बुधवार, 29 नवंबर 2017

विलुप्त होती लेखन परम्परा


डा. रीभा तिवारी
इंटरनेट, मोबाइल फोन, मोबाइल एप्लीकेशन, टैबलेट, लैपटॉप और अन्य आधुनिक उपकरणों के विकास से आज दुनिया की अधिक से अधिक चीजें डिजिटल हो रही हैं। भारत के महानगरों और अन्य शहरों की शिक्षा प्रणाली भी काफी हद तक आधुनिकीकृत हो चुकी है। डिजिटलीकरण के इस दौर में शिक्षा कई अंतरराष्ट्रीय स्कूलों के साथ-साथ भारत की पारम्परिक शिक्षा प्रणाली में अपनी जगह बना रही है और पारम्परिक कक्ष प्रशिक्षण का स्थान ले रही है लेकिन इससे लेखन परम्परा का जिस गति से क्षरण हो रहा है, यह काफी चिन्ता का विषय है। मशीन मनुष्य को भाषा की सांकेतिक पहचान तो करा सकती है लेकिन हृदय में संवेदना के बीज अंकुरित नहीं कर सकती। असल में भाषा हृदय से जुड़ी क्रिया है। यह हृदय की ही होनी चाहिए और लिपि अपने हाथों की, तभी शिक्षा में संवेदना कायम रह सकती है।
भाषा के चार कौशलों में से एक है लेखन। भाषा के चार कौशल हैं लिखना, पढ़ना, बोलना और सुनना। लिखना और बोलना अभिव्यक्ति कौशल है तो पढ़ना और सुनना ग्रहण कौशल है। जब व्यक्ति कुछ कहना चाहता है तब वह लिखता है। हम कुछ लिखते हैं तब उसमें किसी के लिए दिया गया संदेश होता है। भाषा का उदय ही संदेश भेजने के लिए हुआ है। जब हम वर्णों को शब्दों में या वाक्यों में जोड़ते हैं तब उसके द्वारा संदेश पहुँचाने का काम पूर्ण होता है। जब हम लिखते हैं तब लेखन की सारी विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही हमें लिखना पड़ता है। लेखन का कोई भी प्रारूप हो, उसमें दो बातें आम होती हैं। एक है विशेष संदेश देना और दूसरा है किसी के लिए लिखना। लेखन के अनेक उप-कौशल हैं। कुछ विशुद्धता से जुड़े होते हैं। जैसे- शुद्ध वर्तनी, सही विरामचिह्नों का प्रयोग, सही प्रारूप, सही शब्दों का इस्तेमाल, व्याकरण नियम, सही वाक्यों का जोड़ तथा अनुच्छेद आदि बातें ध्यान में रखकर हमें लिखना पड़ता है। इन उप कौशलों के साथ ही हम अपने विचारों को संघटित रूप में तथा सुयोग्य शैली के साथ प्रस्तुत कर सकते हैं।
लेखन का इतिहास बहुत पुराना है। इसका आरम्भ 3300 ईसा पूर्व मेसोपोटामिया में हुआ था। उस समय किसी आदमी ने मिट्टी के बोर्ड पर राशन का रिकॉर्ड रखने के लिए पहली बार लिखा था। इंग्लैण्ड के एक संग्रहालय में वह बोर्ड आज भी सुरक्षित है। शोधकर्ता तो यहां तक मानते हैं कि 60000 से 25000 ईसा पूर्व आदमी हड्डियों और पत्थरों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचा करता था, जैसे हम कभी-कभार अकारण ही कॉपी या कागज पर खींच दिया करते हैं। हस्तलेखन के साथ-साथ अक्षरों का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। सुन्दर हस्तलिपि का अपना महत्व है। पहले अक्षर की खोज 1900 ईसा पूर्व सीनाई पेनिनसुला के लोगों ने की थी। समूची दुनिया में लिखावट का इतिहास बहुत दिलचस्प है। भारत में मोहन जोदड़ो और हड़प्पा के काल की खपड़ों की लिखावट ईसा से पाँच हजार साल पहले की बतायी जाती है। हमारी सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि हमें उस घड़े के ढक्कन से मिलती है जो पिप्रावा में पाया गया है और जिसमें भगवान बुद्ध के फूल रखे मिले हैं।
लेखन के इतिहास पर नजर डालें तो सम्राट अशोक ने स्तम्भ, टीले और पहाड़ की चट्टानों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी में बुद्ध धर्म के साथ ही अन्य उपदेशात्मक बातें खुदवाई थीं। इसके बाद ताड़, बाँस के पत्तों और भोजपत्रों पर खूब लिखा गया। ब्राह्मी लिपि के कई रूप बदले, भाषा के इतिहास ने कई करवटें बदलीं और धरती पर पोथियों की लम्बी परम्परा चली, फिर छापेखाने आए और हाथ की लिखावट वाली पोथियों के दिन लद गए। दुनिया में जितनी भी लिपियां हैं वे तीन तरह से चलती हैं। बाएं से दाएं जैसे देवनागरी या यूरोप की रोमन लिपि। दाएं से बाएं जैसे अरबी और फारसी। ऊपर से नीचे जैसे चीनी बोली की लिखावट। अभी तक ऐसी कोई लिपि देखने में नहीं आई जिसमें नीचे से ऊपर लिखा गया हो। भारत की देवनागरी लिपि सभी लिपियों में सबसे सुलझी हुई है। यह सस्वराक्षर लिपि न होकर ध्वन्यात्मक है। देवनागरी लिपि में हम जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं। अतः लिखने में कठिनाई नहीं होती क्योंकि जो अक्षर का नाम है, वही उसे देखकर बोला जाता है। यह विशेषता अन्य भाषाओं एवं लिपियों में नहीं है।
