रीभा तिवारी
आजादी के बाद से ही हमारी हुकूमतें आम नागरिक को बेहतर जीवन
देने का सब्जबाग दिखा रही हैं लेकिन 69 साल बाद भी परेशानियां जस-की-तस हैं। केन्द्र
की मोदी सरकार द्वारा जनमानस को स्मार्ट सिटी के सपने दिखाए जा रहे हैं लेकिन
हकीकत पर गौर करें तो विकास की लौ सतही धरातल पर कहीं भी टिमटिमाती नहीं दिख रही।
विकास के नाम पर फिजूल का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। महंगाई निरंतर बढ़ रही है। गरीब
व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जुटाना दुरूह कार्य हो गया है। विकास की
रफ्तार इतनी धीमी है कि जनसाधारण को उसका कुछ भी फायदा मिलता नहीं दिख रहा।
स्मार्ट सिटी कैसी होंगी यह तो भविष्य बताएगा लेकिन कस्बों, शहरों और महानगरों के
जो हालात आज हैं उन्हें देखकर हर बात बेमानी सी लगती है। देश का कोई ऐसा शहर और
कस्बा नहीं है जो जलभराव की त्रासदी से न जूझ रहा हो। कई सालों बाद इस साल बिहार
में बारिश का कहर टूटा है। प्रदेश का हर शहर और कस्बा जलभराव से ठहर सा गया है। थोड़ी
सी ही बरसात जनमानस की जान को सांसत में डाल देती है। हमारी सरकारों को इस समस्या
का गम्भीरतापूर्ण समाधान निकालना चाहिए।
जलभराव समूचे देश की पीड़ा है। सरकार को सोचना होगा कि
थोड़ी सी ही बरसात में सड़क दरिया तो नाले उफान पर आखिर क्यों होते हैं। इस साल हुई
निरंतर बारिश ने हमारी व्यवस्था का जिस तरह स्याह सच उजागर किया है, यह वाकई
चिन्ता की बात है। बरसात में कोई ऐसा शहर नहीं जो घुटने-घुटने पानी में डूबते न
दिखता हो। विडम्बना यह कि शहर नियोजन के लिए गठित लम्बे-चौड़े सरकारी अमले पानी के
बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं। सारा दोष नालों की सफाई न होने,
बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं। वैसे इस बात का
जवाब कोई नहीं दे पाता कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून
का इंतजार ही क्यों होता है। यह सभी जानते हैं कि नगरों और महानगरों में बने ढेर
सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सब-वे हल्की सी बरसात में जलभराव के स्थाई
स्थल हैं लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं करता कि आखिर निर्माण में कोई कमी
है या फिर उसके रखरखाव में।
देश भर के शहरों में बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए
बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ्लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि
अमुक सड़क अब ट्रेफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है। इसके बावजूद हर शहर में हर साल जाम
लगते हैं। बरसात में तो यही संरचनाएं जाम का कारक बनती हैं। बारिश के दिनों में
अंडरपास और बीआरटी कॉरीडोरों में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं
ने दिल्ली के दिल में स्थित आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब
के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकों
से बारिश के दिनों में दिल्ली में जलभराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को
ट्रेफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रुपए खर्च कर दर्जन भर अंडरपास
बना दिए गए। सबसे शर्मनाक तो है हमारे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले
अंडरपास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पम्पों के खराब
होने का बहाना है तो सड़क डिजाइन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई न होने का
रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर निगम अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों
की पहचान न कर पाने की मजबूरी बता देता है।
इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है।
आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींचकर
ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। जमीन की गहराई में जाकर
ड्रेनेज किस तरह बनाया जाए ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे
इंजीनियरों को सीखनी होगी। देश के अधिकांश बीआरटी कॉरीडोर थोड़ी सी बरसात में ही नाव
चलने लायक हो जाते हैं। ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि
उसके दोनों ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने
सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनके डिजाइन में ही
कमी है। कई स्थानों पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है कि आएदिन इन पर भारी मालवाहक
वाहनों का लोड न ले पाने के कारण खराब होना आम बात है।
यह विडम्बना है कि हमारे नीति-निर्धारक यूरोप या अमेरिका के
किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां न तो दिल्ली की तरह मौसम
होता है और न ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। अधिकांश शहरों के
सीवर सिस्टम बरसात के जल का बोझ उठाने लायक नहीं हैं, साथ ही उनकी सफाई महज कागजों
पर होती है। शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारम्परिक जलस्रोतों
में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने
का करना होगा। महानगरों में भूमिगत सीवर जलभराव का सबसे बड़ा कारण हैं। पालीथिन, घर
से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा कुछ ऐसे कारण हैं,
जो गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार
का बड़ा माध्यम है। यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने
वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी और जनमानस
परेशान होगा।
