शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

सुखद अहसास

आंख खुली तो
चिड़ियां दस्तक दे चुकी थीं
आंगन में।
मैंने ताका मैंने झाँका
क्या रखा है, आँगन में।
वह फुदक-फुदक के चलती
  जैसे ढूँढ़ रही हो कुछ
  न मिलने पर पूछ रही हो कुछ।
  नजर पड़ी आंगन में रखे
कुछ गमलों पर
जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले थे
कुछ तितली, कुछ भौंरे
 यूँ ही फूलों से गले मिले थे।
मन में कई खूबसूरत ख्याल आए
मन को कई एहसास हुए
मन जैसे भोर की ताजी हवा के साथ
मंद-मंद बहने लगा
खूबसूरत ख्याल दिल में आने लगा
मैं चिड़ियों को तकती
तो कभी खुशबू चुराते भौंरों को
तो कभी तितली को उड़ते देख
तो कभी फूलों को चूमते देख
मुग्ध होती रही,
दिल मुअत्तर होता रहा
उन खुशबुओं के बीच
जिसे तितली भौंरों ने
फूल रोज खिलते हैं आंगन में
पर ये नजारे कब मिलते हैं आंगन में
मैंने कहा ए तितली, ए भौंरे
तुम रोज चले आना मेरे आँगन में
और साथ में लाना वो खुशबू
जो फूलों में ही न समाये
रुह में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो ख्याल बन न रहे
दिल में भी उतर जाए।
साथ लाना वो खुशबू
जो  मुझे भी अपने रंगों में रंग जाए
साथ लाना वो खुशबू
जिसमें मैं समा जाऊँ
वो मुझमें समा जाए।
         

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें