आज हर माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है। कोई उसे अनपढ़ नहीं रखना चाहता। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों सहित देश की साक्षरता प्रतिशत में वृद्धि हुई है। वर्ष 2011 के अनुसार भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है, जिनमें महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है। यही वर्ष 2001 में क्रमश: 65 एवं 54 प्रतिशत थी। यहां हम देखते हैं कि पिछले 10 वर्षों में जिस रफ्तार से शिक्षा की दर बढ़ी, उसी रफ्तार से बच्चों में नैतिक गिरावट भी आई है। हम आये दिन अपने आसपास में घट रही घटनाओं पर नजर डालें तो यह एहसास आसानी से होने लगता है। इस भौतिकवादी युग में अधिकतर लड़के-लड़कियां अपने माता-पिता या गुरुजनों के प्रति सम्मान व समर्पण भाव नहीं दिखा रहे। उनका आदरभाव एवं ध्यान बड़े-बुजुर्गों के प्रति कम होता जा रहा है। वे संस्कार एवं अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।
हम जानते हैं कि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति प्राचीनकाल से ही विश्व में सिरमौर रही है। हमारा देश हर मामले में विश्व गुरु रहा है। बच्चों में नैतिक गिरावट होने के कारण हम इस क्षेत्र में पिछड़ते जा रहे हैं। अत: आज जरूरत है कि बच्चों में नैतिकता का पाठ घर से लेकर बाहर तक पढ़ाया जाए। हमें अपने नौनिहालों को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाना होगा। माता-पिता एवं गुरुजनों को भी इस पर विशेष रूप से विचार करना चाहिए क्योंकि बच्चे ही हमारा भविष्य हैं। यदि हमें बच्चों का भविष्य सुधारना है तो इनके वर्तमान को हर हाल में सुधारना होगा। यदि वे पथ से विचलित हुए तो इसका खामियाजा अगली पीढ़ी को भुगतना होगा। आज जरूरत है कि उनकी शिक्षा मूल्यपरक हो। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल्यपरक शिक्षा द्वारा हम उन्हें जीवन जीने की कला सिखाकर उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। जिसकी शुरुआत हम घर-परिवार से ही कर सकते हैं। जन्म के बाद बच्चा घर में ही सीखना शुरू करता है। वह घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, माता-पिता, बड़े भाई-बहनों आदि से बहुत कुछ सीखता है। अगर परिवार के सभी लोग बच्चों से प्यार करते हैं तो बच्चों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। परिवार में ही बच्चे उठना-बैठना, मीठी वाणी बोलना, सच बोलना, बड़ों का सम्मान करना, घर में गंदगी न फैलाना, सफाई का महत्व, किसी जीव को कष्ट न देना, बड़ों का अभिवादन करना आदि सीखते हैं। चूंकि अनुकरण बच्चों का स्वभाव होता है। उसके सामने परिवार के लोग जैसा नमूना रखेंगे, वह वैसा ही सीखेगा। अत: परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वह भी अपना आचरण शुद्ध रखें। उनकी कथनी और करनी में अंतर न हो। परिवार के सदस्यों के उठने-बैठने एवं पहनावे के तौर-तरीके को भी बच्चे सीखते हैं। इन सबका बच्चों के बाल मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। उनका स्वत: आंतरिक विकास होता रहता है। बच्चों में स्वस्थ आदतों एवं नैतिक गुणों के विकास का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को मूल्य आधारित कहानियां सुनाना चाहिए। साथ ही उनको प्रकृति एवं पर्यावरण से भी सीखने को प्रेरित करना चाहिए। इस प्रकार बच्चे की नींव परिवार में ही अच्छे ढंग से पड़ सकती है एवं उसका जीवन नैतिकतापूर्ण एवं मूल्यपरक हो सकता है। बच्चों से ही विद्यालय है और शिक्षक भी। अगर बच्चे न हों तो शायद इनकी भी जरूरत न हो। चूँकि बच्चे ही हमारे समाज एवं राष्टÑ के भावी नागरिक हैं। अत: इनकी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वे अच्छी बातें सीख सकें जिससे उनमें मूल्यों का विकास हो सके। इसके लिए सबसे पहले हमें ‘मूल्यपरक’ पाठ्यक्रम बनाना होगा एवं दूसरे आदर्श, शिष्ट, गुणवत्तापूर्ण एवं विद्वान शिक्षकों की बहाली करनी होगी।
