बुधवार, 29 नवंबर 2017

विलुप्त होती लेखन परम्परा


डा. रीभा तिवारी
इंटरनेट, मोबाइल फोन, मोबाइल एप्लीकेशन, टैबलेट, लैपटॉप और अन्य आधुनिक उपकरणों के विकास से आज दुनिया की अधिक से अधिक चीजें डिजिटल हो रही हैं। भारत के महानगरों और अन्य शहरों की शिक्षा प्रणाली भी काफी हद तक आधुनिकीकृत हो चुकी है। डिजिटलीकरण के इस दौर में शिक्षा कई अंतरराष्ट्रीय स्कूलों के साथ-साथ भारत की पारम्परिक शिक्षा प्रणाली में अपनी जगह बना रही है और पारम्परिक कक्ष प्रशिक्षण का स्थान ले रही है लेकिन इससे लेखन परम्परा का जिस गति से क्षरण हो रहा है, यह काफी चिन्ता का विषय है। मशीन मनुष्य को भाषा की सांकेतिक पहचान तो करा सकती है लेकिन हृदय में संवेदना के बीज अंकुरित नहीं कर सकती। असल में भाषा हृदय से जुड़ी क्रिया है। यह हृदय की ही होनी चाहिए और लिपि अपने हाथों की, तभी शिक्षा में संवेदना कायम रह सकती है।
भाषा के चार कौशलों में से एक है लेखन। भाषा के चार कौशल हैं लिखना, पढ़ना, बोलना और सुनना। लिखना और बोलना अभिव्यक्ति कौशल है तो पढ़ना और सुनना ग्रहण कौशल है। जब व्यक्ति कुछ कहना चाहता है तब वह लिखता है। हम कुछ लिखते हैं तब उसमें किसी के लिए दिया गया संदेश होता है। भाषा का उदय ही संदेश भेजने के लिए हुआ है। जब हम वर्णों को शब्दों में या वाक्यों में जोड़ते हैं तब उसके द्वारा संदेश पहुँचाने का काम पूर्ण होता है। जब हम लिखते हैं तब लेखन की सारी विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही हमें लिखना पड़ता है। लेखन का कोई भी प्रारूप हो, उसमें दो बातें आम होती हैं। एक है विशेष संदेश देना और दूसरा है किसी के लिए लिखना। लेखन के अनेक उप-कौशल हैं। कुछ विशुद्धता से जुड़े होते हैं। जैसे- शुद्ध वर्तनी, सही विरामचिह्नों का प्रयोग, सही प्रारूप, सही शब्दों का इस्तेमाल, व्याकरण नियम, सही वाक्यों का जोड़ तथा अनुच्छेद आदि बातें ध्यान में रखकर हमें लिखना पड़ता है। इन उप कौशलों के साथ ही हम अपने विचारों को संघटित रूप में तथा सुयोग्य शैली के साथ प्रस्तुत कर सकते हैं।
लेखन का इतिहास बहुत पुराना है। इसका आरम्भ 3300 ईसा पूर्व मेसोपोटामिया में हुआ था। उस समय किसी आदमी ने मिट्टी के बोर्ड पर राशन का रिकॉर्ड रखने के लिए पहली बार लिखा था। इंग्लैण्ड के एक संग्रहालय में वह बोर्ड आज भी सुरक्षित है। शोधकर्ता तो यहां तक मानते हैं कि 60000 से 25000 ईसा पूर्व आदमी हड्डियों और पत्थरों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचा करता था, जैसे हम कभी-कभार अकारण ही कॉपी या कागज पर खींच दिया करते हैं। हस्तलेखन के साथ-साथ अक्षरों का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। सुन्दर हस्तलिपि का अपना महत्व है। पहले अक्षर की खोज 1900 ईसा पूर्व सीनाई पेनिनसुला के लोगों ने की थी। समूची दुनिया में लिखावट का इतिहास बहुत दिलचस्प है। भारत में मोहन जोदड़ो और हड़प्पा के काल की खपड़ों की लिखावट ईसा से पाँच हजार साल पहले की बतायी जाती है। हमारी सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि हमें उस घड़े के ढक्कन से मिलती है जो पिप्रावा में पाया गया है और जिसमें भगवान बुद्ध के फूल रखे मिले हैं।
