मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

कल्पना का यथार्थ


 तुम मेरी एक कल्पना हो
 वैसी कल्पना
जिसमें यथार्थ की कई इच्छाएँ
अपना आकार ग्रहण करने लगती हैं
जो धीरे-धीरे संपूर्ण जीवन के लिए
सौंदर्य बोध का लक्ष्य बन जाती है
लेकिन मैं युगों तक
अपनी कल्पना का शव
अपने कंधों पर ढना नहीं चाहती ।
हर रोज मेरे भीतर
 कहीं से आता है बहता हुआ समुद्र
संगीत
दूर कहीं छूते हुए, समय के पंखों पर
आहिस्ता- आहिस्ता गहरी नींद में
 टुकड़ा- टुकड़ा उजाला पसर जाता है।
जिस्म से लिपट जाती है तुम्हारी याद
और उन यादों में
रहती है आने वाली उदासियां
आखिर मैंने तुम्हें जाने क्यों दिया
इतनी जल्दी क्या थी, तुम्हें जाने की
रह गया मेरा फूलों का बिस्तर
सजाना बहारों के दरीचे बनाना
र तुम्हें बिठाकर
कुछ शिकवे, कुछ उलाहने देकर
तुमसे प्यार करना नहीं
कई अफसाने सुनाना
अपनी बातों में तुम्हें बहलाना
 फूलों के पलने बनाकर
 तुम्हारी बाहों में सो जाना
लेकिन ऐसा कहाँ हुआ
 शायद मेरी कल्पना
 वर्तमान की वास्तविकता से
 कहीं अधिक मूल्यवान हो गई थी ।
- रीभा तिवारी
फजलगंज , (एस. बी. आई. के सामने)
सासाराम, जिला- रोहतास (बिहार)
पिन कोड- 821115

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें