शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

शिक्षा और रास्ता भटकती युवा पीढ़ी

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके कर्म सिर्फ उसे ही नहीं बल्कि वृहद समाज को प्रभावित करते हैं जिसका वह अंग होता है। एक सभ्य समाज के विकास में प्रत्येक कर्म सहायक होते हैं। जो श्रेष्ठ शुभ और ज्ञानवर्धक पथ की ओर जाने के लिए संकेतक होते हैं।कर्म स्वार्थवश नहीं परमार्थवश होना चाहिए। हमारे कर्म सभी के कष्टों को दूर करें, न कि समाज को दूषित और कलंकित करें। अगर हम विद्यार्थी जीवन और उसके कर्म की चर्चा करें तो सच यह है कि उनके पूरे जीवन की कुंजी अनुशासन की पेटिका में बंद है। वस्तुत: उस जीवन संगीत की लय उसके भीतर बसी हुई है।
अगर विद्यार्थी जीवन से अनुशासन को निकाल दिया जाए तो वह कितना बदसूरत हो जाता है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन की एक अनुशासनहीनता हमें निरंतर उसी गलत रास्ते पर चलने को बाध्य कर देती है। एक बार गलत रास्ते पर जाने के बाद हर कदम गलत ही पड़ता है। जैसे कोट का एक बटन गलत लग जाने से कोट के सारे बटन गलत हो जाते हैं। बेतरतीब, नीचे ऊपर, देखने में बदसूरत दिखते हैं। प्रत्येक युवा किसी भी समाज के लिए एक अतीत का रिक्त स्थान और भविष्य का निर्माणकर्ता होता है। वह ज्यों-ज्यों बड़ा होता है त्यों-त्यों भविष्य के निर्माण के प्रति उसका उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है। स्वतंत्र विचारधारा अगर उसका अधिकार है तो पुरुषार्थ का प्रयोग उसका उत्तरदायित्व। प्रत्येक युवक भविष्य की आशा है, सिर्फ अपने मां-बाप की उम्मीद नहीं बल्कि राष्ट्र की उम्मीदें उससे उसी रूप में जुड़ी हैं। उसी प्रकार प्रत्येक युवती भविष्य की धात्री या धरित्री सदृश्य प्रतिमूर्ति है। यही कारण है कि अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए प्रत्येक समाज, प्रत्येक राष्ट्र की आंखें युवा वर्ग की ओर टकटकी लगाए रहती हैं। ऐसे में युवा वर्ग का कर्तव्य बनता है कि वह अपने समाज और राष्ट्र को केन्द्र में रखकर कर्तव्य और दायित्वों का निर्वहन करे। सच में यह कहना-लिखना एवं समझाना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है इसे अपनाना। युवा मन कल्पनाओं का पंख लगाकर उड़ना चाहता है। बिना किसी की परवाह किए। आजादी उसे अच्छी लगती है अंकुश नहीं। युवा मन दिवास्वप्न देखना पसंद करता है लेकिन कल्पनाओं को यथार्थ में परिवर्तित करना किसी चुनौती से कम भी तो नहीं। कहते हैं सपना देखना चाहिए तभी तो उसको पूरा करने के लिए हम प्रयासरत होेंगे। बशर्ते कल्पना थोथी न हो कल्पना अर्थहीन न हो, उर्वर हो, संकल्पपूर्ण हो। कहते हैं मनुष्य बहुत ताकतवर होता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी दृढ़इच्छा शक्ति होती है। अगर वह दिल से किसी काम को करने की ठान ले तो मुश्किल कुछ भी नहीं। युवावस्था वैसे भी काफी ऊर्जावान होती है फिर उसके लिए क्या मुश्किल और क्या नामुमकिन? युवा तो राष्ट्र की दिशा और दशा बदलने में समर्थवान है। उसकी ताकत की कोई सीमा नहीं, बशर्ते कि वह अपनी पूरी ऊर्जा को सही दिशा में लगाए अर्थात उसमें एक सुर, एक लक्ष्य और राष्ट्रप्रेम हो। कहते हैं कि जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते वे हर काम अलग ढंग से करते हैं। सफलता के लिए समय प्रबंधन की कला जानना बेहद जरूरी है जो व्यक्ति अपने जीवन में समय का महत्व देता है, वही एक समय आने पर महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाता है या कहें कि महत्वपूर्ण काम कर जाता है। किसी व्यक्ति की सफलता-असफलता उसके काम करने के तरीके और समय की पाबन्दी पर निर्भर है। समय प्रबंधन की कला जिसे मालूम है, उसकी सफलता न सिर्फ सुनिश्चित है बल्कि उसकी सफलता को कोई रोक नहीं सकता। व्यक्ति व्यर्थ के कार्यों में अपना मूल्यवान समय गंवा देता है? और समय बीतने के बाद पश्चाताप के सिवा उसके पास कुछ भी विकल्प नहीं होता। वहीं अगर आप सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़े, सुनें और देखें तो पाएंगे कि सफल व्यक्ति एक-एक पल का हिसाब रखते हैं। वह हर काम के लिए समय निर्धारित करते हैं और समय के दुरुपयोग से बचते हैं। मनुष्य की सफलता-असफलता उसकी मनोदशा पर भी निर्भर है। यदि आप महत्वाकांक्षी हैं तो आप अपनी शक्ति सामर्थ्य पर विश्वास करेंगे। तन-मन से उत्साहित रहेंगे तथा उस कार्य को करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे किंतु अतिशय महत्वाकांक्षा जीवन को सुपथ पर नहीं चलने देती।
महात्मा गांधी ने शिक्षा को जिस तरह से परिभाषित किया था, शरीर, मन और आत्मा, इन तीनों के विकास पर बल दिया था, वह आज पूर्णत: सही साबित नहीं हो रहा है क्योंकि समय के साथ अन्य क्षेत्रों की भांति शिक्षा के क्षेत्र में समस्त मर्यादाओं और मान्यताओं की इतिश्री हो गई है। युवा वर्ग के मन-मस्तिष्क पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी का भी काफी असर पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा के प्रति उनकी रुचि कम होती जा रही है। हालात ये हैं कि मीडिया धीरे-धीरे शिक्षक का स्थान ग्रहण करता जा रहा है। निरंतर बढ़ती जनसंख्या और कम होते रोजगार के अवसरों के कारण युवा वर्ग कुंठित है। दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था प्रतियोगितावादी होने के कारण बेहतर परिणाम लाने की होड़ काफी बढ़ चुकी है। आज जब युवा वर्ग यह देखता है कि किस प्रकार राजनीतिक एवं अन्य प्रभावों के चलते अयोग्य व्यक्तियों को भी मनचाहे स्थानों में दाखिला एवं पदों पर नियुक्ति प्राप्त हो जाती है तो सुयोग्य पात्रों के मन में निराशा और कुंठा की भावना उत्पन्न हो जाती है और वे धीरे-धीरे प्रयास करना छोड़कर अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। उनमें समाज के प्रति रोष एवं घृणा की भावना बढ़ती चली जाती है। इन सारी परिस्थितियों के लिए परिवार, समाज एवं शिक्षक वर्ग समान रूप से उत्तरदायी है। वहीं शिक्षा पद्धति भी कम दोषपूर्ण नहीं है। इन सभी में सुधार की जरूरत है।

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