-रीभा तिवारी
'शिक्षण' शब्द संस्कृत भाषा की शिक्ष धातु से निर्मित है जिसका सीधा अर्थ है सीखना। शिक्षा
का अर्थ नौनिहालों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने भौतिक तथा सामाजिक वातावरण के
साथ समायोजन स्थापित कर सकें। उनके अन्दर बौद्धिक-शक्ति एवं निर्णय-शक्ति की
क्षमता का विकास हो। आज हम विज्ञान और तकनीकी युग में जी रहे हैं। विज्ञान और
तकनीकी के अन्तर्गत शिक्षा मनोविज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है, फलस्वरूप मानव
जीवन दिनोंदिन जटिल होता जा रहा है। एक समय था जब अकुशल मजदूरों एवं परिश्रमी
लोगों की अधिकता एवं विशेषज्ञों की कम आवश्यकता पड़ती थी किन्तु आज ऐसा नहीं है। आज
विशेषज्ञता किसी कार्य का अहम हिस्सा है।
लाक ने ठीक ही लिखा है- पौधे का विकास कृषि तथा मनुष्य का
विकास शिक्षा से होता है। जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए भोजन का महत्व है,
उसी प्रकार सामाजिक विकास
के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है। शास्त्रों में भी लिखा है- "किम्- किम् न
साधयति कल्पलतवे विद्या" अर्थात कल्पलता के समान विद्या से क्या-क्या प्राप्त
नहीं होता। आधुनिक युग में 'शिक्षा' का तात्पर्य
उपदेश या सूचना देना नहीं माना जाता है, न ही काल्पनिक भविष्य को ध्यान में रखकर ही
बालक को शिक्षा दी जाती है। आज शिक्षा का उद्देश्य बालक के वर्तमान का निर्माण
करना है। बालक के जीवन की प्रत्येक अवस्था में उसके अभिवर्धन और विकास में सहायता
करना है। आज शिक्षा का अर्थ कठिन परिश्रम करने के रूप में नहीं लिया-दिया जाता।
शिक्षा ग्रहण करना तो एक आनंदपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।
बच्चे नई वस्तुओं को सीखने में आनंद का अनुभव करते हैं।
शिक्षा प्राप्त करने में आनंद की इस अभिवृत्ति का होना परमावश्यक है। जहाँ शिक्षा
की प्रक्रिया में बालक एक सक्रिय कार्यकर्ता माना जाता है वहीं अध्यापक एक सहायक
और पथप्रदर्शक के रूप में होता है। अध्यापक का कर्तव्य बालकों के सामने ऐसी
समस्याओं को प्रस्तुत करना है जिनको हल करने में उनकी आनंद के बीच सक्रियता बनी रहे।
शिक्षा बच्चों को नये-नये अनुभवों से अवगत कराती है तथा वातावरण से सामंजस्य
स्थापित करने में सहायक होती है। शिक्षा स्वभाव से ही गतिशील है तथा सीखने आदि
क्रियाओं से बालक के ज्ञान में वृद्धि करती है। आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति
का संतुलित विकास करना है। पाठशाला और अध्यापक का कार्य ऐसा अनुकूल वातावरण निर्मित
करना है, जहाँ बालक के
व्यक्तित्व का विकास स्वतंत्र एवं पूर्णरूप से हो सके। जैसे-जैसे बालक का विकास
होता है, वह वैसे-वैसे ही वातावरण से अनुकूलन करना सीखता है। इन कार्यों में
शिक्षा उसे विशेष सहयोग देती है। शिक्षा व्यवहार में ऐसे वांछनीय परिवर्तन भी करती
है कि वह अपना और अपने समाज का कल्याण करने में सफल हो।
प्रत्येक समाज, राज्य या राष्ट्र की अपनी कुछ मान्यताएं और विश्वास आदर्श
एवं मूल्य होते हैं। इनकी पूर्ति के लिए वह शिक्षा की व्यवस्था करता है और
उद्देश्य निश्चित करता है। इन उदेश्यों की प्राप्ति के लिए जिन विषयों का ज्ञान
एवं प्रशिक्षण आवश्यक होता है उन्हें पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाता है। इस प्रकार
पाठ्यक्रम शिक्षक एवं शिक्षार्थी के सामने स्पष्ट एवं निश्चित लक्ष्य रखता है और
उनकी प्राप्ति के लिए अनेक कार्य भी निश्चित करता है।
बेहतर परीक्षा परिणामों की जब भी बात होती है, शिक्षक अपनी
असुविधा की शिकायत करने लगते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या स्कूलों में शिक्षण को लेकर भी वे उतने ही गंभीर होते हैं? सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई और सीखने का
स्तर अगर अपेक्षित मानक से काफी खराब है, तो इसके लिए शिक्षकों की कमी से लेकर बुनियादी सुविधाओं का
घोर अभाव जिम्मेदार है। अपवादों को छोड़ दें तो अपनी भूमिका के निर्वाह में शिक्षक