लेखन के इतिहास पर नजर डालें तो सम्राट अशोक ने स्तम्भ, टीले और पहाड़ की चट्टानों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी में बुद्ध धर्म के साथ ही अन्य उपदेशात्मक बातें खुदवाई थीं। इसके बाद ताड़, बाँस के पत्तों और भोजपत्रों पर खूब लिखा गया। ब्राह्मी लिपि के कई रूप बदले, भाषा के इतिहास ने कई करवटें बदलीं और धरती पर पोथियों की लम्बी परम्परा चली, फिर छापेखाने आए और हाथ की लिखावट वाली पोथियों के दिन लद गए। दुनिया में जितनी भी लिपियां हैं वे तीन तरह से चलती हैं। बाएं से दाएं जैसे देवनागरी या यूरोप की रोमन लिपि। दाएं से बाएं जैसे अरबी और फारसी। ऊपर से नीचे जैसे चीनी बोली की लिखावट। अभी तक ऐसी कोई लिपि देखने में नहीं आई जिसमें नीचे से ऊपर लिखा गया हो। भारत की देवनागरी लिपि सभी लिपियों में सबसे सुलझी हुई है। यह सस्वराक्षर लिपि न होकर ध्वन्यात्मक है। देवनागरी लिपि में हम जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं। अतः लिखने में कठिनाई नहीं होती क्योंकि जो अक्षर का नाम है, वही उसे देखकर बोला जाता है। यह विशेषता अन्य भाषाओं एवं लिपियों में नहीं है।
भाषा ही किसी देश के सभ्यता की प्राणवायु होती है, लिहाजा हर इंसान को लिखना-पढ़ना आना चाहिए और हाथ से न लिखने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। विकसित राष्ट्रों ने भले ही छात्रों को लैपटॉप या कम्प्यूटर से पढ़ाई करने, परीक्षा देने या नोट्स लेने की अनुमति दे दी हो परन्तु भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए यह उचित नहीं है। साफ-सुथरा लेखन जहां स्मरणशक्ति की वृद्धि में सहायक है वहीं सुन्दर हस्तलिपि का प्रभाव दूसरों पर भी अच्छा पड़ता है। आज संग्रहालयों में महान लेखकों, कवियों, कलाकारों की हस्तलिपि में समाया उनका कौशल आधुनिक पीढ़ी के लिए एक गम्भीर संदेश है। हमारे देश में महान हस्तियों से ऑटोग्रा या हस्ताक्षर लेने की जो परम्परा प्रचलित है वह लेखनी का ही कमाल है। ख्यातिलब्ध रचनाकारों ने अपने ग्रंथों का प्रणयन कागज-कलम के माध्यम से ही किया है। हमारे देश में पत्र-लेखन, डायरी-लेखन की परम्परा रही है लेकिन आज पत्र-लेखन की जगह मोबाइल सन्देशों ने ले लिया है जिससे हमारी भाषा विकृत हो रही है। आज जिस तरह शब्दों का संक्षेपीकरण किया जा रहा है, यह उचित नहीं है। विद्यार्जन उपाधियों के लिए हो या ज्ञान-पिपासा की शान्ति हेतु हमें लेखन के प्रति अनिच्छा नहीं दिखानी चाहिए। दरअसल, विद्यार्थी जीवन में ही तो हाथ से लिखने की अनिवार्यता होती है बाकी का कालखण्ड तो सीखने का होता है। खराब हस्तलिपि अभ्यास से सुधारी भी जा सकती है। आधुनिकता के नाम पर हम जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक कचरे के मोहपाश में फंसते जा रहे हैं, उससे पर्यावरण का खतरा उत्पन्न हो रहा है। इसका लगातार प्रयोग हमारी आंखों के लिए भी उचित नहीं है।
