भारत विविधता में एकता वाला देश है यहाँ पर विभिन्न धर्मों
व सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी भाषाएं, रहन-सहन, वेशभूषा, रीति-रिवाज एवं
साहित्य हैं। सबकी अपनी-अपनी संस्कृति है। सभी की संस्कृति उनकी पहचान बनाए हुए है। सच तो
यह है कि संस्कृति के प्रकाश में ही भारत अपने
वैयक्तिक एवं वैश्विक जीवन मूल्यों की रक्षा कर सकता है। किसी भी देश का
अपना इतिहास होता है, परम्परा होती है। यदि
देश को अपना शरीर मानें तो संस्कृति उसकी आत्मा है। किसी भी संस्कृति में आदर्श
होते हैं, मूल्य होते हैं और विविध परम्पराएं भी समाहित रहती हैं। इन मूल्यों की
संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं। धर्म, अर्थ, काम
और मोक्ष। यह बात अलग है कि हमारे जीवन में पाश्चात्य संस्कृति के प्रवेश से बहुत
कुछ बदल सा गया है। हम धीरे-धीरे ही सही अपनी अच्छी परम्पराओं से भी विमुख हो रहे
हैं। सवाल यह उठता है कि पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कितना उचित है।
हिन्दू धर्म में प्राकृतिक जीवन तथा समाज में प्राणीमात्र
के कल्याण पर विशेष बल दिया जाता है किन्तु इन भावात्मिक शब्दों को क्रियात्मिक
रूप देना हर किसी की योग्यता के बस की बात नहीं। भावनाओं को साकार करने का कार्य
रीति-रिवाज करते हैं। रीति-रिवाजों का अस्तित्व भोजन में मसालों की तरह है, जिनके बिना
जीवन ही नीरस हो जाएगा। किसी भी क्रिया को निर्धारित प्रणाली से करना ही रीति-रिवाज
है ताकि सभी को क्रिया के आरम्भ होने तथा समाप्त होने का प्रत्यक्ष आभास हो जाये।
जब राति-रिवाज क्रिया का यथार्थ लक्ष्य छोड़कर केवल दिखावा बन जाते हैं या समय और
साधनों की सामर्थ्य से बाहर निकल जाते हैं तो वह बेकार का बोझ बन जाते हैं। विश्व
में कहीं भी कोई मानव समाज ऐसा नहीं है जहां लोगों ने सारे रीति-रिवाज छोड़कर केवल
भावनात्मक क्रियाओं के सहारे जीवन व्यतीत किया हो। प्रथा तथा रीति-रिवाज समय और
समाज की जरूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। पहले साधक प्रातः ब्रह्म मुहूर्त या
सूर्योदय के समय, दोपहर तथा सूर्यास्त के समय लगभग अनिवार्य तौर से ध्यान लगाकर
किसी न किसी मंत्र का जाप करते थे या मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते थे लेकिन समय
के अभाव के कारण आजकल यह प्रथायें या तो लुप्त हो चुकी हैं या संशोधित रूप में की
जा रही हैं।
किसी भी प्रथा या रीति-रिवाज को जब मन और श्रद्धा से किया
जाये तो वह अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने में सहायक है। साधक आसानी से अपने को मन
वांछित दिशा में केन्द्रित कर सकता है तथा दैनिक गतिविधियों से अपने आपको अलग करके
ईश्वरीय शक्ति का आभास महसूस कर सकता है।यह मनोवैज्ञानिक क्रिया है। रीति-रिवाजों का
प्रावधान सभी मानव समाज तथा धर्मों में किसी न किसी रूप में है। थोड़ी बहुत अन्तर
स्थानीय भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारणों से है। हिन्दू रीति-रिवाज सरल, आसान
तथा परिवर्तनशील हैं। उन्हें समय तथा आवश्यक्तानुसार बदला जा सकता है। समाजहित में
रीजि-रिवाजों को बदलने की क्रिया सर्वसम्मति से होनी चाहिए व्यक्तिगत सुविधा के
लिये नहीं। हमें क्या चुनना है, हमारे लिए क्या हितकारी है, यह हमारे विवेक निर्भर
करता है। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण और उससे हो रहा सामाजिक बदलाव हमारी
संस्कृति और सभ्यता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हम बिना सोचे-समझे जिस तरह पश्चिमी
सभ्यता की धड़ल्ले से नकल कर रहे हैं, उसके दूरगामी परिणाम चिन्ताजनक हो सकते हैं।
बात खानपान की हो, पहनावे की या फिर हमारे विचारों में आए बदलाव की, आज जो तस्वीर देखने
को मिल रही है, उसे सही नहीं कहा जा सकता। पाश्चात्य संस्कृति का यह अंधानुकरण ही
है कि आज हमारी अच्छी परम्पराएं भी विस्मृत हो रही हैं। अब चिट्ठी-पत्री, सावन के
गीत-मल्हार ही नहीं सुबह का हमारा खान-पान भी बदल गया है। सुबह के खानपान में जहां
पहले दूध-दही, चूड़ा चबेना होता था उसकी जगह चाय और फूड-फास्ट ने ले ली है। ब्रेड
बटर, पिज्जा, बर्गर, सैंडविच ये हमें नाश्ते में खूब भाने लगे हैं। बदलाव समय के
साथ होना स्वाभाविक है लेकिन हमें यह भी ध्यान देना होगा कि जो चीजें हम नाश्ते
में ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं भी या नहीं। इसमें कितनी पौष्टिकता
है। कहीं हम अंधानुकरण के बहाने अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे।
चिठ्ठी-पत्री की बात करें तो आज की युवा पीढ़ी शायद ही इससे
इत्फाक रखती हो। सच कहें तो उनके लिए अपने परिजनों से पत्र-व्यवहार करना किसी
चुनौती से कम नहीं है। पहले हम भरी दोपहरी में भी डाकबाबू का इंतजार बेसब्री से
करते थे। डाकबाबू क्या बरसात, क्या गर्मी और क्या शीतलहर हर मौसम में संदेशवाहक बन
कहीं खुशी और कहीं गम की खबर लिए पहुंच जाते थे। हम एक-दूसरे से पूछते थे कि क्या
आज डाकिया दिखा है। उस दौर में हमें अपनों के संदेशों का बेहद इंतजार रहता था। अब
समय के साथ सब कुछ बदल गया है। मोबाइल, ईमेल और नेटवर्किंग के आ जाने से चिठ्ठी के
दिन लद गए। पत्रों में अपनों की भावनाएं समाहित रहती थीं। पत्र गिले-शिकवों के
बावजूद मान-मनौवल का सशक्त माध्यम थे। व्यक्ति बेशकीमती चीज की तरह उन्हें सहेज कर
रखता था। पत्र पुराने होने पर भी उनकी अहमियत बरकरार रहती थी। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका,
दोस्त-मित्र, पिता-पुत्र सभी एक-दूसरे का कुशलक्षेम पत्र व्यवहार से ही
जानते-समझते थे। जो साक्षर नहीं होते थे उन्हें भी अपने परिजनों की चिट्ठी का
इंतजार रहता थी। वे भी दूसरों से पत्र लिखवाते और पत्र आने पर किसी और से पढ़वाते
थे।
अगर हम गीत-मल्हार, कजरी, चैता की बात करें तो यह भी धीरे-धीरे
कम होते जा रहे हैं। ऋतुओं के अनुसार गीत गाया जाना हमारी सुखद परम्परा में समाहित
था। इसी बहाने ही सही हमारा एक-दूसरे से मिलना-जुलना होता था। इससे आपस में प्रेम और
अपनत्व बना रहता था। लोग लोककला के सौंदर्य को जीते थे। अब मानों सब कुछ विलुप्त
होने की स्थिति में है। सावन आते ही जगह-जगह नीम, बदगद के पेड़ों पर झूले पड़ जाया
करते थे। सखी-सहेलियां झुंड का झुंड हँसी-ठिठोली करते कजरी गीत गाते रिमझिम बारिश
की फुहारों के बीच झूला झूलते-झुलाते पेंग मारते दिख जाया करती थीं और यह सिलसिला
पूरे सावन भर चलता था। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी चादर से आच्छादित होती है,
हर तरफ हरियाली ही हरियाली दिखती है तब मन अपने आप तरंगित होने लगता है। सावन में
हरी चूड़ियां और हरे रंग के परिधानों को पहनने का चलन भी अब बीते दिनों की बात हो
गई है। अब पारम्परिक तीज-त्योहार भी पहले की तरह नहीं मनाये जाते। अब उनकी जगह मदर्स
डे, फादर्स डे, वेलेंटाइन डे आदि ने ले ली है।
तीज-त्योहारों के बहाने ही सही पहले हम एक-दूसरे का
कुशलक्षेम जानने के लिए उनके घर जाते थे या अपने घर बुलाते थे। अब आने-जाने की
तकल्लुफ करने की बजाय हम फोन से ही सम्बन्धों की प्रगाढ़ता की दुहाई देने में अपनी
शान समझने लगे हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि मोबाइल पर बात करना और आमने-सामने
बैठकर बात करने में कितना फर्क है। जहाँ हम आमने-सामने होते हैं वहाँ रिश्तों में
कुछ भी छुपा-छुपाई नहीं होती। हमारी भावनाएं स्वाभाविक तौर पर प्रगट हो जाती हैं। हम
खुशी-गम दोनों का इजहार खुलकर कर लेते हैं। उससे रिश्तों में ताजगी आ जाती है और
हम उसमें गर्मजोशी का अनुभव करते हैं। जब हम किसी से हाथ मिलाते हैं, किसी को गले
लगाते हैं या माथा चूमते हैं, पीठ थपथपाते हैं या चरण स्पर्श करते हैं तो उसमें
अपनत्व का बोध होता है। हम फोन से हालचाल तो जान सकते हैं लेकिन अपनत्व का अहसास
नहीं कर सकते। आज हर कोई काम और समय का रोना रोता है लेकिन समय तब भी 24 घंटे का था और आज भी 24 घंटे का है। यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि आखिर हम
क्या चाहते हैं और कैसा चाहते हैं। रहन-सहन, खानपान, जीने का सलीका सब कुछ हमारा
है। हां यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हमें पसंद क्या है। बेहतर होगा कि हम अपनी
संस्कृति और रीति रिवाजों को जिएं जिनमें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना समाहित है।
डा. रीभा तिवारी
सम्पर्क-
एस.बी.आई.
कालोनी के सामने
फजलगंज, सासाराम
जिला- रोहतास
(बिहार)
पिन कोड नम्बर- 821115
मोबाइल नम्बर-9430990167, 7759874313

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