जन्मदिन पर
विशेष
डा. रीभा
तिवारी
हिन्दी साहित्य जगत में कई ऐसे साहित्यकार और
लेखक हुए जिन्होंने अपनी रचनाओं से खुद को साहित्य जगत में अमर कर दिया। ऐसे ही
लोगों में कालजयी कवयित्री और लेखिका महादेवी वर्मा का शुमार है। सच
कहें तो महादेवी वर्मा अध्यापक, कवि, गद्यकार, कलाकार, समाजसेवी और विदुषी के बहुरंगे मिलन
का जीता जागता उदाहरण थीं। 26 मार्च, 1907 को एक कायस्थ परिवार
में जन्मी महादेवी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका बेजोड़ लेखन भारतीय हिन्दी
साहित्य की समृद्ध परम्परा की याद जरूर दिलाता है। महादेवी जी में काव्य प्रतिभा
सात वर्ष की उम्र में ही मुखर हो उठी थी। बचपन से ही साहित्य में गहरी अभिरुचि के
चलते उनकी कविताएं बाल्यकाल से ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।
अमर साहित्य की महादेवी ने लेखन की शुरुआत ब्रजभाषा से की उसके बाद तत्कालीन खड़ी बोली
की कविता से प्रभावित होकर खड़ीबोली में रोला व हरिगीतिका छंदों में काव्य लिखना
प्रारम्भ किया। महादेवी वर्मा की प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर, स्नातक की पढ़ाई जबलपुर
तो आगे की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई।
महादेवी वर्मा को छायावाद युग के सबसे प्रमुख
रचनाकारों में गिना जाता है। छायावाद हिन्दी साहित्य का वह युग है जब प्रेम,
प्रकृति और आत्मसात रचनायें अपने समय का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। महादेवी वर्मा
की रचनाओं में भी छायावाद एक अव्यक्त प्रेम की तरह अन्तर्निहित दिखाई पड़ता है। महादेवी
की रचनाओं में एक नारी का प्रेम के प्रति दृष्टिकोण भी बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई
देता है। महादेवी मेधावी छात्रा के साथ ही एक प्रखर सामाजिक चिन्तक थीं, यही वजह
रही कि शैक्षणिक काल में ही उनके दो काव्य संकलन नीहार और रश्मि प्रकाशित होकर
चर्चा में आ चुके थे। साहित्य के क्षेत्र में इस कवयित्री का सर्वाधिक योगदान
काव्य में है किन्तु गद्य में उत्कृष्ट कोटि के संस्मरण, रेखाचित्र, निबन्ध एवं
आलोचना भी खासे लोकप्रिय हैं। रहस्यवाद एवं प्रकृतिवाद पर आधारित इनका छायावादी
साहित्य हिन्दी साहित्य की अमूल्य विरासत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विरह
गायिका के रूप में महादेवी जी को आधुनिक मीरा कहा गया। इनके काव्य में वंदना की
प्रधानता है। इनका हृदय अत्यंत करुणापूर्ण, भावुक और संवेदनायुक्त था यही वजह है
कि इनके साहित्य में लोकजीवन की जीवन्तता का समावेश मिलता है। इनकी काव्यगत रचनाओं
में उर्दू और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का समावेश है तो मुहावरों एवं
लोकोक्तियों का प्रयोग भी बखूबी किया गया है।
महादेवी वर्मा की शादी कम उम्र में ही हो गई थी
लेकिन उनका संसारिकता से कोई लगाव नहीं था। वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित थीं और
बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थीं, जिसकी शिक्षा उन्होंने शादी के बाद भी जारी रखी। महादेवी
वर्मा ने निरीह व्यक्तियों की सेवा का व्रत ले रखा था। महादेवी के हृदय में
शैशवावस्था से ही जीवमात्र के प्रति करुणा और दया थी। उनकी कहानियों में उनके पशु
