मंगलवार, 31 जनवरी 2017

हर मन को भाये ऋतुराज वसंत

वसंत पंचमी पर विशेष
-डा. रीभा तिवारी
सरस्वती पूजा ने अन्य पर्वों के भांति अपना विशिष्ट रूप धारण कर लिया है। हमारे देश के एक बड़े भूभाग में सरस्वती पूजा एक पखवाड़े तक मनाया जाता है। यहीं से भारतीयों का कंठ खुलता है, जो दो महीने तक कोयल के पंचम स्वर में मिलकर होली धम्मार गाते रहते हैं। यदि वसंत पंचमी नहीं आई तो वसंत कहां से आ सकता है। सारा ऐश्वर्य तो उस पंचमी का ही है। वसंत के सौंदर्य को कोई कैसे नहीं गाएगा और किसने नहीं गाया। गा-बजाकर आगमन की सूचना देने की दिव्यकला तो देवी के ही प्रसाद से सम्भव है। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। सरस्वती जी वीणा संगीत की, पुस्तक विचार की और मयूर वाहन नृत्य कला की अभिव्यक्ति नहीं तो क्या हैं। आम भाषा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। पशु को मनुष्य बनाने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है। मान्यता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने के बाद मनुष्य की रचना की। मनुष्य की रचना के बाद उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य की रचना-मात्र से सृष्टि की गति को संचालित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अनुभव किया कि निःशब्द सृष्टि का औचित्य कुछ नहीं हो सकता क्योंकि शब्दहीनता के कारण विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था। अभिव्यक्ति के माध्यम के नहीं होने से ज्ञान का प्रसार नहीं हो पा रहा था। इसके बाद उन्होंने विष्णु की अनुमति लेकर एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना की जिसके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वर मुद्रा तथा अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी।
सरस्वती को अगर स-रसवती कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। वह रस से युक्त हैं। ज्ञान भी रस पेशल है। उसका भी जल के समान कोई रूप-आकार नहीं। जल की सारी विशेषताओं को वह सम्पूर्णता में धारण करती हैं। जैसे जल सतत प्रवाहित होने वाला है। जल पात्रानुसार अपना रूप धारण करता है। जल रस रूप है। जल जीवन समरूप है। तृष्णा की शांति जल से ही सम्भव है। जल रस रूप में ही अवतीर्ण है अतः सबको रसावृत भी करता है। जल का स्वभाव शीतलता प्रदान करना है। वह ताप प्रदान करने पर गर्म भी होता है, फिर भी स्वभाव से शीतल होने के कारण आग को बुझाने वाला वही होता है। उसके बिना संसार का जीवन कठिन है। पृथ्वी पर जल की मात्रा सर्वाधिक है। ठीक इसी प्रकार हम इन सारी विशेषताओं को ज्ञान में अन्तर्विष्ट पाते हैं। यह ज्ञान भी जल की भांति एक से दूसरे व्यक्ति में सतत प्रवाहित होने वाला है। इसलिए जल की भांति यह भी सनातनता को प्राप्त किए हुए है।
यह ज्ञान भी पात्रता के अनुसार प्राप्त होता है जैसे समुद्र के पास जाने वाला यदि एक लोटा लेकर जल की इच्छा करता है तो वह वहां से उससे अधिक प्राप्त नहीं कर सकता यद्यपि वहां जल का महार्णव लहरा रहा है। इसी प्रकार विद्या के महार्णव से भी बिना पात्रता के अधिक ज्ञानार्जन नहीं किया जा सकता। शास्त्रों में इसलिए विद्या के साथ विनय और पात्रता के प्रथम सम्बन्ध की संहिति स्वीकार की गई है। फिर कल्पलता की भाँति विनय और पात्रता को धारण कर वह विद्या, धन, धर्म और अंत में सर्वसुख को प्रदान करने वाली सिद्ध होती है। जैसे जल निर्मल है, शांत है, उज्ज्वल है उसी प्रकार ज्ञान भी प्रत्यक्ष होते हुए भी प्रच्छन्न है। उसे देखा नहीं जा सकता बल्कि अनुभव किया जा सकता है। उससे शीतल हुआ जा सकता है। वाणी का मोल भी यही है।
ऐसी बानी बोलिये मन का आप खोय,
औरन को शीतल करै आपहुं शीतल होय।