भाषा ही किसी देश के सभ्यता की प्राणवायु होती है, लिहाजा हर इंसान को लिखना-पढ़ना आना चाहिए और हाथ से न लिखने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। विकसित राष्ट्रों ने भले ही छात्रों को लैपटॉप या कम्प्यूटर से पढ़ाई करने, परीक्षा देने या नोट्स लेने की अनुमति दे दी हो परन्तु भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए यह उचित नहीं है। साफ-सुथरा लेखन जहां स्मरणशक्ति की वृद्धि में सहायक है वहीं सुन्दर हस्तलिपि का प्रभाव दूसरों पर भी अच्छा पड़ता है। आज संग्रहालयों में महान लेखकों, कवियों, कलाकारों की हस्तलिपि में समाया उनका कौशल आधुनिक पीढ़ी के लिए एक गम्भीर संदेश है। हमारे देश में महान हस्तियों से ऑटोग्रा या हस्ताक्षर लेने की जो परम्परा प्रचलित है वह लेखनी का ही कमाल है। ख्यातिलब्ध रचनाकारों ने अपने ग्रंथों का प्रणयन कागज-कलम के माध्यम से ही किया है। हमारे देश में पत्र-लेखन, डायरी-लेखन की परम्परा रही है लेकिन आज पत्र-लेखन की जगह मोबाइल सन्देशों ने ले लिया है जिससे हमारी भाषा विकृत हो रही है। आज जिस तरह शब्दों का संक्षेपीकरण किया जा रहा है, यह उचित नहीं है। विद्यार्जन उपाधियों के लिए हो या ज्ञान-पिपासा की शान्ति हेतु हमें लेखन के प्रति अनिच्छा नहीं दिखानी चाहिए। दरअसल, विद्यार्थी जीवन में ही तो हाथ से लिखने की अनिवार्यता होती है बाकी का कालखण्ड तो सीखने का होता है। खराब हस्तलिपि अभ्यास से सुधारी भी जा सकती है। आधुनिकता के नाम पर हम जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक कचरे के मोहपाश में फंसते जा रहे हैं, उससे पर्यावरण का खतरा उत्पन्न हो रहा है। इसका लगातार प्रयोग हमारी आंखों के लिए भी उचित नहीं है।
आधुनिक तकनीकी शिक्षा के बढ़ते प्रभाव का ही नतीजा है कि आज हमारी हस्तलिपि लोगों की आंखों को नहीं भाती। ऐसा नहीं कि हस्तलिपि का क्षरण सिर्फ भारत में ही हो रहा है। इस मामले में अन्य देशों की  स्थिति भी ताली पीटने लायक नहीं है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय को ही लें, छात्र-छात्राओं के खराब हस्तलेखन को देखते हुए वह अपनी आठ सौ वर्ष पुरानी लिखित परीक्षा की परम्परा समाप्त करने पर विचार कर रहा है। विद्यार्थियों की खराब हस्तलिपि को देखते हुए दुनिया के अन्य विश्वविद्यालय भी अब लैपटॉप या आईपैड पर परीक्षा के पक्ष में हैं। हस्तलेखन के प्रति लगातार बढ़ती अरुचि हमारे अपने देश के लिए भी चिन्तनीय विषय है। पहले छात्र एक दिन में नियमित रूप से कुछ घण्टे हाथ से लिखते थे, लेकिन अब परीक्षा के अलावा हाथ से लिखना युवा पीढ़ी समय की बर्बादी मानती है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की ही तरह अन्य देशों के विश्वविद्यालय भी यदि हस्तलेखन की बजाय लैपटॉप या कम्प्यूटर के उपयोग को विकल्प के रूप में स्वीकृति प्रदान करते हैं तो निश्चित रूप से हाथ से लिखने की परम्परा पर यह करारा प्रहार होगा।
बेशक इक्कीसवीं सदी में संचार माध्यमों ने लोगों के जीवन में गहरी पैठ बना ली हो लेकिन हाथ से लिखने की कला और इस परम्परा की बात ही अलग है। विद्यार्थी को हाथ से लिखने के लिए प्रेरित करने की बजाय लैपटॉप या कम्प्यूटर के उपयोग की स्वीकृति दे देना सही नहीं है। हस्तलिपि हमें संवेदना के धरातल से जोड़ती और मन में अद्भुत भावों का संचार करती है। ऐसे में हस्तलेखन को हतोत्साहित करना ठीक नहीं है। मुझे बचपन के दिन याद आते हैं जब विद्यालय में प्रतिदिन एक कालखण्ड सुलेख लेखन का हुआ करता था। सुलेख प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। सुन्दर, साफ़-सुथरी हस्तलिपि वाले विद्यार्थियों को कक्षा में विशेष महत्व दिया जाता था लेकिन आज के छात्रों में भाषा के शुद्ध लेखन और वाचन के प्रति जरा भी अनुराग नहीं है। भाषा का ज्ञानार्जन युवाओं की प्राथमिकता में नहीं है। आज की युवा पीढ़ी शरीर ही नहीं दिमा का भी कम से कम उपयोग करना चाहती है। हरेक जानकारी के लिए वह इण्टरनेट पर निर्भर है। पुस्तकालयों तक जाने, सन्दर्भ ग्रन्थों को खंगालने या पृष्ठ पलटने में उसकी दिलचस्पी शून्य हो चली है।

सोचने की बात है कि विद्यार्थी जीवन में ही कुछ घण्टों तक नियमित रूप से लिखने-पढ़ने की बाध्यता होती है। अगर विद्यार्थी ऐसा नहीं करते तो उन्हें समझाया जा सकता है। हस्तलिपि भी सबकी खराब नहीं होती इसलिए कुछेक विद्यार्थियों के चलते शताब्दियों से चली आ रही परम्परा को तिलांजलि देने का निर्णय बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। इन दिनों भारत को डिजिटल इण्डिया बनाने का राग अलापा जा रहा है। मोबाइल फोन का उपयोग कितना घातक है, यह जानने के बावजूद सरकारें विद्यार्थियों को मुफ्त में फोन बाँट रही हैं। मेधावी के नाम पर कुछ को मुफ्त में लैपटॉप भी बाँटे जा रहे हैं। इससे छात्र-छात्राएं आलसी हो रहे हैं। वे कोई सूचना, जानकारी, समयसारिणी, पाठ्यक्रम आदि नोटबुक में कलम से नहीं लिखना चाहते। मोबाइल फोन से फोटो खींचकर सब कुछ सुरिक्षत रख लेना पसन्द करते हैं। सरकारी उदारता से तो लिखने की कला ही उपेक्षित होगी, जोकि कतई उचित नहीं है। ज्ञान किसी भी क्षेत्र का हो, पढ़ने के साथ-साथ उसका लिखा जाना भी आवश्यक है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

