशलता, व्यवहार में लचीलापन, काम के प्रति समर्पण के भाव जैसी तमाम बातों पर निर्भर करता है। जो जीवन में जितनी सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेगा, वह उतनी ही अधिक सफलता अर्जित करेगा। क्या यह सच नहीं कि विश्वविद्यालय जिसे गोल्ड मेडल देता है, जिन्दगी उसे मिट्टी के मेडल भी नहीं दे पाती।
अक्सर देखने को मिलता है कि माता-पिता बच्चों के परीक्षाफल को लेकर ज्यादा चिंतित हो जाते हैं। कई बार तो ऐसा देखने को भी मिलता है कि बच्चे से ज्यादा माता-पिता इसे सोशल स्टेटस मान बैठते हैं जिसका दुष्परिणाम कभी-कभी बहुत ही भयंकर रूप में देखने को मिलता है। मन के अनुकूल रिपोर्ट कार्ड नहीं आने पर बच्चा आत्महत्या की कोशिश कर बैठता है और इसमें भी असफल रहा तो मानसिक तनाव से गुजरने लगता है जो उसके साथ-साथ पूरे परिवार के लिए घातक हो जाता है। ज्ञान, शिक्षा और मूल्यांकन की अहमियत अपनी जगह ठीक है लेकिन जीवन और इंसान से बढ़कर कुछ भी नहीं। जीवन सुरक्षित है तो कई परीक्षाएं होंगी। कभी हम पास तो कभी फेल होंगे लेकिन अगर जीवन ही नहीं रहा तो फिर कैसी परीक्षा, कैसा मूल्यांकन और कैसा सोशल स्टेटस?
शुक्रवार, 23 जनवरी 2015
प्रेम ही वसंत है
वसंत का आगमन ही कुछ ऐसा है जो हमें उल्लास से भर देता है। शायद ही कोई हो जिसे वसंत न भाता हो। मौसम का राजा वसंत, दिलों पर राज करने वाला वसंत। प्रेम से सराबोर वसंत। राजा जो सबका प्रिय हो, सबके साथ समभाव रखता हो। सबके लिए सामान्य हो। यही तो है वसंत की खासियत। वसंत को लिखना शुरू की तो लगा स्वयं को लिख दूँ, प्रेम को लिख दूँ। वसंत के परे क्या कोई उत्साह की कल्पना भी कर सकता है। प्रकृति की गोद में हर्ष, उल्लास, प्रेम और सौंदर्य ही तो है। बस जरूरत है इसे महसूस करने की।
आधुनिकता के रंग में रंगने के बाद जैसे मौसम तो आना-जाना हो। किसी को इसकी खबर तक नहीं। बंद कमरे में एसी में बैठे लोग भला इस वसंत को क्या समझें। वसंत को समझना है तो प्रकृति को निहारना होगा, महसूस करना होगा। उसके स्पर्श में कुछ पल बिताना होगा। वसंत जो प्रेम से परिपूर्ण, विविध रंग से भरा, जिधर भी नजर घुमाएं सिर्फ रंग,आकर्षण मादकता और सौंदर्य ही तो है जो मानो अपनी ओर खींचता है न चाहें तो भी हम उसके रंग में रंग जाते हैं। यही तो है मादकता। भला कौन होगा जो वसंत से अछूता होगा, जिसे वसंत ने कभी न लुभाया हो। वसंत तो प्रेम का प्रतीक है। वसंत अपने अंदर गमों को भुलाने का राज रखे हुए है। वसंत का तात्पर्य है वनस्पतियों का प्रसन्न हो जाना, फूलों का खिलना, भौरों का गुनगुनाना, धरती का श्रृंगार कर लेना। जितनी उल्लासमय श्रेष्ठताएं हमारे भीतर और बाहर हैं, वो वसंत का ही रूपक है। वसंत वह रंग है जो छूटता नहीं। वसंत हमें अभिभूत करता है क्योंकि वह प्रेम है या यूँ कहें कि प्रेम ही वसंत है।
सच कहें तो सौंदर्य किसी पदार्थ में नहीं होता,अवस्था में होता है। बच्चे के लिए खिलौने में आनंद है, युवक को भोग में आनंद है। संत-महात्माओं की वाणी में आनंद है। ठीक उसी प्रकार वसंत प्रेम है और प्रेम वसंत लेकिन कब जब हम उसके रंग में रंगें तब। कहते हैं गुणों को देखते-देखते केवल गुणों का भीतर आवर्तन होने लगता है, फिर भला वसंत को देखते-निहारते इसका असर क्यों न हो। वसंत पंचमी एक अवसर है, जहाँ से सरस्वती यानी वाक् की शक्ति को ग्रहण करने के लिए आधार पाते हैं। अगर