सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

नाकाबिल पैरों बावजूद रवीन्द्र पाण्डेय का कमाल


कार से टोल बैरियरों पर बिना रुके भरते हैं फर्राटा
राजस्थान के उदयपुर शहर के रवीन्द्र पाण्डेय के जीवन में बचपन में बदकिस्मती ने दरवाजा खटखटाया और उनके पैर लकवाग्रस्त हो गए लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कुदरत की मंशा बदलने के लिए उन्होंने विपरीत हालात से संघर्ष शुरू कर दिया। अब रवीन्द्र एक विशेष मशीन के आविष्कारक हैं जिसका उन्हें पेटेंट भी हासिल है। अब वे फर्राटे से कार चलाते हैं जिससे किसी टोल बैरियर पर टैक्स नहीं वसूला जा सकता। इसके अलावा उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी दर्ज है। यह सब उन्होंने अपने बलबूते हासिल किया है।    
रवीन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि जब मैं करीब 10 साल का था, सामान्य बच्चों की तरह खेलता-कूदता था। अचानक मुझे बुखार आया। मुझे इंजेक्शन लगाए गए और इसी दौरान मुझे पैरालिसिस हो गया। इलाज चला और धीरे-धीरे सहारे के साथ चलने-फिरने लायक हो गया। वक्त ने बड़ा झटका दे दिया, दौड़ तो नहीं सकता था लेकिन सहारे के साथ धीरे-धीरे टहलते हुए ही जिंदगी की गाड़ी को पटरी पर चलाना था। कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी। साइंस विषयों के साथ हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास की। साइंस और तकनीक में रुचि थी इसलिए आईटीआई में ड्रॉफ्ट्समैन के ट्रेड में डिप्लोमा कर लिया। इसके बाद वेदांता ग्रुप की कम्पनी हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में नौकरी भी मिल गई।
जिंक की अंडरग्राउंड खदानों के लिए माइनिंग प्लानिंग के नक्शे बनाने और जरूरत के मुताबिक मशीनों को डिजाइन करने वाले रवीन्द्र को आने-जाने में परेशानी होती थी, इसके लिए उन्होंने एक कार खरीदी और उसे चलाना भी सीख लिया लेकिन पैरों के सामान्य रूप से काम न करने के कारण ड्राइविंग में परेशानी होती थी। वे कहते हैं कि परेशानी मेरी थी सो उससे छुटकारा भी मैं अपनी कोशिशों से ही पा सकता था।
मशीनों की डिजाइनें बनाने में जुटे रहने वाले रवीन्द्र ने अपनी गाड़ी के लिए भी एक ऐसी मशीन बनाने की ठान ली जो उनकी जरूरत के मुताबिक हो यानी ऐसी मशीन जो उनके पैरों का काम कर सके। वे इसके लिए जुट गए। काफी कोशिशों के बाद वे एक ऐसी डिवाइस बनाने में कामयाब हुए जो कार के मैकेनिज्म के साथ फिट हो सकती थी और उनकी जरूरतें पूरी कर सकती थी। कार के लिए डिवाइस तो बन गई लेकिन इसके उपयोग के लिए आरटीओ ने इजाजत नहीं दी। इसके उपयोग के लिए सरकार की ओर से न तो कोई तकनीकी परीक्षण किया गया था, न ही कोई एप्रूवल था। पुणे में स्थित आटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया को इस डिवाइस के एप्रूवल के लिए भेजा गया। देश भर में इस मशीन के काम करने की क्षमता के परीक्षण के लिए रिसर्च की गई। इस रिसर्च का व्यय केंद्र सरकार के साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट ने उठाया। एक तरफ जहां रवीन्द्र की बनाई हुई मशीन पर सरकार की रिसर्च चल रही थी वहीं दूसरी तरफ उन्होंने इस मशीन के पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया। उन्हें जल्द ही इसका पेटेंट हासिल भी हो गया। उधर साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट ने भी उनकी डिवाइस को हरी झंडी दे दी।
जब सरकारी इजाजत मिल गई और रवीन्द्र को उनके आविष्कार का पेटेंट भी मिल गया तो वे बेफिक्र हुए और लम्बी ड्राइव पर उदयपुर से सोमनाथ (गुजरात) निकल पड़े। इस सफर में उनको रास्ते में कई स्थानों पर टोल देना पड़ा जो काफी आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला था। इस सफर ने उनको दिव्यांगों के लिए बने विशेष वाहनों को टोल से छूट दिलाने के लिए संघर्ष के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को पत्र लिखे। उनके पत्र पर शुरुआत में तो कुछ नहीं हुआ लेकिन वे कोशिशें जारी रखते हुए चिट्ठियों पर चिट्ठियां लिखते रहे। करीब एक साल तक लगातार मशक्कत करने के बाद उनके प्रयास रंग लाए और आठ जून, 2016 को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने एक अधिसूचना जारी करके दिव्यांगों के लिए बने विशेष वाहनों को टोल फ्री करने की अधिसूचना जारी कर दी। प्राधिकरण ने सभी टोल बैरियरों पर इसके बारे में सूचना लिखने के निर्देश दिए। इन वाहनों से टैक्स वसूली पर टोल संचालकों पर कार्रवाई का भी नियम बनाया गया है।
लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज कीर्तिमान
रवीन्द्र पाण्डेय ने दिव्यांगों के लिए ऐसी डिवाइस बनाई जिससे कार सिर्फ हाथों के उपयोग से ड्राइव हो सकती है। उन्होंने जब इस तरह की कार से 70 हजार किलोमीटर की ड्राइव पूरी कर ली तो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने उनका यह कीर्तिमान नेशनल रिकॉर्ड में शामिल कर लिया। खुद खास डिवाइस बनाकर हजारों किलोमीटर कार चलाने का उनका यह रिकॉर्ड है। उन्हें 2011 में राजस्थान सरकार ने निःशक्तजन कल्याण के लिए उल्लेखनीय कार्य करने पर राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया। 

रवीन्द्र के परिवार में उनकी मां, पत्नी, एक बेटा और एक बेटी है। 52 वर्षीय रवीन्द्र पाण्डेय ने कभी अपनी कमजोरी को अपनी मजबूरी नहीं बनने दिया। वे परिवार की गाड़ी तो दिव्यांग होने के बावजूद आम लोगों की तरह चला ही रहे हैं, सड़कों पर अपनी खास गाड़ी भी पूरे आत्मविश्वास के साथ दौड़ा रहे हैं। उनका परिवार उन पर गर्व करता है। रवीन्द्र की कहानी कुदरत के दिए जख्मों को अभिशाप मान लेने वालों को रास्ता दिखाकर प्रेरित करने वाली है।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