उचित नहीं पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण

भारत विविधता में एकता वाला देश है यहाँ पर विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी भाषाएं, रहन-सहन, वेशभूषा, रीति-रिवाज एवं साहित्य हैं। सबकी अपनी-अपनी संस्कृति है। सभी की संस्कृति उनकी पहचान बनाए हुए है। सच तो यह है कि संस्कृति के प्रकाश में ही भारत अपने  वैयक्तिक एवं वैश्विक जीवन  मूल्यों की रक्षा कर सकता है। किसी भी देश का अपना इतिहास होता है, परम्परा होती है। यदि देश को अपना शरीर मानें तो संस्कृति उसकी आत्मा है। किसी भी संस्कृति में आदर्श होते हैं, मूल्य होते हैं और विविध परम्पराएं भी समाहित रहती हैं। इन मूल्यों की संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह बात अलग है कि हमारे जीवन में पाश्चात्य संस्कृति के प्रवेश से बहुत कुछ बदल सा गया है। हम धीरे-धीरे ही सही अपनी अच्छी परम्पराओं से भी विमुख हो रहे हैं। सवाल यह उठता है कि पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कितना उचित है।
हिन्दू धर्म में प्राकृतिक जीवन तथा समाज में प्राणीमात्र के कल्याण पर विशेष बल दिया जाता है किन्तु इन भावात्मिक शब्दों को क्रियात्मिक रूप देना हर किसी की योग्यता के बस की बात नहीं। भावनाओं को साकार करने का कार्य रीति-रिवाज करते हैं। रीति-रिवाजों का अस्तित्व भोजन में मसालों की तरह है, जिनके बिना जीवन ही नीरस हो जाएगा। किसी भी क्रिया को निर्धारित प्रणाली से करना ही रीति-रिवाज है ताकि सभी को क्रिया के आरम्भ होने तथा समाप्त होने का प्रत्यक्ष आभास हो जाये। जब राति-रिवाज क्रिया का यथार्थ लक्ष्य छोड़कर केवल दिखावा बन जाते हैं या समय और साधनों की सामर्थ्य से बाहर निकल जाते हैं तो वह बेकार का बोझ बन जाते हैं। विश्व में कहीं भी कोई मानव समाज ऐसा नहीं है जहां लोगों ने सारे रीति-रिवाज छोड़कर केवल भावनात्मक क्रियाओं के सहारे जीवन व्यतीत किया हो। प्रथा तथा रीति-रिवाज समय और समाज की जरूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। पहले साधक प्रातः ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय, दोपहर तथा सूर्यास्त के समय लगभग अनिवार्य तौर से ध्यान लगाकर किसी न किसी मंत्र का जाप करते थे या मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते थे लेकिन समय के अभाव के कारण आजकल यह प्रथायें या तो लुप्त हो चुकी हैं या संशोधित रूप में की जा रही हैं।
किसी भी प्रथा या रीति-रिवाज को जब मन और श्रद्धा से किया जाये तो वह अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने में सहायक है। साधक आसानी से अपने को मन वांछित दिशा में केन्द्रित कर सकता है तथा दैनिक गतिविधियों से अपने आपको अलग करके ईश्वरीय शक्ति का आभास महसूस कर सकता है।यह मनोवैज्ञानिक क्रिया है। रीति-रिवाजों का प्रावधान सभी मानव समाज तथा धर्मों में किसी न किसी रूप में है। थोड़ी बहुत अन्तर स्थानीय भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारणों से है। हिन्दू रीति-रिवाज सरल, आसान तथा परिवर्तनशील हैं। उन्हें समय तथा आवश्यक्तानुसार बदला जा सकता है। समाजहित में रीजि-रिवाजों को बदलने की क्रिया सर्वसम्मति से होनी चाहिए व्यक्तिगत सुविधा के लिये नहीं। हमें क्या चुनना है, हमारे लिए क्या हितकारी है, यह हमारे विवेक निर्भर करता है। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण और उससे हो रहा सामाजिक बदलाव हमारी संस्कृति और सभ्यता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हम बिना सोचे-समझे जिस तरह पश्चिमी सभ्यता की धड़ल्ले से नकल कर रहे हैं, उसके दूरगामी परिणाम चिन्ताजनक हो सकते हैं। बात खानपान की हो, पहनावे की या फिर हमारे विचारों में आए बदलाव की, आज जो तस्वीर देखने को मिल रही है, उसे सही नहीं कहा जा सकता। पाश्चात्य संस्कृति का यह अंधानुकरण ही है कि आज हमारी अच्छी परम्पराएं भी विस्मृत हो रही हैं। अब चिट्ठी-पत्री, सावन के गीत-मल्हार ही नहीं सुबह का हमारा खान-पान भी बदल गया है। सुबह के खानपान में जहां पहले दूध-दही, चूड़ा चबेना होता था उसकी जगह चाय और फूड-फास्ट ने ले ली है। ब्रेड बटर, पिज्जा, बर्गर, सैंडविच ये हमें नाश्ते में खूब भाने लगे हैं। बदलाव समय के साथ होना स्वाभाविक है लेकिन हमें यह भी ध्यान देना होगा कि जो चीजें हम नाश्ते में ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं भी या नहीं। इसमें कितनी पौष्टिकता है। कहीं हम अंधानुकरण के बहाने अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे।
चिठ्ठी-पत्री की बात करें तो आज की युवा पीढ़ी शायद ही इससे इत्फाक रखती हो। सच कहें तो उनके लिए अपने परिजनों से पत्र-व्यवहार करना किसी चुनौती से कम नहीं है। पहले हम भरी दोपहरी में भी डाकबाबू का इंतजार बेसब्री से करते थे। डाकबाबू क्या बरसात, क्या गर्मी और क्या शीतलहर हर मौसम में संदेशवाहक बन कहीं खुशी और कहीं गम की खबर लिए पहुंच जाते थे। हम एक-दूसरे से पूछते थे कि क्या आज डाकिया दिखा है। उस दौर में हमें अपनों के संदेशों का बेहद इंतजार रहता था। अब समय के साथ सब कुछ बदल गया है। मोबाइल, ईमेल और नेटवर्किंग के आ जाने से चिठ्ठी के दिन लद गए। पत्रों में अपनों की भावनाएं समाहित रहती थीं। पत्र गिले-शिकवों के बावजूद मान-मनौवल का सशक्त माध्यम थे। व्यक्ति बेशकीमती चीज की तरह उन्हें सहेज कर रखता था। पत्र पुराने होने पर भी उनकी अहमियत बरकरार रहती थी। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, दोस्त-मित्र, पिता-पुत्र सभी एक-दूसरे का कुशलक्षेम पत्र व्यवहार से ही जानते-समझते थे। जो साक्षर नहीं होते थे उन्हें भी अपने परिजनों की चिट्ठी का इंतजार रहता थी। वे भी दूसरों से पत्र लिखवाते और पत्र आने पर किसी और से पढ़वाते थे।
अगर हम गीत-मल्हार, कजरी, चैता की बात करें तो यह भी धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। ऋतुओं के अनुसार गीत गाया जाना हमारी सुखद परम्परा में समाहित था। इसी बहाने ही सही हमारा एक-दूसरे से मिलना-जुलना होता था। इससे आपस में प्रेम और अपनत्व बना रहता था। लोग लोककला के सौंदर्य को जीते थे। अब मानों सब कुछ विलुप्त होने की स्थिति में है। सावन आते ही जगह-जगह नीम, बदगद के पेड़ों पर झूले पड़ जाया करते थे। सखी-सहेलियां झुंड का झुंड हँसी-ठिठोली करते कजरी गीत गाते रिमझिम बारिश की फुहारों के बीच झूला झूलते-झुलाते पेंग मारते दिख जाया करती थीं और यह सिलसिला पूरे सावन भर चलता था। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी चादर से आच्छादित होती है, हर तरफ हरियाली ही हरियाली दिखती है तब मन अपने आप तरंगित होने लगता है। सावन में हरी चूड़ियां और हरे रंग के परिधानों को पहनने का चलन भी अब बीते दिनों की बात हो गई है। अब पारम्परिक तीज-त्योहार भी पहले की तरह नहीं मनाये जाते। अब उनकी जगह मदर्स डे, फादर्स डे, वेलेंटाइन डे आदि ने ले ली है।
तीज-त्योहारों के बहाने ही सही पहले हम एक-दूसरे का कुशलक्षेम जानने के लिए उनके घर जाते थे या अपने घर बुलाते थे। अब आने-जाने की तकल्लुफ करने की बजाय हम फोन से ही सम्बन्धों की प्रगाढ़ता की दुहाई देने में अपनी शान समझने लगे हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि मोबाइल पर बात करना और आमने-सामने बैठकर बात करने में कितना फर्क है। जहाँ हम आमने-सामने होते हैं वहाँ रिश्तों में कुछ भी छुपा-छुपाई नहीं होती। हमारी भावनाएं स्वाभाविक तौर पर प्रगट हो जाती हैं। हम खुशी-गम दोनों का इजहार खुलकर कर लेते हैं। उससे रिश्तों में ताजगी आ जाती है और हम उसमें गर्मजोशी का अनुभव करते हैं। जब हम किसी से हाथ मिलाते हैं, किसी को गले लगाते हैं या माथा चूमते हैं, पीठ थपथपाते हैं या चरण स्पर्श करते हैं तो उसमें अपनत्व का बोध होता है। हम फोन से हालचाल तो जान सकते हैं लेकिन अपनत्व का अहसास नहीं कर सकते। आज हर कोई काम और समय का रोना रोता है लेकिन समय तब भी 24 घंटे का था और आज भी 24 घंटे का है। यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि आखिर हम क्या चाहते हैं और कैसा चाहते हैं। रहन-सहन, खानपान, जीने का सलीका सब कुछ हमारा है। हां यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हमें पसंद क्या है। बेहतर होगा कि हम अपनी संस्कृति और रीति रिवाजों को जिएं जिनमें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना समाहित है।