इसे भी विस्तार से सोचें तो पाते हैं कि वसंत पंचमी वाक् की शक्ति तभी पूर्ण है, सार्थक है जो वाक् हमें शक्ति, ऊर्जा, संकल्प से भर दे। प्रेम का अनुभूति कराए जो बैर को जड़ से नष्ट कर दे। तो क्या सरस्वती पूजा का वसंत में आना यह संदेश नहीं देता कि अपनी वाक्पटुता और वाणी कौशल से तुम दिलों पर राज करो। सबको जोड़ो, सबसे प्रेम करो। जहाँ भी जाओ उस आकर्षण, उस खुशबू को बिखेरो जो सब में समाहित हो जाए, सब पर असर कर जाए। किसी के उदास चेहरे पर मुस्कान खींच जाए।
गौर करे वसंत पंचमी विद्यालय में ही क्यों? क्योंकि विद्यालय में हमारा बचपन बीतता है और अगर विद्यालय से ही वसंत की महत्ता जान जाएं तो फिर जीवन भर भूलें ही नहीं। हमारे अंदर एक सकारात्मक विचार, उत्साह और उमंग का समावेश हो। जो हमें जीवनपर्यंत ऊर्जावान रखे। आज जीवन आनंदहीन, प्रेमहीन प्रतीत होता है। मानो जीवन से मादकता बिछुड़ गई है। व्यक्ति खुद को एकांत में सिमटा महसूस करने लगा है फिर जो खुद असहाय हो वह दूसरे को कैसे कुछ दे सकता है। प्रेम पूर्णता की बात करता है। प्रेम पूर्ण है, वसंत पूर्ण है। प्रेम देने का नाम है, वसंत भी देना जानता है। बांटना जानता है, भरना जानता है और रंगना जानता है। तभी तो पूर्णता का प्रतीक है। तभी तो वसंत प्रगाढ़ता की अनुभूति कराता है बशर्ते आप इसे महसूस करें। जहाँ निकटता नहीं वहां नीरसता छाएगी ही। फिर वसंत तो निकटता की बात करता है। जहाँ रस ही रस हो, मादकता हो, सुगंध हो और सौंदर्य हो, यही तो है वसंत। प्रेम निकटता का सूचक है तो वसंत एहसास। प्रेम से पूर्ण ये मौसम अपने आपमें न जाने कितने सौंदर्य, रंग रस को समाहित किए हुए है जो सिर चढ़ बोलता है, नस-नस में प्रेम रस घोलता है। एक प्रेयसी के कानों में वसंत क्या-क्या बोलता है, कोई सुनो तो सही सिर्फ प्रेम ही तो बोलता है।
आधुनिकता के रंग में रंगने के बाद जैसे मौसम तो आना-जाना हो। किसी को इसकी खबर तक नहीं। बंद कमरे में एसी में बैठे लोग भला इस वसंत को क्या समझें। वसंत को समझना है तो प्रकृति को निहारना होगा, महसूस करना होगा। उसके स्पर्श में कुछ पल बिताना होगा। वसंत जो प्रेम से परिपूर्ण, विविध रंग से भरा, जिधर भी नजर घुमाएं सिर्फ रंग,आकर्षण मादकता और सौंदर्य ही तो है जो मानो अपनी ओर खींचता है न चाहें तो भी हम उसके रंग में रंग जाते हैं। यही तो है मादकता। भला कौन होगा जो वसंत से अछूता होगा, जिसे वसंत ने कभी न लुभाया हो। वसंत तो प्रेम का प्रतीक है। वसंत अपने अंदर गमों को भुलाने का राज रखे हुए है। वसंत का तात्पर्य है वनस्पतियों का प्रसन्न हो जाना, फूलों का खिलना, भौरों का गुनगुनाना, धरती का श्रृंगार कर लेना। जितनी उल्लासमय श्रेष्ठताएं हमारे भीतर और बाहर हैं, वो वसंत का ही रूपक है। वसंत वह रंग है जो छूटता नहीं। वसंत हमें अभिभूत करता है क्योंकि वह प्रेम है या यूँ कहें कि प्रेम ही वसंत है।
