डा. रीभा तिवारी
आज हमारा देश विकास की राह पर अग्रसर है। समाज
के हर वर्ग का जीवन समृद्ध हो रहा है। स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं तो भौतिक
सुविधाएं अपनी श्रेष्ठता के चरम पर आरूढ़ मानव मन को चुनौती दे रही हैं। सुख की
खोज में हमारी खुशी तो चैन की तलाश में मुस्कराहट कहीं खो गई है। हम समझ ही नहीं
पा रहे कि पर्यावरण की विनाश-लीला को कैसे और किस तरह रोकें। अल-सुबह हम पार्कों
में ठहाके तो लगा रहे हैं लेकिन दिल से निकलने वाली वो हँसी जो आँखों से झाँककर
होठों से निकलती थी अब सुनाई नहीं देती। उसने शायद अपना रास्ता बदल लिया है। आज हंसी
दिमाग के आदेश से मुख से निकलती है और चेहरे की मांसपेशियों पर भी दिखाई देती है
लेकिन हमें महसूस नहीं होती। ऐसा क्यों हो रहा है। इस यक्ष प्रश्न का समाधान आज
सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया का हर मुल्क खोज रहा है लेकिन सफलता से हम कोसों दूर
हैं।
आज जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ रही है,
इंसान का जीवन-यापन कठिन होता जा रहा है। शरीर को नित नई व्याधियां अपने आगोश में
ले रही हैं। अतीत में जब सुबह से शाम तक हम प्रत्येक काम अपने हाथों से करते थे तब
वातावरण कुछ और था. आज कुछ और है। पर्यावरण यानि हमारे आस-पास का आवरण आज इस तरह
से दूषित हो चुका है कि हम सुकून की सांस भी नहीं ले पा रहे। प्रकृति और मनुष्य का
सम्बन्ध पुराना है। पर्यावरण और जीवन की अभिन्नता से सभी परिचित भी हैं। पर्यावरण
की स्वच्छता, निर्मलता और संतुलन से ही मानव मात्र को बचाया जा सकता है, यह जानते
हुए भी हम बेखबर हैं। प्राचीन साहित्य में कवियों की कविताएं प्रकृति से भरी पड़ी
हैं। तुलसीदासजी की यह पंक्ति निरक्षरों तक को याद है-
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे,
खल के वचन संत सहे जैसे।
प्राचीनकाल से ही जीव पंचभूतों (जल, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि) से परिचित है। इस एक में से किसी का भी क्षरण
मानव के लिए लाभदायी नहीं कहा जा सकता। हम स्वार्थ के वशीभूत होकर इन पंच तत्वों से
लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं। आज हम भौतिक सुख-सम्पदा में बेशक बहुत आगे बढ़ रहे हों
लेकिन प्रदूषित वातावरण से हमारी शारीरिक सम्पदा निरंतर चिन्ता का सबब बनती जा रही
है। जब तक हम किसी वस्तु, आविष्कार और खोज के गुण-दोष को नहीं टटोलेंगे तब तक हमारा
आगे बढ़ना, पीछे हटने के ही बराबर है। विकास के पथ पर मानव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा
है, सीख की बहुत-सी बातें पीछे छोड़ता जा रहा है। पर्यावरण को कैसे बचाया जाए, यह
समस्या आज सबसे ज्वलंत है। पृथ्वी का अस्तित्व बचाने के लिए हमें सबसे पहले जल-प्रदूषण
को रोकना होगा। पर्यावरण के लाभ और उसके महत्व को ध्यान में रखते हुए वनों के
संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। जल, जंगल और जमीन हमारी राष्ट्रीय सम्पदा का
मूल स्रोत हैं। जंगल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनसे हमें इमारती लकड़ी,
आयुर्वेदिक औषधियां, पशुओं के लिए चारा, भूमि कटाव पर रोक, शुद्ध व ताजी हवा नसीब
होती है। हमें एकजुट होकर न केवल पर्यावरण संरक्षण की पहल करनी होगी बल्कि पर्यावरण
की समृद्धि में वृहद रूप से पौध-रोपण करना भी अनिवार्य है। आधुनिक जीवनशैली के
परिणामस्वरूप आज हमारा भोजन और हमारा जीवन दोनों एक समान हो गए हैं। हम जीवन जीने
के लिए नहीं बल्कि सुख-सुविधाएँ और स्टेटस हासिल करने को जी रहे हैं।
आज के समय में शुद्ध जल की समस्या सबसे जटिल
समस्याओं में से एक है लेकिन हम इस दिशा में कुछ करने की बजाय लगातार पानी बर्बाद
कर रहे हैं। पिछले बीस साल में भारत में बोतलबन्द पानी के व्यापार में जो तेजी और
तरक्की आई है, वह आश्चर्यजनक है। हम इस बात से अनजान हैं कि एक बोतल पानी जो हम खरीद
कर पीते हैं उसके एवज में कम्पनियां पांच लीटर पानी का अपव्यय कर देती हैं। दुनिया
भर में साल 2014 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया तो हमारे देश
में ऐसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी
बहाया गया। यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से लेकर केरल के गांव वाले इन बोतलबन्द कम्पनियों
और कोकाकोला कम्पनियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। भारत में कृषि एक ऐसा
क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा का इस्तेमाल होता है। घरेलू इस्तेमाल
