शनिवार, 18 जून 2016

अंधेरों का उजाला बनी हरपिन्दर राणा

हरपिन्दर राणा का जन्म 29 अक्टूबर, 1974 को श्रीमुक्तसर साहेब के ऐतिहासिक शहर में एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में सरदार साधू सिंह और सरदारनी अमरजीत कौर के घर हुआ। इस दम्पति ने अपनी सुपुत्री का नाम रिम्पीरखा। गोलू-मोलू सी रिम्पी, दादा-दादी, चाचा और बुआ की लाड़ली दिन-ब-दिन बड़ी होती जा रही थी। आठ माह की बच्ची ने अभी चारपाई की बाजू के सहारे खड़ी होना ही सीखा था कि  सभी को लगने लगा कि अब तो वह खुद-ब-खुद जल्दी चलने लगेगी, लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। उसने अपने बही-खाते में बच्ची की जिन्दगी कुछ अजब ही लिख दी थी।
बुआ के गांव जाते हुए बारिश में भीगने के कारण ज्वर हो गया। गांव के आर.एम.पी. कम नीम-हकीम डाक्टर ने अपने अनाड़ीपन का सबूत देते हुए तेज ज्वर में उसे टीका लगा दिया। लापरवाही की वजह से  बच्ची का खून सीरिंज में चढ़ गया। यह देखकर घबराए से डाक्टर ने फिर से वही खून भीतर ही डाल दिया। ऐसा कर डाक्टर तो अपनी गलती छुपा गया मगर ये बच्ची एकदम से गर्दन से नीचे सारी की सारी एकदम सुन्न सी हो गयी। उसके शरीर में कोई हरकत न रही। वह सिर्फ सांस ही ले रही थी या फिर आंखें झपका रही थी। टांग, बाजू, हाथ और पांव ऐसे शिथिल हो गए जैसे रबड़ के बन गए हों।
घबराए हुए अनपढ़ मां-बाप को जहां भी कोई वैद्य-हकीम, डाक्टर या फिर साधू-सन्तों के बारे में बताता वहीं वे अपनी बच्ची को ले दौड़ते। बच्ची की हालत में जरा सा भी सुधार होता न देख घर में उदासी छाई हुई थी। अंततः शहर में आए एक नए व जाने-माने डाक्टर वालिया के विषय में पता चला। मां-बाप को एक अन्तिम और धुंधली सी आशा की किरण नजर आई। डाक्टर ने सम्पूर्ण जांच के पश्चात कहा-     मैंने पूर्ण कोशिश के बाद दवा दे दी है। अगर जरा सा भी फर्क नजर आया तो मैं इसको जिन्दा तो रख पाऊंगा लेकिन इसकी पूरी तरह से ठीक होने की कोई गारंटी नहीं और फिर से चल पाने में भी शंका ही है। डाक्टर की निराशा में से भी आशा की किरण ढूंढ़ते मां-बाप घर पहुंचे। अगले दिन सिर्फ दायें हाथ की उंगलियों में ही जरा सी हरकत हुई तो उनकी सांस में सांस आई। डाक्टर ने भी अपने इष्टदेव के समक्ष नमन किया और आगे का उपचार आरम्भ कर दिया।
आज-कल करते हुए बच्ची हरपिन्दर की अवस्था में सुधार तो आ गया मगर उम्रभर चलने-फिरने से वंचित हो गई। उससे उसके बाल्यावस्था की क्रीड़ा-किलकारियां खो गईं। वह घर की दहलीज पर बैठी नाचते-कूदते, खिलखिलाते बच्चों को ताकती रहती। सही-सलामत स्वस्थ बच्चे जब  दौड़ते-दौड़ते दूर निकल जाते तो हरपिन्दर मायूस और उदास हो जाती। नयनों में भर आए अश्कों को साथियों से छुपाते हुए वह दूर आस्मां में टकटकी बांधे देखने लगती। आकाश में उड़ते बादलों के हवा संग बनते-बिगड़ते आकारों को मनभावन नामकरण करती जैसे हाथी-घोड़ा या फूल इत्यादि। अगर आकाश में ये बादल खिलौने ना मिलते तो वह टांगें घसीटती रेंगती घर की सीली कुन्दराओं या किवाड़ों के पीछे छुपे जुगनुओं को झाड़ू की तीली से बाहर निकालती और माचिस की खाली डिबिया में बन्द कर लेती। फिर रात के अंधेरे में उन्हें तकिए पर फैलाकर जुगनुओं को जगमगाते देखकर खुश होती उसे लगता जैसे आकाश के तारे उसके संग खेलने आए हैं।