आधुनिक तकनीकी शिक्षा के बढ़ते प्रभाव का ही नतीजा है कि आज हमारी हस्तलिपि लोगों की आंखों को नहीं भाती। ऐसा नहीं कि हस्तलिपि का क्षरण सिर्फ भारत में ही हो रहा है। इस मामले में अन्य देशों की  स्थिति भी ताली पीटने लायक नहीं है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय को ही लें, छात्र-छात्राओं के खराब हस्तलेखन को देखते हुए वह अपनी आठ सौ वर्ष पुरानी लिखित परीक्षा की परम्परा समाप्त करने पर विचार कर रहा है। विद्यार्थियों की खराब हस्तलिपि को देखते हुए दुनिया के अन्य विश्वविद्यालय भी अब लैपटॉप या आईपैड पर परीक्षा के पक्ष में हैं। हस्तलेखन के प्रति लगातार बढ़ती अरुचि हमारे अपने देश के लिए भी चिन्तनीय विषय है। पहले छात्र एक दिन में नियमित रूप से कुछ घण्टे हाथ से लिखते थे, लेकिन अब परीक्षा के अलावा हाथ से लिखना युवा पीढ़ी समय की बर्बादी मानती है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की ही तरह अन्य देशों के विश्वविद्यालय भी यदि हस्तलेखन की बजाय लैपटॉप या कम्प्यूटर के उपयोग को विकल्प के रूप में स्वीकृति प्रदान करते हैं तो निश्चित रूप से हाथ से लिखने की परम्परा पर यह करारा प्रहार होगा।
बेशक इक्कीसवीं सदी में संचार माध्यमों ने लोगों के जीवन में गहरी पैठ बना ली हो लेकिन हाथ से लिखने की कला और इस परम्परा की बात ही अलग है। विद्यार्थी को हाथ से लिखने के लिए प्रेरित करने की बजाय लैपटॉप या कम्प्यूटर के उपयोग की स्वीकृति दे देना सही नहीं है। हस्तलिपि हमें संवेदना के धरातल से जोड़ती और मन में अद्भुत भावों का संचार करती है। ऐसे में हस्तलेखन को हतोत्साहित करना ठीक नहीं है। मुझे बचपन के दिन याद आते हैं जब विद्यालय में प्रतिदिन एक कालखण्ड सुलेख लेखन का हुआ करता था। सुलेख प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। सुन्दर, साफ़-सुथरी हस्तलिपि वाले विद्यार्थियों को कक्षा में विशेष महत्व दिया जाता था लेकिन आज के छात्रों में भाषा के शुद्ध लेखन और वाचन के प्रति जरा भी अनुराग नहीं है। भाषा का ज्ञानार्जन युवाओं की प्राथमिकता में नहीं है। आज की युवा पीढ़ी शरीर ही नहीं दिमा का भी कम से कम उपयोग करना चाहती है। हरेक जानकारी के लिए वह इण्टरनेट पर निर्भर है। पुस्तकालयों तक जाने, सन्दर्भ ग्रन्थों को खंगालने या पृष्ठ पलटने में उसकी दिलचस्पी शून्य हो चली है।

सोचने की बात है कि विद्यार्थी जीवन में ही कुछ घण्टों तक नियमित रूप से लिखने-पढ़ने की बाध्यता होती है। अगर विद्यार्थी ऐसा नहीं करते तो उन्हें समझाया जा सकता है। हस्तलिपि भी सबकी खराब नहीं होती इसलिए कुछेक विद्यार्थियों के चलते शताब्दियों से चली आ रही परम्परा को तिलांजलि देने का निर्णय बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। इन दिनों भारत को डिजिटल इण्डिया बनाने का राग अलापा जा रहा है। मोबाइल फोन का उपयोग कितना घातक है, यह जानने के बावजूद सरकारें विद्यार्थियों को मुफ्त में फोन बाँट रही हैं। मेधावी के नाम पर कुछ को मुफ्त में लैपटॉप भी बाँटे जा रहे हैं। इससे छात्र-छात्राएं आलसी हो रहे हैं। वे कोई सूचना, जानकारी, समयसारिणी, पाठ्यक्रम आदि नोटबुक में कलम से नहीं लिखना चाहते। मोबाइल फोन से फोटो खींचकर सब कुछ सुरिक्षत रख लेना पसन्द करते हैं। सरकारी उदारता से तो लिखने की कला ही उपेक्षित होगी, जोकि कतई उचित नहीं है। ज्ञान किसी भी क्षेत्र का हो, पढ़ने के साथ-साथ उसका लिखा जाना भी आवश्यक है।