जल ही जीवन है। इस कटु सत्य पर हमारी नजरअंदाजी के चलते ही हर साल ग्रीष्म ऋतु में देश भर में पानी को लेकर त्याहि-त्याहि मच जाती है। प्यास लगने के बाद कुंआ खोदना हमारी फितरत में शुमार हो गया है। पानी की समस्या से आज शहर ही नहीं गांव भी मुश्किल में हैं। शहरों में मांग और पूर्ति के बीच खींचतान से हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। कहने को हम चांद पर रहने का सपना देख रहे हैं लेकिन कुदरत ने धरती पर हमें जीवन-यापन को जो कुछ भी दिया है उसकी लगातार अनदेखी हो रही है। अतीत पर नजर डालें तो हमारे अधिकांश प्राचीन मन्दिर तालाबों के किनारे ही विद्यमान हैं। तालाबों की अपनी गरिमा है, तभी तो इसे ताल-तलैया, गहड़ी, पोखर, चेवर, आहर, हौजी-हौदा, तरिया, झील और बावड़ी के नाम से अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है।
देश में जल संकट के मौजूदा हालातों को देखते हुए हमें जल आपूर्ति के दूसरे विकल्प के रूप में तरण-तारण तालाब के महत्व को नजरअंदाज करने से बचना चाहिए। जब देश में बड़े बांध अस्तित्व में नहीं थे, तब यही तालाब सिंचाई का एकमात्र साधन हुआ करते थे। वायु प्रवाह और पर्यावरण के संतुलन की भूमिका में भी तालाबों की अपनी अहमियत है। आज जल प्रबंधन एवं जल संचय के लिए हार्वेस्टिंग सिस्टम की जो दलीलें दी जा रही हैं वह तालाब की ही संरचना है। सनातन समय से तालाब हमारे जल सरोकार के परम्परागत साधन रहे हैं, आज उन्हें विकसित करने की बजाय हम उनसे आंखें फेर रहे हैं। तालाबों की इसी अनदेखी का परिणाम है कि आज शहर ही नहीं बल्कि गांव भी प्यासे हैं। आधुनिक जीवन शैली के हिमायतियों ने जिस तरह जंगल की उपयोगिता को नकार दिया है कुछ वैसे ही तालाबों के प्रति भी उदासीनता बरती जा रही है।
पानी की मांग एवं पूर्ति के बीच प्रति व्यक्ति जल खपत की तुलना करें, तो शहर की तुलना में ग्रामीण लोग आठ गुना कम पानी का उपयोग करते हैं, जो तालाब के निस्तारी से ही सम्भव हो पाता है। देश को पानी की समस्या से निजात दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की नदी जोड़ो परियोजना को मूर्तरूप देने की आज महती आवश्यकता है। देश में तालाबों पर ध्यान देकर 30 से 35 प्रतिशत जल बचाया जा सकता है। देश में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए यदि जल आपूर्ति का वास्तविक चिन्तन करें तो हम तालाबों को सुविधा के सागर के रूप में देख सकते हैं। शहरों और महानगरों में स्वीमिंग पूलों का जो क्रेज इन दिनों हम देख रहे हैं, वह गांव के तालाबों का ही एक परिमार्जित रूप है।
नदी, तालाब एवं सागर सिर्फ हमारी प्यास ही नहीं बुझाते बल्कि इनके पास से गुजरने वाली हवायें बेहतर स्वास्थ्य के लिये आयुर्विज्ञान से कम नहीं हैं। तालाब के किनारे पेड़ के नीचे बैठना, नदी अथवा सागर के किनारे खड़ा होना, लहरों की अठखेलियों को देखना, जलधार में उतर कर इसके आनन्द को महसूस करना अपने आप में सुखानुभूति ही तो है। तालाब में सिर्फ जल ही नहीं होता अपितु इसमें लोकदर्शन के तत्व भी मौजूद होते हैं। ग्रामीण संस्कृति में लोक व्यवहार एवं ग्राम्य सूचना के दो ही केन्द्र हैं पहला चौपाल तो दूसरा हमारे तालाब। भारतीय संस्कृति, अपने दर्शन एवं अध्यात्म के आलोक