एक कहावत है कि लड़की जन्म से लता के समान होती है, उसे पुरुष के मजबूत कंधों की जरूरत होती है यानी वह अपने आप में कुछ भी नहीं है। पुरुष सहारे के बिना वह भू-लंठित कमजोर लता के समान है। समाज में कैसी-कैसी बेतुकी बातें गढ़कर स्त्री के पैरों में बेड़ियां डालने की साजिश रची गई है। जहां परिवार किसी भी समाज की बुनियाद है वहीं परिवार और शादी समाज के दो अहम स्तम्भ। शादी -विवाह का मतलब ही होता है वंश उत्पति। विवाहित इंसान खासतौर पर महिलाओं के लिए बच्चे का होना जीवन में संतुष्ट होने का प्रमाण माना जाता है। शादी होने के कुछ समय पश्चात अगर कोई संतान न पैदा हो तो उस दम्पति की पीड़ा उससे बेहतर कोई और समझ ही नहीं सकता। महिलाओं को तो कुछ समय बीतते ही कई तरह के ताने-उलाहने मिलने लगते हैं। घर-परिवार ही नहीं नात-रिश्तेदारी में भी चर्चा का विषय बना दिया जाता है। हर तरफ से महिलाओं पर उंगलियां उठने लगती हैं।
संतति सुख का यह संत्रास पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ही भोगना पड़ता है। शादी के कुछ समय पश्चात बच्चा न होने पर पुरुष समाज दूसरी और तीसरी शादी को स्वतंत्र है। समाज में राजा-महाराजाओं से लेकर रंक तक को मानो इसकी आजादी मिली हो, मानो छूट दी गई हो। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद संतान के आने की खबर बेशक एक सुखद अहसास है। एक नन्ही सी जान के साथ जिंदगी की शुरुआत किसी परीलोक की कहानी से कम रोचक और सुखद नहीं। फिर दूसरी और तीसरी संतान तक स्वाभाविक है कि हमारा आकर्षण पहले पहल मां बनने की खुशी से थोड़ा कम होने लगता है। इन सब के साथ शारीरिक क्षमता भी कम होने लगती है। पहली संतान को लेकर जो आकर्षण, जो अनुभव होता है वह दूसरी संतान के आने के समय सामान्य सी बात लगने लगती है। हमारे समाज में ऐसी माताएं भी हैं, जिनके दर्जन भर बच्चे होते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थितियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। कितना मुश्किल होता होगा इतने बच्चों का लालन-पालन और उनकी जिम्मेदारी सम्हालना। इन स्थितियों में एक औरत कई हिस्सों में बंट सी जाती है। उसका हर बार प्रसव पीड़ा से जूझना, गुजरना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार तो प्रसव के दौरान उचित देख-रेख के अभाव में महिला की जान तक चली जाती है तो कई महिलाएं खान-पान में अनियमितता और लापरवाही की वजह से अनचाही बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं।
नारी को यूं ही महान नहीं कहा गया है। उसमें कुछ क्षमताएं ईश्वर प्रदत्त हैं तभी तो वह जननी है, वंदनीय है। साइंस का मानना है कि संतानोत्पत्ति में 80 फीसदी मामलों में पुरुषों में कमी होती है। इसके बावजूद भी महिलाओं को कई शारीरिक, मानसिक यातनाओं से हर रोज रूबरू होना पड़ता है। समाज वंश का मतलब बेटा मानता है। भले ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने कुछ हद तक यह भ्रम तोड़ा हो लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता पूर्णत: बदली नहीं है। यह सवाल जेहन में बार-बार उठता है क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है? हम शिक्षित हो रहे हैं? क्या विचार बदल रहे हैं? अगर जवाब हां में है तो फिर ऐसा क्यों नहीं देखने और सुनने को मिलता कि शादी के बाद अगर एक दम्पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हो तो लोग पुरुषों की ओर भी उंगली उठाएं। ऐसा क्यों होता है कि बार-बार एक नारी को ही दोषी ठहराया जाता है। डॉक्टर की रिपोर्ट में बिल्कुल स्पष्ट होने के बावजूद पुरुष सामान्य रूप से अपनी कमी को क्यों नहीं स्वीकारता? वह और उसका परिवार औरत को दूसरी शादी की इजाजत क्यों नहीं देता? सच तो यह है कि समाज में जितने भी कायदे-कानून हैं, वे सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए ही बने हंै।
पुरुष कभी अपने को नारी से कम आंकने की कल्पना मात्र से टूट जाता है लेकिन जो स्त्री पल-पल टूटती है, चुपचाप सब कुछ सहती है उसके समर्पण, उसके दर्द के बदले उसे प्यार के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते। यहां अपवादों को देखें तो भी आंकड़े एक-दो फीसदी ही हैं। सवाल यह उठता है कि पुरुष सच से भयभीत है या खुद की कमियों से? क्या एक स्त्री का जीवन पुरुष के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और समर्पित होने के लिए ही बना है या बच्चा पैदा करके संतान सुख की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है? क्या उसके स्वयं के सपने साकार नहीं होने चाहिए। क्या वह आजाद नहीं, क्या उसे खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आज उन महिलाओं की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को भी देखने की जरूरत है जिनके पास संतान तो हैं लेकिन सिर्फ बेटियां। तीन-चार बेटियों के बावजूद भी उनका परिवार उनसे बेटे की इच्छा रखता है। क्या यह शारीरिक शोषण की श्रेणी में नहीं आता? उस महिला की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई पुरुष महसूस कर सके।
