गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

वियोग में आँखों का रोना

जार-जार रोती हैं आँखें
एक बियावान दृश्य सामने उभरता है
जिसकी परिक्रमा में
नींद आँखों से विदा नहीं माँगती
बल्कि परित्याग कर अनायास
दूर चली जाती है।
इस तलाश में कल जो नींद में आया था
और  कुछ जो अपनी आहट से
मेरे एहसास पर हल्की-हल्की थपकी
देकर चला गया था,
उसी के वियोग में आँखों का रोना
निरंतर जारी है।
वह सपनों में आने वाला कौन था
जिसे मैं बार-बार समझने
और उसके आने के औचित्य को,
अपनी आंखों की सतह पर
उभर आए पदचिन्हों को
व्याख्यायित करने की
कोशिश कर रही हूँ क्योंकि
सपनों में किसी का आना
दुर्भाग्य और सुखद संयोग का
एक संकेत होता है।
मैं सपनों में आए उस
संकेत के साथ जीना चाहती हूँ ।
 एक निश्चित अपने दायित्व की
     नींव रखने हेतु।।
                  -रीभा तिवारी 

प्रतीक्षा की धूप में

तप-तप कर
अनुभूतियों की अतल गहराइयों में
तैर रहे प्रश्नों को पकड़ने की कोशिश में
तुम्हारी निराकृत तस्वीर से पूछती हूँ
शब्दों के फ्रेम में,
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।

चैन की सम्पूर्ण परिधियों को तोड़ते हुए
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।

रह-रह कर याद आना
समझ  में तो आता है
लेकिन अनायास विस्मृतियों के
दरीचे में खो जाना यह क्या है?
कहीं मेरी यादों की ग्रन्थियों को
चीरने की कोशिश तो नहीं?

 अगर मैं पूछूं कि क्या तुम्हारा भी
 नींद की गहराइयों से एकाएक
 चौंक कर जाग उठना
 मुझे याद करना जारी है।

अपनी यादों की चुप्पी के बारे में
कुछ सोचा नहीं है
अगर तुमने कुछ सोचा है तो बता देना
सुबह की पहली किरण के साथ
सुबह की पहली किरण के साथ।

-रीभा तिवारी
                       
                