आंखें नहीं सफलता के लिए विजन जरूरीः श्वेता मंडल

इस दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अपने बूते दुनिया को बदल कर रख दिया है। ऐसे ही महान लोगों में कितने ऐसे हैं जो विकलांग हैं लेकिन अपनी शारीरिक संरचना को बहाना न बनाकर उन्होंने अपने नाम को स्वर्णिम अक्षरों में दुनिया के सामने स्थापित किया है। आंखें न होने के बाद भी भारत की बेटी श्वेता मण्डल ने अपनी दृढ़-इच्छाशक्ति से दिखाया कि वह किसी से कम नहीं।
श्वेता देख नहीं सकतीं लेकिन उनका जज्बा गजब का है। रांची विश्वविद्यालय की छात्रा श्वेता ने ह्यूमन राइट्स पोस्ट ग्रेजुएशन डिग्री (2011-13) में टॉप कर दिखा दिया कि वह किसी भी लक्ष्य को हासिल कर सकती हैं। श्वेता को इस उपलब्धि के लिए विश्वविद्यालय में आयोजित 29वें दीक्षांत समारोह में गोल्ड मैडल से नवाजा गया। सबसे बड़ी बात यह है कि श्वेता ने यह उपलब्धि ब्रेल की सहायता के बिना हासिल की। टॉपर बनीं श्वेता दिल्ली के जवाहर लाल विश्वविद्यालय से एमफिल और पीएचडी की पढ़ाई की। श्वेता को बचपन में ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारी हो गई। इस बीमारी के इलाज के दौरान रेडिएशन का प्रयोग किया गया जिसका साइड इफेक्ट सालों बाद दिखाई दिया और 10वीं में पढ़ने के दौरान उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई। लेकिन यह हादसा उनका हौसला नहीं तोड़ पाया। आंखों की रोशनी नहीं होने के चलते उन्होंने अपनी पढ़ाई रिकॉर्डिंग के जरिए की। जवाब लिखने के लिए परीक्षा में उन्हें एक हेल्पर भी दिया गया। लोगों को लगा कि इस तरह परीक्षा पास होना मुश्किल ही है लेकिन 10वीं की परीक्षा में 72 फीसदी नम्बर लाकर श्वेता ने सभी को हैरान कर दिया। बता दें कि 2014 में उन्होंने ह्यूमन राइट्स से नेट भी क्वालीफाई किया।
अपने बारे में बात करते हुए श्वेता कहती हैं कि उनको जन्म से यह समस्या नहीं थी इसलिए उन्होंने कभी ब्रेल लिपि सीखने के बारे में नहीं सोचा। उनके माता-पिता ने हर कदम पर उनका साथ दिया और अपनी सफलता का श्रेय वह उन्हीं को देती हैं। श्वेता के संघर्ष के बारे में उनकी मां बताती हैं कि वह अपनी किताबें साथ क्लीनिक में लेकर आती थी। वह चैप्टर्स को पढ़ती थी और उन्हें एक कैसेट में रिकॉर्ड कर लेती थी। अगले दिन श्वेता इस रिकॉर्डिंग को सुनती थी।

श्वेता बताती हैं कि उन्होंने कभी ब्रेल नहीं सीखी और न ही उनके पास ब्रेल की कोई किताब रही। जब वह ग्रेजुएशन में पहुंचीं तो उन्होंने बहुत सी किताबें और जरनल पढ़े। इसके बाद श्वेता ने टेक्नोलॉजी को अपना दोस्त बना लिया है। वह कहती हैं कि कम्प्यूटर और लैपटॉप के माध्यम से पढ़ाई जारी रखने में उन्हें बेहतर सहयोग मिला। जॉब एक्स विद स्पीच नामक सॉफ्टवेयर उनके लिए काफी कारगर साबित हुआ। अपनी इस कामयाबी पर श्‍वेता का कहना है कि ज्योति यानी रोशनी से ज्यादा जरूरी है आपके पास दृष्टि यानी विजन का होना। उन्होंने इसी को फॉलो किया और आगे भी इसी के दम पर आगे बढ़ना चाहती हैं।

एक पैर से साइकिल चलाने का बनाया रिकॉर्ड



आदित्य मेहता के नाम दर्ज हैं कई कीर्तिमान
एशियन पैरासाइकिलिंग चैम्पियन और 2013 में डबल सिल्वर मैडल जीतने वाले हैदराबाद के आदित्य मेहता की कहानी किसी के भी अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा कर सकती है। आदित्य का एक पैर नहीं है यह सुनकर कोई भी सहानुभूति से भर जाएंगा लेकिन आदित्य का जोश ऐसा है जो किसी मुर्दे में भी जान डाल सकता है।
आदित्य हैदराबाद के सिकंदराबाद की उद्योग घराने से ताल्लुक रखते हैं। बिजनेस में शुरू से ही दिलचस्पी के चलते उन्होंने टेक्सटाइल की फील्ड में अपना बिजनेस शुरू किया। इसमें कामयाबी भी मिली लेकिन एक दिन अचानक ही हैदराबाद में हुए हादसे में उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। हादसे के बारे में पूछे जाने पर वह बताते हैं कि मैं पूरी तरह टूट गया था और अपना बिजनेस भी मैंने बंद कर दिया था। सच तो यह है कि जीवन से जुड़ी हर उम्मीद मैंने छोड़ दी थी। लेकिन जिन्दगी हमें उम्मीदों के रास्ते हमेशा दिखाती रही। ऐसा ही एक रास्ता दिखा आदित्य को जब उन्होंने हैदराबाद में बने बाई-साइकिलिंग क्लब के विज्ञापन को देखा। विज्ञापन देखते ही उन्होंने तय किया कि अपनी शारीरिक कमी को पीछे छोड़ वह साइकिलिंग में नया मुकाम बनाएंगे।
उनके लिए यह सफर आसान नहीं था। साइकिलिंग के साथ पहला अनुभव उनके लिए बेहद निराशाजनक था। उनको जो कृत्रिम पैर लगाया गया था, उससे साइकिल के पैडल को चलाना आसान नहीं था। इस समस्या का समाधान करने के लिए उन्होंने खुद ही एक ऐसा कृत्रिम पैर डिजाइन किया जिससे साइकिल को आसानी से चलाया जा सके। आमतौर पर ऐसा किया जाना आसान नहीं था। खैर, पूरे 18 महीने की कड़ी मेहनत के बाद वह प्रोफेशनल पैरासाइकिलिस्ट बनें और 2013 में उनका लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज हुआ।
आदित्य मेहता हैदराबाद से बैंगलूरु का सफर साइकिल से तीन दिन में पूरा कर चुके हैं। वह मनाली से लेह-खरदूंगला को फतह करने निकले और इस दौरान 13050 फुट ऊंचे रोहतांग पास को पार किया। यही नहीं उन्होंने लंदन से पेरिस का 520 किलोमीटर का सफर तीन दिन में तय करके एक नया रिकॉर्ड बनाया। आदित्य ने कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच का 3600 किलोमीटर का सफर साइकिल से तय कर नया रिकॉर्ड भी बना दिया। अपने इस रिकॉर्ड के लिए उन्होंने इस रूट में आने वाले देश के 36 शहरों का सफर 36 दिनों में तय किया। बेशक यह रिकॉर्ड आम आदमी के बस की बात नहीं हो लेकिन धुन के पक्के आदित्य यह कारनामा कर दिखाया।