सच कहें तो सौंदर्य किसी पदार्थ में नहीं होता,अवस्था में होता है। बच्चे के लिए खिलौने में आनंद है, युवक को भोग में आनंद है। संत-महात्माओं की वाणी में आनंद है। ठीक उसी प्रकार वसंत प्रेम है और प्रेम वसंत लेकिन कब जब हम उसके रंग में रंगें तब। कहते हैं गुणों को देखते-देखते केवल गुणों का भीतर आवर्तन होने लगता है, फिर भला वसंत को देखते-निहारते इसका असर क्यों न हो। वसंत पंचमी एक अवसर है, जहाँ से सरस्वती यानी वाक् की शक्ति को ग्रहण करने के लिए आधार पाते हैं। अगर इसे भी विस्तार से सोचें तो पाते हैं कि वसंत पंचमी वाक् की शक्ति तभी पूर्ण है, सार्थक है जो वाक् हमें शक्ति, ऊर्जा, संकल्प से भर दे। प्रेम का अनुभूति कराए जो बैर को जड़ से नष्ट कर दे। तो क्या सरस्वती पूजा का वसंत में आना यह संदेश नहीं देता कि अपनी वाक्पटुता और वाणी कौशल से तुम दिलों पर राज करो। सबको जोड़ो, सबसे प्रेम करो। जहाँ भी जाओ उस आकर्षण, उस खुशबू को बिखेरो जो सब में समाहित हो जाए, सब पर असर कर जाए। किसी के उदास चेहरे पर मुस्कान खींच जाए।
गौर करे वसंत पंचमी विद्यालय में ही क्यों? क्योंकि विद्यालय में हमारा बचपन बीतता है और अगर विद्यालय से ही वसंत की महत्ता जान जाएं तो फिर जीवन भर भूलें ही नहीं। हमारे अंदर एक सकारात्मक विचार, उत्साह और उमंग का समावेश हो। जो हमें जीवनपर्यंत ऊर्जावान रखे। आज जीवन आनंदहीन, प्रेमहीन प्रतीत होता है। मानो जीवन से मादकता बिछुड़ गई है। व्यक्ति खुद को एकांत में सिमटा महसूस करने लगा है फिर जो खुद असहाय हो वह दूसरे को कैसे कुछ दे सकता है। प्रेम पूर्णता की बात करता है। प्रेम पूर्ण है, वसंत पूर्ण है। प्रेम देने का नाम है, वसंत भी देना जानता है। बांटना जानता है, भरना जानता है और रंगना जानता है। तभी तो पूर्णता का प्रतीक है। तभी तो वसंत प्रगाढ़ता की अनुभूति कराता है बशर्ते आप इसे महसूस करें। जहाँ निकटता नहीं वहां नीरसता छाएगी ही। फिर वसंत तो निकटता की बात करता है। जहाँ रस ही रस हो, मादकता हो, सुगंध हो और सौंदर्य हो, यही तो है वसंत। प्रेम निकटता का सूचक है तो वसंत एहसास। प्रेम से पूर्ण ये मौसम अपने आपमें न जाने कितने सौंदर्य, रंग रस को समाहित किए हुए है जो सिर चढ़ बोलता है, नस-नस में प्रेम रस घोलता है। एक प्रेयसी के कानों में वसंत क्या-क्या बोलता है, कोई सुनो तो सही सिर्फ प्रेम ही तो बोलता है।
मंगलवार, 13 जनवरी 2015
मकर संक्रान्ति का महत्व
मकर संक्रान्ति का अर्थ है-माघ मास की संक्रान्ति जिस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। मकर राशि बारह राशियों में दसवें स्थान पर होती है। मकर संक्रान्ति का पर्व किसी न किसी रूप में पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। यह पर्व कभी पूष और कभी माघ में भी पड़ जाता है। जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी की गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांति चक्र कहलाता है। इस परिधि को बारह भागों में बांटकर बारह राशियां बनी हैं। ये बारह नक्षत्रों के अनुरूप हैं। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रान्ति कहलाता है। पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रान्ति कहते हैं। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं और रात छोटी तथा दक्षिणायन में इसके ठीक विपरीत रात बड़ी और दिन छोटा होता है।शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और दक्षिणायन देवताओं की रात्रि। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप-तप अनुष्ठानों का अत्यन्त महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुणा होकर प्राप्त होता है। इतना ही नहीं यह काल भगवान के भजन, पूजन, स्मरण और चिंतन के लिए महत्वपूर्ण है। रामचरित मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि पर प्राप्त होता है अर्थात जब मकर संक्रान्ति होती है तब प्रयागराज में देवता दैत्य और मनुष्य झुंड के झुंड आकर त्रिवेणी में स्नान करते हैं-
