भारत तीज-त्योहारों का देश है। यहां हर महीने कोई न कोई
तीज-त्योहार जनमानस को तरंगित-उमंगित करता रहता है। मकर संक्रान्ति को ही लें यह
त्योहार पूरे भारत में मनाया जाता है। भले ही अलग-अलग प्रांतों में इसके नाम अलग
हों और इसकी मान्यताएं अलग हों लेकिन कुछ चीजें इस त्योहार से ऐसे जुड़ी हैं जिन्हें
पूरा देश मानता है और वह है मकर संक्रान्ति के दिन प्रातः स्नान, दान और तिल का
सेवन। इस दिन लोग नए चावल से बनी खिचड़ी और तिल से बनी चीजें जरूर खाते हैं। मकर
संक्रान्ति का अर्थ है माघ मास की संक्रान्ति जिस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं।
मकर राशि बारह राशियों में दसवें स्थान पर होती है। यह पर्व कभी पौष तो कभी माघ मास
में पड़ता है। जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है उस अवधि को
सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी की गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांति चक्र
कहलाता है। इस परिधि को बारह भागों में बांटकर बारह राशियां बनी हैं। यह बारह
नक्षत्रों के अनुरूप हैं। पृथ्वी का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश संक्रान्ति
कहलाता है। पृथ्वी के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रान्ति कहते हैं। सूर्य
का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी
मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन कहलाता है। उत्तरायण में दिन बड़े और रातें छोटी तथा
दक्षिणायन में इसके ठीक विपरीत रात बड़ी और दिन छोटा होता है।
शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और
दक्षिणायन देवताओं की रात्रि। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन पुण्य, दान, जप-तप
अनुष्ठानों का अत्यन्त महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ
गुणा होकर प्राप्त होता है। इतना ही नहीं यह काल भगवान के भजन, पूजन, स्मरण और
चिंतन के लिए महत्वपूर्ण है। रामचरित मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने
बताया है कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि पर होता है अर्थात जब मकर संक्रान्ति
होती है तब प्रयागराज में देवता, दैत्य और मनुष्य झुंड के झुंड आकर त्रिवेणी में
स्नान करते हैं।
माघ मकरगत रवि जा होई। तीरथ पतिहिं आव सा कोई॥
देव, दनुज, किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
यहाँ दो बातें विचारणीय हैं। पहली बात है रवि जा होई, माने
पौष में हो या माघ में। इसलिए ग्रंथों में पौष को भी माघ में मिलाकर कहा गया है
अर्थात पौष को माघ में जोड़कर कहा गया है। उत्तरायण से सूर्य का स्वागत सभी करते
हैं। हर मास के स्वामी के नाम अलग हैं। माघ मास के स्वामी माधव भगवान हैं। अतः सभी
उनकी पूजा किया करते हैं। यह पावन स्नान प्रातःकाल में पूर्ण होता है अतः इसे पुण्यदायक
माना जाता है। चूँकि इसी पुण्यकाल में मुनियों का समाज जुटता था। तहाँ होइ मुनि
रिषय समाजा। भारद्वाज जी का आश्रम मुनियों को अच्छा लगता था, संगम के पास था अतः
मन को भाता था। वे प्रातःकाल वहाँ स्नान करते थे। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। और
परस्पर भगवान की गाथा गाते और सुनते थे। कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा। इस ऋषि समाज
की गोष्ठी में ब्रह्म का निरूपण, धर्म के विधान और तत्व के विभागों का वर्णन किया
जाता था और ज्ञान-वैराग्य युक्त भगवान् की भक्ति के विषय में प्रबुद्धजनों की
वार्ता होती थी। संक्षेप में याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद की रामायणकथा मकर
संक्रान्ति को ही प्रारम्भ हुई थी। इस दृष्टि से मकर संक्रान्ति हमारी समस्त
आध्यात्मिक जिज्ञासा को पुष्ट-तुष्ट करने का भी पावन पर्व है।
संक्रान्ति को हमारे देश ने एक सांस्कृतिक पर्व का
महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह पर्व नववर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस
पर्व का महत्व एक और दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। वर्ष के विभिन्न ऋतुओं में जो