अपने इस सफर के बारे में आदित्य बताते हैं कि इस दौरान थकान के अलावा भी कई परेशानियां उनके सामने आईं। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनकी नाक से खून आने लगा, पैर में चोटें आईं और त्वचा भी कई जगहों से कट गई थी। इस सफलता पर आदित्य कहते हैं कि साइकिलिंग से मुझे जिन्दगी में रफ्तार मिलती है। उनका यह भी कहना है कि लगन और पक्की धुन के दम पर इंसान असम्भव को भी सम्भव कर दि‍खाता है। पैरा साइकिलिस्ट आदित्य मेहता नशे के खिलाफ अभियान चला चुके हैं। उन्होंने युवाओं से नशे की प्रवृत्ति से दूर रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को नशा ही करना है तो साइकिलिंग का करें। इससे वे हमेशा तंदुरुस्त रहेंगे। उन्होंने कहा कि युवा जंक फूड, चाय, कोल्डड्रिंक और वसा मुक्त भोजन से बचें। अभिभावक अपने बच्चों को भी इन चीजों से दूर रखें।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

एक हाथ से दुनिया फतह

                
पैरालम्पिक खेलों का जांबाज खिलाड़ी देवेन्द्र झाझरिया

पैरालम्पिक खेलों में विश्व कीर्तिमान के साथ जीत चुके हैं दो स्वर्ण पदक
रियो पैरालम्पिक में स्वर्णिम छलांग लगाने वाले भाला फेंक खिलाड़ी देवेन्द्र झाझरिया उस राजस्थान के चुरू जिले से ताल्लुक रखते हैं, जहां खेल सुविधाएं सिफर हैं। प्रोत्साहन देने वाले भी बहुत ही कम हैं। वह पैरालम्पिक खेलों में भारत की पहचान हैं। देवेन्द्र झाझरिया पैरालम्पिक खेलों में अब तक दो स्वर्ण पदक जीत चुके हैं वह भी विश्व कीर्तिमान के साथ। रियो की सफलता का श्रेय खुद लेने की बजाय वह इस अपनी बेटी को समर्पित करना चाहते हैं। देवेन्द्र कहते हैं कि रियो पैरालम्पिक से पहले अपनी छह साल की बेटी के साथ हुई डील का ही नतीजा है कि वह पैरालम्पिक में रिकार्ड दूसरा स्वर्ण पदक जीतने में सपल हुए। सच कहें तो मेरी बेटी ही मेरी प्रेरणा बनी।
देवेन्द्र झाझरिया का अपनी बेटी जिया से समझौता हुआ था कि अगर वह अपनी एलकेजी परीक्षा में टॉप करती है तो वह पैरालम्पिक में स्वर्ण पदक जीतकर लाएंगे। पैरालम्पिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले एकमात्र भारतीय झाझरिया ने पुरुष एफ-46 भाला फेंक में स्वर्ण जीतने के बाद दूरभाष पर हुई चर्चा में कहा कि मैं जब रियो में ही था मेरी बेटी जिया ने गर्व के साथ फोन करते हुए मुझे बताया कि मैंने टॉप किया है और अब आपकी बारी है। देवेन्द्र बताते हैं कि ओलम्पिक स्टेडियम में जब मैं मैदान पर उतरा तो बेटी जिया की बात बार-बार मेरे कानों में गूंज रही थी। आखिरकार उन्होंने निश्चय किया कि वह अब स्वर्ण पदक जीतकर ही वतन लौटेंगे। भारत के लिए गर्व और गौरव की बात है कि देवेन्द्र झाझरिया ने एथेंस में बनाया अपना ही रिकॉर्ड तोड़कर स्वर्ण पदक जीता।
देवेन्द्र झाझरिया कहते हैं कि मैं पूरी रात नहीं सोया और रियो में सुबह पांच बजे तक अपने परिवार के सदस्यों और शुभचिंतकों से बात करते रहे। देवेन्द्र झाझरिया के पैरालम्पिक खेलों में पदकों की संख्या और भी होती यदि उन्हें 2008 और 2012 के पैरालम्पिक खेलों में शिरकत का मौका मिलता। पिछले दो पैरालम्पिक में वह हिस्सा नहीं ले पाए थे क्योंकि उनकी स्पर्धा को ही शामिल नहीं किया गया था। इस दौरान खुद को फिट और चोटमुक्त रखने के लिए झाझरिया ने कड़ी ट्रेनिंग की और बेहद कम बार घर गए। उनका घर राजस्थान के चुरू जिले के एक छोटे से गांव में है। वहां इतने कम घर रहे हैं कि उनका दो साल का बेटा काव्यान अपने पिता को पहचानता भी नहीं है। उन्होंने कहा- उसे तो यह भी नहीं पता कि पिता कैसा होता है। उसकी मां मेरी फोटो दिखाकर कहती है कि यह तुम्हारे पापा हैं। पैरालम्पिक से पहले झाझारिया ने अप्रैल-जून में फिनलैंड के क्योरटेन में अभ्यास किया जहां उनकी कीनिया के भाला फेंक खिलाड़ी यूलियस येगो से दोस्ती हुई जिन्हें वह अपना सबसे बड़ा प्रेरक मानते हैं। देवेन्द्र झाझरिया ने कहा कि उनकी मां जिवानी देवी और पत्नी राष्ट्रीय स्तर की पूर्व कबड्डी खिलाड़ी मंजू ने उनकी सफलता में अहम भूमिका निभाई। रेलवे के पूर्व कर्मचारी देवेन्द्र झाझरिया अब भारतीय खेल प्राधिकरण के साथ काम कर रहे हैं। झाझरिया को द्रोणाचार्य अवार्डी आर.डी. सिंह कोचिंग देते हैं।
देवेन्द्र झाझरिया का जन्म 10 जून, 1981 को राजस्थान के चूरू जिले में हुआ था। मात्र आठ साल की उम्र में देवेन्द्र के साथ ऐसा भयानक हादसा हुआ जिसने उनकी जिन्दगी ही बदल दी। वे एक पेड़ पर चढ़ रहे थे तभी उनका हाथ बिजली के तार से जा टकराया। 11000 वोल्ट के करंट के कारण पूरा हाथ झुलस गया। तमाम कोशिशों के बावजूद देवेन्द्र का बायां हाथ काटना पड़ा और यह उनके और उनके परिवार के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था। देवेन्द्र का हाथ तो काट दिया गया लेकिन इसके बाद भी उनके अंदर जीने का जज्बा बना रहा। उनके मनोबल ने उनके घर वालों को हिम्मत दी और देवेन्द्र ने एथलीट की दुनिया में कॅरियर बनाने का फैसला कर लिया। देवेन्द्र झाझरिया ने एथलेटिक्स में 2004 में एथेंस पैरालम्पिक में स्वर्ण पदक जीता था। उस समय उन्होंने 62.15 मीटर दूर भाला फेंका था लेकिन रियो पैरालम्पिक खेलों में देवेन्द्र ने खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस बार उन्होंने 63.15 मीटर दूर भाला फेंका। देवेन्द्र झाझरिया को 2004 में अर्जुन पुरस्कार और 2012 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। वे पहले ऐसे पैरालम्पियन खिलाड़ी हैं जिन्हें पद्मश्री का खिताब मिला है। 2012 में देवेन्द्र झाझरिया पद्मश्री से सम्‍मानित होने वाले देश के पहले पैरालम्पिक खिलाड़ी बने। देवेन्द्र झाझरिया ने 2013 में फ्रांस के लियोन में आयोजित आईपीसी एथलेटिक्‍स विश्‍व चैम्पियनशिप में स्‍वर्ण पदक जीता। 2014 में दक्षिण कोरिया में आयोजित एशियन पैरा गेम्‍स और 2015 की वर्ल्‍ड चैम्पियनशिप में उन्‍होंने रजत पदक हासिल किया था। 2014 में देवेन्द्र झाझरिया फिक्‍की पैरा-स्‍पोर्ट्स पर्सन ऑफ द ईयर चुने गए। 2016 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार प्रदान किया गया।


शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

बिहार की बेटी ने एक पैर से किया माउंट एवरेस्ट फतह

 मैंने कमजोरी को बनाया अपनी ताकतः अरुणिमा सिन्हा
कहते हैं हवा के अनुकूल चलने वाला जहाज कभी बन्दरगाह नहीं पहुंचता। प्रतिकूल परिस्थितियों में जो अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता सफलता उसी के कदम चूमती है। कृत्रिम पैर के सहारे हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट फतह कर उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर का नाम रोशन करने वाली अरुणिमा सिन्हा कहती हैं मेरा कटा पांव मेरी कमजोरी था, जिसे मैंने अपनी ताकत बनाया। बास्केटबॉल खिलाड़ी अरुणिमा को 11 अप्रैल, 2011 की वह काली रात आज भी याद आती है जब पद्मावत एक्सप्रेस से वह दिल्ली जा रही थीं। बरेली के पास कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनके डिब्बे में प्रवेश किया। अरुणिमा को अकेला पाकर वे उनकी चैन छीनने लगे। छीना-झपटी के बीच बदमाशों ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेंक दिया। जिससे उनका बांया पैर कट गया। लगभग सात घण्टे तक वे बेहोशी की हालत में तड़पती रहीं। इस दौरान दर्जनों ट्रेनें गुजर गईं।
सुबह टहलने निकले कुछ लोगों ने जब पटरी के किनारे अरुणिमा को बेहोशी की हालत में पाया तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया। जब मीडिया सक्रिय हुआ तो अरुणिमा को दिल्‍ली के एम्‍स में भर्ती कराया गया। एम्स में इलाज के दौरान उनका बांया पैर काट दिया गया। तब लगा बास्‍केटबॉल की राष्‍ट्रीय स्‍तर की खिलाड़ी अरुणिमा अब जीवन में कुछ नहीं कर पायेगी। लेकिन उसने जिन्दगी से हार नहीं मानी। अरुणिमा की आंखों से आंसू निकले लेकिन उन आंसुओं ने उन्‍हें कमजोर करने के बजाय साहस प्रदान किया और देखते ही देखते अरुणिमा ने दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ने की ठान ली। अरुणिमा ने ट्रेन पकड़ी और सीधे जमशेदपुर पहुंच गईं। वहां उन्‍होंने एवरेस्ट फतह कर चुकी बछेन्द्री पाल से मुलाकात की। फिर तो मानो उनके पर से लग गये। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 31 मार्च को उनका मिशन एवरेस्ट शुरू हुआ। 52 दिनों की इस चढ़ाई में 21 मई को माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर वे विश्व की पहली विकलांग पर्वतारोही बन गईं। अरुणिमा का कहना है विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है। हर किसी के जीवन में पहाड़ से ऊंची कठनाइयां आती हैं जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू करेगा हर ऊंचाई बौनी हो जायेगी।
अम्बेडकर नगर के शहजादपुर इलाके में एक मुहल्ला है पंडाटोला वहीं एक छोटे से मकान में रहने वाली अरुणिमा सिन्हा के जीवन का बस एक ही लक्ष्य था- भारत को वॉलीबाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना। छठी कक्षा से ही वे इसी जुनून के साथ पढ़ाई कर रही थीं। समय गुजरता गया, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री लेने के साथ अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबाल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने लगीं। इसी बीच 11 अप्रैल, 2011 की घटना ने उनकी जिन्दगी ही बदल दी। नई दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) में चार महीने तक भर्ती रहने के बाद जब अरुणिमा को एम्स से छुट्टी मिली तो वह उस हादसे को भूलकर एक बेहद कठिन और असम्भव से प्रतीत होने वाले लक्ष्य को साथ लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं। लक्ष्य था विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का। अब तक कोई भी विकलांग ऐसा नहीं कर पाया था। कटा हुआ बायां पैर, दाएं पैर की हड्डियों में पड़ी लोहे की छड़ और शरीर पर जख्मों के निशान के साथ एम्स से बाहर आते ही अरुणिमा सीधे अपने घर न आकर एवरेस्ट पर चढऩे वाली पहली भारतीय महिला पर्वतारोही बछेन्द्री पॉल से मिलने जमशेदपुर जा पहुंचीं। बछेन्द्री पॉल ने पहले तो अरुणिमा की हालत देखते हुए उन्हें आराम करने की सलाह दी लेकिन उनके बुलंद हौसलों के आगे आखिर वे भी हार मान गईं। अरुणिमा ने पॉल की निगरानी में नेपाल से लेकर लेह, लद्दाख में पर्वतारोहण के गुर सीखे। उत्तराखण्ड में नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग और टाटा स्टील ऑफ एडवेंचर फाउंडेशन से प्रशिक्षण लेने के बाद एक अप्रैल, 2013 को उन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की। 