शनिवार, 12 मार्च 2016

...जिद.....

..
मैं नहीं लगाना
चाहती हूँ छलांग
तुम्हारी जिद के आगे
मैं जानती हूँ
 मैंने अपनी कविताओं को
 तुम्हारे सीने में उतार दिया है
जो तुम्हारी कल्पनाओं से होते हुए
 तुम्हारे प्यार करने की
 जिद तक उतर आई है ।
- रीभा तिवारी





  .......याद ..........
 मेरी जिस्म की नसों से
गुजरती है हर रोज
तुम्हारी याद
निगाह घर की चौखट से
होते हुए छत पर
 आसमान में टहलते चांद को
 देखती है
अनायास वहाँ रहता है
उसमें तुम्हारा चेहरा
और भीतर मचल जाती है
तुम्हारी याद।
-रीभा तिवारी
.......एहसास.....
 जब भी हमारी
 खिड़कियों के परदे
हवाओं के माध्यम से
सरकने लगते हैं
कुछ यादें
वजूद की विरासत से
एकाएक सामने आकर
खड़ी हो जाती हैं
हृदय में एक अलौकिक
हसास सा भर जाता है
एक ही समय में
आँखों में सैकड़ों सूरज
चमकने लगते हैं
और मैं तुम्हारे हिस्से में
अपनी रातें रखकर
अपने गीले सपनों के साथ
सो जाती हूँ,
सुबह की प्रतीक्षा में।
- रीभा तिवारी





.....अस्वीकार के शब्द.
स्त्री क्या तुम
बाजुओं की कैद से
आजाद होना नहीं चाहती।
 लड़ना नहीं चाहती
तुम अपने यथार्थ से
 जिस यथार्थ को
तुम्हारे विरुद्ध
पुरुषों ने बुना है
और उस यथार्थ में
उसने बिछा दिया है
अपनी हसीन चाहतों का जाल
जिसमें तुम फँस तो जाती हो
लेकिन निकलने की तुम्हारी कोशिश
बिखरते हुए जर्द पत्तों की तरह
तुम्हारे आँसुओं की बूंदों से
आँखों में टूटती किरणों के
अनजानेपन की धूल में
 एक अनसुलझी दुनिया की तस्वीर
 लेकर खड़ी हो जाती है,
जिस दुनिया में तुम्हारा
अंत तो निश्चित होता है
लेकिन आरम्भ की गुंजाइश नहीं होती।
लेकिन अब तुम्हें अस्वीकार करना है
पुरुषों के बनाए हुए नियम को
अपने लिए उनके विरुद्ध ।       
-रीभा तिवारी