सोमवार, 29 मई 2017

पर्यावरण पर महत्वाकांक्षा की कालिख

डा. रीभा तिवारी
आज हमारा देश विकास की राह पर अग्रसर है। समाज के हर वर्ग का जीवन समृद्ध हो रहा है। स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं तो भौतिक सुविधाएं अपनी श्रेष्ठता के चरम पर आरूढ़ मानव मन को चुनौती दे रही हैं। सुख की खोज में हमारी खुशी तो चैन की तलाश में मुस्कराहट कहीं खो गई है। हम समझ ही नहीं पा रहे कि पर्यावरण की विनाश-लीला को कैसे और किस तरह रोकें। अल-सुबह हम पार्कों में ठहाके तो लगा रहे हैं लेकिन दिल से निकलने वाली वो हँसी जो आँखों से झाँककर होठों से निकलती थी अब सुनाई नहीं देती। उसने शायद अपना रास्ता बदल लिया है। आज हंसी दिमाग के आदेश से मुख से निकलती है और चेहरे की मांसपेशियों पर भी दिखाई देती है लेकिन हमें महसूस नहीं होती। ऐसा क्यों हो रहा है। इस यक्ष प्रश्न का समाधान आज सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया का हर मुल्क खोज रहा है लेकिन सफलता से हम कोसों दूर हैं।
आज जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ रही है, इंसान का जीवन-यापन कठिन होता जा रहा है। शरीर को नित नई व्याधियां अपने आगोश में ले रही हैं। अतीत में जब सुबह से शाम तक हम प्रत्येक काम अपने हाथों से करते थे तब वातावरण कुछ और था. आज कुछ और है। पर्यावरण यानि हमारे आस-पास का आवरण आज इस तरह से दूषित हो चुका है कि हम सुकून की सांस भी नहीं ले पा रहे। प्रकृति और मनुष्य का सम्बन्ध पुराना है। पर्यावरण और जीवन की अभिन्नता से सभी परिचित भी हैं। पर्यावरण की स्वच्छता, निर्मलता और संतुलन से ही मानव मात्र को बचाया जा सकता है, यह जानते हुए भी हम बेखबर हैं। प्राचीन साहित्य में कवियों की कविताएं प्रकृति से भरी पड़ी हैं। तुलसीदासजी की यह पंक्ति निरक्षरों तक को याद है-
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे,
खल के वचन संत सहे जैसे।
प्राचीनकाल से ही जीव पंचभूतों (जल, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि) से परिचित है। इस एक में से किसी का भी क्षरण मानव के लिए लाभदायी नहीं कहा जा सकता। हम स्वार्थ के वशीभूत होकर इन पंच तत्वों से लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं। आज हम भौतिक सुख-सम्पदा में बेशक बहुत आगे बढ़ रहे हों लेकिन प्रदूषित वातावरण से हमारी शारीरिक सम्पदा निरंतर चिन्ता का सबब बनती जा रही है। जब तक हम किसी वस्तु, आविष्कार और खोज के गुण-दोष को नहीं टटोलेंगे तब तक हमारा आगे बढ़ना, पीछे हटने के ही बराबर है। विकास के पथ पर मानव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, सीख की बहुत-सी बातें पीछे छोड़ता जा रहा है। पर्यावरण को कैसे बचाया जाए, यह समस्या आज सबसे ज्वलंत है। पृथ्वी का अस्तित्व बचाने के लिए हमें सबसे पहले जल-प्रदूषण को रोकना होगा। पर्यावरण के लाभ और उसके महत्व को ध्यान में रखते हुए वनों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। जल, जंगल और जमीन हमारी राष्ट्रीय सम्पदा का मूल स्रोत हैं। जंगल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनसे हमें इमारती लकड़ी, आयुर्वेदिक औषधियां, पशुओं के लिए चारा, भूमि कटाव पर रोक, शुद्ध व ताजी हवा नसीब होती है। हमें एकजुट होकर न केवल पर्यावरण संरक्षण की पहल करनी होगी बल्कि पर्यावरण की समृद्धि में वृहद रूप से पौध-रोपण करना भी अनिवार्य है। आधुनिक जीवनशैली के परिणामस्वरूप आज हमारा भोजन और हमारा जीवन दोनों एक समान हो गए हैं। हम जीवन जीने के लिए नहीं बल्कि सुख-सुविधाएँ और स्टेटस हासिल करने को जी रहे हैं।
आज के समय में शुद्ध जल की समस्या सबसे जटिल समस्याओं में से एक है लेकिन हम इस दिशा में कुछ करने की बजाय लगातार पानी बर्बाद कर रहे हैं। पिछले बीस साल में भारत में बोतलबन्द पानी के व्यापार में जो तेजी और तरक्की आई है, वह आश्चर्यजनक है। हम इस बात से अनजान हैं कि एक बोतल पानी जो हम खरीद कर पीते हैं उसके एवज में कम्पनियां पांच लीटर पानी का अपव्यय कर देती हैं। दुनिया भर में साल 2014 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया तो हमारे देश में ऐसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया। यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से लेकर केरल के गांव वाले इन बोतलबन्द कम्पनियों और कोकाकोला कम्पनियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। भारत में कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा का इस्तेमाल होता है। घरेलू इस्तेमाल में पानी का सिर्फ पांच  फीसदी ही खर्च होता है। इसके अलावा भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700 लीटर पानी खर्च होता है यानी यदि हमारे परिवार में एक दिन में एक किलो गेहूं की खपत होती है तो हम उसके साथ करीब 1700 लीटर पानी की भी खपत करते हैं।
