रविवार, 8 फ़रवरी 2015

समझें नौनिहालों की भावना

कौन नहीं चाहता की हमारी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर पैसा, इज्जत और शोहरत कमाए। हजारों कल्पनाओं के बीच ही तो हम अपने लाड़ले को पालते हैं और वक्त के साथ-साथ हमारी उम्मीदें बढ़ती जाती हैं। उम्मीद करना सही बात है लेकिन किससे और कितनी उम्मीद की जाए इसका भी ख्याल रखना जरूरी है। हम कहीं अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद तो नहीं कर बैठते जो वे पूरा ही न कर सकें।
कहने को तो जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं लेकिन हर काम हर किसी के लिए सम्भव हो यह भी तो जरूरी नहीं। सबकी अपनी-अपनी पसंद-नापसंद, रुचि-अरुचि होती है। हम बच्चों के बारे में बिना कुछ जाने-सोचे उसके ऊपर कुछ भी थोप दें, यह सही नहीं है। खासकर बच्चों से जब भी हम कुछ उम्मीद करें उनकी  रुचि-अरुचि के बारे में जरूर जानकारी रखें क्योंकि बिना मन से किया हुआ कोई भी कार्य कभी पूर्ण नहीं होता। जिस काम में हमारी रुचि होती है, वह काम मानो बोलता है। जब काम बोलने लगता है तो आप किसी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते न ही किसी बाह्य दिखावे में उलझते हैं वरना उस काम को आप और तल्लीनता के साथ करने में जुट जाते हैं।
माता-पिता को अपने बच्चों से उम्मीद रखनी चाहिए लेकिन उम्मीद रखने से पहले बच्चों की राय भी जानना जरूरी है। उनसे इस विषय में खुलकर बात करें और किसी भी कार्य को बेहतर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं और उसके परिणाम-दुष्परिणाम के बारे में भी अवगत कराएं। अक्सर माता-पिता की यह शिकायत होती है कि उनके बच्चे खेलकूद  तो बेहतर हैं लेकिन पढ़ाई का नाम लेते ही उनकी तबियत खराब हो जाती है। ऐसे में बच्चे को खेल-खेल में ही पढ़ना सिखाएं। जरूरी नहीं कि आप बच्चे को सिर्फ किताबी ज्ञान ही दें। पढ़ाई के बहाने उन्हें व्यावहारिक ज्ञान भी अवश्य दें। यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बच्चे से हर दिन किसी न किसी विषय पर चर्चा करें। इससे भी उसमें जानने-समझने की लालसा बढ़ेगी। वह हर दिन कुछ नया करने की कोशिश करेगा।
अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि माता-पिता अपने बच्चों में भी तुलना करने लगते हैं कि ये अच्छा है और ये नहीं। ऐसा करने से हमें बचना चाहिए। हर बच्चे में अलग-अलग प्रतिभा मौजूद रहती है। जरूरत है समय रहते उसे पहचान कर निखारा जाए । हर बच्चा महान बन सकता है बशर्ते कि उसकी प्रतिभा की पहचान सही समय पर कर ली जाए। माता-पिता और शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों को सही राह दिखाएं। उचित-अनुचित का संज्ञान कराएं। बच्चे को बात-बात पर झिड़कने की बजाय उसे प्रेम से अपनी बातें समझाएं और उनकी बातों को भी ध्यान से सुनें, ऐसा करने से बच्चे में न केवल समझ पैदा होगी बल्कि वह आपकी हर बात मान लेगा ।
देखने में आया है कि अभिभावक बच्चे का मूल्यांकन उसके कक्षा में प्राप्त अंकों से करने लगते हैं। अंकों से किसी बच्चे की बुद्धि और क्षमता का मूल्यांकन किया जाना सही नहीं है। एक कक्षा में अगर 50 से 100 बच्चे पढ़ते हैं तो यह जरूरी नहीं है कि सभी बच्चे टाप करें। हर बच्चे की अपनी काबिलियत और रुचि होती है। किसी में नेतृत्व क्षमता होती है तो कोई कला में विशेष रुचि रखता है। किसी का मन खेलों में लगता है तो कोई पठन-पाठन में ध्यान देता है। यह तय है कि जो बच्चा जिस विषय पर अधिक रुचि लेगा, उसे उसमें अन्य विषयों से बेहतर सफलता मिलेगी।
अफसोस, आज हर माता-पिता अपने नौनिहाल का मूल्यांकन उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट से करते हैं।  उसके सामाजिक और भावनात्मक पक्ष का जरा भी ध्यान नहीं रखते। आज इसी वजह से रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है जिससे बच्चे अपनी रुचि के अनुरूप विषय का चयन कर सकें। आज मूल्यांकन की जो भी पद्धतियां हंै उनमें कई खामियां हैं। बच्चे के विषयगत ज्ञान का मूल्यांकन उसके रिपोर्ट कार्ड से तो जरूर किया जा सकता है लेकिन बच्चा अपने जीवन और भविष्य में कितना सफल होगा यह विषयगत मूल्यांकन नहीं बता सकता।
यह उसकी किसी काम के प्रति रुचि, उसका स्वयं का व्यवहार, उसका लोगों के साथ सम्बन्ध, कार्यकुशलता, व्यवहार में लचीलापन, काम के प्रति समर्पण के भाव जैसी तमाम बातों पर निर्भर करता है। जो जीवन में जितनी सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेगा, वह उतनी ही अधिक सफलता अर्जित करेगा। क्या यह सच नहीं कि विश्वविद्यालय जिसे गोल्ड मेडल देता है, जिन्दगी उसे मिट्टी के मेडल भी नहीं दे पाती।  
अक्सर देखने को मिलता है कि माता-पिता बच्चों के परीक्षाफल को लेकर ज्यादा चिंतित हो जाते हैं। कई बार तो ऐसा देखने को भी मिलता है कि बच्चे से ज्यादा माता-पिता इसे सोशल स्टेटस मान बैठते हैं जिसका दुष्परिणाम कभी-कभी बहुत ही भयंकर रूप में देखने को मिलता है। मन के अनुकूल रिपोर्ट कार्ड नहीं आने पर बच्चा आत्महत्या की कोशिश कर बैठता है और इसमें भी असफल रहा तो मानसिक तनाव से गुजरने लगता है जो उसके साथ-साथ पूरे परिवार के लिए घातक हो जाता है।  ज्ञान, शिक्षा और मूल्यांकन की अहमियत अपनी जगह ठीक है लेकिन जीवन और इंसान से बढ़कर कुछ भी नहीं। जीवन सुरक्षित है तो कई परीक्षाएं होंगी। कभी हम पास तो कभी फेल होंगे लेकिन अगर जीवन ही नहीं रहा तो फिर कैसी परीक्षा, कैसा मूल्यांकन और कैसा सोशल स्टेटस? 

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