52 दिनों की बेहद दुश्वार पहाड़ी चढ़ाई के बाद आखिरकार 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली विश्व की पहली महिला विकलांग पर्वतारोही बन गईं। वे यहीं नहीं रुकीं। युवाओं और जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव के चलते निराशापूर्ण जीवन जी रहे लोगों में प्रेरणा और उत्साह जगाने के लिए उन्होंने अब दुनिया के सभी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को लांघने का लक्ष्य तय किया है। इस क्रम में वे अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की एलब्रुस चोटी पर तिरंगा फहरा चुकी हैं। अरुणिमा ने केवल पर्वतारोहण ही नहीं आर्टीफीशियल ब्लेड रनिंग में भी अपनी धाक जमाई है। इसी वर्ष चेन्नई में हुए ओपन नेशनल गेम्स (पैरा) में उन्होंने 100 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। इस बीच समय निकाल कर वे उन्नाव के बेथर गांव में शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी और प्रोस्थेटिक लिम्ब रिसर्च सेंटर के रूप में अपने सपने को आकार देने में भी जुटी हैं। वह एक किताब भी लिख चुकी हैं।
                             अरुणिमा से बातचीत के अंश-
प्रश्न- एवरेस्ट फतह करने का मन आपने कब और क्यों बनाया।
उत्तर- ट्रेन हादसे में हमने अपने पैर गंवा दिये थे। अस्पताल में बिस्तर पर बस पड़ी रहती थी। परिवार के सदस्य, मेरे अपने मुझे देखकर पूरा दिन रोते, हमें सहानुभूति की भावना से अबला व बेचारी कहकर सम्बोधित करते। यही मुझे मंजूर न था। पर मुझे जीना था, कुछ करना था। मैंने मन ही मन कुछ अलग करने की ठानी जो औरों के लिए एक मिशाल बने।
प्रश्न- क्या परिस्थितियां थीं उस समय।
उत्तर- मूलतः हम बिहार के रहने वाले थे। पिताजी फौज में थे जिस कारण हम लोग सुल्तानपुर आ गये। चार वर्ष की उम्र में पिता का स्वर्गवास हो गया। मां के साथ हम अम्बेडकर नगर पहुंचे वहां उन्हें स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई, पर परिवार को चलाना अब भी मुश्किल था। फिर भी इण्टर के बाद एलएलबी की पढ़ाई की। खेलों में रुझान होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबाल व फुटबाल में कई पुरस्कार जीते लेकिन कुछ खास हाथ न लग सका। मेरा सपना था कुछ अलग करने का।
प्रश्न- उस भयानक ट्रेन हादसे पर क्या कहेंगी।
उत्तर- उस रात को मैं सारी उम्र नहीं भूल सकती। मैं दिल्ली जा रही थी। रात के लगभग दो बजे थे। चारों ओर सन्नाटा था कब मेरी आंख लगी कुछ पता न चला। तभी बरेली के पास कुछ बदमाश गाड़ी पर चढ़े। अकेला जान वे मेरी चैन छीनने लगे, मैंने भी डटकर उनका सामना किया। झपटा-झपटी के बीच उन लोगों ने मुझे ट्रेन से नीचे फेंक दिया, जिससे मेरा बांया पैर कट गया।
प्रश्न- बछेन्द्री पाल से आपने ट्रेनिंग ली, कैसे पहुंचीं उन तक।
उत्तर- एम्स में इलाज के दौरान ही मैंने बछेन्द्री पाल जी का मोबाइल नम्बर इण्टरनेट से प्राप्त किया। उनसे मैंने अपनी पूरी कहानी बतायी और कहा मैं एवरेस्ट पर चढ़ना चाहती हूं। उन्होंने मुझे जमशेदपुर बुलाया। फिर क्या था अगले ही पल मैं वहां थी। दो वर्ष तक मैंने उनसे ट्रेनिंग ली।
प्रश्न- हिमालय की चढ़ाई के दौरान कैसी चुनौतियां थीं।
उत्तर- 52 दिनों की यात्रा हर पल रोमांच खतरों और हौसलों की कहानी से भरी थी। सबसे मुश्किल क्षण डेथ जोन एरिया खम्बू आइसलैण्ड के थे। बर्फ की चट्टानों पर चढ़ाई करनी थी। सिर पर चमकता सूरज था। कब कौन सी चट्टान पिघल कर गिर जाए, अंदाजा लगाना मुश्किल था।
प्रश्न- माउंट एवरेस्‍ट पर लाशें देख कैसा लगा।
उत्तर- जब मैं माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ रही थी, उसके पहले उसे पार करने की कवायद कर चुके आधा दर्जन से ज्यादा पर्वतारोहियों की सामने पड़ी लाशें रोंगटे खड़ी कर देती थीं। कभी बर्फ उन्हें ढंक देती, कभी हवा के झोंके उन पर ढंकी बर्फ हटा देते। ऐसे मंजर का सामना मुश्किल था लेकिन नामुमकिन नहीं।
प्रश्न- सब कह रहे थे वापस आ जाओ, फिर क्‍या हुआ।
उत्तर- पर्वत पर चुनौतियों का सामना करना बहुत मुश्किल था, पर धैर्य नहीं खोया। इसी बीच मेरा आक्सीजन सिलेण्डर खत्म हो गया। कैम्प से मेरे पास फोन आ रहे थे कि अरुणिमा तुम वापस आ जाओ जहां तक तुम पहुंची हो वो भी एक रिकार्ड है लेकिन मैंने तो मंजिल को पाने की ठानी थी बीच में कैसे आ जाती।
प्रश्न- आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी।

