इन दिनों देश भर में आदर्श गांवों को लेकर बहुत कुछ कहा-सुना जा रहा है। शंका-कुशंका व्यक्त की जा रही हैं। इस नेक काम में राजनीतिज्ञ ही नहीं खिलाड़ी भी दिलचस्पी ले रहे हैं। अखरने वाली बात यह है कि जिन उद्योगपतियों को हमारी सरकारें तरह-तरह की इमदाद देने में कोताही नहीं बरततीं वे इस काम में जरा भी दिलचस्पी नहीं ले रहे। आज देश के सभी गांवों को आदर्श गांव के रूप में विकसित करने का विचार भले ही दूर की कौड़ी लगे पर ऐसा करना असम्भव कतई नहीं है।
आज सरकार का सारा जोर ग्राम विकास पर है, फिर भी गांवों की तस्वीर बदलती नहीं दिख रही है। वजह किसी से छिपी नहीं है, फिर भी इसे दूर करने के कोई उपाय नहीं हो रहे हैं। एक गांव को विकसित गांव कैसे बनाया जा सकता है, पंचायत स्तर पर इसे अनेकों बार साबित करने के प्रयास हो चुके हैं। आज सरकारें तरह-तरह के अभियानों पर बेहिसाब पैसा खर्च कर रही हैं लेकिन उनके परिणाम निराशाजनक हैं। आदर्श गांवों के सपने को यदि साकार करना ही है तो हमारी सल्तनतों को सबसे पहले ग्रामीणों को जागरूक करने की पहल करनी चाहिए। गांव के लोग भी अपने गांव को आदर्श गांव बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ें तभी गांवों की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है। देखा जाए तो हमारे यहां गांवों में पंचायत पदाधिकारियों और ग्रामीणों में विश्वास का बेहद अभाव है।
आदर्श गांवों का सपना साकार करने से पहले हमारी सरकारों को पंचायती राज व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करना होगा। यह तभी सम्भव है जब पंचायतों में ईमानदार लोग चुनकर आएं। सरकार का भी प्रयास होना चाहिए कि वह ईमानदार लोगों को सामने लाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने को साथ लोगों का स्वभाव भी बदले। इसकी मिसाल पिछले चुनावों में चुनाव आचार संहिता को लेकर चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान से ली जा सकती है। भारत में पंचायती राज 30 साल का होने वाला है और इन वर्षों में लोगों में इतनी तो जागृति आ ही गई है कि वे पंचायत चुनावों का क्या महत्व है, समझ सकें। यह काम कठिन भी नहीं है और न ही महंगा है। गांवों में कुछ पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को जोड़कर सिर्फ यह बताने की जरूरत है कि उन्हें पंच-सरपंच के चुनाव में किन लोगों को सामने लाना चाहिए। यह कोशिश आदर्श ग्राम योजना की मजबूत नींव बन सकती है।
एक बार ग्रामसभा मजबूत हो गई तो किसी गांव को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। महाराष्टÑ के हिवड़े बाजार गांव के सरपंच पोपटराव पवार भी शायद कभी सरपंच नहीं बन पाते यदि गांव वालों ने उन्हें आगे लाने का प्रयास नहीं किया होता। पोपटराव पवार ने सरपंच बनने के बाद सबसे पहले पानी का संरक्षण, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने तथा सरकारी विकास योजनाओं की राशि का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए ग्रामसभा की भूमिका को सुदृढ़ किया और देखते ही देखते गांव की तस्वीर बदल गई। इस गांव की आज आदर्श गांव के रूप में देशभर में चर्चा है और लोग इसे देखने आ रहे हैं। इस गांव ने खुद ऐसे साधन विकसित किए जिनसे पंचायत को नियमित आय हो रही है। इस गांव में बच्चों को बचत से जोड़कर जेब खर्च के रूप में मिलने वाले पैसे को किसी दुर्व्यसन में लगाने से बचाने की भी कोशिश की गई है। देखा जाए तो आज गांवों में दुर्व्यसन की समस्या काफी गम्भीर है। हमारा युवा वर्ग दिनोंदिन नशाखोरी में जकड़ता जा रहा है। ग्रामीण विकास से पहले हमारी सरकारों को जगह-जगह खुले नशे के ठेकों को समाप्त करना चाहिए।
