शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, समाज की चहुंमुखी उन्नति और सभ्यता की बहुमुखी प्रगति की आधारशिला है। शिक्षा शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है-विद्या, ज्ञान, बोध और विनय। शिक्षा व्यक्ति को सभ्य और उन्नत बनाती है, यह आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा को प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता है जो हमारी शारीरिक, मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का निरन्तर एवं सामंजस्यपूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करती हुई और उत्कृष्ट बनाती है। शिक्षा हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में एक है। शिक्षा बिना हम नेत्र रहते हुए भी अंधे के समान हैं।
हर व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार और मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु होती है। जीवन में बच्चे की सुखानुभूति होते ही मां कल्पनालोक में उड़ान भरते हुए उसके भविष्य के बारे में योजनाएं बनाने लगती है। बच्चा जन्मा भी नहीं और मां उसके लिए सपने बुनना शुरू कर देती है। मैं अपने बच्चे का ऐसे ख्याल रखूंगी वैसे रखूंगी तरह-तरह से। वही बच्चा जब इस संसार में आता है तो मां को जो सुख मिलता है वह शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं। बच्चे के लालन-पालन का माँ पूरा-पूरा ध्यान रखती है। उसे इस बात की हर क्षण फिक्र होती है कि बच्चे को कोई तकलीफ न हो। बच्चा सबसे पहले माँ शब्द बोलता है उसके बाद ही दूसरा शब्द बोलना सीखता है। बच्चा माँ के स्पर्श को भी पहचानता है। उसके हर हाव-भाव से वाकिफ रहता है। वहीं मां भी अपने बच्चे के इशारे को बखूबी भाँप जाती है। माँ के आँचल में पलने वाला बच्चा देखते-देखते कब बड़ा हो जाता है समझ में भी नहीं आता।बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है मां का दायित्व भी बढ़ जाता है। मां को उसके खान-पान, रहन-सहन के साथ-साथ उसकी शिक्षा की भी जिम्मेदारी सम्हालनी पड़ती है। हर मां का सपना होता है कि उसका बच्चा अच्छा-से-अच्छा करे। एक नेक और सभ्य आदमी बने। मां उसकी शिक्षा-दीक्षा को लेकर काफी परेशान रहती है। वह अपने जीवन के अपूर्ण स्वप्न अपने बच्चों में पूर्ण होता देखती है। वह बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए ज्यादा प्रयत्नशील रहती है। एक महिला का शिक्षित होना, नैतिक होना यानि एक परिवार का शिक्षित होना है। मां के दायित्व का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं जब बच्चा अच्छा करता है तो 10 फीसदी माताओं की तारीफ की जाती है, वहीं बच्चा जब कुछ गलत करता है तो इसके सारे इल्जाम मां के ऊपर मढ़ दिये जाते हैं। मां अपने बच्चे को जितना करीब से जानती है उतना कोई और नहीं जानता। मां बच्चे की रुचि-रुझान के साथ-साथ उसकी पसंद-नापसंद को भी अच्छी तरह जानती है। अगर बच्चा नेक कार्यों में रुचि लेता है तो माँ का दायित्व बनता है कि वह उसकी भावनाओं को समझे और उचित मार्गदर्शन करे, वहीं अगर बच्चा कोई गलत काम करता है तो उसे सही और गलत के फर्क के साथ-साथ उसके दुष्परिणाम के बारे में अवगत कराना उसका कर्तव्य बनता है। बच्चे का मन चंचल होता है। बच्चे बिल्कुल कच्ची मिट्टी के समान होते हैे। उन्हें जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है। मां को इस बात का ध्यान रखना होता है कि बच्चे के दोस्त-मित्र कौन-कौन हैं और कैसे हैं? उनकी रुचि कैसी है? मां का दायित्व बनता है कि वह कुछ महत्वपूर्ण बातों का हमेशा ध्यान रखे जैसे-बच्चों के आहार में पौष्टिकता और उनके सोने-जगने का समय। बच्चे की रुचि जानकर ही उसे किसी काम में लगाना चाहिए न कि उस पर दबाव बनाकर। जिस घर में एक से ज्यादा बच्चे हों, उनकी आपस में तुलना न करें क्योंकि सभी बच्चों की मानसिक क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। साथ-ही-साथ उनकी रुचियां भी भिन्न होती हैं। जैसे किसी की पढ़ने में अधिक रुचि होती है तो कोई खेलना-कूदना पसंद करता है तो कुछ बच्चे रचनात्मक कार्य में रुचि लेते हैं। ऐसे में बच्चों के मानसिक स्तर और रुझान को ध्यान में रखकर मां को उचित सलाह देना