उत्तर- मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं, पर हमें अपने लक्ष्य से भटकता नहीं चाहिये बल्कि उनका सामना करना चाहिये। जब मैं हॉकी स्टिक लेकर खेलने जाती तो मोहल्ले के लोग मुझ पर हंसते थे, मेरा मज़ाक उड़ाते थे। शादी हुई और फिर तलाक पर मैंने हार नहीं मानी। बड़ी बहन व मेरी मां ने मेरा साथ दिया। हादसे के बाद मेरे जख्मों को कुरेदने वाले बहुत थे पर मरहम लगाने वाले बहुत कम। इतना कुछ होने के बाद मैंने अपने लक्ष्य को पाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। अंततः मुझे सफलता मिली।

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

दीपा की जांबाजी को हिन्दुस्तान का सलाम


पैरालम्पिक में मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला
मिसाल-ए-हिम्मत
जरा सी चोट जहां इंसान का हौसला तोड़ देती है वहीं हरियाणा की बेटी दीपा मलिक ने स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी की असहनीय पीड़ा को सहते हुए अपनी निःशक्तता को ही अपना अमोघ-अस्त्र बना लिया। जिस उम्र में लोग खेल से संन्यास ले लेते हैं, उस उम्र में उन्होंने खेल मैदानों को ही अपना घर बना लिया। दीपा ने 36 साल की उम्र में अपने खेल की शुरुआत की थी। दीपा शौकिया नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी हैं। उम्र से अधिक जीते उनके पदक इस बात का सुबूत हैं। सोनीपत के भैंसवाल गांव की दीपा मलिक ने स्पाइनल ट्यूमर से न केवल जंग जीती बल्कि खेलों में पदकों के अम्बार लगा डाले। रियो पैरालम्पिक में चांदी का पदक जीतते ही उनके नाम एक ऐसा ऐतिहासिक कीर्तिमान दर्ज हो गया है, जो दीपा की खेल अमरता की कहानी हमेशा बयां करेगा। यह ऐसा कीर्तिमान है जो कभी नहीं टूटेगा।
30 सितम्बर, 1970 को हरियाणा के सोनीपत में जन्मीं दीपा मलिक को 17 साल पहले 29 साल की उम्र में लकवा मार गया और कमर के नीचे का पूरा हिस्सा पैरेलाइज्ड हो गया। इस बीमारी की शुरुआत में पहले उनकी टांगों में कमजोरी की शिकायत आई, बाद में पता चला कि उनके स्पाइनल कॉर्ड में ट्यूमर है। इसके बाद उनका ऑपरेशन हुआ लेकिन 1999 में दोबारा परेशानी महसूस होने के बाद उनका दूसरा ऑपरेशन किया गया। उनकी तीसरी सर्जरी से पहले डाक्टरों ने उन्हें बता दिया था कि अब उनकी बाकी जिंदगी व्हीलचेयर पर ही बीतेगी। उन्हें सात दिन का वक्त दिया गया था कि वह जी भरकर चल-फिर लें। अंततः दीपा की स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी हुई और उनको 183 टांके लगे।
दीपा मलिक का जीवन बेहद उतार-चढ़ाव भरा है। जिस समय वह ट्यूमर जैसी तकलीफदेह बीमारी से जूझ रही थीं उस समय उनके पति कर्नल विक्रम सिंह कारगिल में देश के लिए जंग लड़ रहे थे। दीपा सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं हैं बल्कि सामाजिक कार्यों में शिरकत करने के अलावा लिखने में भी उनकी खासी रुचि है। दीपा वाणी की सरताज हैं। दीपा मलिक गम्भीर बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए कैम्पेन चलाने के साथ ही सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। दीपा अपनी बायोग्राफी से लेकर खिलाड़ियों के बारे में भी खूब लिखती हैं। जोश और जीवटता की मिसाल दीपा का ग्वालियर से भी खासा लगाव है। उन्होंने लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान के तरणताल में डा. वी.के. डबास से तैराकी के गुर सीखे और तैराकी में भी दर्जनों पदक जीतकर यह साबित किया कि वह वाकई चैम्पियन खिलाड़ी हैं। दीपा की उम्र 46 साल है और उनके पास विभिन्न खेलों के 50 से अधिक स्वर्ण पदक हैं।
दीपा मलिक की सल्तनत केवल अपने ही देश में नहीं है बल्कि वह विदेशों में भी अपनी खेल प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। दीपा शॉटपुटर ही नहीं आला दर्जे की स्वीमर, बाइकर, जेवलिन व डिस्कस थ्रोअर भी हैं। दीपा ने एथलेटिक्स में अपनी कामयाबी की दास्तां सात साल पहले (2009 में) शॉटपुट में लिखी थी। उन्हें तब कांसे का पदक मिला था लेकिन उन्होंने 2010 में ऐसा कमाल किया जोकि आज तक कोई भारतीय पुरुष खिलाड़ी भी नहीं कर सका। दीपा ने इंग्लैंड में शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जेवलिन थ्रो में गोल्ड मैडल जीतकर मादरेवतन को गौरवान्वित किया। उस साल दीपा के सितारे बुलंदी पर रहे और वह चीन में पैरा एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
दीपा ने 2011 में वर्ल्ड एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में रजत पदक तो उसी साल वर्ल्ड गेम्स में दो कांस्य पदक जीते। वर्ष 2012 में मलेशिया ओपन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में जेवलिन व डिस्कस थ्रो में दो स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। 2014 में बीजिंग में हुए चाइना ओपन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में उन्होंने शॉटपुट में स्वर्ण पदक जीता। उसी साल इंचियोन एशियन पैरा गेम्स में रजत पदक जीकर रिकॉर्ड बनाया। वर्ष 2016 भी दीपा मलिक के लिए बेहतर रहा। पैरालम्पिक में चांदी का पदक जीतने से पहले ही दुबई में एशियन चैम्पियनशिप में जेवलिन थ्रो में स्वर्ण व शॉटपुट में कांस्य पदक जीता।
देविका और अम्बिका की मां हैं दीपा
दीपा मलिक रिटायर्ड कर्नल विक्रम सिंह की पत्नी हैं। उनके पिता कर्नल बी.के. नागपाल भी आर्मी में ही थे। दीपा के परिवार में पति के अलावा दो बेटियां हैं। उनकी बड़ी बेटी का नाम देविका और छोटी बेटी का नाम अम्बिका है। दीपा मलिक एक खिलाड़ी होने के साथ ही एक एंटरप्रेनर भी रही हैं। उन्होंने सात साल तक कैटरिंग और रेस्टोरेंट बिजनेस भी किया है। इसके अलावा दीपा एक मोटिवेशनल और इंस्पिरेशनल स्पीकर भी हैं। वे अलग-अलग इवेंट्स में लोगों को मोटीवेट करने के लिए स्पीच देने भी जाती रहती हैं। दीपा पहली इंडियन लेडी हैं जिन्हें मोडीफाई व्हीकल चलाने का लायसेंस मिला।
ये मिले अवार्ड
दीपा को राष्ट्रपति रोल मॉडल अवार्ड-2014, लीडर एशिया एक्सीलेंस अवार्ड-2014, लिम्का पीपल ऑफ द ईयर अवार्ड-2014, कांगो करमवीर पुरस्कार-2014, एमेजिंग इंडिया अवार्ड-2013, करमवीर चक्र अवार्ड-2013, अर्जुन अवार्ड-2012, एक्सीलेंस अवार्ड फॉर स्पोर्ट्स-2012, महाराणा मेवाड़ अरावली स्पोर्ट्स अवार्ड-2012, मिसाल ए हिम्मत अवार्ड-2012, महाराष्ट्र छत्रपति अवार्ड स्पोर्ट्स-2009-10, हरियाणा कर्मभूमि अवार्ड-2008, स्वावलम्बन पुरस्कार महाराष्ट्र-2006 आदि से नवाजा जा चुका है।
                    


