रविवार, 22 फ़रवरी 2015

संतति सुख का संत्रास

एक कहावत है कि लड़की जन्म से लता के समान होती है, उसे पुरुष के मजबूत कंधों की जरूरत होती है यानी वह अपने आप में कुछ भी नहीं है। पुरुष सहारे के बिना वह भू-लंठित कमजोर लता के समान है।  समाज में कैसी-कैसी बेतुकी बातें गढ़कर स्त्री के पैरों में बेड़ियां डालने की साजिश रची गई है। जहां परिवार किसी भी समाज की बुनियाद है वहीं परिवार और शादी समाज के दो अहम स्तम्भ। शादी -विवाह का मतलब ही होता है वंश उत्पति। विवाहित इंसान खासतौर पर महिलाओं के लिए बच्चे का होना जीवन में संतुष्ट होने का प्रमाण माना जाता है। शादी होने के कुछ समय पश्चात अगर कोई संतान न पैदा हो तो उस दम्पति की पीड़ा उससे बेहतर कोई और समझ ही नहीं सकता। महिलाओं को तो कुछ समय बीतते ही कई तरह के ताने-उलाहने  मिलने लगते हैं। घर-परिवार ही नहीं नात-रिश्तेदारी में भी चर्चा का विषय बना दिया जाता है। हर तरफ से महिलाओं पर उंगलियां उठने लगती हैं।
संतति सुख का यह संत्रास पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ही भोगना पड़ता है। शादी के कुछ समय पश्चात बच्चा न होने पर पुरुष समाज दूसरी और तीसरी शादी को स्वतंत्र है। समाज में राजा-महाराजाओं से लेकर रंक तक को मानो इसकी आजादी मिली हो, मानो छूट दी गई हो। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद  संतान के आने की खबर बेशक एक सुखद अहसास  है। एक नन्ही सी जान  के साथ जिंदगी की शुरुआत किसी परीलोक की कहानी से कम रोचक और सुखद नहीं। फिर दूसरी और तीसरी संतान तक स्वाभाविक है कि हमारा आकर्षण पहले पहल मां बनने की खुशी से थोड़ा कम होने लगता है। इन सब के साथ शारीरिक क्षमता भी कम होने लगती है। पहली संतान को लेकर जो आकर्षण, जो अनुभव होता है वह दूसरी संतान के आने के समय सामान्य सी बात लगने लगती है। हमारे समाज में ऐसी माताएं भी हैं, जिनके दर्जन भर बच्चे होते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थितियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। कितना मुश्किल होता होगा इतने बच्चों का लालन-पालन  और उनकी जिम्मेदारी सम्हालना। इन स्थितियों में एक औरत कई हिस्सों में बंट सी जाती है। उसका हर बार प्रसव पीड़ा से जूझना, गुजरना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार तो प्रसव के दौरान उचित देख-रेख के अभाव में महिला की जान तक चली जाती है तो कई महिलाएं खान-पान में अनियमितता और लापरवाही की वजह से अनचाही बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं।
नारी को यूं ही महान नहीं कहा गया है। उसमें कुछ क्षमताएं ईश्वर प्रदत्त हैं तभी तो वह जननी है, वंदनीय है। साइंस का मानना है कि संतानोत्पत्ति में 80 फीसदी मामलों में पुरुषों में कमी होती है। इसके बावजूद भी महिलाओं को कई शारीरिक, मानसिक यातनाओं  से हर रोज रूबरू होना पड़ता है। समाज वंश का मतलब बेटा मानता है। भले ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने कुछ हद तक यह भ्रम तोड़ा हो लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता पूर्णत: बदली नहीं है।  यह सवाल जेहन में बार-बार उठता है क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है? हम शिक्षित हो रहे हैं?  क्या विचार बदल रहे हैं?  