शनिवार, 27 मई 2017

खिलाड़ी बेटियां भेदभाव का शिकार


डा. रीभा तिवारी
संतति सुख को सामाजिक और पारिवारिक जीवन में सबसे बड़ा सुख माना जाता है लेकिन हमारे देश के कई राज्यों में आज भी बेटी का पैदा होना निराशा का सबब बन जाता है। बेटियों को अभिशाप मानने वाले हमारे समाज की सोच बदल रही है लेकिन जिस गति से बदलना चाहिए वैसा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक गरीब परिवार में बेटी का पैदा होना कल भी अभिशाप था और आज भी है। कुछ बेटियां गर्भ में ही मार दी जाती हैं तो कुछ बेटियां दहेज के चलते जिन्दा जला दी जाती हैं। समय बदल रहा है, हर क्षेत्र में बेटियां अपनी कामयाबी का परचम फहरा रही हैं। खेल के क्षेत्र में तो बेटियां पुरुषों से कहीं आगे हैं। एशियन खेल हों या ओलम्पिक इनके आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय बेटियां ही लगातार देश के गौरव को बढ़ा रही हैं। यह सब उन परिस्थितियों में हो रहा है जब देश की बेटियां भेदभाव का शिकार हैं।
खेल नियम-कायदों द्वारा संचालित ऐसी गतिविधि है जो हमारे शरीर को फिट रखने में मदद करती है। आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में अक्सर हम खेल के महत्व को दरकिनार कर देते हैं। आज के समय में जितना पढ़ना-लिखना जरूरी है उतना ही खेलकूद भी जरूरी है। एक अच्छे जीवन के लिए जितना ज्ञानी होना जरूरी है, उतना ही स्वस्थ होना भी जरूरी है। फुटबाल, क्रिकेट, शतरंज, टेनिस, टेबल टेनिस, कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, हॉकी सहित लगभग सभी खेलों में बेटियों का दखल है। भारतीय बेटियां विश्व पटल मुल्क का नाम रोशन कर रही हैं बावजूद उनके साथ भेदभाव जारी है। देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को ही लें जो सुविधाएं और अवसर पुरुष खिलाड़ियों को नसीब हैं वे महिला क्रिकेटरों को नहीं मिल रहे। जबकि क्रिकेट का संचालन उस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हाथ में है जिसके बैनर तले महिला और पुरुष दोनों खेलते हैं।
जब देश आईपीएल के खुमार में डूबा था उसी समय भारत की क्रिकेटर बेटियों ने दक्षिण अफ्रीका में चार देशों की एक दिवसीय प्रतियोगिता में तीन कीर्तिमान सृजित किए। 34 वर्षीय तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी ने जहां एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक विकेटों का कीर्तिमान अपने नाम किया वहीं भारत की दीप्ति शर्मा ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए महिला एकदिवसीय क्रिकेट की दूसरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी खेली और इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। 19 वर्षीय दीप्ति ने आयरलैंड के खिलाफ 188 रन बनाए। यह अब तक किसी भी भारतीय महिला खिलाड़ी का सबसे बड़ा निजी स्कोर है। साथ ही महिला क्रिकेट में यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक की दूसरी सबसे बड़ी पारी है। महिला क्रिकेट में सबसे बड़ी पारी का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क के नाम दर्ज है जिन्होंने 1997 में डेनमार्क के खिलाफ मुम्बई में 229 रन बनाए थे। दीप्ति के व्यक्तिगत रिकॉर्ड के अलावा इस मैच में एक और बड़ा रिकॉर्ड दर्ज हुआ। दीप्ति और उनकी सलामी जोड़ीदार पूनम राउत ने 320 रन जोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पहले विकेट की सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड बनाया। महिला क्रिकेट में यह पहला मौका था जब किसी जोड़ी ने 300 का आंकड़ा छुआ या पार किया। पुरुष वनडे क्रिकेट में पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड उपुल थरंगा और सनथ जयसूर्या के नाम है। श्रीलंका की इस जोड़ी ने 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ 286 रन की साझेदारी की थी।