क्या पूरी तरह ईमानदारी बरतते हैं? स्कूली शिक्षा के मसले पर होने वाले तमाम अध्ययनों में पिछले कई साल से यह
तथ्य सामने आ रहा है कि बच्चों के सीखने का स्तर बेहद दयनीय है और पांचवीं कक्षा
के विद्यार्थी दूसरी कक्षा की भी किताब नहीं पढ़ पाते। सवाल यह कि क्या इस स्थिति
के लिए बच्चे ही जिम्मेदार हैं? देशभर में शिक्षण की पद्धति से लेकर शिक्षकों के कर्तव्य
निर्वहन तक की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।
प्रत्येक समाज एवं राष्ट्र के विकास में शिक्षा का विशेष
महत्व है, इसलिए प्रत्येक
देश मानवीय संसाधन को श्रेष्ठ, योग्य एवं प्रशिक्षित करने के लिए शिक्षा पर आश्रित होता है। इस दृष्टि से
शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में मूल्यांकन का महत्वपूर्ण स्थान है। मूल्यांकन से
अधिगमकर्ता की उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। उसी में शिक्षक द्वारा प्रदान की
जा रही शिक्षा की गुणवत्ता, उसकी प्रभावशीलता और कौशल का आकलन होता है। परीक्षा की यह अंकीय प्रणाली
छात्रों के बीच योग्यता व मेधा का निर्धारण प्राप्त अंकों के आधार पर करती है। एक
अंक की कमी और अधिकता होने से छात्र की योग्यता का स्तर कम और अधिक हो जाता है, जोकि
तर्कसंगत नहीं है। सामाजिक दृष्टिकोण से एक अंक अधिक प्राप्त छात्र दूसरे से अधिक
श्रेष्ठ माना जाता है जबकि मूल्यांकनकर्ता की वस्तुनिष्ठता संदेह से परे नहीं है।
शिक्षा-शास्त्रियों एवं शैक्षिक-चिंतकों के शोध एवं कई दशकों से प्रचलित मूल्यांकन
प्रणाली के विश्लेषण से इसमें अनेक विसंगतियां एवं दोष उजागर हुए हैं। जिसका ताजा
उदाहरण बिहार बोर्ड की इंटर और मैट्रिक परीक्षा की मेरिट-लिस्ट में धांधली का
पर्दाफाश होना है। यह हतप्रभ एवं दुखी करने वाला वाकया है।
निश्चित तौर पर यह एक व्यापक गड़बड़ी का नतीजा है, जिसमें अकेले परीक्षार्थी को कसूरवार नहीं
ठहराया जा सकता। पिछले साल ऐसी ही एक परीक्षा में व्यापक रूप से गड़बड़ी होने की
खबरें फैलने के बाद सरकार ने इस बार पूरी तरह साफ-सुथरी परीक्षा आयोजित कराने का
फैसला किया था और काफी हद तक इसमें कामयाबी भी मिली। यहां तक कि सख्ती के चलते कई
जगहों पर स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया था। मगर तमाम चौकसी के बावजूद
बिहार की परीक्षा प्रणाली पर इस बार कहीं ज्यादा ही सवाल उठ रहे हैं, यहां तक कि वह जगहंसाई का विषय बन गई है।
बिहार बौद्धिकता के लिए जाना जाता रहा है लेकिन बिहार
विद्यालय परीक्षा समिति को पहली बार अपनी टापर्स लिस्ट को प्रूव करने की जरूरत पड़ी
है, जिसके परिणामस्वरूप टापर्स मैदान छोड़कर भाग निकली और समिति के पास आवेदन भेजा
है जिसमें डिप्रेशन के कारण नहीं आने की वजह बताई गई। खुशी के मौके पर डिप्रेशन की
बात समझ से परे है। ऐसा पहली बार देखने-सुनने को मिला है। बिहार बोर्ड की धांधली
प्रकाश में आने के बाद कुछ कदम जरूर उठाए गये हैं लेकिन इनमें आक्रामकता के अलावा
दृढ़ता की कमी दिख रही है। राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सख्ती और सुधार का संदेश देने
से पहले सरकार को व्यवस्था में खामियों के मूल कारणों के साथ-साथ उन तमाम पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए जिनकी वजह से यह विषबेल
लगातार बढ़ रही है। बिहार ही नहीं देश भर के स्कूलों में योग्य शिक्षकों की कमी,
विद्यालयों में मूलभूत
सुविधाओं और पठन-पाठन में एकरूपता का अभाव, विषयवार प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, शिक्षक बहाली में पाई जाने वाली गड़बड़ियों को
कदाचित नकारा नहीं जा सकता। इस बात को भी गम्भीरता से लेना होगा कि जो शिक्षक
उपलब्ध हैं वह कक्षा लेने में रुचि ले रहे हैं या नहीं। सरकार को एक स्वस्थ माहौल
बनाने की भी जरूरत है जिससे स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई हो तथा परीक्षा को गम्भीरता से
लिया जाए तभी हम अपनी बौद्धिक सम्पदा, बौद्धिकता की छवि को धूमिल होने से बचा सकेंगे।

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