हमारे देश में किसानों की फसलों का समर्थन मूल्य तय करने के लिए प्रतिवर्ष समितियां गठित की जाती हैं और विवाद होते हैं। देश में एक ही फसल पर अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न लागत रहती है। कहीं पानी की कमी, तो कहीं मजदूरी महंगी, कहीं दवा की जरूरत ज्यादा पड़ती है। कहीं खेती मशीनों पर निर्भर है तो कहीं पशुओं और इंसानों की मेहनत पर। स्वामीनाथन रिपोर्ट को पेश करना आसान है लेकिन उसे लागू करना उतना आसान नहीं है। आज खेती-किसानी में लाभ की अपेक्षा हानि की सम्भावना अधिक रहती है। किसान खेती के चक्कर में लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है। इतना ही नहीं वह आत्महत्या को भी मजबूर हो रहा है। आदर्श गांव का ढिंढोरा पीटने की जगह हमारी सरकारों को किसानों की माली हालत सुधारने के प्रयास करने चाहिए। गांवों में आज कुरातियां सिर चढ़कर बोल रही हैं। अनपढ़ लोगों के साथ-साथ पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी कुरीतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसी हालत में इन कुरीतियों को दूर करने के लिए महिलाएं कैसे आगे आएं इसकी भी पहल जरूरी है। आदर्श गांव का मकसद सिर्फ बिजली, सड़क और कम्प्यूटर ही नहीं होना चाहिए। समाज में जब तक भ्रूण हत्या, बाल विवाह और दहेज आदि कुरीतियां जारी रहेंगी आदर्श गांव का सपना बेमानी ही साबित होगा।
आज सरकार का सारा जोर ग्राम विकास पर है, फिर भी गांवों की तस्वीर बदलती नहीं दिख रही है। वजह किसी से छिपी नहीं है, फिर भी इसे दूर करने के कोई उपाय नहीं हो रहे हैं। एक गांव को विकसित गांव कैसे बनाया जा सकता है, पंचायत स्तर पर इसे अनेकों बार साबित करने के प्रयास हो चुके हैं। आज सरकारें तरह-तरह के अभियानों पर बेहिसाब पैसा खर्च कर रही हैं लेकिन उनके परिणाम निराशाजनक हैं। आदर्श गांवों के सपने को यदि साकार करना ही है तो हमारी सल्तनतों को सबसे पहले ग्रामीणों को जागरूक करने की पहल करनी चाहिए। गांव के लोग भी अपने गांव को आदर्श गांव बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ें तभी गांवों की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है। देखा जाए तो हमारे यहां गांवों में पंचायत पदाधिकारियों और ग्रामीणों में विश्वास का बेहद अभाव है।
आदर्श गांवों का सपना साकार करने से पहले हमारी सरकारों को पंचायती राज व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करना होगा। यह तभी सम्भव है जब पंचायतों में ईमानदार लोग चुनकर आएं। सरकार का भी प्रयास होना चाहिए कि वह ईमानदार लोगों को सामने लाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने को साथ लोगों का स्वभाव भी बदले। इसकी मिसाल पिछले चुनावों में चुनाव आचार संहिता को लेकर चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान से ली जा सकती है। भारत में पंचायती राज 30 साल का होने वाला है और इन वर्षों में लोगों में इतनी तो जागृति आ ही गई है कि वे पंचायत चुनावों का क्या महत्व है, समझ सकें। यह काम कठिन भी नहीं है और न ही महंगा है। गांवों में कुछ पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को जोड़कर सिर्फ यह बताने की जरूरत है कि उन्हें पंच-सरपंच के चुनाव में किन लोगों को सामने लाना चाहिए। यह कोशिश आदर्श ग्राम योजना की मजबूत नींव बन सकती है।