माघ मकरगत रवि जा होई। तीरथ पतिहिं आव सा कोई॥
देव, दनुज, किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
यहाँ की दो बातें विचारणीय हैं। पहली बात है ‘रवि जा होई’ माने पौष में हो या माघ में। इसलिए ग्रंथों में पौष को भी माघ में मिलाकर कहा गया है। अर्थात् पूष को माघ में जोड़कर कहा गया है। उत्तरायण से सूर्य का स्वागत सभी करते हैं। हर मास के स्वामी के नाम अलग हैं। माघ मास के स्वामी माधव भगवान हैं। अत: सभी उनकी पूजा किया करते हैं। यह पावन स्नान प्रात:काल में पूर्ण होता है अत: पुण्यदायक माना जाता है। चूँकि इसी पुण्यकाल में मुनियों का समाज जुटता था- ‘तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा’। भारद्वाज जी का आश्रम मुनियों को अच्छा लगता था, संगम के पास था अत: मन को भाता था। वे प्रात:काल वहाँ स्नान करते थे। ‘मज्जहिं प्रात समेत उछाहा’। और परस्पर भगवान की गाथा गाते और सुनते थे। ‘कहहिं परसपर हरि गुन गाहा’। इस ऋषि समाज की गोष्ठी में ब्रह्म का निरूपण, धर्म के विधान और तत्व के विभागों का वर्णन किया जाता था और ज्ञान-वैराग्य युक्त भगवान् की भक्ति के विषय में प्रबुद्धजनों की वार्ता होती थी। संक्षेप में याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद की रामायणकथा मकर संक्रान्ति को ही प्रारंभ हुई थी। इस दृष्टि से मकर संक्रान्ति हमारी समस्त आध्यात्मिक जिज्ञासा को पुष्ट-तुष्ट करने का भी पावन पर्व है।
संक्रान्ति को हमारे देश ने एक सांस्कृतिक पर्व का महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह पर्व नववर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व एक और दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। वर्ष के विभिन्न ऋतुओं में जो पर्व काल निश्चित किए गए हैं उनका हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जनजीवन में जिस काल के प्रभाव से शारीरिक शक्ति और मानसिक उल्लास का संचार और प्रसार होता है वह स्वत: ही पर्व बन जाता है। हमारे कालपुरुष के छह अंग षड्ऋतुओं के रूप में हैं। शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त। उत्तरायण सूर्य के साथ शिशिर वसंत और ग्रीष्म से जुड़े हुए हैं। उत्तरायण में धरती और वनस्पतियों के रस का शोषण होता है। आदान कार्य के चलते ही सूर्य का नाम आदित्य है और विसर्ग कार्य के कारण चन्द्रमा का नाम सुधांशु है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति विसर्गकाल का अंत और आदान काल का प्रारंभ है। इसमें मनुष्य और वनस्पतियों का बल चरम सीमा पर होता है। अत: मकर राशि एक ऐसे संधि-स्थल पर है जब प्राणियों और वनस्पतियों की भौतिक शक्ति के आरोह-अवरोह क्रम का अंत और प्रारंभ होता है। इस दृष्टि से बल और शक्ति का विचार करते हुए मकर संक्रान्ति का अत्यधिक महत्व है।