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

अभिव्यक्ति की दुश्वारियां

आईटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वाभाविक ही चौतरफा स्वागत हुआ है। यह कानून इण्टरनेट और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का जरिया बन गया था। ऐसे कई मामले सामने आए जब इस कानून के तहत महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में मनमाने ढंग से गिरफ्तारियां हुर्इं। बात सिर्फ इतनी नहीं थी। देश में अन्य कानूनों के भी बेजा इस्तेमाल के अनेकों उदाहरण हैं। अभिव्यक्ति की आजादी ने साइबर क्षेत्र से जुड़े लोगों के चेहरे पर मुस्कान तो ला दी पर इसकी अति के गम्भीर परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति की आजादी चाहना बुरी बात नहीं है लेकिन इसका आजकल जिस तरह दुरुपयोग हो रहा है, वह अखरने वाली बात जरूर है।
यह सच है कि हमारी हुकूमतों ने जब-जब नागरिक अधिकारों को कुचलने के कदम उठाए गए हैं, न्यायपालिका ने नागरिकों का ही पक्ष लिया है। सर्वोच्च अदालत का ताजा फैसला इसी परिपाटी की ही एक कड़ी है। 2008 में बने आईटी अधिनियम के मुताबिक इण्टरनेट या सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और आहत करने वाली सामग्री डालना अपराध था। इस प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि किसी भी बात को आहत पहुंचाने वाला करार देकर धड़ाधड़ पुलिस में शिकायतें दर्ज कराई जाने लगीं। जो शिकायतें राजनीतिज्ञों या रसूख वाले लोगों की तरफ से आर्इं उन पर पुलिस ने फौरन कथित आरोपियों को गिरफ्तार भी किया। इस मामले में सर्वोच्च अदालत का मानना है कि जो बात किसी को आपत्तिजनक या आक्रामक लग सकती है, वह किसी और को कहने लायक भी लग सकती है, उसे पसंद भी आ सकती है। अगर महज चिढ़ाने या आहत करने के आरोप में कार्रवाई की जाएगी, तो असहमति का इजहार करना असम्भव हो जाएगा और फिर अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ भी नहीं रहेगा। संविधान की धारा 19 (1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल है। यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान ने धारा 19 (2) के तहत कुछ मर्यादाएं तय की हैं। मसलन, राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर आंच आने, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होने, समुदायों के बीच वैमनस्यता पैदा करने की स्थितियों में सम्बन्धित सामग्री को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, यानि ये मर्यादाएं ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। इसी तरह मानहानि से सम्बन्धित कानून पहले की ही तरह प्रभावी रहेगा। अगर किसी वेबसाइट को लेकर धारा 19 (2) के तहत तय की गई मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायत हो, तो उसे बंद करने का सरकार को अधिकार होगा। जो भी हो सर्वोच्च न्यायालय ने असहमति और आलोचना को साइबर अपराध का रंग देकर नागरिकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गुंजाइश जरूर समाप्त कर दी है।
आज संचार क्रांति का युग है और यह बहुत तेजी से दुनिया भर में अपने पैर पसार रहा है। सोशल मीडिया की पहुंच हर घर की चौखट तक है। हर व्यक्ति अपने स्तर से इसका उपयोग कर रहा है। यह हमारे जीवन की आवश्यकता बन चुका है। इसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है। वजह पलक झपकते ही देश-दुनिया को जान लेने की इसकी सहूलियत है।  सोशल मीडिया से हम वस्तुगत स्थिति से घर बैठे ही परिचित हो जाते हैं जो हमारे ज्ञान वृद्धि में मददगार साबित होता है। इसमें अच्छाइयां हैं तो बुराइयां भी कम नहीं हैं। कई बार नकारात्मक सूचनाएं हमारे मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं तो दिल दहला देने वाली हिंसक वारदातें कई दिनों तक हमें अशांत रखती हैं। इंटरनेट ने एक-दूसरे को आपस में जोड़ने का काम किया है। हम अपनों से दूर और दूसरों के बहुत करीब पहुंच गए हैं। यह जान और सुनकर अटपटा जरूर लगता है, पर सच यही है। जो समय हमें अपने परिवार और घर के अन्य सदस्यों के बीच साझा करना चाहिए, उनके सुख-दु:ख के बारे में जानना-सुनना चाहिए उसे हम हम नेट, मोबाइल, फोन, फेसबुक, व्हाट्सएप को दे रहे हैं। क्या बच्चे, युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग जिसे देखिए वही इण्टरनेट के मोहपाश से बंधा हुआ है। सुध-बुध खोते इंसान को अपनों ही नहीं, अपने भी सोने-जगने की सुध नहीं रही। सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने कई सवालों को जन्म दिया है। मसलन, जब समाज में इंटरनेट या सोशल मीडिया का चलन नहीं था तब क्या हमारा समाज नहीं जीता था? क्या हममें जानकारी का अभाव था? क्या हम अपनी प्रतिभा को निखारने में पीछे थे?
दरअसल आज हमारा समाज अति का शिकार है, उसे कोई बंदिश पसंद नहीं है। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद हम गर्वोक्ति महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया का उपयोग सही है और आज के परिवेश में जरूरी भी लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में भी चौकस रहने की जरूरत है। जिस इंटरनेट के बिना जीवन थम सा जाता है वही हमारी रातों की नींद और दिन का चैन भी हराम कर रहा है। सोशल मीडिया दुरुपयोग के मामले आये दिन सामने आ रहे हैं। हम न केवल इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि शब्दों पर भी संयम और शुद्धता नहीं रही। एसएमएस के जरिए हम जिन अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे भाषा विसंगति को ही बढ़ावा मिल रहा है। इंटरनेट में अश्लीलता भी कम नहीं है। लोग अश्लील वीडियो डाउनलोड कर अपना ही नहीं समाज के लिए भी बुरा कर रहे हैं।  कुसंगत के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। अतीत में बच्चा अपनी किसी भी जिज्ञासा को लेकर माता-पिता या अभिभावक से सवाल किया करता था। अपनी हर छोटी से छोटी बात को पूछता या शेयर करता था लेकिन अब तो उसे भी मालूम है कि हर प्रश्न का उत्तर इण्टरनेट में मौजूद है। गाहे-बगाहे कोई बच्चा यदि अपने अभिभावक से कोई सवाल भी करता है तो वे नेट पर ही सर्च करने की सलाह देते हैं। मानो नेट मैजिक स्टिक बन गया हो, हर समस्या का समाधान उसी में हो।
आज का यंगिस्तान अपनी ऊर्जा किसी सकारात्मक कार्य में लगाने की बजाय अपना छह-सात घण्टे का बहुमूल्य समय सोशल मीडिया को दे रहा है। इण्टरनेट नशा बन गया है। दो-चार लोग कहीं मिलने-जुलने भी जाते हैं तो वहां भी आपस में बात करने की बजाय नेट पर ही मशगूल हो जाते हैं। एक जगह बैठकर काम करने, बिना पलक झपकाए टेलीविजन, मोबाइल और कम्प्यूटर पर लगे रहने से मानसिक और शारीरिक बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इन उपकरणों से निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणें हमारे लिए नुकसानदेह साबित होती हैं। इससे हमारी आंखों और मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जरूरी है कि इन उपकरणों का हम उचित तरीके से जरूरत के हिसाब से ही उपयोग करें वरना यह सोशल मीडिया अनचाही बीमारियों की गिरफ्त में ला देगा।