विद्यालय जाने की उम्र में दादी मां उसे गोद में उठाकर विद्यालय छोड़ आतीं। मगर उसके शिक्षकों ने भी उसे अधूरेपन का अहसास करवाया। उसे दूसरे बच्चे के साथ डेस्क पर बैठाने की बजाय एक कोने में टाट पर बैठाया जाता और उच्च शिक्षक यह कहते हुए खुद की जिम्मेदारी से भागते नजर आते कि दूसरे बच्चे नादान व शरारती होते हैं, अगर किसी ने इसको डेस्क से नीचे गिरा दिया तो इस लड़की का कहीं और ज्यादा नुकसान न हो जाए। इसी वजह से हरपिन्दर को सातवीं कक्षा तक दूसरे विद्यार्थियों से अलग नीचे जमीं पर बैठना पड़ा। आठवीं कक्षा के कमरे में जमीन पर भूरी चीटियों के बिल होने की वजह से हरपिन्दर को दूसरे बच्चों के साथ डेस्क मिला। इसी कक्षा में उसे एक सुहृदय शिक्षिका मलकीत सिंह मान मिलीं। उन्होंने हरपिन्दर के अधूरे शरीर में एक पूर्ण व रोशन मस्तिष्क की झलक देखी। फिर उसने हरपिन्द्र को भीतर से मजबूत बनाने हेतु उसकी उंगली पकड़ पुस्तको की सैलफ़ांे का राह दिखलाया। एक वर्ष में ही हरपिन्दर ने सैकड़ों पुस्तकें पढ़ डालीं। अब उसने अपने लिए एक नई राह चुनी। यह रास्ता उसने खुद को भीड़ के पैरों तले कुचले जाने से बचाव के लिए चुना था। फिर यही विलक्षण राह उसकी पहचान बनी। पुस्तकों से मिले शक्ति-ज्ञान व संस्कारों की बदौलत वह मर्द-प्रधान समाज में भेड़िया-रिश्तों के जबड़ों से भी बचकर निकलती रही लेकिन कुछ रिश्ते मृतप्राण अजगर की भांति उसके गले पड़े जिन्हें उसने आन्तरिक बल-शक्ति व हौसले से दूर धकेल दिया।
हरपिन्दर की मुश्किलें-मुसीबतें अभी समाप्त नहीं हुई थीं। शिक्षा में आने वाली अड़चनों के बारे में लिखने बैठो तो पन्नों के पन्ने काले हो जाएंगे। आठवीं कक्षा के बाद का स्कूल दूर होने के कारण बूढ़ी दादी मां उसे उठाकर नहीं ले जा सकती थीं। इसलिए उसे शिक्षा छोड़ घर बैठना पड़ा। इसी निराशा की वजह से उसे टाइफायड हो गया और सही होने का नाम नहीं ले रहा था। इस मुश्किल समय में उसकी मौसी आबो-हवा बदलते हेतु कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले गईं। यही सफ़र उसकी जिन्दगी का टर्निंग-प्वाइंट हो गया। मौसी के घर उसे एक सुहृदय इंसान कामरेड सुरजीत गिल मिला। उसके प्रयत्नों से हरपिन्दर की शिक्षा फिर से आरम्भ हो गई व कामरेड गिल उसका मार्गदर्शक बनकर उसके साथ-साथ चल पड़े। इस अपनत्व भरे साथ ने हरपिन्दर को एक दृढ़ इरादों वाली, उच्च विचारों वाली और दूसरों के लिए रोल-माडल बन सकने वाली नवयुवती बनाया।
इसी हिम्मत-हौसले से हरपिन्दर ने उच्च शिक्षा में कुछ हौसलापस्त करने वाली शिक्षिकाओं की डाली गई अटकलों को पार किया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोग्राम के तहत मजदूर संगठनों के लिए भी कार्य किया। जनवादी स्त्री सभा की निर्माता भी बनी और पार्टी के राज्यस्तरीय कार्यकर्ताओं श्रीमती बृंदा करात और तारा शर्मा के नेतृत्व में खेत-मजदूर औरतों के लिए कार्य किया। ये सब कार्य करते हुए साथ-साथ अपनी शिक्षा भी पूर्ण की। राज्य सरकार के राष्ट्रीय साक्षरता अभियान में निरक्षरों को साक्षर करने के लिए होल टाइमर के रूप में कार्य किया।