डा. रीभा तिवारी
सम्पर्क-
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जिला- रोहतास (बिहार)
पिन कोड नम्बर- 821115
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सोमवार, 29 मई 2017

पर्यावरण पर महत्वाकांक्षा की कालिख

डा. रीभा तिवारी
आज हमारा देश विकास की राह पर अग्रसर है। समाज के हर वर्ग का जीवन समृद्ध हो रहा है। स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं तो भौतिक सुविधाएं अपनी श्रेष्ठता के चरम पर आरूढ़ मानव मन को चुनौती दे रही हैं। सुख की खोज में हमारी खुशी तो चैन की तलाश में मुस्कराहट कहीं खो गई है। हम समझ ही नहीं पा रहे कि पर्यावरण की विनाश-लीला को कैसे और किस तरह रोकें। अल-सुबह हम पार्कों में ठहाके तो लगा रहे हैं लेकिन दिल से निकलने वाली वो हँसी जो आँखों से झाँककर होठों से निकलती थी अब सुनाई नहीं देती। उसने शायद अपना रास्ता बदल लिया है। आज हंसी दिमाग के आदेश से मुख से निकलती है और चेहरे की मांसपेशियों पर भी दिखाई देती है लेकिन हमें महसूस नहीं होती। ऐसा क्यों हो रहा है। इस यक्ष प्रश्न का समाधान आज सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया का हर मुल्क खोज रहा है लेकिन सफलता से हम कोसों दूर हैं।
आज जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ रही है, इंसान का जीवन-यापन कठिन होता जा रहा है। शरीर को नित नई व्याधियां अपने आगोश में ले रही हैं। अतीत में जब सुबह से शाम तक हम प्रत्येक काम अपने हाथों से करते थे तब वातावरण कुछ और था. आज कुछ और है। पर्यावरण यानि हमारे आस-पास का आवरण आज इस तरह से दूषित हो चुका है कि हम सुकून की सांस भी नहीं ले पा रहे। प्रकृति और मनुष्य का सम्बन्ध पुराना है। पर्यावरण और जीवन की अभिन्नता से सभी परिचित भी हैं। पर्यावरण की स्वच्छता, निर्मलता और संतुलन से ही मानव मात्र को बचाया जा सकता है, यह जानते हुए भी हम बेखबर हैं। प्राचीन साहित्य में कवियों की कविताएं प्रकृति से भरी पड़ी हैं। तुलसीदासजी की यह पंक्ति निरक्षरों तक को याद है-
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे,
खल के वचन संत सहे जैसे।
प्राचीनकाल से ही जीव पंचभूतों (जल, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि) से परिचित है। इस एक में से किसी का भी क्षरण मानव के लिए लाभदायी नहीं कहा जा सकता। हम स्वार्थ के वशीभूत होकर इन पंच तत्वों से लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं। आज हम भौतिक सुख-सम्पदा में बेशक बहुत आगे बढ़ रहे हों लेकिन प्रदूषित वातावरण से हमारी शारीरिक सम्पदा निरंतर चिन्ता का सबब बनती जा रही है। जब तक हम किसी वस्तु, आविष्कार और खोज के गुण-दोष को नहीं टटोलेंगे तब तक हमारा आगे बढ़ना, पीछे हटने के ही बराबर है। विकास के पथ पर मानव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, सीख की बहुत-सी बातें पीछे छोड़ता जा रहा है। पर्यावरण को कैसे बचाया जाए, यह समस्या आज सबसे ज्वलंत है। पृथ्वी का अस्तित्व बचाने के लिए हमें सबसे पहले जल-प्रदूषण को रोकना होगा। पर्यावरण के लाभ और उसके महत्व को ध्यान में रखते हुए वनों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। जल, जंगल और जमीन हमारी राष्ट्रीय सम्पदा का मूल स्रोत हैं। जंगल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनसे हमें इमारती लकड़ी, आयुर्वेदिक औषधियां, पशुओं के लिए चारा, भूमि कटाव पर रोक, शुद्ध व ताजी हवा नसीब होती है। हमें एकजुट होकर न केवल पर्यावरण संरक्षण की पहल करनी होगी बल्कि पर्यावरण की समृद्धि में वृहद रूप से पौध-रोपण करना भी अनिवार्य है। आधुनिक जीवनशैली के परिणामस्वरूप आज हमारा भोजन और हमारा जीवन दोनों एक समान हो गए हैं। हम जीवन जीने के लिए नहीं बल्कि सुख-सुविधाएँ और स्टेटस हासिल करने को जी रहे हैं।
आज के समय में शुद्ध जल की समस्या सबसे जटिल समस्याओं में से एक है लेकिन हम इस दिशा में कुछ करने की बजाय लगातार पानी बर्बाद कर रहे हैं। पिछले बीस साल में भारत में बोतलबन्द पानी के व्यापार में जो तेजी और तरक्की आई है, वह आश्चर्यजनक है। हम इस बात से अनजान हैं कि एक बोतल पानी जो हम खरीद कर पीते हैं उसके एवज में कम्पनियां पांच लीटर पानी का अपव्यय कर देती हैं। दुनिया भर में साल 2014 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया तो हमारे देश में ऐसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया। यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से लेकर केरल के गांव वाले इन बोतलबन्द कम्पनियों और कोकाकोला कम्पनियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। भारत में कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा का इस्तेमाल होता है। घरेलू इस्तेमाल में पानी का सिर्फ पांच  फीसदी ही खर्च होता है। इसके अलावा भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700 लीटर पानी खर्च होता है यानी यदि हमारे परिवार में एक दिन में एक किलो गेहूं की खपत होती है तो हम उसके साथ करीब 1700 लीटर पानी की भी खपत करते हैं।
देखा जाए तो हम जीवन का उद्देश्य ही भूल गए हैं। इस मशीनी युग में हम भी मशीनी होते जा रहे हैं। आधुनिक राजनीति विज्ञान की अवधारणा है कि समाज में जैसे-जैसे समृद्धि और सम्पन्नता आती है वह खुशहाल होता जाता है। आज हम अपार सम्पदा को अपनी खुशी मान बैठे हैं। हम सुख और खुश होने का अन्तर भूल रहे हैं। सुख पैसे से खरीदा जा सकता है पर खुशी नहीं। इसी प्रकार हम सम्पत्ति और पैसे के बीच के अन्तर को भी नहीं समझ पा रहे। दरअसल हमारा परिवार, हमारे दोस्त, हमारे बच्चे, हमारा अच्छा स्वास्थ्य, हमारा जीवन ही हमारी सम्पत्ति है जिसे हम धन से नहीं खरीद सकते। एक व्यक्ति हवाई जहाज में बैठकर दुखी हो सकता है जबकि दूसरी तरफ एक व्यक्ति खेतों के बीच पगडंडी पर ताजी हवा के झोंकों के बीच साइकिल चलाता हुआ भी खुश हो सकता है। जो खुशी बचपन में तितलियों के पीछे भागने में मिलती थी वह क्या आज पैसे के पीछे भागने में मिल रही है। सच कहें यदि हमारा मन खुश नहीं होगा तो खुशी के सारे संसाधन व्यर्थ हैं। खुशी का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है, वह एक भाव है जो दिखाई नहीं देता। हमारी संस्कृति ने हमें शुरू से ही यह सिखाया है कि खुशी त्याग में है, सेवा में है, प्रेम में है, मित्रता में है, लेने में नहीं बल्कि देने में है। आज इंसान आधुनिकता और उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है। वह पर्यावरण का लगातार दोहन कर रहा है।
पिछले कई वर्षों से पर्यावरण को लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर बहस चल रही है। पर्यावरण संरक्षण के उपायों और क्रियान्वयन को लेकर प्रतिवर्ष पर्यावरण सम्मलेन आयोजित किये जाते हैं लेकिन इन सम्मेलनों में भी वैश्विक स्तर पर कोई व्यापक सहमति नहीं बन पाई है जिससे कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई पहल की जा सके। पर्यावरण संरक्षण, ओजोन परत की चिन्ता अभी तक केवल बहस का ही विषय रहे हैं, इनका हल निकालने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर यदि भारत की बात की जाये तो हमने भी इस मसले को लेकर कोई खास संजीदगी नहीं दिखाई है। भारत में पर्यावरण की स्थिति चिन्ताजनक है। साथ ही सरकार के लचर रवैये ने इस चिन्ता को और बढ़ाया है। पर्यावरण और जीवन का अनोखा सम्बन्ध है। दुर्भाग्य से कुछ लोगों का यह मानना है कि केवल सरकार और सामान्य तौर पर बड़ी कम्पनियों को ही पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुछ करना चाहिए, यह सही नहीं है। दरअसल पर्यावरण संरक्षण हम सभी का दायित्व है।
हमारा पर्यावरण पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन का अस्तित्व बनाये रखने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिक युग में हमारा पर्यावरण मानव निर्मित तकनीकी उन्नति के कारण दिन-ब-दिन बदतर होता जा रहा है। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या बन गयी है जिसका हम आज सामना कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, भावनात्मक और बौद्धिक स्तर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण कई रोगों का जनक है जिससे इंसान पूरी जिन्दगी पीड़ित हो सकता है। यह किसी समुदाय या शहर की समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है जो किसी एक के प्रयास से खत्म नहीं हो सकती। अगर इसका ठीक से निवारण नहीं हुआ तो एक दिन जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। वायु और जल प्रदूषण विभिन्न बीमारियों और विकारों द्वारा हमारे स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। आजकल हम किसी भी चीज को सेहतमंद नहीं कह सकते क्योंकि जो हम खाते हैं वह पहले से ही कृत्रिम उर्वरकों के दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चुका है और हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को कमजोर कर रहा है। यही कारण है कि हम में से कोई भी स्वस्थ और खुश रहने के बावजूद कभी भी रोगग्रस्त हो सकता है। हमें पर्यावरण को स्वस्थ और प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए सबसे पहले अपने स्वार्थों और गलतियों को सुधारना होगा। यह विश्वास करना मुश्किल है लेकिन सच है कि हम सब अपने एक छोटे से सकारात्मक प्रयास से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।