देखा जाए तो हम जीवन का उद्देश्य ही भूल गए हैं। इस मशीनी युग में हम भी मशीनी होते जा रहे हैं। आधुनिक राजनीति विज्ञान की अवधारणा है कि समाज में जैसे-जैसे समृद्धि और सम्पन्नता आती है वह खुशहाल होता जाता है। आज हम अपार सम्पदा को अपनी खुशी मान बैठे हैं। हम सुख और खुश होने का अन्तर भूल रहे हैं। सुख पैसे से खरीदा जा सकता है पर खुशी नहीं। इसी प्रकार हम सम्पत्ति और पैसे के बीच के अन्तर को भी नहीं समझ पा रहे। दरअसल हमारा परिवार, हमारे दोस्त, हमारे बच्चे, हमारा अच्छा स्वास्थ्य, हमारा जीवन ही हमारी सम्पत्ति है जिसे हम धन से नहीं खरीद सकते। एक व्यक्ति हवाई जहाज में बैठकर दुखी हो सकता है जबकि दूसरी तरफ एक व्यक्ति खेतों के बीच पगडंडी पर ताजी हवा के झोंकों के बीच साइकिल चलाता हुआ भी खुश हो सकता है। जो खुशी बचपन में तितलियों के पीछे भागने में मिलती थी वह क्या आज पैसे के पीछे भागने में मिल रही है। सच कहें यदि हमारा मन खुश नहीं होगा तो खुशी के सारे संसाधन व्यर्थ हैं। खुशी का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है, वह एक भाव है जो दिखाई नहीं देता। हमारी संस्कृति ने हमें शुरू से ही यह सिखाया है कि खुशी त्याग में है, सेवा में है, प्रेम में है, मित्रता में है, लेने में नहीं बल्कि देने में है। आज इंसान आधुनिकता और उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है। वह पर्यावरण का लगातार दोहन कर रहा है।
पिछले कई वर्षों से पर्यावरण को लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर बहस चल रही है। पर्यावरण संरक्षण के उपायों और क्रियान्वयन को लेकर प्रतिवर्ष पर्यावरण सम्मलेन आयोजित किये जाते हैं लेकिन इन सम्मेलनों में भी वैश्विक स्तर पर कोई व्यापक सहमति नहीं बन पाई है जिससे कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई पहल की जा सके। पर्यावरण संरक्षण, ओजोन परत की चिन्ता अभी तक केवल बहस का ही विषय रहे हैं, इनका हल निकालने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर यदि भारत की बात की जाये तो हमने भी इस मसले को लेकर कोई खास संजीदगी नहीं दिखाई है। भारत में पर्यावरण की स्थिति चिन्ताजनक है। साथ ही सरकार के लचर रवैये ने इस चिन्ता को और बढ़ाया है। पर्यावरण और जीवन का अनोखा सम्बन्ध है। दुर्भाग्य से कुछ लोगों का यह मानना है कि केवल सरकार और सामान्य तौर पर बड़ी कम्पनियों को ही पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुछ करना चाहिए, यह सही नहीं है। दरअसल पर्यावरण संरक्षण हम सभी का दायित्व है।
हमारा पर्यावरण पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन का अस्तित्व बनाये रखने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिक युग में हमारा पर्यावरण मानव निर्मित तकनीकी उन्नति के कारण दिन-ब-दिन बदतर होता जा रहा है। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बन गयी है जिसका हम आज सामना कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, भावनात्मक और बौद्धिक स्तर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण कई रोगों का जनक है जिससे इंसान पूरी जिन्दगी पीड़ित हो सकता है। यह किसी समुदाय या शहर की समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है जो किसी एक के प्रयास से खत्म नहीं हो सकती। अगर इसका ठीक से निवारण नहीं हुआ तो एक दिन जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। वायु और जल प्रदूषण विभिन्न बीमारियों और विकारों द्वारा हमारे स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। आजकल हम किसी भी चीज को सेहतमंद