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल-दान का महत्व विशेष है। धर्मशास्त्र में षट् तिला पाप नाशिनी का वर्णन मिलता है। लोक में नया चूड़ा, गुड़, दही और तिल यह मकर संक्रान्ति का भोजन प्रसिद्ध है। नये चावल और उड़द की खिचड़ी खाने का भी रिवाज है। इन सब बातों का सीधा सम्बन्ध आयुर्वेद में कही गई बातों की ऋतु चर्चा से है। शीतऋतु में शीत वायु के स्पर्श से प्राणियों की अग्नि अंतर्मुखी हो जाती है और उस समय उसे मात्रा और स्वभाव से गुरुद्रव्यों की अपेक्षा होती है। शास्त्रकारों ने इस काल में स्निग्ध, अमल, लवण रसों से युक्त पदार्थ, गोरस, गुड़ आदि इक्षुविकार, तैल नया अन्न सेवन करने का विधान है। शीत निवारण के लिए तिल के तेल का महत्वपूर्ण विधान है। इसी से मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल उबटन, तिल हवन, तिल भोजन तथा तिलदान सभी कार्य पापनाशक हैं।
मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व हिमाचल, हरियाणा तथा पंजाब में यह त्योहार लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल अंधेरा होने पर होली के समान आग जलाकर तिल, गुड़, चावल तथा मक्का से अग्नि पूजन करके आहुति डाली जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस उत्सव को खिचड़ी कहते हैं। बंगाल में भी इस दिन स्नान करके तिलदान की विशेष प्रथा है। राजस्थान तथा गुजरात में इस दिन बालक, युवा-युवतियां तथा वृद्धजन बड़े उत्साह से पतंग उड़ाते हैं। प्राचीन रोम में इस दिन खजूर, अंजीर और शहद बाँटने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन यूनान में लोग वर-वधू को संतान की वृद्धि के लिए तिलों का पकवान बांटते थे। इस दिन कमल और शुद्ध घी का दान पुण्य कार्य माना जाता है।
इस पुनीत अवसर पर गंगासागर में बहुत बड़ा मेला लगता है। कहते हैं कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। अत: यह मकर संक्रान्ति का पर्व पूरे देश में बड़ी श्रद्धा व आदरपूर्वक मनाया जाता है। लोहड़ी के रूप में सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश प्राप्त होता है। दक्षिण भारत के विशेष त्योहारों में मकर संक्रान्ति या पोंगल तीन दिनों तक मनाया जाता है। कई जगहों पर इस पर्वोत्सव को मेले का रूप देना सार्वभौम माना गया है। इसमें बच्चे, बूढ़े सभी आनंदित होते हैं। यह सांस्कृतिक पर्व हमें विरासत रूप में प्राप्त होता है। इसकी विश्वसनीयता में सदियों का अनुभव छिपा है। संक्रान्ति काल के आहार और गंगा स्नान की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। कृषि प्रधान देश के इन त्योहारों का महत्व कृषि के साथ धार्मिकता और राष्टÑीयता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
रविवार, 11 जनवरी 2015
तलाश है...
कुछ दूर है
कुछ पास है
सबको किसी न किसी की,
तलाश है।
यह जिंदगी
तो एक प्यास है
जिसे मिल गया
वह पा लिया
जो पा लिया,
उसे खो दिया।
जिसे नहीं मिला
वो हैरान है
व्यर्थ में परेशान है
यह प्यास वो है
जो बुझती नहीं
सागर में बूंदे
मिलती नहीं।
जो ढूँढ़ता इसे
ढूँढ़ता ही रहे
बिन राह चलता रहे
पास मंजिल रहे
फिर भी भटकता रहे
व्यर्थ ही प्यासा रहे ।
कुछ दूर है
कुछ पास है
हर किसी को किसी की,
तलाश है.....।
कुछ पास है
सबको किसी न किसी की,
तलाश है।
यह जिंदगी
तो एक प्यास है
जिसे मिल गया
वह पा लिया
जो पा लिया,
उसे खो दिया।
जिसे नहीं मिला
वो हैरान है
व्यर्थ में परेशान है
यह प्यास वो है
जो बुझती नहीं
सागर में बूंदे
मिलती नहीं।
जो ढूँढ़ता इसे
ढूँढ़ता ही रहे
बिन राह चलता रहे
पास मंजिल रहे
फिर भी भटकता रहे
व्यर्थ ही प्यासा रहे ।
कुछ दूर है
कुछ पास है
हर किसी को किसी की,
तलाश है.....।
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