में पानी का सिर्फ पांच फीसदी ही खर्च होता है। इसके अलावा भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700
लीटर पानी खर्च होता है
यानी यदि हमारे परिवार में एक दिन में एक किलो गेहूं की खपत होती है तो हम उसके
साथ करीब 1700 लीटर पानी की भी
खपत करते हैं।
देखा जाए तो हम जीवन का उद्देश्य ही भूल गए हैं।
इस मशीनी युग में हम भी मशीनी होते जा रहे हैं। आधुनिक राजनीति विज्ञान की अवधारणा
है कि समाज में जैसे-जैसे समृद्धि और सम्पन्नता आती है वह खुशहाल होता जाता है। आज
हम अपार सम्पदा को अपनी खुशी मान बैठे हैं। हम सुख और खुश होने का अन्तर भूल रहे
हैं। सुख पैसे से खरीदा जा सकता है पर खुशी नहीं। इसी प्रकार हम सम्पत्ति और पैसे
के बीच के अन्तर को भी नहीं समझ पा रहे। दरअसल हमारा परिवार, हमारे दोस्त, हमारे
बच्चे, हमारा अच्छा स्वास्थ्य, हमारा जीवन ही हमारी सम्पत्ति है जिसे हम धन से
नहीं खरीद सकते। एक व्यक्ति हवाई जहाज में बैठकर दुखी हो सकता
है जबकि दूसरी तरफ एक व्यक्ति खेतों के बीच पगडंडी पर ताजी हवा के झोंकों के बीच
साइकिल चलाता हुआ भी खुश हो सकता है। जो खुशी बचपन में तितलियों के पीछे भागने में
मिलती थी वह क्या आज पैसे के पीछे भागने में मिल रही है। सच कहें यदि हमारा मन खुश
नहीं होगा तो खुशी के सारे संसाधन व्यर्थ हैं। खुशी का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है, वह
एक भाव है जो दिखाई नहीं देता। हमारी संस्कृति ने हमें शुरू से ही यह सिखाया है कि
खुशी त्याग में है, सेवा में है, प्रेम में है, मित्रता में है, लेने में नहीं बल्कि
देने में है। आज इंसान आधुनिकता और उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है। वह पर्यावरण का
लगातार दोहन कर रहा है।
पिछले कई वर्षों से पर्यावरण को लेकर वैश्विक और
राष्ट्रीय स्तर बहस चल रही है। पर्यावरण संरक्षण के उपायों और क्रियान्वयन को लेकर
प्रतिवर्ष पर्यावरण सम्मलेन आयोजित किये जाते हैं लेकिन इन सम्मेलनों में भी
वैश्विक स्तर पर कोई व्यापक सहमति नहीं बन पाई है जिससे कि पर्यावरण संरक्षण को
लेकर कोई पहल की जा सके। पर्यावरण संरक्षण, ओजोन परत की चिन्ता अभी तक केवल बहस का
ही विषय रहे हैं, इनका हल निकालने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। पर्यावरण
संरक्षण को लेकर यदि भारत की बात की जाये तो हमने भी इस मसले को लेकर कोई खास
संजीदगी नहीं दिखाई है। भारत में पर्यावरण की स्थिति चिन्ताजनक है। साथ ही सरकार
के लचर रवैये ने इस चिन्ता को और बढ़ाया है। पर्यावरण और जीवन का अनोखा सम्बन्ध है।
दुर्भाग्य से कुछ लोगों का यह मानना है कि केवल सरकार और सामान्य तौर पर बड़ी कम्पनियों
को ही पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुछ करना चाहिए, यह सही नहीं है। दरअसल पर्यावरण
संरक्षण हम सभी का दायित्व है।
हमारा पर्यावरण पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन का
अस्तित्व बनाये रखने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिक युग में
हमारा पर्यावरण मानव निर्मित तकनीकी उन्नति के कारण दिन-ब-दिन बदतर होता जा रहा
है। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बन गयी है जिसका हम आज सामना कर
रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक,
भावनात्मक और बौद्धिक स्तर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण
कई रोगों का जनक है जिससे इंसान पूरी जिन्दगी पीड़ित हो सकता है। यह किसी समुदाय
या शहर की समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है जो किसी एक के प्रयास से खत्म
नहीं हो सकती। अगर इसका ठीक से निवारण नहीं हुआ तो एक दिन जीवन का अस्तित्व ही खतरे
में पड़ जाएगा। वायु और जल प्रदूषण विभिन्न बीमारियों और विकारों द्वारा हमारे
स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। आजकल हम किसी भी चीज को सेहतमंद नहीं कह सकते
क्योंकि जो हम खाते हैं वह पहले से ही कृत्रिम उर्वरकों के दुष्प्रभाव से प्रभावित
हो चुका है और हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को कमजोर कर रहा है। यही
कारण है कि हम में से कोई भी स्वस्थ और खुश रहने के बावजूद कभी भी रोगग्रस्त हो
सकता है। हमें पर्यावरण को स्वस्थ और प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए सबसे पहले अपने
स्वार्थों और गलतियों को सुधारना होगा। यह विश्वास करना मुश्किल है लेकिन सच है कि
हम सब अपने एक छोटे से सकारात्मक प्रयास से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव ला सकते
हैं।

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