मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

प्रासंगिक निर्मल अंतर्मन

सवाल उठता है कि सुन्दर कौन है? सुन्दर वह है जो सुन्दर काम करे, जिसकी सोच-विचार सुन्दर हों, जिसका व्यवहार सुन्दर हो और जिसका व्यक्तित्व प्रभावकारी हो। सौंदर्य का कोई पैमाना नहीं होता। चाहत तो सबकी होती है कि हम सुन्दर दिखें। उसे देखने वाले देखते ही रहें और देखने के बाद कुछ कहने को बाध्य हो जाएं। जैसे वाह! क्या सुन्दर चेहरा पाया है, भगवान ने बड़ी फुर्सत में बनाया है जैसी तमाम बातें। तन की सुन्दरता के साथ ही साथ अगर मन भी सुन्दर हो तो सुन्दरता में चार चांद लग जाएं। हम अपने तन की सुन्दरता को लेकर काफी चिंतित और सजग रहते हैं। उसकी देखभाल में बहुत समय भी देते हैं। साथ ही साथ घरेलू नुस्खे, कास्मेटिक चीजों का भी जहाँ तक हो सकता है उपयोग करते हैं ताकि हमारी त्वचा आकर्षक दिखे।
मन की सुन्दरता जो हर किसी के लिए जरूरी है उस पर तो कभी ध्यान ही नहीं देते। मन का सुन्दर होना चेहरे के सुन्दर होने से ज्यादा जरूरी है। मन की सुन्दरता सिर्फ हमें ही सुन्दर नहीं बनाती बल्कि आसपास के वातावरण को भी प्रभावित करती है। मन को कोमल पुष्प की संज्ञा दी गई है। कहा जाता है कि मन बड़ा ही कोमल होता है। मन में कभी भी कुटिलता, कुविचार हावी नहीं होने देना चाहिए बल्कि मन को हमेशा ही पाक-साफ रखने की कोशिश करना जरूरी है। मन में हमेशा प्रेम, दया और सहयोग की भावना रखने के साथ ही साथ ध्यान सकारात्मक बातों में लगाना चाहिए। हमारे सोच-विचार का असर हमारे कर्म पर पड़ता है और हमारा कोई भी कर्म सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र को प्रभावित करता है इसलिए कोई भी कार्य करने से पहले हमें उसके परिणाम के बारे में जरूर सोचना चाहिए।
इस दुनिया में सारी चीजें अस्थायी हैं पर इंसान का स्वभाव ऐसी खूबी है जो हमेशा उसके साथ रहती है। इसलिए सबके प्रति अपना व्यवहार अच्छा रखना ही एक अच्छे इंसान की पहचान है। मन को जहाज तो कभी पंछी तो कभी घोड़े से भी तेज दौड़ने वाली सवारी कहा गया है। मन के बारे में यह भी कहा जाता है कि मन की सवारी करने वाले दिमाग से नहीं सोचते यानी मन बड़ा ही तेज चलने वाला होता है इस पर दिमागरूपी लगाम  को कसना जरूरी होता है। 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत' यह बात भी पूर्णत: सत्य है कि व्यक्ति की हार-जीत, सुख-दु:ख सब कुछ उसके मन पर निर्भर है। इंसान अगर दु:ख से विचलित न हो और सुख के लिए प्रयासरत रहे तो सुख से उसे कोई दूर नहीं कर सकता। यही बात सफलता-असफलता के साथ भी लागू होती है। व्यक्ति असफलता से घबरा जाता है और सफलता उसे प्रफुल्लित करती है। सच तो यह है कि जो बड़ी असफलता स्वीकारने की हिम्मत रखते हैं उन्हीं में  बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने की क्षमता भी होती है। विषम से विषम परिस्थितियों में मन को शांत रखकर लक्ष्य के प्रति जागरूक रहने से मुश्किल वक्त में भी हम अपना रास्ता बना सकते हैं। मन ही तो वह सम्बल है जो हमें एकांत में भी तन्हा नहीं छोड़ता। मन में कई विचार आते रहते हैं और हम अपने जीवन की सक्रियता बनाए रखते हैं।
मन की बेचैनी, मन की पीड़ा हमारे तन को प्रभावित करती है लेकिन तन बीमार हो और मन में आत्मविश्वास हो तो सारी मुश्किलें अपने आप दूर हो जाती हैं। जो आज है वह कल नहीं रहेगा, ऐसी सोच तन की बड़ी से बड़ी पीड़ा को दूर कर देती है। अगर मन में कोई बात घर कर ले और हम उसी में उलझे रहें तो जीवन का बहुमूल्य समय खोने के साथ ही साथ तन को भी कष्ट होता है। तन की सुन्दरता हमें स्थायी खुशी नहीं दे सकती जबकि मन की सुन्दरता हमें स्थायी खुशी देने में सक्षम होती है। तन की सुन्दरता क्षणिक है लेकिन मन की सुन्दरता हमारे मन-मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव छोड़ जाती है जिसे हम जीवन पर्यंत भूल नहीं पाते। तन की सुन्दरता को क्षणिक प्रभावकारी कहना गलत नहीं होगा। कोई व्यक्ति किसी को भी अपनी बाह्य सुन्दरता से ज्यादा देर तक नहीं लुभा सकता। हो सकता है कि व्यक्ति बाह्य सुन्दरता से प्रभावित होकर क्षणिक कल्पना करे और प्रसन्न हो ले पर मन से किया गया छोटा सा संवाद और मुलाकात हमें स्थायी रूप से रिश्ते में जोड़ने में सक्षम हो जाता है।
तन और मन के बेहतर संतुलन से ही हम कुछ नया कर सकते हैं। हम जब किसी काम को काम की तरह करते हैं, तो तन आगे रह जाता है और मन पीछे रह जाता है। ढर्राई काम करते हुए तन हावी रहता है लेकिन मन जब शांत हो, कोई बोझ न हो तो फिर मन एक बहाव में होता है। मन से किया गया कोई भी काम हमें खुशी के साथ-साथ अच्छा परिणाम भी दे जाता है। इस संसार में प्रत्येक वस्तु मन की शक्ति पर ही निर्भर है। सच्ची लगन से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता। जीवन में नैतिकता, तेजस्विता और कर्मण्यता का अभाव नहीं होना चाहिये। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सभी महान कार्य धीरे धीरे होते हैं परन्तु पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधायें दूर हो जाती हैं। संस्कार, सुविचार, संकल्प, समर्पण व सिद्धता इस पंचामृत के सम्मिलित स्वरूप का नाम है सफलता। वही समाज उन्नति और उपलब्धियों के चरम शिखर पर पहुंच सकता है जहां व्यक्ति में चरित्र होता है। भारत की सत्य-सनातन संस्कृति, व्यक्ति के चरित्र के निर्माण में सहायक बनती है। आवश्यक है कि आप चरित्र व आचरण की महत्ता को समझें और सभ्यता, शालीनता तथा विनम्रता को अपनाएं। 

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