से विश्व को चमत्कृत करती रही है। यहां लोकधर्म एवं लोकपर्वों का अपना अलग ही महत्व है। सूर्य, चन्द्रमा, नदी, पर्वत, आकाश सभी हमारे आराध्य हैं इसीलिये तालाबों में भी माह विशेष की पूर्णिमा व अन्य तिथियों में व्रत के निमित्त धर्म के सारे कर्मकाण्ड इनके तटों पर ही किये जाते हैं। गांवों के तालाब पर्व विशेष में किसी तीर्थ से कम नहीं लगते। कार्तिक माह के छठ पर्व पर तालाबों की महत्ता हमारे उल्लासपूर्ण माहौल को चार चांद लगा देती है। यह सब हमारे तालाबों की लोक संस्कृति का ही कमाल है कि हम बिना किसी शुल्क के सूर्यदर्शन व प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ उठा पाते हैं।
समय के साथ लोगों की सोच बदली है। तालाबों के प्रति हमारी उदासीनता का ही नतीजा है कि आज तालाब पहले जैसे नहीं रहे। सरकार हर साल तालाबों के नाम पर अरबों रुपये खर्च कर रही है पर जो पहले से मौजूद हैं उनकी तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा। तालाबों के स्वरूप को सालों साल से चली आ रही मूर्ति विसर्जन की प्रक्रिया ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। लगातार मूर्ति विसर्जन से तालाबों का पटाव जारी है, जिससे जल धारण क्षमता प्रभावित हुई है। हमें देश को यदि पानी की समस्या से वाकई निजात दिलानी है तो पंचायत स्तर पर क्रियान्वयन होने वाली योजनाओं में तलाबों की सफाई व गहरीकरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इतना ही नहीं पशुओं के लिये अलग से तालाब बनाये जाने की व्यवस्था भी हो ताकि ग्रामीणों को संक्रामक रोगों से बचाया जा सके। चूंकि तालाब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं लिहाजा इनकी लगातार हो रही उपेक्षा पर अविलम्ब रोक लगनी चाहिए वरना ये एक न एक विलुप्त हो जाएंगे। देश को यदि जलसंकट से निजात दिलाना है तो हमारी सरकारों को तालाबों के समुन्नतीकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए तभी जल है, तो कल है की प्रासंगिकता सच साबित होगी।
देश में जल संकट के मौजूदा हालातों को देखते हुए हमें जल आपूर्ति के दूसरे विकल्प के रूप में तरण-तारण तालाब के महत्व को नजरअंदाज करने से बचना चाहिए। जब देश में बड़े बांध अस्तित्व में नहीं थे, तब यही तालाब सिंचाई का एकमात्र साधन हुआ करते थे। वायु प्रवाह और पर्यावरण के संतुलन की भूमिका में भी तालाबों की अपनी अहमियत है। आज जल प्रबंधन एवं जल संचय के लिए हार्वेस्टिंग सिस्टम की जो दलीलें दी जा रही हैं वह तालाब की ही संरचना है। सनातन समय से तालाब हमारे जल सरोकार के परम्परागत साधन रहे हैं, आज उन्हें विकसित करने की बजाय हम उनसे आंखें फेर रहे हैं। तालाबों की इसी अनदेखी का परिणाम है कि आज शहर ही नहीं बल्कि गांव भी प्यासे हैं। आधुनिक जीवन शैली के हिमायतियों ने जिस तरह जंगल की उपयोगिता को नकार दिया है कुछ वैसे ही तालाबों के प्रति भी उदासीनता बरती जा रही है।