जिंदगी की अलग-अलग मुश्किलों को पार करते हुए हरपिन्दर ने एम.ए.पंजाबी, बी.एड. और पी.जी.डी.सी. की शैक्षणिक विद्या प्राप्त की। अपनी मेहनत व लगन के चलते हरपिन्दर आज एक ग्रामीण क्षेत्र के उच्चस्तरीय विद्यालय में सामाजिक शिक्षा की शिक्षिका है। हरपिन्दर निर्धन व दिव्यांग युवतियों के लिए सिलाई-कढ़ाई सेण्टर खोलकर अनेक लड़कियों को रोजगार का हुनर सिखा चुकी हैं। निर्धन विद्यार्थियों के लिए पुस्तकें और वर्दियों का प्रबन्ध करना हो या आर्थिक पक्ष से कमजोर लेखकों की वित्तीय सहायता करनी हो या शहीदों की कुर्बानियों के स्मरण में लोक-लहर उसारने, समागम करवाने की बात हो हरपिन्दर कभी पीछे नहीं हटती। निजी जिन्दगी से ऊपर उठ दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने का यत्न ही उसके जीवन का मनोरथ है। सिर्फ सरकारी नौकरी प्राप्तकर और अपना आर्थिक पक्ष सुरिक्षत कर ही हाथ पर हाथ रखकर बैठना उसे कबूल नहीं। घर-परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए उसने घर बनाया। छोटे भाईयों को पढ़ाया और उनके कारोबार चलवाए व उनकी शादी भी की।
पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त होकर हरपिन्दर अपने जीवन के मनोरथ की तरफ बढ़ी। साहित्य ने ही उसकी जिन्दगी को सजाया और संवारा था सो उसने अपनी जिन्दगी ही साहित्य लेखन को भेंट कर दी। हरपिन्दर ने अपनी सखी मीनाक्षी मनहर के साथ एक साहित्य मंच सुख़न-सुनेहे का गठन किया जोकि अदब, नाट और संगीत को समर्पित है। इसी तरह ये दोनों पुस्तक सभ्याचार फैलाने के लिए भी प्रयत्नशील हैं। इन दोनों ने परवाज पुस्तकालय भी खोला है जिसमें हर विषय की पुस्तकें मौजूद हैं। इनके लक्ष्य में युवतियों को जागरूक करना भी शामिल है। ये युवतियों की विशेष कक्षाएं भी लेती हैं और उन्हें समाज और अपने हकों के प्रति जागरूक करती हैं। वे कहती हैं कि अगर युवतियों को स्वविश्वास और स्वरक्षा करने की कला सिखा दी जाए तो वह समाज में बहुत मजबूत व दृढ़ इरादे वाली बन सकती हैं। शहर के लोग मीनाक्षी व हरपिन्दर को जय-वीरू की जोड़ी व ए.के.-47 कहकर पुकारते हैं।
हरपिन्दर राणा सुख़न-सुनेहे मंच की गतिविधियों के अलावा स्वयं भी साहित्य लेखन करती हैं। 2007 में उसका प्रथम पंजाबी काव्य संग्रह बिन परों परवाजप्रकाशित हुआ। जिसमें कृत्य वर्ग व नारी शक्ति को उभारने वाली कविताएं समाहित हैं। फिर उसने अपनी जीवन में रोल-माडल बन आए शख्स और सहृदय कामरेड सुरजीत गिल की जिन्दगी पर आधारित निर्भओ निरवैरनाम का पंजाबी उपन्यास लिखा। जिसमें वृद्ध पीढ़ी की नैतिकता, जिम्मेदारी, प्रतिबद्धता व पारिवारिक सम्बन्धों के प्रति सुहृदयता और नौजवान पीढ़ी में से समाप्त होते जा रहे इन अहसासों का तुल्नात्मक विश्लेषन किया है। 2012 में इस उपन्यास को एक मुकाबले द बेस्टपुस्तक चुना गया और कामरेड संदूरा सिंह यादगरी अवार्ड मिला। 2014 में उसने सखी के साथ मिलकर मीनाक्षी मनहर की हिन्दी में बच्चों के लिए लोक गाथाओं पर आधारित एक पुस्तक क्या वो जल परी थीप्रकाशित करवाई।
कार्य-व्यवहार में डाक्टर जगतार और अमृता प्रीतम हरपिन्दर के आदर्श हैं। हिन्दी व उर्दू में वह गुलजार साहेब और साहिर लुधियानवी को अपना आदर्श मानती है। हरपिन्दर मुंशी प्रेमचन्द, नानक सिंह, जसवंत कंवल, कमलेश्वर कुर्तल, एन. हैदर और बहुत से रशियन साहित्यकारों को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं। बोरिस पोलवाई की पुस्तक असली इंसान की कहानीऔर हमिंगवे की पुस्तक बूढ़ा आदमी और समुन्द्र ने उसे हर बार जिन्दगी में नई राह दिखाई है। हरपिन्दर लिखते-लिखते जब