एक महिला के मां बनते ही उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह सब कुछ भूलकर बच्चे में ही खुद को देखने लगती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठती है। शादी और वंश तक ही एक महिला का घूमते रहना कहां तक उचित है? समाज में शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह की महिलाओं के साथ यातनाएं हो रही हैं। पहले यह आम धारणा थी कि गरीब-गुरबे, अनपढ़ लोग ही महिला की संवेदना को नहीं समझ पाते और उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं। यह सच नहीं है। आज की नारी सड़क से अधिक घर के भीतर असुरक्षित है। शिक्षित महिलाओं को अशिक्षित महिलाओं से भी ज्यादा अत्याचार सहन करना पड़ता है। घर और बाहर की दोहरी भूमिका निभाने के साथ दोहरा शोषण और कई समस्याओं से हर क्षण दो चार होना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
कहते हैं शिक्षा हमारी सोच को विकसित कर देती है। स्वाभाविक है शिक्षा से हमारी सोचने की क्षमता बढ़ती है तो किसी समस्या के बारे में बखूबी समझ भी। यही समझ शिक्षित लोगों की सबसे बड़ी तकलीफ भी है। किसी कम पढ़े-लिखे गांव के व्यक्ति को कोई भयंकर बीमारी हो जाए तो वह नहीं डरता, मस्ती में जीता है क्योंकि उसे उसकी विशेष जानकारी नहीं होती लेकिन एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सिर्फ इसकी भनक तक लग जाए तो वह बीमारी से कम और उसके भय, दुष्परिणामों के बारे में सोच-सोच कर नई बीमारियों गले लगा लेता है। यही बातें शिक्षित महिलाओं के साथ भी होती हैं। उसकी समस्या अनपढ़ महिलाओं से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती है। समय बदल रहा है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। तमाम योजनाएं शिक्षा को लेकर चलाई जा रही हैं, नारी हित की बातें की जा रही हैं लेकिन कोई भी योजना तभी सार्थक और कारगर होगी जब हम स्वयं बदलें तथा हमारे सोचने का दृष्टिकोण भी बदल जाए। हमारा समाज जन्म से लेकर आखिरी सांस तक स्त्री को पुरुषों पर निर्भर माने जाने की परम्परा से ऊपर उठकर सोचें तभी एक स्त्री को हम वह सब कुछ दे सकते हैं जिसकी वह हकदार है।
संतति सुख का यह संत्रास पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ही भोगना पड़ता है। शादी के कुछ समय पश्चात बच्चा न होने पर पुरुष समाज दूसरी और तीसरी शादी को स्वतंत्र है। समाज में राजा-महाराजाओं से लेकर रंक तक को मानो इसकी आजादी मिली हो, मानो छूट दी गई हो। दाम्पत्य जीवन में आने के बाद संतान के आने की खबर बेशक एक सुखद अहसास है। एक नन्ही सी जान के साथ जिंदगी की शुरुआत किसी परीलोक की कहानी से कम रोचक और सुखद नहीं। फिर दूसरी और तीसरी संतान तक स्वाभाविक है कि हमारा आकर्षण पहले पहल मां बनने की खुशी से थोड़ा कम होने लगता है। इन सब के साथ शारीरिक क्षमता भी कम होने लगती है। पहली संतान को लेकर जो आकर्षण, जो अनुभव होता है वह दूसरी संतान के आने के समय सामान्य सी बात लगने लगती है। हमारे समाज में ऐसी माताएं भी हैं, जिनके दर्जन भर बच्चे होते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थितियों का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। कितना मुश्किल होता होगा इतने बच्चों का लालन-पालन और उनकी जिम्मेदारी सम्हालना। इन स्थितियों में एक औरत कई हिस्सों में बंट सी जाती है। उसका हर बार प्रसव पीड़ा से जूझना, गुजरना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। कई बार तो प्रसव के दौरान उचित देख-रेख के अभाव में महिला की जान तक चली जाती है तो कई महिलाएं खान-पान में अनियमितता और लापरवाही की वजह से अनचाही बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं।