शनिवार, 27 मई 2017

खिलाड़ी बेटियां भेदभाव का शिकार


डा. रीभा तिवारी
संतति सुख को सामाजिक और पारिवारिक जीवन में सबसे बड़ा सुख माना जाता है लेकिन हमारे देश के कई राज्यों में आज भी बेटी का पैदा होना निराशा का सबब बन जाता है। बेटियों को अभिशाप मानने वाले हमारे समाज की सोच बदल रही है लेकिन जिस गति से बदलना चाहिए वैसा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक गरीब परिवार में बेटी का पैदा होना कल भी अभिशाप था और आज भी है। कुछ बेटियां गर्भ में ही मार दी जाती हैं तो कुछ बेटियां दहेज के चलते जिन्दा जला दी जाती हैं। समय बदल रहा है, हर क्षेत्र में बेटियां अपनी कामयाबी का परचम फहरा रही हैं। खेल के क्षेत्र में तो बेटियां पुरुषों से कहीं आगे हैं। एशियन खेल हों या ओलम्पिक इनके आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय बेटियां ही लगातार देश के गौरव को बढ़ा रही हैं। यह सब उन परिस्थितियों में हो रहा है जब देश की बेटियां भेदभाव का शिकार हैं।
खेल नियम-कायदों द्वारा संचालित ऐसी गतिविधि है जो हमारे शरीर को फिट रखने में मदद करती है। आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में अक्सर हम खेल के महत्व को दरकिनार कर देते हैं। आज के समय में जितना पढ़ना-लिखना जरूरी है उतना ही खेलकूद भी जरूरी है। एक अच्छे जीवन के लिए जितना ज्ञानी होना जरूरी है, उतना ही स्वस्थ होना भी जरूरी है। फुटबाल, क्रिकेट, शतरंज, टेनिस, टेबल टेनिस, कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, हॉकी सहित लगभग सभी खेलों में बेटियों का दखल है। भारतीय बेटियां विश्व पटल मुल्क का नाम रोशन कर रही हैं बावजूद उनके साथ भेदभाव जारी है। देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को ही लें जो सुविधाएं और अवसर पुरुष खिलाड़ियों को नसीब हैं वे महिला क्रिकेटरों को नहीं मिल रहे। जबकि क्रिकेट का संचालन उस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हाथ में है जिसके बैनर तले महिला और पुरुष दोनों खेलते हैं।
जब देश आईपीएल के खुमार में डूबा था उसी समय भारत की क्रिकेटर बेटियों ने दक्षिण अफ्रीका में चार देशों की एक दिवसीय प्रतियोगिता में तीन कीर्तिमान सृजित किए। 34 वर्षीय तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी ने जहां एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक विकेटों का कीर्तिमान अपने नाम किया वहीं भारत की दीप्ति शर्मा ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए महिला एकदिवसीय क्रिकेट की दूसरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी खेली और इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। 19 वर्षीय दीप्ति ने आयरलैंड के खिलाफ 188 रन बनाए। यह अब तक किसी भी भारतीय महिला खिलाड़ी का सबसे बड़ा निजी स्कोर है। साथ ही महिला क्रिकेट में यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक की दूसरी सबसे बड़ी पारी है। महिला क्रिकेट में सबसे बड़ी पारी का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क के नाम दर्ज है जिन्होंने 1997 में डेनमार्क के खिलाफ मुम्बई में 229 रन बनाए थे। दीप्ति के व्यक्तिगत रिकॉर्ड के अलावा इस मैच में एक और बड़ा रिकॉर्ड दर्ज हुआ। दीप्ति और उनकी सलामी जोड़ीदार पूनम राउत ने 320 रन जोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पहले विकेट की सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड बनाया। महिला क्रिकेट में यह पहला मौका था जब किसी जोड़ी ने 300 का आंकड़ा छुआ या पार किया। पुरुष वनडे क्रिकेट में पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड उपुल थरंगा और सनथ जयसूर्या के नाम है। श्रीलंका की इस जोड़ी ने 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ 286 रन की साझेदारी की थी।
बीते साल रियो ओलम्पिक में जब भारतीय पुरुष खिलाड़ी एक अदद पदक के लिए जूझ रहे थे ऐसे समय में पहलवान साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक दिलाकर भारत की रीती झोली को आबाद किया। साक्षी के इस प्रदर्शन से शटलर पी.वी. सिन्धू का मनोबल बढ़ा और उसने चांदी का पदक जीतकर मायूस खेलप्रेमियों को पुलकित होने का अवसर प्रदान किया। इन दोनों बेटियों ने अपने शानदार प्रदर्शन से भारत के प्रत्येक माँ-बाप को यह सोचने को मजबूर कर दिया कि बेटियां भी समय आने पर देश का मान-सम्मान बचा सकती हैं। साक्षी मलिक ने साबित कर दिया कि भारत की बेटियां बैडमिंटन या टेनिस ही नहीं बल्कि कुश्ती जैसे खेल में भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। साक्षी ने जो कांस्य पदक जीता वह भी ऐतिहासिक था क्योंकि महिला कुश्ती में इससे पहले ओलम्पिक में किसी ने पदक नहीं जीता था।
ओलम्पिक में जगह बनाने वाली भारत की पहली महिला जिमनास्ट दीपा कर्माकर कांस्य पदक से महज मामूली अंक के अंतर से चूक गई लेकिन उसके प्रदर्शन ने देशवासियों का दिल जीत लिया। उड़नपरी पीटी ऊषा के बाद ललिता बाबर ओलम्पिक इतिहास में 1984 के बाद 32 साल बाद ट्रैक स्पर्धा के फाइनल के लिये क्वालीफाई होने वाली दूसरी भारतीय महिला बनीं। ललिता बाबर ने अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से 3000 मीटर स्टीपलचेज में 10वां स्थान हासिल किया। पांच बार की विश्व चैम्पियन मुक्केबाज एम.सी. मैरीकाम, विश्व एथलेटिक्स स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने वाली लांग जम्पर अंजू बाबी जार्ज, ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की पहली भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी, पैरालम्पिक में रजत पदक जीतने वाली एथलीट दीपा मलिक, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, निशानेबाज हिना सिद्धू आदि ने कई मर्तबा देश के सम्मान को चार चांद लगाए हैं लेकिन जब यही महिला खिलाड़ी अपने साथ होते भेदभाव का जिक्र करती हैं तो उसे अनसुना कर दिया जाता है।
देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है बल्कि प्रतिभाओं को खोजने वाले संसाधनों की कमी है। भारत के जितने भी खेल संघ हैं, वे राजनीति छोड़कर अगर अपने-अपने क्षेत्र के खिलाड़ियों पर ध्यान दें तो भारतीय युवा खिलाड़ी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। जरूरत है सभी के सहयोग की। क्रिकेट के अलावा भारत में अन्य खेलों में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था नहीं मिलती और न ही देश और प्रदेश की सरकारें देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी और विभिन्न खेलों पर ध्यान देती हैं। इसलिए देश के होनहारों का क्रिकेट के अलावा सारे खेलों से मोहभंग होता जा रहा है। जरूरत है क्रिकेट के साथ-साथ सभी खेलों को प्रोत्साहन मिले और ऐसे कार्यक्रम बनें जिनसे सभी भावी खिलाड़ियों का रुझान क्रिकेट के साथ-साथ बाकी सभी खेलों की तरफ भी बढ़े। आज क्रिकेट की दुनिया में भारतीय टीम विश्व की नम्बर वन टीमों में गिनी जाती है। भारत में क्रिकेट जितना बढ़ रही है अन्य खेल पिछड़ रहे हैं।
देखा जाए तो क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों की तरफ खेलप्रेमियों का रुझान ही नहीं है। मैदान में पसीना बहाते खिलाड़ियों को यदि प्रोत्साहन ही नहीं मिलेगा तो वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे कर पाएगा। आज जरूरत है समाज की सोच और नजरिया बदलने की। भारत में लैंगिक आधार पर खेलों में भेदभाव हो रहा है। कभी बेटियों पर प्रशिक्षक कुदृष्टि डालते हैं तो कभी अन्य खेलनहार उनके अरमानों पर पानी फेरने से बाज नहीं आते। खेलों से संन्यास के बाद कई महिला खिलाड़ियों ने पुस्तकें लिखी हैं जिनमें कई चौंकाने वाले आरोप लगे हैं, जो बेटियां देश की अस्मिता को लगातार चार चांद लगा रही हैं आखिर उनके साथ भेदभाव कितना उचित है। 




मंगलवार, 31 जनवरी 2017

हर मन को भाये ऋतुराज वसंत

वसंत पंचमी पर विशेष
-डा. रीभा तिवारी
सरस्वती पूजा ने अन्य पर्वों के भांति अपना विशिष्ट रूप धारण कर लिया है। हमारे देश के एक बड़े भूभाग में सरस्वती पूजा एक पखवाड़े तक मनाया जाता है। यहीं से भारतीयों का कंठ खुलता है, जो दो महीने तक कोयल के पंचम स्वर में मिलकर होली धम्मार गाते रहते हैं। यदि वसंत पंचमी नहीं आई तो वसंत कहां से आ सकता है। सारा ऐश्वर्य तो उस पंचमी का ही है। वसंत के सौंदर्य को कोई कैसे नहीं गाएगा और किसने नहीं गाया। गा-बजाकर आगमन की सूचना देने की दिव्यकला तो देवी के ही प्रसाद से सम्भव है। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। सरस्वती जी वीणा संगीत की, पुस्तक विचार की और मयूर वाहन नृत्य कला की अभिव्यक्ति नहीं तो क्या हैं। आम भाषा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। पशु को मनुष्य बनाने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है। मान्यता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने के बाद मनुष्य की रचना की। मनुष्य की रचना के बाद उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य की रचना-मात्र से सृष्टि की गति को संचालित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अनुभव किया कि निःशब्द सृष्टि का औचित्य कुछ नहीं हो सकता क्योंकि शब्दहीनता के कारण विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था। अभिव्यक्ति के माध्यम के नहीं होने से ज्ञान का प्रसार नहीं हो पा रहा था। इसके बाद उन्होंने विष्णु की अनुमति लेकर एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना की जिसके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वर मुद्रा तथा अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी।
सरस्वती को अगर स-रसवती कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। वह रस से युक्त हैं। ज्ञान भी रस पेशल है। उसका भी जल के समान कोई रूप-आकार नहीं। जल की सारी विशेषताओं को वह सम्पूर्णता में धारण करती हैं। जैसे जल सतत प्रवाहित होने वाला है। जल पात्रानुसार अपना रूप धारण करता है। जल रस रूप है। जल जीवन समरूप है। तृष्णा की शांति जल से ही सम्भव है। जल रस रूप में ही अवतीर्ण है अतः सबको रसावृत भी करता है। जल का स्वभाव शीतलता प्रदान करना है। वह ताप प्रदान करने पर गर्म भी होता है, फिर भी स्वभाव से शीतल होने के कारण आग को बुझाने वाला वही होता है। उसके बिना संसार का जीवन कठिन है। पृथ्वी पर जल की मात्रा सर्वाधिक है। ठीक इसी प्रकार हम इन सारी विशेषताओं को ज्ञान में अन्तर्विष्ट पाते हैं। यह ज्ञान भी जल की भांति एक से दूसरे व्यक्ति में सतत प्रवाहित होने वाला है। इसलिए जल की भांति यह भी सनातनता को प्राप्त किए हुए है।
यह ज्ञान भी पात्रता के अनुसार प्राप्त होता है जैसे समुद्र के पास जाने वाला यदि एक लोटा लेकर जल की इच्छा करता है तो वह वहां से उससे अधिक प्राप्त नहीं कर सकता यद्यपि वहां जल का महार्णव लहरा रहा है। इसी प्रकार विद्या के महार्णव से भी बिना पात्रता के अधिक ज्ञानार्जन नहीं किया जा सकता। शास्त्रों में इसलिए विद्या के साथ विनय और पात्रता के प्रथम सम्बन्ध की संहिति स्वीकार की गई है। फिर कल्पलता की भाँति विनय और पात्रता को धारण कर वह विद्या, धन, धर्म और अंत में सर्वसुख को प्रदान करने वाली सिद्ध होती है। जैसे जल निर्मल है, शांत है, उज्ज्वल है उसी प्रकार ज्ञान भी प्रत्यक्ष होते हुए भी प्रच्छन्न है। उसे देखा नहीं जा सकता बल्कि अनुभव किया जा सकता है। उससे शीतल हुआ जा सकता है। वाणी का मोल भी यही है।
ऐसी बानी बोलिये मन का आप खोय,
औरन को शीतल करै आपहुं शीतल होय।
ज्ञान का क्षेत्र असीम है। सभी चेतन इस ज्ञान या विवेक के ही पीछे हैं। ज्ञान से पवित्र वस्तु की कल्पना इस जगत में नहीं की जा सकती। नहिं ज्ञानेन सदृशं पवित्रं महिविध्यते। अतः ज्ञान की एकमात्र अधिष्ठात्री देवी के रूप में सरस्वती को अंकित किया जाना उसके लक्षित रूप को ही प्रत्यक्ष करना है। सरस्वती का जन्मकाल वसंत पंचमी के अवसर को माना जाता है। इस वसंत को भगवान ने अपने ऐश्वर्य से मंडित किया है। ऋतुओं में मैं वसंत हूं, कुसुमाकर हूं। समस्त धरा अपनी निहित श्री को इसी काल में प्रत्यक्ष और प्रगट करती है। जल, थल, नभ तीनों पर इसका समान प्रभाव होता है। दरअसल ऋतुओं का यह परिवर्तन सूर्य से सम्बन्ध रखता है। सूर्य से प्राप्त अग्नि की ऊष्णता जब ठीक से पृथ्वी पर आने लगती है तभी वसंत है। वसंत शब्द की उत्पत्ति में यह अर्थ छिपा हुआ है। वसंतो अत्र अग्नयः अर्थात् अग्नि का समस्त पृथ्वी पर विकास हो जाना ही वसंत है।
सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश के साथ ही रतिकाम महोत्सव आरम्भ हो जाता है। यही वह अवधि है जिसमें पेड़-पौधे तक अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से आच्छादित दिखाई देते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध और भौंरों की गूँज से भरा होता है। मधुमक्खियों की टोली पराग से शहद लेती दिखाई देती है, इसलिए इस माह को मधुमास भी कहा जाता है। प्रकृति काममय हो जाती है। वसंत के इस मौसम पर ग्रहों में सर्वाधिक विद्वान शुक्र का प्रभाव रहता है। शुक्र भी काम और सौंदर्य का कारक है। इसलिए रति-काम महोत्सव की यह अवधि कामोद्दीपक होती है। वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रगट होते हैं। पंचतत्व जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। धरती मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे बिहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढ़ते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। धनी जहां प्रकृति के नव सौंदर्य के फूलों को देखने की लालसा प्रकट करने में लगते हैं वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है उसका। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है तब वसंत उसका सौंदर्य लौटा देता है। नवजात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है। वसंत का आरम्भ वसंत पंचमी से होता है। इसी दिन श्री अर्थात विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है। वाग्यदेवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। सरस्वती जी विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। यह हमारी बुद्धि प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। जिसके पास विद्या है उसी के पास बल है। अन्ततः श्री भी विद्यारत्नं महाधनम् किं-किं न साधयति कल्पलतेव विद्या। कहा भी गया है कि विद्याविहीन व्यक्ति पशु के समान है। आज के युग में जो राष्ट्र ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आकाश चूम रहे हैं वह सत्यतः सरस्वती के आराधक हैं। संसार में सर्वत्र वीणापाणि की उपासना हो रही है। विश्व की सभी भाषाओं में वर्ण, पद, वाक्य तथा काव्य उनकी यशोगाथा के ही विविध रूप हैं। लिपियां उनके स्वरूप की काल्पनिक रेखाएं हैं, हस्तलिखित सचमुच अपनी सारी शक्तियों के रूप में अन्तः बाह्य प्रदेश में सर्वत्र विराजमान हैं। देवताओं में ब्रह्मा, शिव, सूर्य तक सरस्वती के उपासक हैं।

सरस्वती को इस रूप में आज पहचानने की आवश्यकता है। महाकवि निराला ने पूरे भारत की कल्पना भारती के रूप में की है। भारती वंदना तथा देवी सरस्वती नामक दोनों कविताओं में इतिहास, भूगोल से लेकर सम्पूर्ण सांस्कृतिक चेतना को कवि ने रूपायित करने का सदुद्यम किया है। इसमें भारत की वैदिक विराट कल्पना के आधार पर ही सरस्वती का रूप अंकित किया गया है। महासरस्वती देवी की कृपा से ही संस्कृत के महान नाटककार कालिदास कवि एवं कालजयी कृतिकार स्वरूप प्रमाणित हुए। वाणी के वरद पुत्र हिन्दी के महान कवि तुलसीदास ने अपने मानस के आरम्भ में इसीलिए प्रथम प्रणाम निवेदित करते हुए लिखा है- वन्दे वाणी विनायकौ।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