अगर जवाब हां में है तो फिर ऐसा क्यों नहीं देखने और सुनने को मिलता कि शादी के बाद अगर एक दम्पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हो तो लोग पुरुषों की ओर भी उंगली उठाएं। ऐसा क्यों होता है कि बार-बार एक नारी को ही दोषी ठहराया जाता है। डॉक्टर की रिपोर्ट में बिल्कुल स्पष्ट होने के बावजूद पुरुष सामान्य रूप से अपनी कमी को क्यों नहीं स्वीकारता? वह और उसका परिवार औरत को दूसरी शादी की इजाजत क्यों नहीं देता? सच तो यह है कि समाज में जितने भी कायदे-कानून हैं, वे सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए ही बने हंै।
पुरुष कभी अपने को नारी से कम आंकने की कल्पना मात्र से टूट जाता है लेकिन जो स्त्री पल-पल टूटती है, चुपचाप सब कुछ सहती है उसके समर्पण,  उसके दर्द के  बदले उसे प्यार के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते। यहां अपवादों को देखें तो भी आंकड़े  एक-दो फीसदी ही हैं। सवाल यह उठता है कि पुरुष सच से भयभीत है या खुद की कमियों से? क्या एक स्त्री का जीवन पुरुष के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और समर्पित होने के लिए ही बना  है या बच्चा पैदा करके  संतान सुख की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है? क्या उसके स्वयं के सपने साकार नहीं होने चाहिए। क्या वह आजाद नहीं, क्या उसे खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आज उन महिलाओं की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को भी देखने की जरूरत है जिनके पास संतान तो हैं लेकिन सिर्फ बेटियां। तीन-चार बेटियों के बावजूद भी उनका परिवार उनसे बेटे की इच्छा रखता है। क्या यह शारीरिक शोषण की श्रेणी में नहीं आता? उस महिला की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई पुरुष महसूस कर सके।
एक महिला के मां बनते ही उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह सब कुछ  भूलकर बच्चे में ही खुद को देखने लगती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठती है। शादी और वंश तक ही एक महिला का घूमते रहना कहां तक उचित है? समाज में शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह की महिलाओं के साथ यातनाएं हो रही हैं। पहले यह आम धारणा थी कि गरीब-गुरबे, अनपढ़ लोग ही महिला की संवेदना को नहीं समझ पाते और उन्हें कष्ट  पहुंचाते हैं। यह सच नहीं है। आज  की नारी सड़क से अधिक घर के भीतर असुरक्षित है। शिक्षित महिलाओं को अशिक्षित महिलाओं से भी ज्यादा अत्याचार सहन करना पड़ता है। घर और बाहर की दोहरी भूमिका निभाने के साथ दोहरा शोषण और कई समस्याओं से हर क्षण दो चार होना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
कहते हैं शिक्षा हमारी सोच को विकसित कर देती है। स्वाभाविक है शिक्षा से हमारी सोचने की क्षमता बढ़ती है तो किसी समस्या के बारे में बखूबी समझ भी। यही समझ शिक्षित लोगों की सबसे बड़ी तकलीफ भी है। किसी कम पढ़े-लिखे  गांव के व्यक्ति को कोई भयंकर बीमारी हो जाए तो वह नहीं डरता, मस्ती में जीता है क्योंकि उसे उसकी विशेष जानकारी नहीं होती लेकिन एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सिर्फ इसकी भनक तक लग जाए तो वह बीमारी से कम और उसके भय, दुष्परिणामों के बारे में सोच-सोच कर नई बीमारियों गले लगा लेता है। यही बातें शिक्षित महिलाओं के साथ भी होती हैं। उसकी  समस्या अनपढ़ महिलाओं से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती है।  