ज्ञान का क्षेत्र असीम है। सभी चेतन इस ज्ञान या विवेक के ही पीछे हैं। ज्ञान से पवित्र वस्तु की कल्पना इस जगत में नहीं की जा सकती। नहिं ज्ञानेन सदृशं पवित्रं महिविध्यते। अतः ज्ञान की एकमात्र अधिष्ठात्री देवी के रूप में सरस्वती को अंकित किया जाना उसके लक्षित रूप को ही प्रत्यक्ष करना है। सरस्वती का जन्मकाल वसंत पंचमी के अवसर को माना जाता है। इस वसंत को भगवान ने अपने ऐश्वर्य से मंडित किया है। ऋतुओं में मैं वसंत हूं, कुसुमाकर हूं। समस्त धरा अपनी निहित श्री को इसी काल में प्रत्यक्ष और प्रगट करती है। जल, थल, नभ तीनों पर इसका समान प्रभाव होता है। दरअसल ऋतुओं का यह परिवर्तन सूर्य से सम्बन्ध रखता है। सूर्य से प्राप्त अग्नि की ऊष्णता जब ठीक से पृथ्वी पर आने लगती है तभी वसंत है। वसंत शब्द की उत्पत्ति में यह अर्थ छिपा हुआ है। वसंतो अत्र अग्नयः अर्थात् अग्नि का समस्त पृथ्वी पर विकास हो जाना ही वसंत है।
सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश के साथ ही रतिकाम महोत्सव आरम्भ हो जाता है। यही वह अवधि है जिसमें पेड़-पौधे तक अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से आच्छादित दिखाई देते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध और भौंरों की गूँज से भरा होता है। मधुमक्खियों की टोली पराग से शहद लेती दिखाई देती है, इसलिए इस माह को मधुमास भी कहा जाता है। प्रकृति काममय हो जाती है। वसंत के इस मौसम पर ग्रहों में सर्वाधिक विद्वान शुक्र का प्रभाव रहता है। शुक्र भी काम और सौंदर्य का कारक है। इसलिए रति-काम महोत्सव की यह अवधि कामोद्दीपक होती है। वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रगट होते हैं। पंचतत्व जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। धरती मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे बिहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढ़ते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। धनी जहां प्रकृति के नव सौंदर्य के फूलों को देखने की लालसा प्रकट करने में लगते हैं वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है उसका। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है तब वसंत उसका सौंदर्य लौटा देता है। नवजात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है। वसंत का आरम्भ वसंत पंचमी से होता है। इसी दिन श्री अर्थात विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है। वाग्यदेवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। सरस्वती जी विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। यह हमारी बुद्धि प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। जिसके पास विद्या है उसी के पास बल है। अन्ततः श्री भी विद्यारत्नं महाधनम् किं-किं न साधयति कल्पलतेव विद्या। कहा भी गया है कि विद्याविहीन व्यक्ति पशु के समान है। आज के युग में जो राष्ट्र ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आकाश चूम रहे हैं वह सत्यतः सरस्वती के आराधक हैं। संसार में सर्वत्र वीणापाणि की उपासना हो रही है। विश्व की सभी भाषाओं में वर्ण, पद, वाक्य तथा काव्य उनकी यशोगाथा के ही विविध रूप हैं। लिपियां उनके स्वरूप की काल्पनिक रेखाएं हैं, हस्तलिखित सचमुच अपनी सारी शक्तियों के रूप में अन्तः बाह्य प्रदेश में सर्वत्र विराजमान हैं। देवताओं में ब्रह्मा, शिव, सूर्य तक सरस्वती के उपासक हैं।

सरस्वती को इस रूप में आज पहचानने की आवश्यकता है। महाकवि निराला ने पूरे भारत की कल्पना भारती के रूप में की है। भारती वंदना तथा देवी सरस्वती नामक दोनों कविताओं में इतिहास, भूगोल से लेकर सम्पूर्ण सांस्कृतिक चेतना को कवि ने रूपायित करने का सदुद्यम किया है। इसमें भारत की वैदिक विराट कल्पना के आधार पर ही सरस्वती का रूप अंकित किया गया है। महासरस्वती देवी की कृपा से ही संस्कृत के महान नाटककार कालिदास कवि एवं कालजयी कृतिकार स्वरूप प्रमाणित हुए। वाणी के वरद पुत्र हिन्दी के महान कवि तुलसीदास ने अपने मानस के आरम्भ में इसीलिए प्रथम प्रणाम निवेदित करते हुए लिखा है- वन्दे वाणी विनायकौ।

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