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

इनकी जांबाजी को देश का सलाम

मरियप्पन थंगवेलु, देवेन्द्र झाझरिया, दीपा मलिक, वरुण भाटी ने बढ़ाया मान
यदि कुछ कर गुजरने की चाहत और जुनून हो तो हर कामयाबी हासिल की जा सकती है। हम जिन निःशक्तजनों को हेयदृष्टि से देखते हैं या जिन पर तरस खाते हैं, उनकी कामयाबियों पर नजर डालें तो क्या नहीं लगता कि भारत का असली गौरव तो यही हैं। ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरियो में खत्म हुए ओलम्पिक खेलों की धूम दुनिया भर में किस कदर रही, यह सभी जानते हैं लेकिन उसी शहर में हुए पैरालम्पिक खेल मुकाबलों में बहुतों की कोई रुचि ही नहीं दिखी। हमने यह जानने का भी प्रयास नहीं किया कि भारतीयों ने वहां चार पदक जीते जिनमें एक विश्व कीर्तिमान के साथ दो स्वर्ण पदक भी शामिल हैं।
राजस्थान के देवेन्द्र झाझरिया ने रियो में इतनी दूर भाला फेंका कि लोग दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गये। पैरालम्पिक इतिहास में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले देवेन्द्र पहले भारतीय हैं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इन्हीं खेलों में हरियाणा की जांबाज एथलीट, देविका और अम्बिका की मां दीपा मलिक ने गोला फेंक में चांदी का पदक जीत दिखाया। दीपा यह कारनामा करने वाली भारत की पहली महिला पैरा एथलीट हैं। यह गर्व की बात है कि ओलम्पिक के समानान्तर शारीरिक-मानसिक तौर पर किसी कमी के शिकार खिलाड़ियों के लिए होने वाले इस आयोजन में भारत के चार खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया है। ऊंची कूद में मरियप्पन थंगवेलु की स्वर्णिम छलांग के बाद चुरू (राजस्थान) के देवेन्द्र झाझरिया ने भालाफेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इससे पहले 2004 के एथेंस पैरालम्पिक में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था। इस तरह पैरालम्पिक खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले वे पहले भारतीय खिलाड़ी हैं।
गौरतलब है कि आठ साल की उम्र में पेड़ पर चढ़ते हुए देवेन्द्र का हाथ उच्चदाब की बिजली की चपेट में आकर बुरी तरह जल गया, जिसे बाद में काटना पड़ा। लेकिन उनके जीवट में कोई कमी नहीं आई। बार-बार उन्होंने साबित किया कि वे किसी से कम नहीं हैं। इससे पहले मरियप्पन थंगवेलु ने पुरुषों की ऊंची कूद के मुकाबले में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया तो कमर से नीचे पोलियो की शिकार दीपा मलिक ने गोलाफेंक में रजत हासिल किया और वरुण भाटी ने भी ऊंची कूद में कांस्य पदक जीता। इस साल के ओलम्पिक में भारत ने अपनी सबसे बड़ी टीम भेजी थी और उम्मीद थी कि हमारे खिलाड़ी कम से कम दस पदक जरूर लेकर आएंगे लेकिन देश को सिर्फ दो पदकों से संतोष करना पड़ा, वह भी दो बेटियों शटलर पी.वी. सिन्धु और पहलवान साक्षी मलिक के बूते।
ओलम्पिक की तैयारियों में झोंके गए संसाधनों के मुकाबले उपेक्षित पैरालम्पिक खिलाड़ियों ने सीमित सुविधाओं के बीच अपनी किसी शारीरिक या मानसिक कमी के सवाल को पीछे छोड़ते हुए निःसंदेह शानदार प्रदर्शन किया है। भारत में व्यवस्थागत रूप से खेलों को लेकर क्या रुख रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसका नतीजा अमूमन हर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में देखने को मिलता रहा है। जब भारत की झोली में एक-दो पदक आ जाते हैं तो उसे किसी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जाता है। जबकि क्षेत्रफल, आबादी और संसाधनों के स्तर पर भारत के मुकाबले कई गुना पीछे रहने वाले देश इस मामले में हमसे काफी आगे दिखते हैं। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में यह तस्वीर अफसोसजनक ही कही जाएगी। हम 116 साल से ओलम्पिक खेलों में शिरकत कर रहे हैं लेकिन पदकों की संख्या सिर्फ 28 है, जिनमें 11 पदक तो उस हाकी से हैं जिसमें 36 साल से हमें कोई तमगा ही नहीं मिला है। टके भर का सवाल है, क्या खेलों की बदहाल स्थिति के लिए अकेले खिलाड़ी ही कसूरवार हैं। अब तक जिन खिलाड़ियों को पदक मिले हैं उनका आकलन किया जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि उनकी तैयारी में जितनी भूमिका देश के खेल-तंत्र की रही, उससे ज्यादा उन्होंने अपने स्तर पर कोशिश की। रियो ओलम्पिक के दौरान भारत के खिलाड़ियों को जिन असुविधाओं और व्यवस्थागत अभाव का सामना करना पड़ा, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में किसी शारीरिक या मानसिक कमी का सामना करने के बावजूद पैरालम्पिक में हमारे खिलाड़ियों ने जो देश के नाम शानदार कामयाबी दर्ज की है वह इन खिलाड़ियों के जीवट की ही जीत कही जाएगी। अगर खेलों के मामले में पर्याप्त इंतजाम और प्रतिभाओं की खोज के साथ-साथ उन्हें हर स्तर पर उचित प्रोत्साहन मिले तो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की पदक-तालिका में भारत का नाम अग्रणी देशों के बीच आ सकता है। आओ मरियप्पन थंगवेलु, देवेन्द्र झाझरिया, दीपा मलिक तथा वरुण भाटी की कामयाबी पर जश्न मनाएं ताकि अगले पैरालम्पिक में भारत के खिलाड़ी और बेहतर प्रदर्शन करें।