अपनी स्मृतियों और तजुर्बों में उतरती हैं तो वह मार्मिक रचनाएं लिखती हैं। मानवीय अहसास और संवेदनाओं से भरपूर पुस्तकें उसके सिरहाने मिलती हैं। वैसे उसकी स्मृर्तियों के दीपक रात-रात भर जलते रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि वे सोकर भी नहीं सोतीं। वह लोगों के दर्द को महज बयां ही नहीं करतीं बल्कि खुद वही दर्द महसूस कर लोगों की पीड़ा को कम करने का प्रयत्न भी करती हैं। इन दिनों हरपिन्दर राणा का नया पंजाबी उपन्यास शाहरग दे रिश्तेबहुत चर्चित हो रहा है जो उसने हादसों में अपाहिज हो चुके लोगों की शारीरिक व मानसिक अवस्थाओं के विषय में लिखा है। इस उपन्यास में हरपिन्दर ने प्रमाणित किया है कि शारीरिक अपंगता कोई अड़चन नहीं अगर इंसान मानसिक तौर पर स्वस्थ हो। आजकल यह उपन्यास निराशा में डूबे व्यक्तियों के लिए आशा की किरण बन रहा है। बहुत जल्द इसका हिन्दी व अंग्रेजी में अनुवाद छप रहा है।
हरपिन्दर के इस कठिन और लम्बे संघर्षमयी जीवन के लिए भास्कर वूमन आफ द ईयर 2011 अवार्ड’, ‘मालवे दा मान 2011 अवार्ड’ , ‘मदर टेरेसा 2012 अवार्ड’ ‘ होनी तो बलवान 2014वार्ड’ ‘मान धीया दा 2014 अवार्ड’ ‘पत्रिका लोहमनी की बीबी नक्षत्र कौर गिल्ल 2015 अवार्डआदि मिल चुके हैं। इन सम्मानों से हरपिन्दर के इरादे और ज्यादा दृढ़ हुए हैं और उसकी सरगर्मियां और ज्यादा तेज हुई हैं। हरपिन्दर राणा चाहती हैं कि अगर उसकी एक भी संरचना निराशा के दलदल में डूबे लोगों को आशावादी बनाकर जिंदगी की ओर वापस ला सके तभी उसका जीवन सफल होगा। वह लोगों की जिंदगी को थोड़ा सा और खूबसूरत बनाने में प्रयत्नशील हैं।
                                   प्रस्तुतकर्ताः मीनाक्षी मनहर 
          
                    


सोमवार, 13 जून 2016

शिक्षा की साख पर सवाल

 -रीभा तिवारी
'शिक्षण' शब्द संस्कृत भाषा की शिक्ष धातु से निर्मित है जिसका सीधा अर्थ है सीखना। शिक्षा का अर्थ नौनिहालों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने भौतिक तथा सामाजिक वातावरण के साथ समायोजन स्थापित कर सकें। उनके अन्दर बौद्धिक-शक्ति एवं निर्णय-शक्ति की क्षमता का विकास हो। आज हम विज्ञान और तकनीकी युग में जी रहे हैं। विज्ञान और तकनीकी के अन्तर्गत शिक्षा मनोविज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है, फलस्वरूप मानव जीवन दिनोंदिन जटिल होता जा रहा है। एक समय था जब अकुशल मजदूरों एवं परिश्रमी लोगों की अधिकता एवं विशेषज्ञों की कम आवश्यकता पड़ती थी किन्तु आज ऐसा नहीं है। आज विशेषज्ञता किसी कार्य का अहम हिस्सा है।
लाक ने ठीक ही लिखा है- पौधे का विकास कृषि तथा मनुष्य का विकास शिक्षा से होता है। जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए भोजन का महत्व है, उसी प्रकार सामाजिक विकास के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है। शास्त्रों में भी लिखा है- "किम्- किम् न साधयति कल्पलतवे विद्या" अर्थात कल्पलता के समान विद्या से क्या-क्या प्राप्त नहीं होता। आधुनिक युग में 'शिक्षा' का तात्पर्य उपदेश या सूचना देना नहीं माना जाता है,  न ही काल्पनिक भविष्य को ध्यान में रखकर ही बालक को शिक्षा दी जाती है। आज शिक्षा का उद्देश्य बालक के वर्तमान का निर्माण करना है। बालक के जीवन की प्रत्येक अवस्था में उसके अभिवर्धन और विकास में सहायता करना है। आज शिक्षा का अर्थ कठिन परिश्रम करने के रूप में नहीं लिया-दिया जाता। शिक्षा ग्रहण करना तो एक आनंदपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।