बीते साल रियो ओलम्पिक में जब भारतीय पुरुष खिलाड़ी एक अदद पदक के लिए जूझ रहे थे ऐसे समय में पहलवान साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक दिलाकर भारत की रीती झोली को आबाद किया। साक्षी के इस प्रदर्शन से शटलर पी.वी. सिन्धू का मनोबल बढ़ा और उसने चांदी का पदक जीतकर मायूस खेलप्रेमियों को पुलकित होने का अवसर प्रदान किया। इन दोनों बेटियों ने अपने शानदार प्रदर्शन से भारत के प्रत्येक माँ-बाप को यह सोचने को मजबूर कर दिया कि बेटियां भी समय आने पर देश का मान-सम्मान बचा सकती हैं। साक्षी मलिक ने साबित कर दिया कि भारत की बेटियां बैडमिंटन या टेनिस ही नहीं बल्कि कुश्ती जैसे खेल में भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। साक्षी ने जो कांस्य पदक जीता वह भी ऐतिहासिक था क्योंकि महिला कुश्ती में इससे पहले ओलम्पिक में किसी ने पदक नहीं जीता था।
ओलम्पिक में जगह बनाने वाली भारत की पहली महिला जिमनास्ट दीपा कर्माकर कांस्य पदक से महज मामूली अंक के अंतर से चूक गई लेकिन उसके प्रदर्शन ने देशवासियों का दिल जीत लिया। उड़नपरी पीटी ऊषा के बाद ललिता बाबर ओलम्पिक इतिहास में 1984 के बाद 32 साल बाद ट्रैक स्पर्धा के फाइनल के लिये क्वालीफाई होने वाली दूसरी भारतीय महिला बनीं। ललिता बाबर ने अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से 3000 मीटर स्टीपलचेज में 10वां स्थान हासिल किया। पांच बार की विश्व चैम्पियन मुक्केबाज एम.सी. मैरीकाम, विश्व एथलेटिक्स स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने वाली लांग जम्पर अंजू बाबी जार्ज, ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की पहली भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी, पैरालम्पिक में रजत पदक जीतने वाली एथलीट दीपा मलिक, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, निशानेबाज हिना सिद्धू आदि ने कई मर्तबा देश के सम्मान को चार चांद लगाए हैं लेकिन जब यही महिला खिलाड़ी अपने साथ होते भेदभाव का जिक्र करती हैं तो उसे अनसुना कर दिया जाता है।
देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है बल्कि प्रतिभाओं को खोजने वाले संसाधनों की कमी है। भारत के जितने भी खेल संघ हैं, वे राजनीति छोड़कर अगर अपने-अपने क्षेत्र के खिलाड़ियों पर ध्यान दें तो भारतीय युवा खिलाड़ी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। जरूरत है सभी के सहयोग की। क्रिकेट के अलावा भारत में अन्य खेलों में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था नहीं मिलती और न ही देश और प्रदेश की सरकारें देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी और विभिन्न खेलों पर ध्यान देती हैं। इसलिए देश के होनहारों का क्रिकेट के अलावा सारे खेलों से मोहभंग होता जा रहा है। जरूरत है क्रिकेट के साथ-साथ सभी खेलों को प्रोत्साहन मिले और ऐसे कार्यक्रम बनें जिनसे सभी भावी खिलाड़ियों का रुझान क्रिकेट के साथ-साथ बाकी सभी खेलों की तरफ भी बढ़े। आज क्रिकेट की दुनिया में भारतीय टीम विश्व की नम्बर वन टीमों में गिनी जाती है। भारत में क्रिकेट जितना बढ़ रही है अन्य खेल पिछड़ रहे हैं।
देखा जाए तो क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों की तरफ खेलप्रेमियों का रुझान ही नहीं है। मैदान में पसीना बहाते खिलाड़ियों को यदि प्रोत्साहन ही नहीं मिलेगा तो वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे कर पाएगा। आज जरूरत है समाज की सोच और नजरिया बदलने की। भारत में लैंगिक आधार पर खेलों में भेदभाव हो रहा है। कभी बेटियों पर प्रशिक्षक कुदृष्टि डालते हैं तो कभी अन्य खेलनहार उनके अरमानों पर पानी फेरने से बाज नहीं आते। खेलों से संन्यास के बाद कई महिला खिलाड़ियों ने पुस्तकें लिखी हैं जिनमें कई चौंकाने वाले आरोप लगे हैं, जो बेटियां देश की अस्मिता को लगातार चार चांद लगा रही हैं आखिर उनके साथ भेदभाव कितना उचित है। 




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