आध्यात्मिक जिज्ञासा का दिन मकर संक्रान्ति

भारत तीज-त्योहारों का देश है। यहां हर महीने कोई न कोई तीज-त्योहार जनमानस को तरंगित-उमंगित करता रहता है। मकर संक्रान्ति को ही लें यह त्योहार पूरे भारत में मनाया जाता है। भले ही अलग-अलग प्रांतों में इसके नाम अलग हों और इसकी मान्यताएं अलग हों लेक‌िन कुछ चीजें इस त्‍योहार से ऐसे जुड़ी हैं ज‌िन्हें पूरा देश मानता है और वह है मकर संक्रान्ति के द‌िन प्रातः स्नान, दान और त‌िल का सेवन। इस द‌िन लोग नए चावल से बनी ख‌िचड़ी और त‌िल से बनी चीजें जरूर खाते हैं। मकर संक्रान्ति का अर्थ है माघ मास की संक्रान्ति जिस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। मकर राशि बारह राशियों में दसवें स्थान पर होती है। यह पर्व कभी पौष तो कभी माघ मास में पड़ता है। जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी की गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांति चक्र कहलाता है। इस परिधि को बारह भागों में बांटकर बारह राशियां बनी हैं। यह बारह नक्षत्रों के अनुरूप हैं। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रान्ति कहलाता है। पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रान्ति कहते हैं। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन कहलाता है। उत्तरायण में दिन बड़े और रातें छोटी तथा दक्षिणायन में इसके ठीक विपरीत रात बड़ी और दिन छोटा होता है।
शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और दक्षिणायन देवताओं की रात्रि। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप-तप अनुष्ठानों का अत्यन्त महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुणा होकर प्राप्त होता है। इतना ही नहीं यह काल भगवान के भजन, पूजन, स्मरण और चिंतन के लिए महत्वपूर्ण है। रामचरित मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि पर होता है अर्थात जब मकर संक्रान्ति होती है तब प्रयागराज में देवता, दैत्य और मनुष्य झुंड के झुंड आकर त्रिवेणी में स्नान करते हैं।
माघ मकरगत रवि जा होई। तीरथ पतिहिं आव सा कोई॥
देव, दनुज, किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
यहाँ दो बातें विचारणीय हैं। पहली बात है रवि जा होई, माने पौष में हो या माघ में। इसलिए ग्रंथों में पौष को भी माघ में मिलाकर कहा गया है अर्थात पौष को माघ में जोड़कर कहा गया है। उत्तरायण से सूर्य का स्वागत सभी करते हैं। हर मास के स्वामी के नाम अलग हैं। माघ मास के स्वामी माधव भगवान हैं। अतः सभी उनकी पूजा किया करते हैं। यह पावन स्नान प्रातःकाल में पूर्ण होता है अतः इसे पुण्यदायक माना जाता है। चूँकि इसी पुण्यकाल में मुनियों का समाज जुटता था। तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। भारद्वाज जी का आश्रम मुनियों को अच्छा लगता था, संगम के पास था अतः मन को भाता था। वे प्रातःकाल वहाँ स्नान करते थे। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। और परस्पर भगवान की गाथा गाते और सुनते थे। कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा। इस ऋषि समाज की गोष्ठी में ब्रह्म का निरूपण, धर्म के विधान और तत्व के विभागों का वर्णन किया जाता था और ज्ञान-वैराग्य युक्त भगवान् की भक्ति के विषय में प्रबुद्धजनों की वार्ता होती थी। संक्षेप में याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद की रामायणकथा मकर संक्रान्ति को ही प्रारम्भ हुई थी। इस दृष्टि से मकर संक्रान्ति हमारी समस्त आध्यात्मिक जिज्ञासा को पुष्ट-तुष्ट करने का भी पावन पर्व है।
संक्रान्ति को हमारे देश ने एक सांस्कृतिक पर्व का महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह पर्व नववर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व एक और दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। वर्ष के विभिन्न ऋतुओं में जो पर्व काल निश्चित किए गए हैं उनका हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जनजीवन में जिस काल के प्रभाव से शारीरिक शक्ति और मानसिक उल्लास का संचार और प्रसार होता है वह स्वतः ही पर्व बन जाता है। हमारे कालपुरुष के छह अंग षड्ऋतुओं के रूप में हैं। शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त। उत्तरायण सूर्य के साथ शिशिर वसंत और ग्रीष्म से जुड़े हुए हैं। उत्तरायण में धरती और वनस्पतियों के रस का शोषण होता है। आदान कार्य के चलते ही सूर्य का नाम आदित्य है और विसर्ग कार्य के कारण चन्द्रमा का नाम सुधांशु है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति विसर्गकाल का अंत और आदान काल का प्रारंभ है। इसमें मनुष्य और वनस्पतियों का बल चरम सीमा पर होता है। अतः मकर राशि एक ऐसे संधि-स्थल पर है जब प्राणियों और वनस्पतियों की भौतिक शक्ति के आरोह-अवरोह क्रम का अंत और प्रारंभ होता है। इस दृष्टि से बल और शक्ति का विचार करते हुए मकर संक्रान्ति का अत्यधिक महत्व है।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल-दान का विशेष महत्व है। धर्मशास्त्र में षट् तिला पाप नाशिनी का वर्णन मिलता है। लोक में नया चूड़ा, गुड़, दही और तिल यह मकर संक्रान्ति का भोजन प्रसिद्ध है। नये चावल और उड़द की खिचड़ी खाने का भी रिवाज है। इन सब बातों का सीधा सम्बन्ध आयुर्वेद में कही गई बातों की ऋतु चर्चा से है। शीतऋतु में शीत वायु के स्पर्श से प्राणियों की अग्नि अंतर्मुखी हो जाती है और उस समय उसे मात्रा और स्वभाव से गुरुद्रव्यों की अपेक्षा होती है। शास्त्रकारों ने इस काल में स्निग्ध, अमल, लवण रसों से युक्त पदार्थ, गोरस, गुड़ आदि इक्षुविकार, तैल नया अन्न सेवन करने का विधान है। शीत निवारण के लिए तिल के तेल का महत्वपूर्ण विधान है। इसी से मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल उबटन, तिल हवन, तिल भोजन तथा तिलदान सभी कार्य पापनाशक हैं।
मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व हिमाचल, हरियाणा तथा पंजाब में यह त्योहार लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल अंधेरा होने पर होली के समान आग जलाकर तिल, गुड़, चावल तथा मक्का से अग्नि पूजन करके आहुति डाली जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस उत्सव को खिचड़ी कहते हैं। बंगाल में भी इस दिन स्नान करके तिलदान की विशेष प्रथा है। राजस्थान तथा गुजरात में इस दिन बालक, युवा-युवतियां तथा वृद्धजन बड़े उत्साह से पतंग उड़ाते हैं। प्राचीन रोम में इस दिन खजूर, अंजीर और शहद बाँटने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन यूनान में लोग वर-वधू को संतान की वृद्धि के लिए तिलों का पकवान बांटते थे। इस दिन कमल और शुद्ध घी का दान पुण्य कार्य माना जाता है।
इस पुनीत अवसर पर गंगासागर में बहुत बड़ा मेला लगता है। कहते हैं कि इस दिन यशोदाजी ने श्रीकृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। अतः मकर संक्रान्ति का पर्व पूरे देश में बड़ी श्रद्धा व आदरपूर्वक मनाया जाता है। लोहड़ी के रूप में सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश प्राप्त होता है। दक्षिण भारत के विशेष त्योहारों में मकर संक्रान्ति या पोंगल तीन दिनों तक मनाया जाता है। कई जगहों पर इस पर्वोत्सव को मेले का रूप देना सार्वभौम माना गया है। इसमें बच्चे, बूढ़े सभी आनंदित होते हैं। यह सांस्कृतिक पर्व हमें विरासत में प्राप्त होता है। इसकी विश्वसनीयता में सदियों का अनुभव छिपा है। संक्रान्ति काल के आहार और गंगा स्नान की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। कृषि प्रधान देश के इन त्योहारों का महत्व कृषि के साथ धार्मिकता और राष्ट्रीयता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
                 डा. रीभा तिवारी
             एस.बी.आई. कालोनी से पहले
                 फजलगंज, सासाराम
               जिला- रोहतास (बिहार)
               पिन कोड नम्बर- 821115