समय बदल रहा है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। तमाम योजनाएं शिक्षा को लेकर चलाई जा रही हैं, नारी हित की बातें की जा रही हैं लेकिन कोई भी योजना तभी सार्थक और कारगर होगी जब हम स्वयं बदलें तथा हमारे सोचने का दृष्टिकोण भी बदल जाए। हमारा समाज जन्म से लेकर आखिरी सांस तक स्त्री को पुरुषों पर निर्भर माने जाने की परम्परा से ऊपर उठकर सोचें तभी एक स्त्री को हम वह सब कुछ दे सकते हैं जिसकी वह हकदार है।
       

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

सुखद अहसास

आंख खुली तो
चिड़ियां दस्तक दे चुकी थीं
आंगन में।
मैंने ताका मैंने झाँका
क्या रखा है, आँगन में।
वह फुदक-फुदक के चलती
  जैसे ढूँढ़ रही हो कुछ
  न मिलने पर पूछ रही हो कुछ।
  नजर पड़ी आंगन में रखे
कुछ गमलों पर
जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले थे
कुछ तितली, कुछ भौंरे
 यूँ ही फूलों से गले मिले थे।
मन में कई खूबसूरत ख्याल आए
मन को कई एहसास हुए
मन जैसे भोर की ताजी हवा के साथ
मंद-मंद बहने लगा
खूबसूरत ख्याल दिल में आने लगा
मैं चिड़ियों को तकती
तो कभी खुशबू चुराते भौंरों को
तो कभी तितली को उड़ते देख
तो कभी फूलों को चूमते देख
मुग्ध होती रही,
दिल मुअत्तर होता रहा
उन खुशबुओं के बीच
जिसे तितली भौंरों ने
फूल रोज खिलते हैं आंगन में
पर ये नजारे कब मिलते हैं आंगन में
मैंने कहा ए तितली, ए भौंरे
तुम रोज चले आना मेरे आँगन में
और साथ में लाना वो खुशबू
जो फूलों में ही न समाये
रुह में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो ख्याल बन न रहे
दिल में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो  मुझे भी अपने रंगों में रंग जाए
साथ लाना वो खुशबू
जिसमें मैं समा जाऊँ
वो मुझमें समा जाए।
         

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रेम जीवन का आधार

हर दर्द की दवा इश्क में है,
जीने का मजा इश्क में है।
इधर-उधर जो ढूंढ़ते हैं खुदा को,
कोई उनसे कह दे कि खुदा इश्क में है।
व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ प्रेम ही चाहता है। रुपया-पैसा, धन-दौलत, इज्जत-शोहरत के बावजूद जीवन में प्रेम न हो तो सब बेईमानी है। शायद ही कोई हो जिसे प्रेम न हो और प्रेम न चाहता हो। इसके बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम ईश्वर है, प्रेम पूजा है। प्रेम वह स्पर्श है जो एक शिशु भी महसूस कर लेता है। प्रेम वह भाव है जो एक बालक भी पढ़ लेता है। प्रेम वह अभिव्यक्ति है जो बिना बोले ही सामने वाला महसूस कर लेता है। जब प्रेम होता है तो कुछ भी नहीं सूझता। प्रेम किसी को किसी से किसी भी समय किसी रूप में हो सकता है। प्रेम न जाति, न धर्म और न ही उम्र की सीमा देखता है, यह किसी भी परिस्थिति में हो सकता है। प्रेम की व्याख्या भले ही लोगों ने अलग-अलग तरीके से की हो लेकिन इसे पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। प्रेम सिर्फ देना जानता है यानि प्रेम समर्पण है। प्रेम खोना जानता है। सच तो यही है प्रेम वही समझ सकता है जो प्रेम के लिए जिया हो, प्रेम में जिया हो।
