शनिवार, 16 मई 2015

सपनों का महल

क्या सचमुच ही
हँसी ठिठोली करते हैं
शहर में उग आए महलों के जंगल
लेकिन नेपथ्य में रोटी और अन्न के
अवरोध को ढोते-ढोते
एक असमर्थ मजदूर
अपनी आंखों के विश्वास में
जम रही बर्फ को हटाते-हटाते
सोचता है और टटोलता है
अपनी जेबों में पड़े
चन्द सिक्के को।
सचमुच मात्र
निराशा और कुंठाओं के अभिलेख पर
उसके सपनों का संवाद लिख तो दिए गए हैं
लेकिन प्रकृति का कोई कोना
उसके नजदीक नहीं आया
फिर भी बीते कल को
वो छोड़ना चाहता है और
विस्मय होकर देखता है
अपनी हथेलियों को
अपनी स्मृतियों में
जमी धूल की परतें
उघार कर रस्क करता है
ऊँची इमारतों को देखकर जिसे
उसने ही श्रम के लहू से बनाया है
लेकिन अब वह जोड़ना चाहता है
अपने सपनों का महल
इन ऊँची हवेलियों के समानान्तर।

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