शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

प्रेम ही वसंत है

वसंत का आगमन ही कुछ ऐसा है जो हमें उल्लास से भर देता है। शायद ही कोई हो जिसे वसंत न भाता हो। मौसम का राजा वसंत, दिलों पर राज करने वाला वसंत। प्रेम से सराबोर वसंत। राजा जो सबका प्रिय हो, सबके साथ समभाव रखता हो। सबके लिए सामान्य हो। यही तो है वसंत की खासियत। वसंत को लिखना शुरू की तो लगा स्वयं को लिख दूँ, प्रेम को लिख दूँ। वसंत के परे क्या कोई उत्साह की कल्पना भी कर सकता है। प्रकृति की गोद में हर्ष, उल्लास, प्रेम और सौंदर्य ही तो है। बस जरूरत है इसे महसूस करने की।
आधुनिकता के रंग में रंगने के बाद जैसे मौसम तो आना-जाना हो। किसी को इसकी खबर तक नहीं। बंद कमरे में एसी में बैठे लोग भला इस वसंत को क्या समझें। वसंत को समझना है तो प्रकृति को निहारना होगा, महसूस करना होगा। उसके स्पर्श  में कुछ पल बिताना होगा। वसंत जो प्रेम से परिपूर्ण, विविध रंग से भरा, जिधर भी नजर घुमाएं सिर्फ रंग,आकर्षण  मादकता और सौंदर्य ही तो है जो मानो अपनी ओर खींचता है न चाहें तो भी हम उसके रंग में रंग जाते हैं। यही तो है मादकता। भला कौन होगा जो वसंत से अछूता होगा, जिसे वसंत ने कभी न लुभाया हो। वसंत तो प्रेम का प्रतीक है। वसंत अपने अंदर गमों को भुलाने का राज रखे हुए है। वसंत का तात्पर्य है वनस्पतियों का प्रसन्न हो जाना, फूलों का खिलना, भौरों का गुनगुनाना, धरती का श्रृंगार कर लेना। जितनी उल्लासमय श्रेष्ठताएं हमारे भीतर और बाहर हैं, वो वसंत का ही रूपक है। वसंत वह रंग है जो छूटता नहीं। वसंत हमें अभिभूत करता है क्योंकि वह प्रेम है या यूँ कहें कि प्रेम ही वसंत है।
सच कहें तो सौंदर्य किसी पदार्थ में नहीं होता,अवस्था में होता है। बच्चे के लिए खिलौने में आनंद है, युवक को भोग में आनंद है। संत-महात्माओं की वाणी में आनंद है। ठीक उसी प्रकार वसंत प्रेम है और प्रेम वसंत लेकिन कब जब हम उसके रंग में रंगें तब। कहते हैं गुणों को देखते-देखते  केवल गुणों का भीतर आवर्तन होने लगता है, फिर भला वसंत को देखते-निहारते इसका असर क्यों न हो। वसंत पंचमी एक अवसर है, जहाँ से सरस्वती यानी वाक् की शक्ति को ग्रहण करने के लिए आधार पाते हैं। अगर इसे भी विस्तार से सोचें तो पाते हैं कि वसंत पंचमी वाक् की शक्ति तभी पूर्ण है, सार्थक है जो वाक् हमें शक्ति, ऊर्जा, संकल्प से भर दे। प्रेम का अनुभूति कराए जो बैर को जड़ से नष्ट कर दे। तो क्या सरस्वती पूजा का वसंत में आना यह संदेश नहीं देता कि अपनी वाक्पटुता और वाणी कौशल से तुम दिलों पर राज करो। सबको जोड़ो, सबसे प्रेम करो। जहाँ भी जाओ उस आकर्षण, उस खुशबू को बिखेरो जो सब में समाहित हो जाए, सब पर असर कर जाए। किसी के उदास चेहरे पर मुस्कान खींच जाए।
गौर करे वसंत पंचमी विद्यालय में ही क्यों? क्योंकि विद्यालय में हमारा बचपन बीतता है और अगर विद्यालय से ही वसंत की महत्ता जान जाएं तो फिर जीवन भर भूलें ही नहीं। हमारे अंदर एक सकारात्मक विचार, उत्साह और उमंग का समावेश हो। जो हमें जीवनपर्यंत ऊर्जावान रखे। आज जीवन आनंदहीन, प्रेमहीन प्रतीत होता है। मानो जीवन से मादकता बिछुड़ गई है। व्यक्ति खुद को एकांत में सिमटा महसूस करने लगा है फिर जो खुद असहाय हो वह दूसरे को कैसे कुछ दे सकता है। प्रेम पूर्णता की बात करता है। प्रेम पूर्ण है, वसंत पूर्ण है। प्रेम देने का नाम है, वसंत भी देना जानता है। बांटना जानता है, भरना जानता है और रंगना जानता है। तभी तो पूर्णता का प्रतीक है। तभी तो वसंत प्रगाढ़ता की अनुभूति कराता है बशर्ते आप इसे महसूस करें। जहाँ निकटता नहीं वहां नीरसता छाएगी ही। फिर वसंत तो निकटता की बात करता है। जहाँ रस ही रस हो, मादकता हो, सुगंध हो और सौंदर्य हो, यही तो है वसंत। प्रेम निकटता का सूचक है तो वसंत एहसास। प्रेम से पूर्ण ये मौसम अपने आपमें न जाने कितने सौंदर्य, रंग रस को समाहित किए हुए है जो सिर चढ़ बोलता है, नस-नस में प्रेम रस घोलता है। एक प्रेयसी के कानों में वसंत क्या-क्या बोलता है, कोई सुनो तो सही सिर्फ प्रेम ही तो बोलता है।