एक बार ग्रामसभा मजबूत हो गई तो किसी गांव को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। महाराष्टÑ के हिवड़े बाजार गांव के सरपंच पोपटराव पवार भी शायद कभी सरपंच नहीं बन पाते यदि गांव वालों ने उन्हें आगे लाने का प्रयास नहीं किया होता। पोपटराव पवार ने सरपंच बनने के बाद सबसे पहले पानी का संरक्षण, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने तथा सरकारी विकास योजनाओं की राशि का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए ग्रामसभा की भूमिका को सुदृढ़ किया और देखते ही देखते गांव की तस्वीर बदल गई। इस गांव की आज आदर्श गांव के रूप में देशभर में चर्चा है और लोग इसे देखने आ रहे हैं। इस गांव ने खुद ऐसे साधन विकसित किए जिनसे पंचायत को नियमित आय हो रही है। इस गांव में बच्चों को बचत से जोड़कर जेब खर्च के रूप में मिलने वाले पैसे को किसी दुर्व्यसन में लगाने से बचाने की भी कोशिश की गई है। देखा जाए तो आज गांवों में दुर्व्यसन की समस्या काफी गम्भीर है। हमारा युवा वर्ग दिनोंदिन नशाखोरी में जकड़ता जा रहा है। ग्रामीण विकास से पहले हमारी सरकारों को जगह-जगह खुले नशे के ठेकों को समाप्त करना चाहिए।
हमारे देश में किसानों की फसलों का समर्थन मूल्य तय करने के लिए प्रतिवर्ष समितियां गठित की जाती हैं और विवाद होते हैं। देश में एक ही फसल पर अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न लागत रहती है। कहीं पानी की कमी, तो कहीं मजदूरी महंगी, कहीं दवा की जरूरत ज्यादा पड़ती है। कहीं खेती मशीनों पर निर्भर है तो कहीं पशुओं और इंसानों की मेहनत पर। स्वामीनाथन रिपोर्ट को पेश करना आसान है लेकिन उसे लागू करना उतना आसान नहीं है। आज खेती-किसानी में लाभ की अपेक्षा हानि की सम्भावना अधिक रहती है। किसान खेती के चक्कर में लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है। इतना ही नहीं वह आत्महत्या को भी मजबूर हो रहा है। आदर्श गांव का ढिंढोरा पीटने की जगह हमारी सरकारों को किसानों की माली हालत सुधारने के प्रयास करने चाहिए। गांवों में आज कुरातियां सिर चढ़कर बोल रही हैं। अनपढ़ लोगों के साथ-साथ पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी कुरीतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसी हालत में इन कुरीतियों को दूर करने के लिए महिलाएं कैसे आगे आएं इसकी भी पहल जरूरी है। आदर्श गांव का मकसद सिर्फ बिजली, सड़क और कम्प्यूटर ही नहीं होना चाहिए। समाज में जब तक भ्रूण हत्या, बाल विवाह और दहेज आदि कुरीतियां जारी रहेंगी आदर्श गांव का सपना बेमानी ही साबित होगा।

रीभा जी,
जवाब देंहटाएंआपके इस आलेख और प्रकाशित आलेख दोनों को पढ़ा .
बधाई.
आपने इस आलेख में अनेक तथ्यात्मक बातों का उल्लेख किया है.
गांधी जी ने स्वतंत्रता के बाद से ही सुराज और ग्रामीण उत्थान की बात पर ज़ोर दिया था,
जब गांधी जी के चहेते नेहरू जी ने ग्रामयांचलों पर वांछित ध्यान नहीं दिया तो आज के शीर्षस्थ नेताओं और देश के तथाकथित कर्णधारों से हम क्या अपेक्षा करें?
_ डॉ. विजय तिवारी "किसलय"