     प्रेम, प्रीत, प्यार, इश्क, चाहत, आशिकी, अनुराग, दीवानगी, मुहब्बत जो भी नाम दें, प्रेम तो प्रेम है। एक बड़ा ही कोमल नाजुक सा एहसास जिसे सिर्फ प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम मानो जीवन हो प्रेम के बिना कैसा जीवन किसका जीवन किसके लिए जीना सब व्यर्थ। प्रेम पूर्णता का एहसास कराता है। जो व्यक्ति स्वयं प्रेम में पूर्ण हो, वही प्रेम दे सकता है। प्रेम स्व आत्मविश्वास को भी बढ़ता है और  जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटने का हौसला भी देता है। प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। प्रेम आकर्षण से शुरू होता है, विचारों के मेल से बढ़ता है और दबता है तो सिर्फ मजबूरियों से।
रिश्तों की तपती मरुभूमि में शीतल जल की फुहार है प्यार। प्यार वह शै है जो हर दिल में जला करती है। यह एक अहसास है जिसे रुह से महसूस किया जा सकता है। यह नूर की वह बूंद है जो सदियों से इंसानी दिलों में बह रही है। यह एक मधुर, सुखद अनुभव है, जो जीवन को नई ऊर्जा से भर देता है। कल्पनाओं से परे प्रेम की एक अलग दुनिया होती है। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं होता, न कोई निर्धारित नियम है। न उम्र की सीमा होती है न रिश्तों का बंधन। यह एक भाव है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। प्यार सिर्फ 'प्रेमी' और 'प्रेमिका' के मध्य निर्धारित सम्बन्ध ही नहीं बल्कि हम अपने और पराए सबके लिए दिल के किसी कोने में कोई अलग सा अहसास महसूस करते हैं। जिसने एक बार यह भाव महसूस किया उसके लिए जीवन के मायने बदल जाते हैं। प्यार का केन्द्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती। प्यार करने वाले ने जाति, धर्म और देश की सीमाओं को हमेशा चुनौती दी है। शायद यही कारण है कि जाति और धर्म के रखवालों ने हमेशा ही प्रेम का विरोध किया है। प्रेम में वह क्षमता है जो हर बंधन को अपने प्रवाह में बहा ले। जब तक हम प्रेम को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगे तब तक समाज से नफरत और हिंसा खत्म नहीं होगी। प्यार ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इसके जैसी सृजनात्मक ऊष्मा किसी दूसरे सम्बन्धों में नहीं मिलती। स्वप्न, सौंदर्य, आनंद, उत्तेजना कुछ कर गुजरने की तमन्ना एक साथ न जाने कितनी धारायें हृदय में फूट पड़ती हैं। अभिव्यक्ति का कोष रिक्त हो जाए, विचारों में शून्यता आ जाए फिर भी मन के अंदर ये एहसास ऊर्जा कायम रखने में सक्षम है। हर इंसान के जीवन में कभी न कभी ऐसा क्षण जरूर आता है जब अचानक कोई उसे अच्छा लगने लगता है। दिल में उसकी तस्वीर उतर आती है। आंखें हर पल बस उसे ही देखना चाहती हैं। उसके ख्यालों में खोया रहना भला लगता है। शायद यही प्यार की शुरुआत  है, लेकिन इन भावों की अभिव्यक्ति भारतीय समाज में सहज नहीं है। मन जिसकी ओर खिंचता है, बहुत कम लोग उसके समक्ष अपने हाल-ए-दिल का इजहार कर पाते हैं। ज्यादातर भावनाएं एक सुखद, कोमल अहसास की तरह दिल की गहराइयों में दफन कर दी जाती हैं।