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

मकर संक्रान्ति का महत्व

मकर संक्रान्ति का अर्थ है-माघ मास की संक्रान्ति जिस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। मकर राशि बारह राशियों में दसवें स्थान पर होती है। मकर संक्रान्ति का पर्व किसी न किसी रूप में पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। यह पर्व कभी पूष और कभी माघ में भी पड़ जाता है। जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी की गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांति चक्र कहलाता है। इस परिधि को बारह भागों में बांटकर बारह राशियां बनी हैं। ये बारह नक्षत्रों के अनुरूप हैं। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रान्ति कहलाता है। पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रान्ति कहते हैं। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं और रात छोटी तथा दक्षिणायन में इसके ठीक विपरीत रात बड़ी और दिन छोटा होता है।
शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और दक्षिणायन देवताओं की रात्रि। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप-तप अनुष्ठानों का अत्यन्त महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुणा होकर प्राप्त होता है। इतना ही नहीं यह काल भगवान के भजन, पूजन, स्मरण और चिंतन के लिए महत्वपूर्ण है। रामचरित मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि पर प्राप्त होता है अर्थात जब मकर संक्रान्ति होती है तब प्रयागराज में देवता दैत्य और मनुष्य झुंड के झुंड आकर त्रिवेणी में स्नान करते हैं-
माघ मकरगत रवि जा होई। तीरथ पतिहिं आव सा कोई॥
देव, दनुज, किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
यहाँ की दो बातें विचारणीय हैं। पहली बात है ‘रवि जा होई’ माने पौष में हो या माघ में। इसलिए ग्रंथों में पौष को भी माघ में मिलाकर कहा गया है। अर्थात् पूष को माघ में जोड़कर कहा गया है। उत्तरायण से सूर्य का स्वागत सभी करते हैं। हर मास के स्वामी के नाम अलग हैं। माघ मास के स्वामी माधव भगवान हैं। अत: सभी उनकी पूजा किया करते हैं। यह पावन स्नान प्रात:काल में पूर्ण होता है अत: पुण्यदायक माना जाता है। चूँकि इसी पुण्यकाल में मुनियों का समाज जुटता था- ‘तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा’। भारद्वाज जी का आश्रम मुनियों को अच्छा लगता था, संगम के पास था अत: मन को भाता था। वे प्रात:काल वहाँ स्नान करते थे। ‘मज्जहिं प्रात समेत उछाहा’। और परस्पर भगवान की गाथा गाते और सुनते थे। ‘कहहिं परसपर हरि गुन गाहा’। इस ऋषि समाज की गोष्ठी में ब्रह्म का निरूपण, धर्म के विधान और तत्व के विभागों का वर्णन किया जाता था और ज्ञान-वैराग्य युक्त भगवान् की भक्ति के विषय में प्रबुद्धजनों की वार्ता होती थी। संक्षेप में याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद की रामायणकथा मकर संक्रान्ति को ही प्रारंभ हुई थी। इस दृष्टि से मकर संक्रान्ति हमारी समस्त आध्यात्मिक जिज्ञासा को पुष्ट-तुष्ट करने का भी पावन पर्व है।
संक्रान्ति को हमारे देश ने एक सांस्कृतिक पर्व का महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह पर्व नववर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व एक और दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। वर्ष के विभिन्न ऋतुओं में जो पर्व काल निश्चित किए गए हैं उनका हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जनजीवन में जिस काल के प्रभाव से शारीरिक शक्ति और मानसिक उल्लास का संचार और प्रसार होता है वह स्वत: ही पर्व बन जाता है। हमारे कालपुरुष के छह अंग षड्ऋतुओं के रूप में हैं। शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त। उत्तरायण सूर्य के साथ शिशिर वसंत और ग्रीष्म