पानी की मांग एवं पूर्ति के बीच प्रति व्यक्ति जल खपत की तुलना करें, तो शहर की तुलना में ग्रामीण लोग आठ गुना कम पानी का उपयोग करते हैं, जो तालाब के निस्तारी से ही सम्भव हो पाता है। देश को पानी की समस्या से निजात दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की नदी जोड़ो परियोजना को मूर्तरूप देने की आज महती आवश्यकता है। देश में तालाबों पर ध्यान देकर 30 से 35 प्रतिशत जल बचाया जा सकता है। देश में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए यदि जल आपूर्ति का वास्तविक चिन्तन करें तो हम तालाबों को सुविधा के सागर के रूप में देख सकते हैं। शहरों और महानगरों में स्वीमिंग पूलों का जो क्रेज इन दिनों हम देख रहे हैं, वह गांव के तालाबों का ही एक परिमार्जित रूप है।
नदी, तालाब एवं सागर सिर्फ हमारी प्यास ही नहीं बुझाते बल्कि इनके पास से गुजरने वाली हवायें बेहतर स्वास्थ्य के लिये आयुर्विज्ञान से कम नहीं हैं। तालाब के किनारे पेड़ के नीचे बैठना, नदी अथवा सागर के किनारे खड़ा होना, लहरों की अठखेलियों को देखना, जलधार में उतर कर इसके आनन्द को महसूस करना अपने आप में सुखानुभूति ही तो है। तालाब में सिर्फ जल ही नहीं होता अपितु इसमें लोकदर्शन के तत्व भी मौजूद होते हैं। ग्रामीण संस्कृति में लोक व्यवहार एवं ग्राम्य सूचना के दो ही केन्द्र हैं पहला चौपाल तो दूसरा हमारे तालाब। भारतीय संस्कृति, अपने दर्शन एवं अध्यात्म के आलोक से विश्व को चमत्कृत करती रही है। यहां लोकधर्म एवं लोकपर्वों का अपना अलग ही महत्व है। सूर्य, चन्द्रमा, नदी, पर्वत, आकाश सभी हमारे आराध्य हैं इसीलिये तालाबों में भी माह विशेष की पूर्णिमा व अन्य तिथियों में व्रत के निमित्त धर्म के सारे कर्मकाण्ड इनके तटों पर ही किये जाते हैं। गांवों के तालाब पर्व विशेष में किसी तीर्थ से कम नहीं लगते। कार्तिक माह के छठ पर्व पर तालाबों की महत्ता हमारे उल्लासपूर्ण माहौल को चार चांद लगा देती है। यह सब हमारे तालाबों की लोक संस्कृति का ही कमाल है कि हम बिना किसी शुल्क के सूर्यदर्शन व प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ उठा पाते हैं।
समय के साथ लोगों की सोच बदली है। तालाबों के प्रति हमारी उदासीनता का ही नतीजा है कि आज तालाब पहले जैसे नहीं रहे। सरकार हर साल तालाबों के नाम पर अरबों रुपये खर्च कर रही है पर जो पहले से मौजूद हैं उनकी तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जा रहा। तालाबों के स्वरूप को सालों साल से चली आ रही मूर्ति विसर्जन की प्रक्रिया ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। लगातार मूर्ति विसर्जन से तालाबों का पटाव जारी है, जिससे जल धारण क्षमता प्रभावित हुई है। हमें देश को यदि पानी की समस्या से वाकई निजात दिलानी है तो पंचायत स्तर पर क्रियान्वयन होने वाली योजनाओं में तलाबों की सफाई व गहरीकरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इतना ही नहीं पशुओं के लिये अलग से तालाब बनाये जाने की व्यवस्था भी हो ताकि ग्रामीणों को संक्रामक रोगों से बचाया जा सके। चूंकि तालाब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं लिहाजा इनकी लगातार हो रही उपेक्षा पर अविलम्ब रोक लगनी चाहिए वरना ये एक न एक विलुप्त हो जाएंगे। देश को यदि जलसंकट से निजात दिलाना है तो हमारी सरकारों को तालाबों के समुन्नतीकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए तभी जल है, तो कल है की प्रासंगिकता सच साबित होगी।

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