बच्चे नई वस्तुओं को सीखने में आनंद का अनुभव करते हैं। शिक्षा प्राप्त करने में आनंद की इस अभिवृत्ति का होना परमावश्यक है। जहाँ शिक्षा की प्रक्रिया में बालक एक सक्रिय कार्यकर्ता माना जाता है वहीं अध्यापक एक सहायक और पथप्रदर्शक के रूप में होता है। अध्यापक का कर्तव्य बालकों के सामने ऐसी समस्याओं को प्रस्तुत करना है जिनको हल करने में उनकी आनंद के बीच सक्रियता बनी रहे। शिक्षा बच्चों को नये-नये अनुभवों से अवगत कराती है तथा वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होती है। शिक्षा स्वभाव से ही गतिशील है तथा सीखने आदि क्रियाओं से बालक के ज्ञान में वृद्धि करती है। आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का संतुलित विकास करना है। पाठशाला और अध्यापक का कार्य ऐसा अनुकूल वातावरण निर्मित करना है, जहाँ बालक के व्यक्तित्व का विकास स्वतंत्र एवं पूर्णरूप से हो सके। जैसे-जैसे बालक का विकास होता है, वह वैसे-वैसे ही वातावरण से अनुकूलन करना सीखता है। इन कार्यों में शिक्षा उसे विशेष सहयोग देती है। शिक्षा व्यवहार में ऐसे वांछनीय परिवर्तन भी करती है कि वह अपना और अपने समाज का कल्याण करने में सफल हो।
प्रत्येक समाज, राज्य या राष्ट्र की अपनी कुछ मान्यताएं और विश्वास आदर्श एवं मूल्य होते हैं। इनकी पूर्ति के लिए वह शिक्षा की व्यवस्था करता है और उद्देश्य निश्चित करता है। इन उदेश्यों की प्राप्ति के लिए जिन विषयों का ज्ञान एवं प्रशिक्षण आवश्यक होता है उन्हें पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षक एवं शिक्षार्थी के सामने स्पष्ट एवं निश्चित लक्ष्य रखता है और उनकी प्राप्ति के लिए अनेक कार्य भी निश्चित करता है।
बेहतर परीक्षा परिणामों की जब भी बात होती है, शिक्षक अपनी असुविधा की शिकायत करने लगते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या स्कूलों में शिक्षण को लेकर भी वे उतने ही गंभीर होते हैं? सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई और सीखने का स्तर अगर अपेक्षित मानक से काफी खराब है, तो इसके लिए शिक्षकों की कमी से लेकर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव जिम्मेदार है। अपवादों को छोड़ दें तो अपनी भूमिका के निर्वाह में शिक्षक क्या पूरी तरह ईमानदारी बरतते हैं? स्कूली शिक्षा के मसले पर होने वाले तमाम अध्ययनों में पिछले कई साल से यह तथ्य सामने आ रहा है कि बच्चों के सीखने का स्तर बेहद दयनीय है और पांचवीं कक्षा के विद्यार्थी दूसरी कक्षा की भी किताब नहीं पढ़ पाते। सवाल यह कि क्या इस स्थिति के लिए बच्चे ही जिम्मेदार हैं? देशभर में शिक्षण की पद्धति से लेकर शिक्षकों के कर्तव्य निर्वहन तक की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।