पर्व काल निश्चित किए गए हैं उनका हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति से घनिष्ठ
सम्बन्ध है। जनजीवन में जिस काल के प्रभाव से शारीरिक शक्ति और मानसिक उल्लास का संचार
और प्रसार होता है वह स्वतः ही पर्व बन जाता है। हमारे कालपुरुष के छह अंग
षड्ऋतुओं के रूप में हैं। शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त। उत्तरायण
सूर्य के साथ शिशिर वसंत और ग्रीष्म से जुड़े हुए हैं। उत्तरायण में धरती और
वनस्पतियों के रस का शोषण होता है। आदान कार्य के चलते ही सूर्य का नाम आदित्य है
और विसर्ग कार्य के कारण चन्द्रमा का नाम सुधांशु है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति
विसर्गकाल का अंत और आदान काल का प्रारंभ है। इसमें मनुष्य और वनस्पतियों का बल
चरम सीमा पर होता है। अतः मकर राशि एक ऐसे संधि-स्थल पर है जब प्राणियों और वनस्पतियों
की भौतिक शक्ति के आरोह-अवरोह क्रम का अंत और प्रारंभ होता है। इस दृष्टि से बल और
शक्ति का विचार करते हुए मकर संक्रान्ति का अत्यधिक महत्व है।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल-दान का विशेष महत्व है।
धर्मशास्त्र में षट् तिला पाप नाशिनी का वर्णन मिलता है। लोक में नया चूड़ा, गुड़,
दही और तिल यह मकर संक्रान्ति का भोजन प्रसिद्ध है। नये चावल और उड़द की खिचड़ी खाने
का भी रिवाज है। इन सब बातों का सीधा सम्बन्ध आयुर्वेद में कही गई बातों की ऋतु
चर्चा से है। शीतऋतु में शीत वायु के स्पर्श से प्राणियों की अग्नि अंतर्मुखी हो
जाती है और उस समय उसे मात्रा और स्वभाव से गुरुद्रव्यों की अपेक्षा होती है। शास्त्रकारों
ने इस काल में स्निग्ध, अमल, लवण रसों से युक्त पदार्थ, गोरस, गुड़ आदि इक्षुविकार,
तैल नया अन्न सेवन करने का विधान है। शीत निवारण के लिए तिल के तेल का महत्वपूर्ण
विधान है। इसी से मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल उबटन,
तिल हवन, तिल भोजन तथा तिलदान सभी कार्य पापनाशक हैं।
मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व हिमाचल, हरियाणा तथा पंजाब
में यह त्योहार लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल अंधेरा होने पर
होली के समान आग जलाकर तिल, गुड़, चावल तथा मक्का से अग्नि पूजन करके आहुति डाली जाती
है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस उत्सव को खिचड़ी कहते हैं। बंगाल में भी इस दिन
स्नान करके तिलदान की विशेष प्रथा है। राजस्थान तथा गुजरात में इस दिन बालक, युवा-युवतियां
तथा वृद्धजन बड़े उत्साह से पतंग उड़ाते हैं। प्राचीन रोम में इस दिन खजूर, अंजीर और
शहद बाँटने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन यूनान में लोग वर-वधू को संतान
की वृद्धि के लिए तिलों का पकवान बांटते थे। इस दिन कमल और शुद्ध घी का दान पुण्य
कार्य माना जाता है।
इस पुनीत अवसर पर गंगासागर में बहुत बड़ा मेला लगता है। कहते
हैं कि इस दिन यशोदाजी ने श्रीकृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत
किया था। अतः मकर संक्रान्ति का पर्व पूरे देश में बड़ी श्रद्धा व आदरपूर्वक मनाया
जाता है। लोहड़ी के रूप में सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश प्राप्त होता है।
दक्षिण भारत के विशेष त्योहारों में मकर संक्रान्ति या पोंगल तीन दिनों तक मनाया
जाता है। कई जगहों पर इस पर्वोत्सव को मेले का रूप देना सार्वभौम माना गया है।
इसमें बच्चे, बूढ़े सभी आनंदित होते हैं। यह सांस्कृतिक पर्व हमें विरासत में
प्राप्त होता है। इसकी विश्वसनीयता में सदियों का अनुभव छिपा है। संक्रान्ति काल
के आहार और गंगा स्नान की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। कृषि प्रधान देश के इन
त्योहारों का महत्व कृषि के साथ धार्मिकता और राष्ट्रीयता के साथ जोड़कर देखा जाना
चाहिए।
डा. रीभा तिवारी
एस.बी.आई. कालोनी से पहले
फजलगंज, सासाराम
जिला- रोहतास (बिहार)
पिन कोड नम्बर- 821115

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