वास्तव में सच्चे प्यार की अनुभूति ऐसी ही होती है जो रगों में लहू, दिल में धड़कन और सीने में सांसों की तरह समा जाती है, जिसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल सा जान पड़ता है। लेकिन आज जिस तरह से आधुनिकता का रंग हर तरफ सिर चढ़ कर बोलने लगा है तो प्रेम कैसे अछूता रह जाए। प्रेम को भी बाजारवाद ने अपने रंगों में रंग लिया है। एक सप्ताह ही प्रेम के नाम जिसमें रोज डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किश डे, वेलेंटाइन डे मानो सप्ताह के संडे, मंडे  तो  गायब ही हो गए हों, ऊपर हम जिस रुहानी प्रेम की बात कर रहे थे वह प्रेम बिना देखे, बिना छुए, बिना आलिंगन किये, बिना किसी उपहार के अदान-प्रदान किए  ही हम एक-दूसरे से मीलों दूर बैठे भी महसूस कर लेते हैं लेकिन ऐसा प्यार जो बाजारवाद से प्रभावित होकर कुछ देर के लिए मौज-मस्ती के लिए, उपहारों के अदान-प्रदान के लिए किया जाता है, वह प्रेम रुहानी प्रेम जैसा हो ही नहीं सकता। प्रेम कुछेक दिनों में बंधने वाला नहीं, यह तो हर बंधन से परे है, उन्मुक्त है। यह किसी आलिंगन, किसी उपहार, किसी डे में बंधना नहीं जानता यह पल-पल सांसों में बसने वाला, धड़कनों के साथ लयबद्ध होकर चलने वाला होता है। यह ऐसा एहसास है जिसे कोई और नहीं प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम सिर्फ प्रेम है, यह न किसी दिन, न ही किसी दिवस का मोहताज, बस इसे रहती है सच्चे आशिकी की तलाश तभी तो कहते हैं इसे अबूझ प्यास।
        

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

समझें नौनिहालों की भावना

कौन नहीं चाहता की हमारी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर पैसा, इज्जत और शोहरत कमाए। हजारों कल्पनाओं के बीच ही तो हम अपने लाड़ले को पालते हैं और वक्त के साथ-साथ हमारी उम्मीदें बढ़ती जाती हैं। उम्मीद करना सही बात है लेकिन किससे और कितनी उम्मीद की जाए इसका भी ख्याल रखना जरूरी है। हम कहीं अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद तो नहीं कर बैठते जो वे पूरा ही न कर सकें।
कहने को तो जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं लेकिन हर काम हर किसी के लिए सम्भव हो यह भी तो जरूरी नहीं। सबकी अपनी-अपनी पसंद-नापसंद, रुचि-अरुचि होती है। हम बच्चों के बारे में बिना कुछ जाने-सोचे उसके ऊपर कुछ भी थोप दें, यह सही नहीं है। खासकर बच्चों से जब भी हम कुछ उम्मीद करें उनकी  रुचि-अरुचि के बारे में जरूर जानकारी रखें क्योंकि बिना मन से किया हुआ कोई भी कार्य कभी पूर्ण नहीं होता। जिस काम में हमारी रुचि होती है, वह काम मानो बोलता है। जब काम बोलने लगता है तो आप किसी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते न ही किसी बाह्य दिखावे में उलझते हैं वरना उस काम को आप और तल्लीनता के साथ करने में जुट जाते हैं।
माता-पिता को अपने बच्चों से उम्मीद रखनी चाहिए लेकिन उम्मीद रखने से पहले बच्चों की राय भी जानना जरूरी है। उनसे इस विषय में खुलकर बात करें और किसी भी कार्य को बेहतर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं और उसके परिणाम-दुष्परिणाम के बारे में भी अवगत कराएं। अक्सर माता-पिता की यह शिकायत होती है कि उनके बच्चे खेलकूद  तो बेहतर हैं लेकिन पढ़ाई का नाम लेते ही उनकी तबियत खराब हो जाती है। ऐसे में बच्चे को खेल-खेल में ही पढ़ना सिखाएं। जरूरी नहीं कि आप बच्चे को सिर्फ किताबी ज्ञान ही दें। पढ़ाई के बहाने उन्हें व्यावहारिक ज्ञान भी अवश्य दें। यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बच्चे से हर दिन किसी न किसी विषय पर चर्चा करें। इससे भी उसमें जानने-समझने की लालसा बढ़ेगी। वह हर दिन कुछ नया करने की कोशिश करेगा।
अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि माता-पिता अपने बच्चों में भी तुलना करने लगते हैं कि ये अच्छा है और ये नहीं। ऐसा करने से हमें बचना चाहिए। हर बच्चे में अलग-अलग प्रतिभा मौजूद रहती है। जरूरत है समय रहते उसे पहचान कर निखारा जाए । हर बच्चा महान बन सकता है बशर्ते कि उसकी प्रतिभा की पहचान सही समय पर कर ली जाए। माता-पिता और शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों को सही राह दिखाएं। उचित-अनुचित का संज्ञान कराएं। बच्चे को बात-बात पर झिड़कने की बजाय उसे प्रेम से अपनी बातें समझाएं और उनकी बातों को भी ध्यान से सुनें, ऐसा करने से बच्चे में न केवल समझ पैदा होगी बल्कि वह आपकी हर बात मान लेगा ।
देखने में आया है कि अभिभावक बच्चे का मूल्यांकन उसके कक्षा में प्राप्त अंकों से करने लगते हैं। अंकों से किसी बच्चे की बुद्धि और क्षमता का मूल्यांकन किया जाना सही नहीं है। एक कक्षा में अगर 50 से 100 बच्चे पढ़ते हैं तो यह जरूरी नहीं है कि सभी बच्चे टाप करें। हर बच्चे की अपनी काबिलियत और रुचि होती है। किसी में नेतृत्व क्षमता होती है तो कोई कला में विशेष रुचि रखता है। किसी का मन खेलों में लगता है तो कोई पठन-पाठन में ध्यान देता है। यह तय है कि जो बच्चा जिस विषय पर अधिक रुचि लेगा, उसे उसमें अन्य विषयों से बेहतर सफलता मिलेगी।
अफसोस, आज हर माता-पिता अपने नौनिहाल का मूल्यांकन उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट से करते हैं।  उसके सामाजिक और भावनात्मक पक्ष का जरा भी ध्यान नहीं रखते। आज इसी वजह से रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है जिससे बच्चे अपनी रुचि के अनुरूप विषय का चयन कर सकें। आज मूल्यांकन की जो भी पद्धतियां हंै उनमें कई खामियां हैं। बच्चे के विषयगत ज्ञान का मूल्यांकन उसके रिपोर्ट कार्ड से तो जरूर किया जा सकता है लेकिन बच्चा अपने जीवन और भविष्य में कितना सफल होगा यह विषयगत मूल्यांकन नहीं बता सकता।
यह उसकी किसी काम के प्रति रुचि, उसका स्वयं का व्यवहार, उसका लोगों के साथ सम्बन्ध, कार्यकुशलता, व्यवहार में लचीलापन, काम के प्रति समर्पण के भाव जैसी तमाम बातों पर निर्भर करता है। जो जीवन में जितनी सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेगा, वह उतनी ही अधिक सफलता अर्जित करेगा। क्या यह सच नहीं कि विश्वविद्यालय जिसे गोल्ड मेडल देता है, जिन्दगी उसे मिट्टी के मेडल भी नहीं दे पाती।  
अक्सर देखने को मिलता है कि माता-पिता बच्चों के परीक्षाफल को लेकर ज्यादा चिंतित हो जाते हैं। कई बार तो ऐसा देखने को भी मिलता है कि बच्चे से ज्यादा माता-पिता इसे सोशल स्टेटस मान बैठते हैं जिसका दुष्परिणाम कभी-कभी बहुत ही भयंकर रूप में देखने को मिलता है। मन के अनुकूल रिपोर्ट कार्ड नहीं आने पर बच्चा आत्महत्या की कोशिश कर बैठता है और इसमें भी असफल रहा तो मानसिक तनाव से गुजरने लगता है जो उसके साथ-साथ पूरे परिवार के लिए घातक हो जाता है।  ज्ञान, शिक्षा और मूल्यांकन की अहमियत अपनी जगह ठीक है लेकिन जीवन और इंसान से बढ़कर कुछ भी नहीं। जीवन सुरक्षित है तो कई परीक्षाएं होंगी। कभी हम पास तो कभी फेल होंगे लेकिन अगर जीवन ही नहीं रहा तो फिर कैसी परीक्षा, कैसा मूल्यांकन और कैसा सोशल स्टेटस?