प्रेम की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। महादेवी जी के जन्म के समय समाज बेटियों की
अभ्यर्थना नहीं करता था। महादेवी के पिता गोविन्द प्रसाद वर्मा भागलपुर में एक
स्कूल के हेडमास्टर और माँ हेमरानी हिन्दी की विदुषी व वैष्णव भक्त थीं। महादेवी
का नामकरण उनके बाबा ने कुलदेवी दुर्गा का विशेष अनुग्रह समझ कर किया था। यद्यपि
महादेवी का समाज पिछड़ा और कन्याओं की शिक्षा व स्वतंत्रता का विरोधी था लेकिन उनका
पारिवारिक परिवेश दर्शन, साहित्य, भक्ति और कला का संगम था। मात्र ग्यारह वर्ष की
आयु में ही उनका विवाह डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा से हुआ। उनके ससुर चूंकि लड़कियों
की शिक्षा के पक्ष में नहीं थे अतः उनकी विधिवत पढ़ाई में कुछ समय के लिए व्यवधान
भी पड़ा। आखिरकार महादेवी वैवाहिक बंधन से मुक्त हो, शिक्षा ग्रहण करने और साहित्य
साधना में जुट गईं।
अन्याय के प्रति स्वभाव से ही असहिष्णु महादेवी
का कृतित्व भावना, कल्पना और चिंतन की अद्भुत नजीर है। उनके मुख पर हमेशा अनोखी
हँसी को देख उनके मिलने वालों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती थी कि क्या वह बाहर
से हँसने में अपने भीतर की वेदना को छिपाती हैं अथवा वह हँसी कृत्रिम थी। महादेवी
वर्मा प्रायः कहती थीं कि मेरे अंतह में कोई ऐसी खरोंच नहीं जो संसार के किसी
व्यक्ति से मिली हो। यद्यपि उन्होंने गृहस्थ जीवन स्वीकार नहीं किया किन्तु उनकी
दृष्टि वसुधैव कुटुम्बकम् की ही थी। महादेवी वर्मा ने छायावादी प्रकृति, तरल, सरल
सौन्दर्य पर प्रेम, विरह और वेदना का स्वर संधान कर, उस विरह वेदना को रहस्यमयी
अध्यात्म चेतना की अंतरंग अनुभूतियों से सजा-संवार कर, अपने काव्यमय स्वरों को जो
पठनीयता दी वह अकल्पनीय है।
महादेवी वर्मा का साहित्यिक व्यक्तित्व
बहुआयामी है क्योंकि वह काव्य, रेखाचित्र, निबंध और आलोचना साहित्य से निर्मित हुआ
है। वस्तुतः इनके द्वारा सृजित साहित्य की दो धुरियाँ हैं। एक धुरी उनका काव्य है
जिसमें करुणा और वेदना की धारा प्रवाहित हुई है तो दूसरी धुरी गद्य साहित्य है,
जिसमें उनकी सामाजिक यथार्थ दृष्टि एवं सामाजिक चिंतनधारा के दर्शन होते हैं। महादेवी
वर्मा का नारी चिंतन समाज केन्द्रित होने के चलते तटस्थ और निष्पक्ष है। वे नारी
जीवन की विडम्बनाओं के लिए पुरुषों को ही दोषी नहीं ठहरातीं बल्कि महिलाओं को भी इसके
लिए समान रूप से उत्तरदायी मानती थीं। भारतीय नारी की अदृष्ट विडम्बना को उजागर
करते हुए उन्होंने लिखा भी कि एक ओर तो वह देवी के प्रतिष्ठापूर्ण पद पर शोभित है
तो दूसरी ओर पराधीन भी।
महादेवी वर्मा ने समाज की पूर्णता हेतु पुरुष
एवं नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को आवश्यक माना। उनकी दृष्टि में नारी को पुरुष
की छायामात्र मानना गलत है। महादेवी ने नारियों की पुरुषोचित अनुकरण वृत्ति को
उचित नहीं मानते हुए लिखा है कि इससे सामाजिक श्रृंखला शिथिल तथा व्यक्तिगत बंधन
और संकुचित होते हैं। इन्होंने भारतीय समाज में नारी की दयनीय स्थिति के लिए नारी
के अर्थहीन अनुसरण और अनर्थमय अनुकरण को जिम्मेदार ठहराया है। महादेवी जी ने नारीत्व
