मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

अमित सरोहा किसी से कम नहीं

                       
जोश और जुनून से हारी विकलांगता
अगर इरादे मजबूत और हौसले बुलंद हों तो फिर शारीरिक विकलांगता भी आदमी के सामने झुक जाती है। सोनीपत जिले के बैंयापुर गांव के एक युवा पैरा खिलाड़ी ने इसे साबित कर दिखाया।अर्जुन अवार्डी अमित सरोहा ने जिन परिस्थितियों में देश और परदेस की धरती पर नाम कमाया है, अकसर वैसी स्थिति में लोग निराशा और कुंठा से भर जाते हैं। यह अमित सरोहा का जोश और हौसला ही था कि उसने अपनी विकलांगता को अपनी जीत का हथियार बना लिया और एक के बाद एक उपलब्धि हासिल कर सबकी आंखों का नूर बन गया, वह भी महज सात साल के छोटे से अंतराल में। भीम और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित अमित सरोहा आज देश के हजारों विकलांग युवाओं का प्रेरणास्रोत है।
कुछ महीने पहले ही अमित सरोहा ने पेरिस में हुई फ्रेंच ओपन चैम्पियनशिप में दो स्वर्ण पदक और एक रजत पदक जीते। इसके साथ ही उसने रियो पैरालम्पिक के लिए अपना टिकट भी पक्का कर लिया था, हालांकि वह रियो में पदक नहीं जीत सका लेकिन उसने दो नये एशियन रिकार्ड कायम कर दिखाए। अमित ने पोलैण्ड में भी देश के लिए एक गोल्ड और एक सिल्वर मैडल जीता था। इससे पहले मार्च, 2016 में शारजहां ओपन में एक गोल्ड और एक सिल्वर देश की झोली में डाला और दुबई में मार्च, 2016 में ही हुई एशियन चैम्पियनशिप में एक गोल्ड व एक सिल्वर मैडल जीता।
कार दुर्घटना ने तोड़ दी थी रीढ़
साधारण परिवार से सम्बन्ध रखने वाले अमित सरोहा के भी दूसरे युवाओं की तरह सपने थे और इन्हें पूरा करने के लिए इच्छाशक्ति भी लेकिन नियति उससे कुछ और ही कराना चाहती थी। 2007 में एक कार दुर्घटना में अमित की रीढ़ टूट गयी। इसके बाद उसके शरीर का निचला हिस्सा काम करना छोड़ गया। साथ ही दोनों हाथों की उंगली भी जवाब दे गईं। एक हृष्ट-पुष्ट युवा बेबस और लाचार की तरह व्हीलचेयर पर आ गया। बकौल अमित इलाज के दौरान एक विदेशी युवक उसे मिला। वह भी अमित की तरह ही स्पाइनल कोड इंजरी से पीड़ित था। इस युवक की खेल के प्रति ललक देखकर अमित में भी लालसा जगी और 2008 में उसने व्हीलचेयर रग्बी से अपने खेल कॅरियर की शुरुआत की। आज उसका नाम देश के खास पैरा खिलाड़ियों में गिना जाता है।
व्हील चेयर रग्बी खेलते हुए अमित ने पहली बार 2009 में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। यह प्रतियोगिता बैंगलूरु में हुई थी। इसमें उसे कोई पदक तो नहीं मिला लेकिन जो हौसला यहां से अर्जित हुआ उसने इस युवा का जीवन ही बदल दिया। अमित सरोहा ने पहली बार पंचकूला में हुए नेशनल गेम्स में डिस्कस थ्रो व शाटपुट में गोल्ड मैडल जीता था। इसके आधार पर उसका चयन राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ। अमित ने पहली बार 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में भाग तो लिया लेकिन कोई पदक नहीं जीत सका। इस हार ने भी अमित को निराशा की बजाए हौसला दिया। दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के एक माह बाद ही चीन के ग्वांग्झू में हुए एशियन खेलों में अमित ने रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसके बाद अमित ने 2011 में विश्व पैरा गेम्स में डिस्कस थ्रो में सोना जीता।इसके बाद उसका हौसला ऐसा चढ़ा कि एक के बाद एक उपलब्धि उसके कदम चूमने लगी। इसके बाद उसने वर्ष 2012 में लंदन पैरा ओलम्पिक में भाग लिया। वर्ष 2013 में फ्रांस में विश्व चैम्पियनशिप में भाग लिया।
यह मिले चुके हैं सम्मान

इस युवा खिलाड़ी की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उसे 2013 में अर्जुन अवार्ड देकर सम्मानित किया और 2014 में हरियाणा सरकार ने उसे भीम अवार्ड से नवाजा। वर्ष 2014 में पैरा एशियन गेम्स में अमित ने क्लब थ्रो में देश को सोना तथा डिस्कस थ्रो में रजत पदक दिलाया। अमित सरोहा को हरियाणा सरकार ने बतौर कोच नियुक्त किया है। वह अब दूसरे पैरा खिलाड़ियों के लिए न केवल प्रेरणास्रोत है बल्कि उनकी राह आसान करने का काम करता है। अमित मानते हैं हमेशा उसके परिवार ने उसकी मदद की है। मां की प्रेरणा ने उसे इस मुकाम तक पहुंचने में बड़ी भूमिका निभाई है। इधर, अमित की मां दर्शना व बड़े भाई सुमित कहते हैं कि जिस मुकाम पर अमित आज पहुंचा है, यह उसकी लगन का नतीजा है। पैरा खिलाड़ी अरुण सोनी को अमित अपना आदर्श मानते हैं। बता दें कि अरुण ने सामान्य एशियन गेम्स में पैरा खिलाड़ी होते हुए पदक अर्जित किया है।

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