मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि स्त्री-पुरुष के मध्य विवेक सम्मत सम्बन्धों के आधार पर ही सृष्टि का विकास एवं विस्तार निर्भर करता है किंतु सत्ता वर्चस्व एवं अधिकार लिप्सा की प्रबलता के कारण प्राय: इन दोनों के मध्य संतुलित समीकरण का अभाव है। कहने को तो यहाँ तक कहा जाता है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता किन्तु व्यावहारिक संदर्भों में यह स्पष्ट है कि नारी वर्ग की नैसर्गिक कोमलता, समर्पण भावना एवं सृजनात्मकता की अविवेकपूर्ण व्याख्या द्वारा उसे पुरुष वर्ग की अधीनस्था एवं उपभोग्या माना गया है। इस दुराग्रह ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में अनिष्टकारी असंतुलन उत्पन्न किया है।
जीवन के हर प्रसंग और परिप्रेक्ष्य में उसके प्रति दोहरे मापदण्ड का अवलोकन किया जाता रहा है। शिक्षा, संस्कार एवं संघर्ष के अवसरों पर स्त्री वर्ग को पीछे धकेले रहना पुरुष वर्ग की वैश्विक विशेषता रही है। लेकिन आखिर कब तक नारी को सिर्फ दोहन और शोषण के अधिकार तक सीमित रखा जा सकता है। कहा जाता है कि नैसर्गिक प्रतिभा को भले ही कुछ देर के लिए दबाया या रोका जाए लेकिन उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। महिलाओं के साथ भी यही हुआ। उसके दहलीज के बाहर कदम रखने पर पाबंदी लगी रही लेकिन जब भी उसने इसे ताक पर रखकर बाहर की खुली हवा में सांस ली, अपने को उन्मुक्त किया और अपने को स्थापित किया तो कई पुरुषों को पीछे छोड़ गई। नारी दुर्गा, शक्ति, वीरांगना, अर्द्धांगिनी, वामांगी, सहचरी जैसे अनेक उपमाओं से महज विभूषित ही नहीं इसके सारे गुण उनमें विद्यमान हैं। उनमें वो जज्बा, कार्यकुशलता और प्रबंधन क्षमता है जो सिर्फ एक मौका तलाशता है जिसे सिर्फ एक मौके की जरूरत है न कि सहारे की। लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज ने इसे नकारने की भरपूर कोशिश की है। वह बार-बार यही बताने का प्रयास करते हैं कि जो महिलाएं अपनी दहलीज लांघती हैं उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ता है। अपनी हस्ती, अपनी अस्मिता तक मिटानी होती है, जैसी तमाम बातें की जाती हैं। जबकि सच्चाई कुछ और है। पुरुष हो या महिला प्रकृति ने मानवशक्ति का विभाजन करके इनके वैशिष्ट्य का निरूपण किया है। जिसमें स्त्री-पुरुष को परस्पर-पूरक माना गया है न कि परस्पर-विरोधी। वर्तमान समय में विश्व भर में स्त्री वर्ग के प्रति चेतना जागृत करने के प्रयास जारी हैं। आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानव के सम्बन्धों के निर्धारण आदि क्षेत्रों में स्त्रियों की निर्णायक भूमिका की अपेक्षा की जा रही है। महिला सशक्तीकरण का अर्थ है शोषण, दमन एवं उत्पीड़न के विरुद्ध महिला वर्ग में चेतना का संचार करना। उनमें उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना तथा उनकी प्रतिभा एवं दक्षता में निखार लाकर मानव कल्याण के व्यापक क्षेत्र में उनकी भूमिका का रचनात्मक विनियोग करना। इसके लिए विभिन्न स्तरों से प्रयास किये जा रहे हैं। महिला सशक्तीकरण का प्रथम सोपान है महिलाओं का स्वावलम्बन। आर्थिक एवं मानसिक रूप से आत्मनिर्भर होकर स्त्रियां अपने प्रति बरती जाने वाली दुरंगी नीतियों का प्रतिकार कर सकती हं,ै इसके लिए उन्हें अपनी इच्छाशक्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। अपनी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना होगा। अपनी सृजनात्मकता को भौतिक विकास- धारा से जोड़ने होगा। तभी महिलाएं अपना वास्तविक महत्व सिद्ध कर सकती हैं। कहा भी गया है कि स्वावलम्बन ही स्वतंत्रता की जननी है। रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास महिला वर्ग के लिए सबसे ज्यादा घातक रहा है। अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण महिला बिना सोचे-विचारे ही अनेक आत्मघाती बातों को अंगीकार कर लेती है। इससे उसकी चेतना का स्वस्थ विकास नहीं होता। मेरा मानना है कि महिला का शिक्षित होना, स्वावलम्बी होना अति आवश्यक है। जब-जब वह अपने परिवार के साथ परिवार की खुशी के लिए घर में रहना चाही तो यह उसकी कमजोरी समझा गया। उसे हर समय आरोप- प्रत्यारोप का सामना करना पड़ा। उसकी क्षमता और कार्यकुशलता को कम आंका गया। उसे घर की शोभा बढ़ाने वाली वस्तुओं तक की उपमा से नवाजा गया। नारी ने जब इन भ्रामक बातों से बाहर निकलने के प्रयास किए तो न केवल उसकी तरफ उंगलियां उठीं बल्कि उसके चरित्र पर भी सवाल उठाए जाने लगे। क्या सचमुच नारी इतना अस्तित्वविहीन है कि उसे किसी और के द्वारा दिए गए चरित्र प्रणाम पत्र की जरूरत है। अगर ऐसा है तो घर से बाहर जाकर काम करने वाले उन सभी पुरुषों के चरित्र प्रमाण पत्र क्यों नहीं बनते या बनाए जाते? महिलाओं से जुड़े सवाल एक नहीं अनेक हैं और जवाब एक है जीवन मेरा है, जीना हमें है, फिर कब तक, आखिर कब तक हम किसी और के सहारे और सहानुभूति का इंतजार करें। आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं अपने स्वरूप को पहचानें, अपनी शक्ति और अस्मिता का उचित मूल्यांकन कर प्रगति की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं। सुनी-सुनाई और रटी-रटाई बातों के पीछे भागते रहने से उनका विकास कदापि सम्भव नहीं है। इस दृष्टि से महिला साक्षरता का विशेष महत्व है। निरक्षर महिलाएं साक्षर बनकर ही अपने कौशल और अंत:करण का विकास कर सकती हैं। इसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं का आर्थिक स्वनियोजन भी महिला सशक्तीकरण की एक आवश्यक शर्त है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में कई तरह की योजनाएं महिला हित के लिए चलाई जा रही हैं लेकिन यह तब तक पूर्णत: सफल नहीं होंगी जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलेगी। आज अर्द्धनारीश्वर की भावना विकसित कर समाज में वह माहौल बनाने की दरकार है जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच समानता और सहयोग की भावना विकसित हो। स्त्री को अबला औरत न समझ कर उसे सामाजिक दर्जा दिया जाए। महिला किसी खास दिवस की मोहताज नहीं बल्कि हर दिन की हकदार है। सशक्तीकरण मूलत: महिलाओं के स्वचिंतन और स्वप्रेरणा का विषय है लिहाजा उसे बिना किसी बाह्य प्रेरणा अथवा प्रोत्साहन की प्रतीक्षा किये स्वयं के सशक्तीकरण के काम में लग जाना चाहिए।