के अभिशाप विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा कि उन्हें इस बात का क्षोभ है
कि नारी ने अपनी शक्ति को समझने का कभी प्रयास ही नहीं किया। वह स्वयं अपनी वेदना
के कारणों को नहीं जानती और न अपने असह्य कष्ट के प्रतिकार की भावना से परिचित है।
महादेवी जी ने अपने साहित्य में आधुनिक नारियों
की स्वच्छन्द प्रवृत्ति व निरुद्देश्य गंतव्य को अनुचित ठहराते हुए प्राचीन
नारियों के योगदान को तुलनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया है। आधुनिक नारी और
प्राचीन नारी के बारे में उन्होंने लिखा है कि आज की सुन्दर नारी भी पुरुष के निकट
कोई विशेष महत्व नहीं रखती। उसे स्वयं भी इस कटु सत्य का बोध होता है परंतु वह उसे
परिस्थिति का दोषमात्र समझती है। महादेवी जी ने नारी के घर और बाहर के कर्तव्यों
एवं अधिकारों पर भी बेबाक कलम चलाई है। उनका मानना है कि युगों से नारी का कार्यक्षेत्र
घर तक सीमित रहा है किंतु आधुनिक काल में उसके कर्तव्यों का विस्तार हुआ है। वे
कहती हैं कि वास्तव में स्त्री अब केवल रमणी या भार्या नहीं रही वरन् घर के बाहर
भी समाज का एक विशेष अंग तथा महत्वपूर्ण नागरिक है, अतः उसका कर्तव्य भी अनेकाकार
हो गया है।
महादेवी वर्मा ने कविता और कहानियां लिखने के
साथ ही 1935 में चांद पत्रिका के विदुषी अंक का संपादन भी
किया था। पत्रिका के संपादकीय में आधुनिक महिला जगत की स्थिति पर उनकी टिप्पणी थी-
अवश्य ही आज की नारी प्राचीन नारी जगत की वंशज नहीं जान पड़ती, इसका सबसे बड़ा
कारण यही है कि वह स्वयं अपनी शक्ति और दुर्बलता दोनों से अनभिज्ञ है। महादेवी जी ने
अपने साहित्य में नारी को केन्द्र में रखकर ही समस्याओं पर दृष्टिपात किया है। इनके
निबंधों में उनका भारतीय नारी के प्रति सहानुभूति से भरा हुआ मन उन सामाजिक तत्वों
के प्रति क्षुब्ध है जो नारी के लिए श्रृंखला की कड़ियां बन गए हैं। महादेवी की प्रमुख कृतियां नीहार, रश्मि,
नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, यामा, सन्धिनी, आधुनिक कवि, सप्तपर्णा, अतीत के
चलचित्र, स्मृति की रेखाएं, श्रृंखला की कड़ियां आदि हैं।
महादेवी जी का नारी चिंतन कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण
है क्योंकि यह चिन्तन उस समय का है जब भारतीय महिलाओं का 90 फीसदी हिस्सा निरक्षर था तथा सामाजिक चेतना
नहीं के बराबर थी। आज तो नारी साहित्य लेखन के भी केन्द्र में आ गई है। आज के नारी-विमर्श
के केन्द्र में महादेवी का चिंतन भी यदि सम्मिलित कर लिया जाए तो उस विमर्श के
सार्थक परिणाम आ सकते हैं। महादेवी वर्मा ने एक निर्भीक, स्वाभिमानी भारतीय नारी
का जीवन जिया। उनकी इसी बहुमुखी प्रतिभा के कारण इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण,
हिन्दी साहित्य सम्मलेन की ओर से सेकसरिया पुरस्कार तथा मंगला प्रसाद पारितोषिक मिला।
एक मई 1983 को इन्हें भारत भारती तथा नवम्बर 1983 में यामा कृति पर ज्ञानपीठ
पुरस्कार से नवाजा गया। 11 सितम्बर, 1987 को महादेवी वर्मा ने प्रयाग में अंतिम सांस ली
थी। वह आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका लिखा साहित्य आज भी जिन्दा है।
डा. रीभा तिवारी
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