हम सभी जानते हैं कि माता-पिता के बाद हर बच्चे का आदर्श गुरु ही होता है। गुरु का अर्थ है अज्ञान रूपी अंधकार दूर करने वाला। बच्चे भी वही काम करते हैं जो गुरु से सीखते हैं। गुरु का व्यवहार, आचरण अच्छा होगा तभी वह उदाहरण पेश कर सकता है। कहावत भी है कि उपदेश से उदाहरण श्रेष्ठ होता है। अत: गुरु का आचरण बच्चों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें ‘राष्टÑ का निर्माता’ कहा जाता है। गुरु जिस आसन पर बैठे होते हैं अगर चाहें तो वे बच्चों में प्राण फूंक सकते हैं। वे उनमें सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, सहयोग, समाज सेवा, त्याग एवं देशप्रेम आदि नैतिक मूल्य विकसित कर सकते हैं। अच्छे गुरु होंगे तभी विद्यालय का वातावरण भी अच्छा होगा और तभी बच्चे भी गुणी बनेंगे।
व्यक्ति से ही समाज बनता है। समाज और व्यक्ति में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। अत: जैसा व्यक्ति होगा वैसा समाज बनेगा और जैसा समाज होगा वैसा देश बनेगा। आज हमारे खेत-खलिहान का स्थान पक्के मकानों एवं कल-कारखानों ने ले लिया है। पूरे समाज पर भौतिकता का प्रभाव है। अत: ऐसे समय में समाज विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का आयोजन कर बच्चों में मूल्यों का विकास करने के लिए अवसर प्रदान कर सकता है। हमारा समाज अच्छे लोगों से भरा हुआ है, बस जरूरत है उनके कला-कौशल का उपयोग करने की। इनका उपयोग बच्चों के मार्गदर्शन हेतु बखूबी किया जा सकता है ताकि उनमें सद्गुणों का विकास हो सके और हमारी अगली पीढ़ी भी गुणवान और नैतिकवान बन सके। अत: समय की माँग के अनुसार हम सभी का दायित्व है कि हमारे बच्चे, हमारी पीढ़ियां नैतिक गुणों को लेकर आगे बढ़ें तो निश्चित ही पुन: हमारा समाज और देश विश्व गुरु की गरिमा को पा सकेगा।
हम जानते हैं कि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति प्राचीनकाल से ही विश्व में सिरमौर रही है। हमारा देश हर मामले में विश्व गुरु रहा है। बच्चों में नैतिक गिरावट होने के कारण हम इस क्षेत्र में पिछड़ते जा रहे हैं। अत: आज जरूरत है कि बच्चों में नैतिकता का पाठ घर से लेकर बाहर तक पढ़ाया जाए। हमें अपने नौनिहालों को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाना होगा। माता-पिता एवं गुरुजनों को भी इस पर विशेष रूप से विचार करना चाहिए क्योंकि बच्चे ही हमारा भविष्य हैं। यदि हमें बच्चों का भविष्य सुधारना है तो इनके वर्तमान को हर हाल में सुधारना होगा। यदि वे पथ से विचलित हुए तो इसका खामियाजा अगली पीढ़ी को भुगतना होगा। आज जरूरत है कि उनकी शिक्षा मूल्यपरक हो। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल्यपरक शिक्षा द्वारा हम उन्हें जीवन जीने की कला सिखाकर उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। जिसकी शुरुआत हम घर-परिवार से ही कर सकते हैं। जन्म के बाद बच्चा घर में ही सीखना शुरू करता है। वह घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, माता-पिता, बड़े भाई-बहनों आदि से बहुत कुछ सीखता है। अगर परिवार के सभी लोग बच्चों से प्यार करते हैं तो बच्चों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। परिवार में ही बच्चे उठना-बैठना, मीठी वाणी बोलना, सच बोलना, बड़ों का सम्मान करना, घर में गंदगी न फैलाना, सफाई का महत्व, किसी जीव को कष्ट न देना, बड़ों का अभिवादन करना आदि सीखते हैं। चूंकि अनुकरण बच्चों का स्वभाव होता है। उसके सामने परिवार के लोग जैसा नमूना रखेंगे, वह वैसा ही सीखेगा। अत: परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वह भी अपना आचरण शुद्ध रखें। उनकी कथनी और करनी में अंतर न हो। परिवार के सदस्यों के उठने-बैठने एवं पहनावे के तौर-तरीके को भी बच्चे सीखते हैं। इन सबका बच्चों के बाल मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। उनका स्वत: आंतरिक विकास होता रहता है। बच्चों में स्वस्थ आदतों एवं नैतिक गुणों के विकास का प्रयास करना चाहिए। बच्चों को मूल्य आधारित कहानियां सुनाना चाहिए। साथ ही उनको प्रकृति एवं पर्यावरण से भी सीखने को प्रेरित करना चाहिए। इस प्रकार बच्चे की नींव परिवार में ही अच्छे ढंग से पड़ सकती है एवं उसका जीवन नैतिकतापूर्ण एवं मूल्यपरक हो सकता है। बच्चों से ही विद्यालय है और शिक्षक भी। अगर बच्चे न हों तो शायद इनकी भी जरूरत न हो। चूँकि बच्चे ही हमारे समाज एवं राष्टÑ के भावी नागरिक हैं। अत: इनकी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वे अच्छी बातें सीख सकें जिससे उनमें मूल्यों का विकास हो सके। इसके लिए सबसे पहले हमें ‘मूल्यपरक’ पाठ्यक्रम बनाना होगा एवं दूसरे आदर्श, शिष्ट, गुणवत्तापूर्ण एवं विद्वान शिक्षकों की बहाली करनी होगी।
हम सभी जानते हैं कि माता-पिता के बाद हर बच्चे का आदर्श गुरु ही होता है। गुरु का अर्थ है अज्ञान रूपी अंधकार दूर करने वाला। बच्चे भी वही काम करते हैं जो गुरु से सीखते हैं। गुरु का व्यवहार, आचरण अच्छा होगा तभी वह उदाहरण पेश कर सकता है। कहावत भी है कि उपदेश से उदाहरण श्रेष्ठ होता है। अत: गुरु का आचरण बच्चों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें ‘राष्टÑ का निर्माता’ कहा जाता है। गुरु जिस आसन पर बैठे होते हैं अगर चाहें तो वे बच्चों में प्राण फूंक सकते हैं। वे उनमें सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, सहयोग, समाज सेवा, त्याग एवं देशप्रेम आदि नैतिक मूल्य विकसित कर सकते हैं। अच्छे गुरु होंगे तभी विद्यालय का वातावरण भी अच्छा होगा और तभी बच्चे भी गुणी बनेंगे।
व्यक्ति से ही समाज बनता है। समाज और व्यक्ति में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। अत: जैसा व्यक्ति होगा वैसा समाज बनेगा और जैसा समाज होगा वैसा देश बनेगा। आज हमारे खेत-खलिहान का स्थान पक्के मकानों एवं कल-कारखानों ने ले लिया है। पूरे समाज पर भौतिकता का प्रभाव है। अत: ऐसे समय में समाज विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का आयोजन कर बच्चों में मूल्यों का विकास करने के लिए अवसर प्रदान कर सकता है। हमारा समाज अच्छे लोगों से भरा हुआ है, बस जरूरत है उनके कला-कौशल का उपयोग करने की। इनका उपयोग बच्चों के मार्गदर्शन हेतु बखूबी किया जा सकता है ताकि उनमें सद्गुणों का विकास हो सके और हमारी अगली पीढ़ी भी गुणवान और नैतिकवान बन सके। अत: समय की माँग के अनुसार हम सभी का दायित्व है कि हमारे बच्चे, हमारी पीढ़ियां नैतिक गुणों को लेकर आगे बढ़ें तो निश्चित ही पुन: हमारा समाज और देश विश्व गुरु की गरिमा को पा सकेगा।

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