प्रत्येक समाज एवं राष्ट्र के विकास में शिक्षा का विशेष महत्व है, इसलिए प्रत्येक देश मानवीय संसाधन को श्रेष्ठ, योग्य एवं प्रशिक्षित करने के लिए शिक्षा पर आश्रित होता है। इस दृष्टि से शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में मूल्यांकन का महत्वपूर्ण स्थान है। मूल्यांकन से अधिगमकर्ता की उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। उसी में शिक्षक द्वारा प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता, उसकी प्रभावशीलता और कौशल का आकलन होता है। परीक्षा की यह अंकीय प्रणाली छात्रों के बीच योग्यता व मेधा का निर्धारण प्राप्त अंकों के आधार पर करती है। एक अंक की कमी और अधिकता होने से छात्र की योग्यता का स्तर कम और अधिक हो जाता है, जोकि तर्कसंगत नहीं है। सामाजिक दृष्टिकोण से एक अंक अधिक प्राप्त छात्र दूसरे से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है जबकि मूल्यांकनकर्ता की वस्तुनिष्ठता संदेह से परे नहीं है। शिक्षा-शास्त्रियों एवं शैक्षिक-चिंतकों के शोध एवं कई दशकों से प्रचलित मूल्यांकन प्रणाली के विश्लेषण से इसमें अनेक विसंगतियां एवं दोष उजागर हुए हैं। जिसका ताजा उदाहरण बिहार बोर्ड की इंटर और मैट्रिक परीक्षा की मेरिट-लिस्ट में धांधली का पर्दाफाश होना है। यह हतप्रभ एवं दुखी करने वाला वाकया है।
निश्चित तौर पर यह एक व्यापक गड़बड़ी का नतीजा है, जिसमें अकेले परीक्षार्थी को कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। पिछले साल ऐसी ही एक परीक्षा में व्यापक रूप से गड़बड़ी होने की खबरें फैलने के बाद सरकार ने इस बार पूरी तरह साफ-सुथरी परीक्षा आयोजित कराने का फैसला किया था और काफी हद तक इसमें कामयाबी भी मिली। यहां तक कि सख्ती के चलते कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया था। मगर तमाम चौकसी के बावजूद बिहार की परीक्षा प्रणाली पर इस बार कहीं ज्यादा ही सवाल उठ रहे हैं, यहां तक कि वह जगहंसाई का विषय बन गई है।

बिहार बौद्धिकता के लिए जाना जाता रहा है लेकिन बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को पहली बार अपनी टापर्स लिस्ट को प्रूव करने की जरूरत पड़ी है, जिसके परिणामस्वरूप टापर्स मैदान छोड़कर भाग निकली और समिति के पास आवेदन भेजा है जिसमें डिप्रेशन के कारण नहीं आने की वजह बताई गई। खुशी के मौके पर डिप्रेशन की बात समझ से परे है। ऐसा पहली बार देखने-सुनने को मिला है। बिहार बोर्ड की धांधली प्रकाश में आने के बाद कुछ कदम जरूर उठाए गये हैं लेकिन इनमें आक्रामकता के अलावा दृढ़ता की कमी दिख रही है। राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सख्ती और सुधार का संदेश देने से पहले सरकार को व्यवस्था में खामियों के मूल कारणों के साथ-साथ उन तमाम पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए जिनकी वजह से यह विषबेल लगातार बढ़ रही है। बिहार ही नहीं देश भर के स्कूलों में योग्य शिक्षकों की कमी, विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं और पठन-पाठन में एकरूपता का अभाव, विषयवार प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, शिक्षक बहाली में पाई जाने वाली गड़बड़ियों को कदाचित नकारा नहीं जा सकता। इस बात को भी गम्भीरता से लेना होगा कि जो शिक्षक उपलब्ध हैं वह कक्षा लेने में रुचि ले रहे हैं या नहीं। सरकार को एक स्वस्थ माहौल बनाने की भी जरूरत है जिससे स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई हो तथा परीक्षा को गम्भीरता से लिया जाए तभी हम अपनी बौद्धिक सम्पदा, बौद्धिकता की छवि को धूमिल होने से बचा सकेंगे।