तप-तप कर
अनुभूतियों की अतल गहराइयों में
तैर रहे प्रश्नों को पकड़ने की कोशिश में
तुम्हारी निराकृत तस्वीर से पूछती हूँ
शब्दों के फ्रेम में,
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
चैन की सम्पूर्ण परिधियों को तोड़ते हुए
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
रह-रह कर याद आना
समझ में तो आता है
लेकिन अनायास विस्मृतियों के
दरीचे में खो जाना यह क्या है?
कहीं मेरी यादों की ग्रन्थियों को
चीरने की कोशिश तो नहीं?
अगर मैं पूछूं कि क्या तुम्हारा भी
नींद की गहराइयों से एकाएक
चौंक कर जाग उठना
मुझे याद करना जारी है।
अपनी यादों की चुप्पी के बारे में
कुछ सोचा नहीं है
अगर तुमने कुछ सोचा है तो बता देना
सुबह की पहली किरण के साथ
सुबह की पहली किरण के साथ।
-रीभा तिवारी
अनुभूतियों की अतल गहराइयों में
तैर रहे प्रश्नों को पकड़ने की कोशिश में
तुम्हारी निराकृत तस्वीर से पूछती हूँ
शब्दों के फ्रेम में,
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
चैन की सम्पूर्ण परिधियों को तोड़ते हुए
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था
तुम अब भी याद आओगे मालूम न था।
रह-रह कर याद आना
समझ में तो आता है
लेकिन अनायास विस्मृतियों के
दरीचे में खो जाना यह क्या है?
कहीं मेरी यादों की ग्रन्थियों को
चीरने की कोशिश तो नहीं?
अगर मैं पूछूं कि क्या तुम्हारा भी
नींद की गहराइयों से एकाएक
चौंक कर जाग उठना
मुझे याद करना जारी है।
अपनी यादों की चुप्पी के बारे में
कुछ सोचा नहीं है
अगर तुमने कुछ सोचा है तो बता देना
सुबह की पहली किरण के साथ
सुबह की पहली किरण के साथ।
-रीभा तिवारी

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