गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

अजेय मातृशक्ति

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
मातृ या माता यानी सृष्टि को चलायमान रखने वाली दृश्य शक्ति। मनुष्य का जन्म लेने के साथ ही वह पहली शक्ति जिसका स्पर्श और अमृतपान कर वह जीवनयात्रा का शुभारंभ करता है। नवजात शिशु को कोई नहीं बताता पर उसकी उंगलियाँ स्वत: अपनी जन्मदात्री का स्पर्श पाने को व्याकुल हो जाती हैं और जन्मदात्री उसे अपने आँचल में समेटकर मानो उसके पोषण और संरक्षण का अटूट आश्वासन दे देती है। माँ है भी तो सृष्टि की सबसे कल्याणमयी, कल्याणकारी रूप। किसी अन्य रिश्ते में कभी नि:स्वार्थ त्याग, दयालुता और सहिष्णुता जैसे गुण इतने प्रबल रूप में समाहित नहीं होते, जितने माँ के रिश्ते में। शायद यही कारण है कि देवता भी धरती पर स्वत: प्रकट न होकर एक माता का सहारा लेते रहे, चाहे वह कौशल्या के रूप में हो या देवकी के रूप में।
मातृत्व नारी का सर्वश्रेष्ठ गुण है जिसके बिना नारी अधूरी मानी जाती है। लेकिन यह मातृत्व सिर्फ अपनी संतान के संदर्भ में प्रयुक्त नहीं होता, बल्कि व्यापक संदर्भ में पूरी मानव जाति एवं अन्य जीवों के प्रति दया, ममता, करुणा जैसे स्त्री सुलभ गुणों के लिए प्रयुक्त होता आया है। भारतीय संस्कृति में आरंभ से ही मातृत्व गुण से परिपूर्ण नारियाँ सम्मान की पात्र रही हैं, यही कारण है जब प्रकृति के विभिन्न रूपों को देवता मानकर उनकी उपासना शुरू हुई तब मातृशक्ति के रूप में आद्याशक्ति ऊषा और अदिति जैसी देवियों की भी कल्पना कर उनकी प्रार्थना की गई। यहाँ तक कि वैदिक युग से पूर्व की सैंधव संस्कृति में भी मातृदेवी की अनेक मूर्तियों की पहचान की गई है। धीरे-धीरे हिन्दू धर्म-संस्कृति ने इस मातृशक्ति को अपनी लंबी परम्परा में व्यापक रूप दिया। आज के अत्याधुनिक समय में मातृशक्ति की महानता कितनी है, इसका प्रमाण लगभग हर हिन्दू घर में होने वाले शारदीय नवरात्र का आयोजन दे देता है। परन्तु इससे भी अधिक महानता इस बात की है कि इस विविधधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में मातृशक्ति का विस्तार हम मदर टेरेसा जैसी करूणामयी संत में भी स्वीकार करते हैं। कुंवारी पूजन की प्रथा इस मान्यता का प्रतीक है।
आज जमाना हाईटेक हो गया है और जमाने के साथ हाईटेक हो चली हैं आज की नारियाँ। एक हाथ में मोबाइल और गोद में लैपटॉप मौजूद हैं तो दूसरा हाथ गाड़ी की स्टेयरिंग दृढ़ता से थामता है। जिम्मेदारी आज से 25 वर्ष पहले की नारी के अपेक्षा कई गुनी बढ़ गई है। पहले प्राय: केवल घर का मोर्चा संभालना होता था, आज बाहर के मोर्चे से भी जूझना है। या बेहतर शब्दों में यूं कहें कि इस दोहरी जिम्मेदारी से जूझना ही नहीं, बल्कि संतुलन कायम करना है। ऊपरी तौर पर यह नारी के अधिकारों की लड़ाई के रूप में दिखता है, पर गहराई में जाने पर घर-परिवार की उन्नति का उद्देश्य छिपा दिखता है। चाहे कितने भी बड़े पद पर महिला काबिज हो, उसकी प्राथमिकता घर-परिवार की सुख-समृद्घि ही होती है। बड़े से बड़े पद पर स्थापित आज की महिलाओं का महज बड़बोलापन नहीं होता है कि वे माँ पहले हैं और विशिष्ट व्यक्तित्व बाद में। यह तो उनका प्लस प्वाइंट है कि नारीत्व को कायम रखते हुए उन्होंने उस ऊँचाई को प्राप्त किया, जो कुछ समय पहले तक महिलाओं के लिए अप्राप्त माना जाता था।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उपभोक्तावाद ने नारी की स्थिति को चिंतनीय बना दिया है। कुरीतियों के उन्मूलन और विचारों के खुलेपन की बजाय देहमुक्ति अभियान को बढ़ावा देना अहम हिस्सा है। नारी देह के उपभोग की शुंभ-निशुंभ लालसा का सामना नारी साहस और बुद्घि से ही कर सकती है। पर बाजार से घिरी वही नारी इसमें सफलता प्राप्त कर सकती है, जिससे लालची प्रवृत्ति न हो। जिसने शार्ट-कट का रास्ता अख्तियार कर लिया, उसका इस्तेमाल भी तय है। परिश्रम, धैर्य और सहिष्णुता ही सच्ची और टिकाऊ  कामयाबी के साथ अपने अस्तित्व को कायम करने का मूलमंत्र है। मनुस्मृति का श्लोक ‘यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते’ का उदाहरण आज भी बार-बार दिया जाता है। लेकिन दूसरी तरफ घरेलू हिंसा से लेकर दफ्तर और सार्वजनिक स्थानों में आपराधिक घटनाओं की शिकार महिलाओं पर बढ़ती हुई संख्या किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में नौ दिनों तक पूरी श्रद्घा-भक्तिभाव से देवी माँ की गई पूजा पूरे समाज में स्त्री-शक्ति की वास्तविक स्थिति के बीच एक विरोधाभास खड़ा नजर आता है। इस विरोधाभास को खत्म करने के लिए क्या हम उस महाशक्ति से यह प्रार्थना नहीं कर सकते कि वह हमारे दर्प, अहंकार को दूर करने में हमारी मदद करे। समाज में व्याप्त असत्य पर विजय प्राप्त कर सकें। यदि ऐसा कर सकते हैं तो फिर ‘महिला सशक्तीकरण’ के आज के नए श्लोक नारे को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
रीभा तिवारी

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