अमित सरोहा किसी से कम नहीं

                       
जोश और जुनून से हारी विकलांगता
अगर इरादे मजबूत और हौसले बुलंद हों तो फिर शारीरिक विकलांगता भी आदमी के सामने झुक जाती है। सोनीपत जिले के बैंयापुर गांव के एक युवा पैरा खिलाड़ी ने इसे साबित कर दिखाया।अर्जुन अवार्डी अमित सरोहा ने जिन परिस्थितियों में देश और परदेस की धरती पर नाम कमाया है, अकसर वैसी स्थिति में लोग निराशा और कुंठा से भर जाते हैं। यह अमित सरोहा का जोश और हौसला ही था कि उसने अपनी विकलांगता को अपनी जीत का हथियार बना लिया और एक के बाद एक उपलब्धि हासिल कर सबकी आंखों का नूर बन गया, वह भी महज सात साल के छोटे से अंतराल में। भीम और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित अमित सरोहा आज देश के हजारों विकलांग युवाओं का प्रेरणास्रोत है।
कुछ महीने पहले ही अमित सरोहा ने पेरिस में हुई फ्रेंच ओपन चैम्पियनशिप में दो स्वर्ण पदक और एक रजत पदक जीते। इसके साथ ही उसने रियो पैरालम्पिक के लिए अपना टिकट भी पक्का कर लिया था, हालांकि वह रियो में पदक नहीं जीत सका लेकिन उसने दो नये एशियन रिकार्ड कायम कर दिखाए। अमित ने पोलैण्ड में भी देश के लिए एक गोल्ड और एक सिल्वर मैडल जीता था। इससे पहले मार्च, 2016 में शारजहां ओपन में एक गोल्ड और एक सिल्वर देश की झोली में डाला और दुबई में मार्च, 2016 में ही हुई एशियन चैम्पियनशिप में एक गोल्ड व एक सिल्वर मैडल जीता।
कार दुर्घटना ने तोड़ दी थी रीढ़
साधारण परिवार से सम्बन्ध रखने वाले अमित सरोहा के भी दूसरे युवाओं की तरह सपने थे और इन्हें पूरा करने के लिए इच्छाशक्ति भी लेकिन नियति उससे कुछ और ही कराना चाहती थी। 2007 में एक कार दुर्घटना में अमित की रीढ़ टूट गयी। इसके बाद उसके शरीर का निचला हिस्सा काम करना छोड़ गया। साथ ही दोनों हाथों की उंगली भी जवाब दे गईं। एक हृष्ट-पुष्ट युवा बेबस और लाचार की तरह व्हीलचेयर पर आ गया। बकौल अमित इलाज के दौरान एक विदेशी युवक उसे मिला। वह भी अमित की तरह ही स्पाइनल कोड इंजरी से पीड़ित था। इस युवक की खेल के प्रति ललक देखकर अमित में भी लालसा जगी और 2008 में उसने व्हीलचेयर रग्बी से अपने खेल कॅरियर की शुरुआत की। आज उसका नाम देश के खास पैरा खिलाड़ियों में गिना जाता है।
व्हील चेयर रग्बी खेलते हुए अमित ने पहली बार 2009 में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। यह प्रतियोगिता बैंगलूरु में हुई थी। इसमें उसे कोई पदक तो नहीं मिला लेकिन जो हौसला यहां से अर्जित हुआ उसने इस युवा का जीवन ही बदल दिया। अमित सरोहा ने पहली बार पंचकूला में हुए नेशनल गेम्स में डिस्कस थ्रो व शाटपुट में गोल्ड मैडल जीता था। इसके आधार पर उसका चयन राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ। अमित ने पहली बार 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में भाग तो लिया लेकिन कोई पदक नहीं जीत सका। इस हार ने भी अमित को निराशा की बजाए हौसला दिया। दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के एक माह बाद ही चीन के ग्वांग्झू में हुए एशियन खेलों में अमित ने रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसके बाद अमित ने 2011 में विश्व पैरा गेम्स में डिस्कस थ्रो में सोना जीता।इसके बाद उसका हौसला ऐसा चढ़ा कि एक के बाद एक उपलब्धि उसके कदम चूमने लगी। इसके बाद उसने वर्ष 2012 में लंदन पैरा ओलम्पिक में भाग लिया। वर्ष 2013 में फ्रांस में विश्व चैम्पियनशिप में भाग लिया।
यह मिले चुके हैं सम्मान

इस युवा खिलाड़ी की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उसे 2013 में अर्जुन अवार्ड देकर सम्मानित किया और 2014 में हरियाणा सरकार ने उसे भीम अवार्ड से नवाजा। वर्ष 2014 में पैरा एशियन गेम्स में अमित ने क्लब थ्रो में देश को सोना तथा डिस्कस थ्रो में रजत पदक दिलाया। अमित सरोहा को हरियाणा सरकार ने बतौर कोच नियुक्त किया है। वह अब दूसरे पैरा खिलाड़ियों के लिए न केवल प्रेरणास्रोत है बल्कि उनकी राह आसान करने का काम करता है। अमित मानते हैं हमेशा उसके परिवार ने उसकी मदद की है। मां की प्रेरणा ने उसे इस मुकाम तक पहुंचने में बड़ी भूमिका निभाई है। इधर, अमित की मां दर्शना व बड़े भाई सुमित कहते हैं कि जिस मुकाम पर अमित आज पहुंचा है, यह उसकी लगन का नतीजा है। पैरा खिलाड़ी अरुण सोनी को अमित अपना आदर्श मानते हैं। बता दें कि अरुण ने सामान्य एशियन गेम्स में पैरा खिलाड़ी होते हुए पदक अर्जित किया है।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

लक्ष्मी अग्रवाल ने हर बाधा को किया पार



हर दिन मिले महिलाओं को सम्मान
जीवन में कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। ऐसा ही कुछ कर दिखाया लक्ष्मी अग्रवाल ने। एसिड हमले से पीड़ित लक्ष्मी अब एसिड अटैक पीड़ितों को सशक्त बनाने और उनमें आत्मसम्मान जगाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही हैं।
जब लक्ष्मी अग्रवाल केवल 15 वर्ष की थीं तभी उन पर एसिड हमला हुआ था। एक 32 वर्षीय व्यक्ति के शादी के प्रस्ताव को खारिज करने पर उसने लक्ष्मी पर एसिड हमला किया था। यह वाक्या लक्ष्मी की आत्मा को झकझोर कर रख देने वाला था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने सपनों को आगे बढ़ाने और इस तरह के सभी पीड़ितों के लिए लड़ने का फैसला किया। इसके बाद लक्ष्मी एक गैर सरकारी संगठन जो भारत में एसिड हमले में जीवित बचे लोगों की मदद करने को गठित किया गया है, उससे जुड़ीं। लक्ष्मी कहती हैं कि यह तो सिर्फ शुरुआत है। उन्हें अभी इस तरह के लोगों के लिए बहुत कुछ करना है। 2013 में वह दिल्ली में स्टाप एसिड अटैक अभियान के तहत एक कैफे की स्थापना की। इस कैफे का मुख्य उद्देश्य एसिड पीड़ितों को एक छत के नीचे खुशी और प्रोत्साहन का एक ऐसा माहौल देना हैं जिसमें वह अपने खोये हुए आत्मविश्वास को दुबारा पा सकें। यहां कार्यकर्ताओं में ज्यादातर महिलायें हैं जो एसिड अटैक की वजह से अपना आत्मविश्वास खो चुकी हैं लेकिन वे सभी बहुत बहादुर हैं और अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। यही कारण है कि दिल्ली में शुरुआत करने के बाद लक्ष्मी आगरा और लखनऊ में भी कैफे की दो और शाखाएं स्थापित करने में सफल रहीं।
लक्ष्मी अग्रवाल एक भारतीय प्रचारक और एक टीवी होस्ट हैं। वह एसिड हमले के शिकार लोगों के अधिकारों के लिए बोलती हैं। उन्होंने कहा कि समाज उसकी तरह पीड़ितों की कम से कम सहायक है। लक्ष्मी के अनुसार सरकारी विभागों के उच्च अधिकारियों पर दबाव डाला जाता है जोकि काम नहीं करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनकी टीम को कभी भी सरकार की ओर से सहायता प्राप्त नहीं हुई। जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खुद उनके कैफे का दौरा किया तो उन्हें एसिड हमले के शिकार होने वाले लोगों की पीड़ा का एहसास हुआ। वह आज की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो इस तरह के हमले के बाद अपने जीवन को समाप्त मानती हैं। लक्ष्मी ने कहा कोई विपत्ति अपके सपनों का एक विध्वंसक रूप हो सकती है लेकिन यदि इच्छाशक्ति हो तो हर मुसीबत से पार पाया जा सकता है।