मनुष्य जीवन ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसे व्यर्थ न जाने देने की हमेशा नसीहतें दी जाती हैं। अफसोस आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में मनुष्य के लिए नसीहतों का कोई मूल्य नहीं रहा। अर्थ प्रधान युग में जीवन पर अर्थ इस कदर हावी हो गया है कि एक पढ़ा-लिखा, शिक्षित-समझदार, स्वावलम्बी हर तरह की सुविधाओं से पूर्ण व्यक्ति भी आत्मघाती कदम उठाने से नहीं हिचकता। आज का इंसान बिल्कुल अकेला है। उसका यही एकाकीपन और मानसिक संत्रास उसे आत्मघाती निर्णय लेने को प्रेरित करता है।
कहने को मनुष्य योनि को समस्त प्राणि जगत की सर्वश्रेष्ठ योनि माना जाता है। इस सर्वश्रेष्ठता के कारण ही इंसान मनुष्य जन्म को लेकर गौरवान्वित महसूस करता है। मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता का आधार उसकी सद्बुुद्धि और विवेकशीलता है। मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार है कि उसने कितना स्वार्थ छोड़ा है। वेद-शास्त्रानुसार वह कितना मनुष्य बन पाया, उसने कितना जीवन परमार्थ में लगाया है। इस जगत के कल्याण में वह कितना निमित्त बना, पीड़ा से कराह रहे कितने व्यक्तियों में अपनत्व देखकर उन पर अपनी ओर से कितनी करुणा बिखेरी, भूख-प्यास से बिलखते लोगों की चीत्कार सुनकर कितनों के आंसू पोंछकर गले से लगाया, कितने भूखे-प्यासों के काम आकर अपने धनी होने का परिचय दिया। दरअसल, जीवन भर काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा, छल, कपट तथा ठगी करता इंसान जब स्वयं को समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ योनिधारी होने का अहंकार पालता है, तब अफसोस और हैरत होती है। पशु-पक्षी स्वावलम्बी हैं। मनुष्य परावलम्बी है। पशु-पक्षी अपना आहार स्वयं खोज लेते हैं जबकि मनुष्य को एक अच्छा जीवन निर्वाह करने के लिए कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उसे पथ-प्रदर्शक चाहिए। पशु-पक्षी बीमार हो जाते हैं तो अपनी चिकित्सा भी स्वयं खोज लेते हैं, आदमी पराश्रित है, चिकित्सा के अभाव में वह मर भी सकता है। पशु-पक्षी अपना पेट भर जाने के बाद बचे भोजन की तरफ आंख फेर कर भी नहीं देखते जबकि आदमी पेट भर जाने के बाद भी भूखा है। इंसान की यही अर्थ भूख उसे न केवल कमजोर कर रही है बल्कि आत्महत्या का प्रमुख कारण भी है। समस्या और कारण जो भी हों पर समाज में आत्महत्या की बढ़ती वारदातें कई सवालों को जन्म दे रही हैं। बदलते समाज का कटु सत्य यह है कि आज इंसान समस्याओं के सामने असहाय है, उसकी यही लाचारी और विवशता उसे आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर रही है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी समस्या मूल्यवान जीवन से भी जटिल हो सकती है जिसे वह व्यक्ति सहन ही न कर सके। आत्महत्या व्यक्ति तीन कारणों से करता है। एक तो तब जब उसके हालात की वजह से उसके इर्द-गिर्द के लोग दुखी हों और उस दुख के लिए वह खुद को या खुद के हालात को कसूरवार मानता हो। दूसरा तब जब किसी भी हालत में हालात के बदलने की गुंजाइश नहीं बचे। तीसरा यह कि अगर वो खुद स्वतंत्र रूप से फैसला ले तो भी उसे जिनको वह अपना मानता है, उनके दुखी हो जाने या खो देने का भय उसे स्वतंत्र फैसला लेने नहीं दे। कारण जो भी हो मन जब कुंठित होता है और व्यक्तिस्वयं को असहाय महसूस करने लगे तो भावावेश में आकर इस तरह का फैसला लेने की सोच बैठता है। सुनने में आता है व्यक्ति समाज के भय से ऐसा फैसला ले लेता है। ये कैसा समाज और कैसी सामाजिकता? यदि समाज ही सब कुछ है तो फिर कैसा डर, किसका डर? क्या समाज हमें अपनी गलतियों को सुधारने का मौका नहीं दे सकता? क्या वह हमारे कमजोर क्षणों में हमें आत्मबल प्रदान नहीं करा सकता? जिस समाज के बारे में हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि ऐसा न करो समाज के लोग क्या कहेंगे। तो फिर क्यों हमारा समाज हमें अपने विचारों के साथ जीने नहीं देता। जीवन में बहुत सारी मुश्किलें आती हैं और जो इन मुश्किलों में धैर्य और साहस के साथ अपने मानसिक उथल-पुथल की अवस्था में भी अपने को मजबूत और सकारात्मक सोच के साथ जीने के लिए तैयार कर लेता है वही बहादुर है। उसके पास ही जीने की कला है। कोई खुशी-खुशी हर हाल में जी लेता है और कोई छोटी सी तकलीफ भी सहन नहीं कर पाता और मौत को गले लगा लेता है। ये अलग बात है कि मरने के बाद हम उसे कायर, बुजदिल तो कभी संवेदनशील न जाने किन-किन नामों से सम्बोधित करते हैं। यह भी समाज की एक विडम्बना ही तो है कि जीते जी किसी की व्यथा को सुनने और सुलझाने भर का समय आज किसी के पास नहीं है। हर व्यक्तिअपने में मशगूल है। उसे दूसरों की फिक्र ही नहीं है, क्या इसी का नाम समाज है जहां उसके भय से लोग मौत को गले लगा लेते हैं। यदि हर आत्महत्या के पीछे सामाजिक सरोकार ही जिम्मेदार हैं तो फिर हमें ऐसे समाज को बदलना होगा। एक नये समाज की स्थापना करनी होगी जहां व्यक्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझे, उसके दु:ख-दर्द को सुने और आत्मघाती कदम उठाते लोगों का आत्मबल बढ़ाये। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी तभी माना जाएगा जब वह प्रेम, दया, उदारता, सहानुभूति, सहयोग, परहित, करुणा, संवेदना, मानवता, परोपकार आदि मानवीय मूल्यों के साथ जिए और मानवीय दुर्बलताओं को अपने दैनिक जीवन में कोई स्थान न दे।