नहीं कह सकते क्योंकि जो हम खाते हैं वह पहले से ही कृत्रिम उर्वरकों के दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चुका है और हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को कमजोर कर रहा है। यही कारण है कि हम में से कोई भी स्वस्थ और खुश रहने के बावजूद कभी भी रोगग्रस्त हो सकता है। हमें पर्यावरण को स्वस्थ और प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए सबसे पहले अपने स्वार्थों और गलतियों को सुधारना होगा। यह विश्वास करना मुश्किल है लेकिन सच है कि हम सब अपने एक छोटे से सकारात्मक प्रयास से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।


शनिवार, 27 मई 2017

खिलाड़ी बेटियां भेदभाव का शिकार


डा. रीभा तिवारी
संतति सुख को सामाजिक और पारिवारिक जीवन में सबसे बड़ा सुख माना जाता है लेकिन हमारे देश के कई राज्यों में आज भी बेटी का पैदा होना निराशा का सबब बन जाता है। बेटियों को अभिशाप मानने वाले हमारे समाज की सोच बदल रही है लेकिन जिस गति से बदलना चाहिए वैसा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक गरीब परिवार में बेटी का पैदा होना कल भी अभिशाप था और आज भी है। कुछ बेटियां गर्भ में ही मार दी जाती हैं तो कुछ बेटियां दहेज के चलते जिन्दा जला दी जाती हैं। समय बदल रहा है, हर क्षेत्र में बेटियां अपनी कामयाबी का परचम फहरा रही हैं। खेल के क्षेत्र में तो बेटियां पुरुषों से कहीं आगे हैं। एशियन खेल हों या ओलम्पिक इनके आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय बेटियां ही लगातार देश के गौरव को बढ़ा रही हैं। यह सब उन परिस्थितियों में हो रहा है जब देश की बेटियां भेदभाव का शिकार हैं।
खेल नियम-कायदों द्वारा संचालित ऐसी गतिविधि है जो हमारे शरीर को फिट रखने में मदद करती है। आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में अक्सर हम खेल के महत्व को दरकिनार कर देते हैं। आज के समय में जितना पढ़ना-लिखना जरूरी है उतना ही खेलकूद भी जरूरी है। एक अच्छे जीवन के लिए जितना ज्ञानी होना जरूरी है, उतना ही स्वस्थ होना भी जरूरी है। फुटबाल, क्रिकेट, शतरंज, टेनिस, टेबल टेनिस, कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, हॉकी सहित लगभग सभी खेलों में बेटियों का दखल है। भारतीय बेटियां विश्व पटल मुल्क का नाम रोशन कर रही हैं बावजूद उनके साथ भेदभाव जारी है। देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को ही लें जो सुविधाएं और अवसर पुरुष खिलाड़ियों को नसीब हैं वे महिला क्रिकेटरों को नहीं मिल रहे। जबकि क्रिकेट का संचालन उस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हाथ में है जिसके बैनर तले महिला और पुरुष दोनों खेलते हैं।
जब देश आईपीएल के खुमार में डूबा था उसी समय भारत की क्रिकेटर बेटियों ने दक्षिण अफ्रीका में चार देशों की एक दिवसीय प्रतियोगिता में तीन कीर्तिमान सृजित किए। 34 वर्षीय तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी ने जहां एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक विकेटों का कीर्तिमान अपने नाम किया वहीं भारत की दीप्ति शर्मा ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए महिला एकदिवसीय क्रिकेट की दूसरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी खेली और इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। 19 वर्षीय दीप्ति ने आयरलैंड के खिलाफ 188 रन बनाए। यह अब तक किसी भी भारतीय महिला खिलाड़ी का सबसे बड़ा निजी स्कोर है। साथ ही महिला क्रिकेट में यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक की दूसरी सबसे बड़ी पारी है। महिला क्रिकेट में सबसे बड़ी पारी का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क के नाम दर्ज है जिन्होंने 1997 में डेनमार्क के खिलाफ मुम्बई में 229 रन बनाए थे। दीप्ति के व्यक्तिगत रिकॉर्ड के अलावा इस मैच में एक और बड़ा रिकॉर्ड दर्ज हुआ। दीप्ति और उनकी सलामी जोड़ीदार पूनम राउत ने 320 रन जोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पहले विकेट की सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड बनाया। महिला क्रिकेट में यह पहला मौका था जब किसी जोड़ी ने 300 का आंकड़ा छुआ या पार किया। पुरुष वनडे क्रिकेट में पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड उपुल थरंगा और सनथ जयसूर्या के नाम है। श्रीलंका की इस जोड़ी ने 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ 286 रन की साझेदारी की थी।
बीते साल रियो ओलम्पिक में जब भारतीय पुरुष खिलाड़ी एक अदद पदक के लिए जूझ रहे थे ऐसे समय में पहलवान साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक दिलाकर भारत की रीती झोली को आबाद किया। साक्षी के इस प्रदर्शन से शटलर पी.वी. सिन्धू का मनोबल बढ़ा और उसने चांदी का पदक जीतकर मायूस खेलप्रेमियों को पुलकित होने का अवसर प्रदान किया। इन दोनों बेटियों ने अपने शानदार प्रदर्शन से भारत के प्रत्येक माँ-बाप को यह सोचने को मजबूर कर दिया कि बेटियां भी समय आने पर देश का मान-सम्मान बचा सकती हैं। साक्षी मलिक ने साबित कर दिया कि भारत की बेटियां बैडमिंटन या टेनिस ही नहीं बल्कि कुश्ती जैसे खेल में भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। साक्षी ने जो कांस्य पदक जीता वह भी ऐतिहासिक था क्योंकि महिला कुश्ती में इससे पहले ओलम्पिक में किसी ने पदक नहीं जीता था।
ओलम्पिक में जगह बनाने वाली भारत की पहली महिला जिमनास्ट दीपा कर्माकर कांस्य पदक से महज मामूली अंक के अंतर से चूक गई लेकिन उसके प्रदर्शन ने देशवासियों का दिल जीत लिया। उड़नपरी पीटी ऊषा के बाद ललिता बाबर ओलम्पिक इतिहास में 1984 के बाद 32 साल बाद ट्रैक स्पर्धा के फाइनल के लिये क्वालीफाई होने वाली दूसरी भारतीय महिला बनीं। ललिता बाबर ने अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से 3000 मीटर स्टीपलचेज में 10वां स्थान हासिल किया। पांच बार की विश्व चैम्पियन मुक्केबाज एम.सी. मैरीकाम, विश्व एथलेटिक्स स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने वाली लांग जम्पर अंजू बाबी जार्ज, ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की पहली भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी, पैरालम्पिक में रजत पदक जीतने वाली एथलीट दीपा मलिक, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, निशानेबाज हिना सिद्धू आदि ने कई मर्तबा देश के सम्मान को चार चांद लगाए हैं लेकिन जब यही महिला खिलाड़ी अपने साथ होते भेदभाव का जिक्र करती हैं तो उसे अनसुना कर दिया जाता है।
देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है बल्कि प्रतिभाओं को खोजने वाले संसाधनों की कमी है। भारत के जितने भी खेल संघ हैं, वे राजनीति छोड़कर अगर अपने-अपने क्षेत्र के खिलाड़ियों पर ध्यान दें तो भारतीय युवा खिलाड़ी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। जरूरत है सभी के सहयोग की। क्रिकेट के अलावा भारत में अन्य खेलों में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था नहीं मिलती और न ही देश और प्रदेश की सरकारें देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी और विभिन्न खेलों पर ध्यान देती हैं। इसलिए देश के होनहारों का क्रिकेट के अलावा सारे खेलों से मोहभंग होता जा रहा है। जरूरत है क्रिकेट के साथ-साथ सभी खेलों को प्रोत्साहन मिले और ऐसे कार्यक्रम बनें जिनसे सभी भावी खिलाड़ियों का रुझान क्रिकेट के साथ-साथ बाकी सभी खेलों की तरफ भी बढ़े। आज क्रिकेट की दुनिया में भारतीय टीम विश्व की नम्बर वन टीमों में गिनी जाती है। भारत में क्रिकेट जितना बढ़ रही है अन्य खेल पिछड़ रहे हैं।
देखा जाए तो क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों की तरफ खेलप्रेमियों का रुझान ही नहीं है। मैदान में पसीना बहाते खिलाड़ियों को यदि प्रोत्साहन ही नहीं मिलेगा तो वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे कर पाएगा। आज जरूरत है समाज की सोच और नजरिया बदलने की। भारत में लैंगिक आधार पर खेलों में भेदभाव हो रहा है। कभी बेटियों पर प्रशिक्षक कुदृष्टि डालते हैं तो कभी अन्य खेलनहार उनके अरमानों पर पानी फेरने से बाज नहीं आते। खेलों से संन्यास के बाद कई महिला खिलाड़ियों ने पुस्तकें लिखी हैं जिनमें कई चौंकाने वाले आरोप लगे हैं, जो बेटियां देश की अस्मिता को लगातार चार चांद लगा रही हैं आखिर उनके साथ भेदभाव कितना उचित है।