शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रेम जीवन का आधार

हर दर्द की दवा इश्क में है,
जीने का मजा इश्क में है।
इधर-उधर जो ढूंढ़ते हैं खुदा को,
कोई उनसे कह दे कि खुदा इश्क में है।
व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ प्रेम ही चाहता है। रुपया-पैसा, धन-दौलत, इज्जत-शोहरत के बावजूद जीवन में प्रेम न हो तो सब बेईमानी है। शायद ही कोई हो जिसे प्रेम न हो और प्रेम न चाहता हो। इसके बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम ईश्वर है, प्रेम पूजा है। प्रेम वह स्पर्श है जो एक शिशु भी महसूस कर लेता है। प्रेम वह भाव है जो एक बालक भी पढ़ लेता है। प्रेम वह अभिव्यक्ति है जो बिना बोले ही सामने वाला महसूस कर लेता है। जब प्रेम होता है तो कुछ भी नहीं सूझता। प्रेम किसी को किसी से किसी भी समय किसी रूप में हो सकता है। प्रेम न जाति, न धर्म और न ही उम्र की सीमा देखता है, यह किसी भी परिस्थिति में हो सकता है। प्रेम की व्याख्या भले ही लोगों ने अलग-अलग तरीके से की हो लेकिन इसे पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। प्रेम सिर्फ देना जानता है यानि प्रेम समर्पण है। प्रेम खोना जानता है। सच तो यही है प्रेम वही समझ सकता है जो प्रेम के लिए जिया हो, प्रेम में जिया हो।
     प्रेम, प्रीत, प्यार, इश्क, चाहत, आशिकी, अनुराग, दीवानगी, मुहब्बत जो भी नाम दें, प्रेम तो प्रेम है। एक बड़ा ही कोमल नाजुक सा एहसास जिसे सिर्फ प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम मानो जीवन हो प्रेम के बिना कैसा जीवन किसका जीवन किसके लिए जीना सब व्यर्थ। प्रेम पूर्णता का एहसास कराता है। जो व्यक्ति स्वयं प्रेम में पूर्ण हो, वही प्रेम दे सकता है। प्रेम स्व आत्मविश्वास को भी बढ़ता है और  जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटने का हौसला भी देता है। प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है। प्रेम आकर्षण से शुरू होता है, विचारों के मेल से बढ़ता है और दबता है तो सिर्फ मजबूरियों से।
रिश्तों की तपती मरुभूमि में शीतल जल की फुहार है प्यार। प्यार वह शै है जो हर दिल में जला करती है। यह एक अहसास है जिसे रुह से महसूस किया जा सकता है। यह नूर की वह बूंद है जो सदियों से इंसानी दिलों में बह रही है। यह एक मधुर, सुखद अनुभव है, जो जीवन को नई ऊर्जा से भर देता है। कल्पनाओं से परे प्रेम की एक अलग दुनिया होती है। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं होता, न कोई निर्धारित नियम है। न उम्र की सीमा होती है न रिश्तों का बंधन। यह एक भाव है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। प्यार सिर्फ 'प्रेमी' और 'प्रेमिका' के मध्य निर्धारित सम्बन्ध ही नहीं बल्कि हम अपने और पराए सबके लिए दिल के किसी कोने में कोई अलग सा अहसास महसूस करते हैं। जिसने एक बार यह भाव महसूस किया उसके लिए जीवन के मायने बदल जाते हैं। प्यार का केन्द्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती। प्यार करने वाले ने जाति, धर्म और देश की सीमाओं को हमेशा चुनौती दी है। शायद यही कारण है कि जाति और धर्म के रखवालों ने हमेशा ही प्रेम का विरोध किया है। प्रेम में वह क्षमता है जो हर बंधन को अपने प्रवाह में बहा ले। जब तक हम प्रेम को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगे तब तक समाज से नफरत और हिंसा खत्म नहीं होगी। प्यार ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इसके जैसी सृजनात्मक ऊष्मा किसी दूसरे सम्बन्धों में नहीं मिलती। स्वप्न, सौंदर्य, आनंद, उत्तेजना कुछ कर गुजरने की तमन्ना एक साथ न जाने कितनी धारायें हृदय में फूट पड़ती हैं। अभिव्यक्ति का कोष रिक्त हो जाए, विचारों में शून्यता आ जाए फिर भी मन के अंदर ये एहसास ऊर्जा कायम रखने में सक्षम है। हर इंसान के जीवन में कभी न कभी ऐसा क्षण जरूर आता है जब अचानक कोई उसे अच्छा लगने लगता है। दिल में उसकी तस्वीर उतर आती है। आंखें हर पल बस उसे ही देखना चाहती हैं। उसके ख्यालों में खोया रहना भला लगता है। शायद यही प्यार की शुरुआत  है, लेकिन इन भावों की अभिव्यक्ति भारतीय समाज में सहज नहीं है। मन जिसकी ओर खिंचता है, बहुत कम लोग उसके समक्ष अपने हाल-ए-दिल का इजहार कर पाते हैं। ज्यादातर भावनाएं एक सुखद, कोमल अहसास की तरह दिल की गहराइयों में दफन कर दी जाती हैं।
वास्तव में सच्चे प्यार की अनुभूति ऐसी ही होती है जो रगों में लहू, दिल में धड़कन और सीने में सांसों की तरह समा जाती है, जिसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल सा जान पड़ता है। लेकिन आज जिस तरह से आधुनिकता का रंग हर तरफ सिर चढ़ कर बोलने लगा है तो प्रेम कैसे अछूता रह जाए। प्रेम को भी बाजारवाद ने अपने रंगों में रंग लिया है। एक सप्ताह ही प्रेम के नाम जिसमें रोज डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किश डे, वेलेंटाइन डे मानो सप्ताह के संडे, मंडे  तो  गायब ही हो गए हों, ऊपर हम जिस रुहानी प्रेम की बात कर रहे थे वह प्रेम बिना देखे, बिना छुए, बिना आलिंगन किये, बिना किसी उपहार के अदान-प्रदान किए  ही हम एक-दूसरे से मीलों दूर बैठे भी महसूस कर लेते हैं लेकिन ऐसा प्यार जो बाजारवाद से प्रभावित होकर कुछ देर के लिए मौज-मस्ती के लिए, उपहारों के अदान-प्रदान के लिए किया जाता है, वह प्रेम रुहानी प्रेम जैसा हो ही नहीं सकता। प्रेम कुछेक दिनों में बंधने वाला नहीं, यह तो हर बंधन से परे है, उन्मुक्त है। यह किसी आलिंगन, किसी उपहार, किसी डे में बंधना नहीं जानता यह पल-पल सांसों में बसने वाला, धड़कनों के साथ लयबद्ध होकर चलने वाला होता है। यह ऐसा एहसास है जिसे कोई और नहीं प्रेम करने वाला ही महसूस कर सकता है। प्रेम सिर्फ प्रेम है, यह न किसी दिन, न ही किसी दिवस का मोहताज, बस इसे रहती है सच्चे आशिकी की तलाश तभी तो कहते हैं इसे अबूझ प्यास।
        

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