से जुड़े हुए हैं। उत्तरायण में धरती और वनस्पतियों के रस का शोषण होता है। आदान कार्य के चलते ही सूर्य का नाम आदित्य है और विसर्ग कार्य के कारण चन्द्रमा का नाम सुधांशु है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति विसर्गकाल का अंत और आदान काल का प्रारंभ है। इसमें मनुष्य और वनस्पतियों का बल चरम सीमा पर होता है। अत: मकर राशि एक ऐसे संधि-स्थल पर है जब प्राणियों और वनस्पतियों की भौतिक शक्ति के आरोह-अवरोह क्रम का अंत और प्रारंभ होता है। इस दृष्टि से बल और शक्ति का विचार करते हुए मकर संक्रान्ति का अत्यधिक महत्व है।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल-दान का महत्व विशेष है। धर्मशास्त्र में षट् तिला पाप नाशिनी का वर्णन मिलता है। लोक में नया चूड़ा, गुड़, दही और तिल यह मकर संक्रान्ति का भोजन प्रसिद्ध है। नये चावल और उड़द की खिचड़ी खाने का भी रिवाज है। इन सब बातों का सीधा सम्बन्ध आयुर्वेद में कही गई बातों की ऋतु चर्चा से है। शीतऋतु में शीत वायु के स्पर्श से प्राणियों की अग्नि अंतर्मुखी हो जाती है और उस समय उसे मात्रा और स्वभाव से गुरुद्रव्यों की अपेक्षा होती है। शास्त्रकारों ने इस काल में स्निग्ध, अमल, लवण रसों से युक्त पदार्थ, गोरस, गुड़ आदि इक्षुविकार, तैल नया अन्न सेवन करने का विधान है। शीत निवारण के लिए तिल के तेल का महत्वपूर्ण विधान है। इसी से मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल उबटन, तिल हवन, तिल भोजन तथा तिलदान सभी कार्य पापनाशक हैं।
मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व हिमाचल, हरियाणा तथा पंजाब में यह त्योहार लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल अंधेरा होने पर होली के समान आग जलाकर तिल, गुड़, चावल तथा मक्का से अग्नि पूजन करके आहुति डाली जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस उत्सव को खिचड़ी कहते हैं। बंगाल में भी इस दिन स्नान करके तिलदान की विशेष प्रथा है। राजस्थान तथा गुजरात में इस दिन बालक, युवा-युवतियां तथा वृद्धजन बड़े उत्साह से पतंग उड़ाते हैं। प्राचीन रोम में इस दिन खजूर, अंजीर और शहद बाँटने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन यूनान में लोग वर-वधू को संतान की वृद्धि के लिए तिलों का पकवान बांटते थे। इस दिन कमल और शुद्ध घी का दान पुण्य कार्य माना जाता है।
इस पुनीत अवसर पर गंगासागर में बहुत बड़ा मेला लगता है। कहते हैं कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। अत: यह मकर संक्रान्ति का पर्व पूरे देश में बड़ी श्रद्धा व आदरपूर्वक मनाया जाता है। लोहड़ी के रूप में सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश प्राप्त होता है। दक्षिण भारत के विशेष त्योहारों में मकर संक्रान्ति या पोंगल तीन दिनों तक मनाया जाता है। कई जगहों पर इस पर्वोत्सव को मेले का रूप देना सार्वभौम माना गया है। इसमें बच्चे, बूढ़े सभी आनंदित होते हैं। यह सांस्कृतिक पर्व हमें विरासत रूप में प्राप्त होता है। इसकी विश्वसनीयता में सदियों का अनुभव छिपा है। संक्रान्ति काल के आहार और गंगा स्नान की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। कृषि प्रधान देश के इन त्योहारों का महत्व कृषि के साथ धार्मिकता और राष्टÑीयता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।

रविवार, 11 जनवरी 2015

तलाश है...

कुछ दूर है
कुछ पास है
सबको किसी न किसी की,
तलाश है।
यह जिंदगी
तो एक प्यास है
जिसे मिल गया
वह पा लिया
जो पा लिया,
उसे खो दिया।
जिसे नहीं मिला
वो हैरान है
व्यर्थ में परेशान है
यह प्यास वो है
जो बुझती नहीं
सागर में बूंदे
मिलती नहीं।
जो ढूँढ़ता इसे
ढूँढ़ता ही रहे
बिन राह चलता रहे
पास मंजिल रहे
फिर भी भटकता रहे
व्यर्थ ही प्यासा रहे ।
कुछ दूर है
कुछ पास है
हर किसी को किसी की,
 तलाश है.....।