नारी को यूं ही महान नहीं कहा गया है। उसमें कुछ क्षमताएं ईश्वर प्रदत्त हैं तभी तो वह जननी है, वंदनीय है। साइंस का मानना है कि संतानोत्पत्ति में 80 फीसदी मामलों में पुरुषों में कमी होती है। इसके बावजूद भी महिलाओं को कई शारीरिक, मानसिक यातनाओं से हर रोज रूबरू होना पड़ता है। समाज वंश का मतलब बेटा मानता है। भले ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने कुछ हद तक यह भ्रम तोड़ा हो लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता पूर्णत: बदली नहीं है। यह सवाल जेहन में बार-बार उठता है क्या हमारा समाज सचमुच बदल रहा है? हम शिक्षित हो रहे हैं? क्या विचार बदल रहे हैं? अगर जवाब हां में है तो फिर ऐसा क्यों नहीं देखने और सुनने को मिलता कि शादी के बाद अगर एक दम्पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हो तो लोग पुरुषों की ओर भी उंगली उठाएं। ऐसा क्यों होता है कि बार-बार एक नारी को ही दोषी ठहराया जाता है। डॉक्टर की रिपोर्ट में बिल्कुल स्पष्ट होने के बावजूद पुरुष सामान्य रूप से अपनी कमी को क्यों नहीं स्वीकारता? वह और उसका परिवार औरत को दूसरी शादी की इजाजत क्यों नहीं देता? सच तो यह है कि समाज में जितने भी कायदे-कानून हैं, वे सिर्फ और सिर्फ औरतों के लिए ही बने हंै।
पुरुष कभी अपने को नारी से कम आंकने की कल्पना मात्र से टूट जाता है लेकिन जो स्त्री पल-पल टूटती है, चुपचाप सब कुछ सहती है उसके समर्पण, उसके दर्द के बदले उसे प्यार के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते। यहां अपवादों को देखें तो भी आंकड़े एक-दो फीसदी ही हैं। सवाल यह उठता है कि पुरुष सच से भयभीत है या खुद की कमियों से? क्या एक स्त्री का जीवन पुरुष के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और समर्पित होने के लिए ही बना है या बच्चा पैदा करके संतान सुख की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है? क्या उसके स्वयं के सपने साकार नहीं होने चाहिए। क्या वह आजाद नहीं, क्या उसे खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आज उन महिलाओं की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को भी देखने की जरूरत है जिनके पास संतान तो हैं लेकिन सिर्फ बेटियां। तीन-चार बेटियों के बावजूद भी उनका परिवार उनसे बेटे की इच्छा रखता है। क्या यह शारीरिक शोषण की श्रेणी में नहीं आता? उस महिला की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई पुरुष महसूस कर सके।
एक महिला के मां बनते ही उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह सब कुछ भूलकर बच्चे में ही खुद को देखने लगती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य मान बैठती है। शादी और वंश तक ही एक महिला का घूमते रहना कहां तक उचित है? समाज में शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह की महिलाओं के साथ यातनाएं हो रही हैं। पहले यह आम धारणा थी कि गरीब-गुरबे, अनपढ़ लोग ही महिला की संवेदना को नहीं समझ पाते और उन्हें कष्ट पहुंचाते हैं। यह सच नहीं है। आज की नारी सड़क से अधिक घर के भीतर असुरक्षित है। शिक्षित महिलाओं को अशिक्षित महिलाओं से भी ज्यादा अत्याचार सहन करना पड़ता है। घर और बाहर की दोहरी भूमिका निभाने के साथ दोहरा शोषण और कई समस्याओं से हर क्षण दो चार होना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
कहते हैं शिक्षा हमारी सोच को विकसित कर देती है। स्वाभाविक है शिक्षा से हमारी सोचने की क्षमता बढ़ती है तो किसी समस्या के बारे में बखूबी समझ भी। यही समझ शिक्षित लोगों की सबसे बड़ी तकलीफ भी है। किसी कम पढ़े-लिखे गांव के व्यक्ति को कोई भयंकर बीमारी हो जाए तो वह नहीं डरता, मस्ती में जीता है क्योंकि उसे उसकी विशेष जानकारी नहीं होती लेकिन एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सिर्फ इसकी भनक तक लग जाए तो वह बीमारी से कम और उसके भय, दुष्परिणामों के बारे में सोच-सोच कर नई बीमारियों गले लगा लेता है। यही बातें शिक्षित महिलाओं के साथ भी होती हैं। उसकी समस्या अनपढ़ महिलाओं से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती है। समय बदल रहा है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। तमाम योजनाएं शिक्षा को लेकर चलाई जा रही हैं, नारी हित की बातें की जा रही हैं लेकिन कोई भी योजना तभी सार्थक और कारगर होगी जब हम स्वयं बदलें तथा हमारे सोचने का दृष्टिकोण भी बदल जाए। हमारा समाज जन्म से लेकर आखिरी सांस तक स्त्री को पुरुषों पर निर्भर माने जाने की परम्परा से ऊपर उठकर सोचें तभी एक स्त्री को हम वह सब कुछ दे सकते हैं जिसकी वह हकदार है।