चाहिए। खेल, गीत-संगीत, लेखन ये सभी शिक्षा के अंतर्गत ही आते हैं। जैसे कोई बच्चा पढ़ने से ज्यादा खेलने में रुचि रखता है तो हमें परेशान नहीं होना चाहिए। बल्कि उस स्थिति में बच्चे की मन:स्थिति को अच्छी तरह जानना चाहिए न कि अतिरिक्त दबाव या शारीरिक दण्ड देने जैसी गलती की जाए। इसके दुष्प्रभाव यह होते हैं कि बच्चा मानसिक रूप से डर जाता है और वह ‘डिप्रेशन’ का शिकार हो जाता है, उसका अपेक्षाकृत विकास नहीं होता। समय-समय पर बच्चों की मूल्यांकन रिपोर्ट को चेक करना और उनके शिक्षक से बच्चे की गतिविधियों के बारे में बातचीत करना चाहिए ताकि घर से बाहर स्कूल में वह क्या करता है, इसका पता चलता रहे। अच्छे कामों के लिए बच्चों को प्रोत्साहित भी करना जरूरी है। उसे यथासम्भव कुछ ऐसा गिफ्ट दें जिसके उपयोग से वह कुछ सीखने की प्रेरणा ले और हरसम्भव अच्छा करने की कोशिश करे। मां को यह भी देखना होता है कि बच्चा कहीं किसी मानसिक या शारीरिक परेशानियों से तो नहीं गुजर रहा। ऐसे में मां का दायित्व बनता है कि वह बच्चे की उलझन को जानें और उससे मित्रवत व्यवहार करें। उसे उचित सलाह देकर उसकी मानसिक उलझनों को दूर करें ताकि वह अपना मन पठन-पाठन में लगा सके। बच्चों की शिक्षा में मां का दायित्व तो है ही, साथ ही साथ पूरे परिवार और समाज का भी सहयोग होता है। आस-पास का वातावरण भी बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करता है।
हर व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार और मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु होती है। जीवन में बच्चे की सुखानुभूति होते ही मां कल्पनालोक में उड़ान भरते हुए उसके भविष्य के बारे में योजनाएं बनाने लगती है। बच्चा जन्मा भी नहीं और मां उसके लिए सपने बुनना शुरू कर देती है। मैं अपने बच्चे का ऐसे ख्याल रखूंगी वैसे रखूंगी तरह-तरह से। वही बच्चा जब इस संसार में आता है तो मां को जो सुख मिलता है वह शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं। बच्चे के लालन-पालन का माँ पूरा-पूरा ध्यान रखती है। उसे इस बात की हर क्षण फिक्र होती है कि बच्चे को कोई तकलीफ न हो। बच्चा सबसे पहले माँ शब्द बोलता है उसके बाद ही दूसरा शब्द बोलना सीखता है। बच्चा माँ के स्पर्श को भी पहचानता है। उसके हर हाव-भाव से वाकिफ रहता है। वहीं मां भी अपने बच्चे के इशारे को बखूबी भाँप जाती है। माँ के आँचल में पलने वाला बच्चा देखते-देखते कब बड़ा हो जाता है समझ में भी नहीं आता।बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है मां का दायित्व भी बढ़ जाता है। मां को उसके खान-पान, रहन-सहन के साथ-साथ उसकी शिक्षा की भी जिम्मेदारी सम्हालनी पड़ती है। हर मां का सपना होता है कि उसका बच्चा अच्छा-से-अच्छा करे। एक नेक और सभ्य आदमी बने। मां उसकी शिक्षा-दीक्षा को लेकर काफी परेशान रहती है। वह अपने जीवन के अपूर्ण स्वप्न अपने बच्चों में पूर्ण होता देखती है। वह बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए ज्यादा प्रयत्नशील रहती है। एक महिला का शिक्षित होना, नैतिक होना यानि एक परिवार का शिक्षित होना है। मां के दायित्व का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं जब बच्चा अच्छा करता है तो 10 फीसदी माताओं की तारीफ की जाती है, वहीं बच्चा जब कुछ गलत करता है तो इसके सारे इल्जाम मां के ऊपर मढ़ दिये जाते हैं। मां अपने बच्चे को जितना करीब से जानती है उतना कोई और नहीं जानता। मां बच्चे की रुचि-रुझान के साथ-साथ उसकी पसंद-नापसंद को भी अच्छी तरह जानती है। अगर बच्चा नेक कार्यों में रुचि लेता है तो माँ का दायित्व बनता है कि वह उसकी भावनाओं को समझे और उचित मार्गदर्शन करे, वहीं अगर बच्चा कोई गलत काम करता है तो उसे सही और गलत के फर्क के साथ-साथ उसके दुष्परिणाम के बारे में अवगत कराना उसका कर्तव्य बनता है। बच्चे का मन चंचल होता है। बच्चे बिल्कुल कच्ची मिट्टी के समान होते हैे। उन्हें जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है। मां को इस बात का ध्यान रखना होता है कि बच्चे के दोस्त-मित्र कौन-कौन हैं और कैसे हैं? उनकी रुचि कैसी है? मां का दायित्व बनता है कि वह कुछ महत्वपूर्ण बातों का हमेशा ध्यान रखे जैसे-बच्चों के आहार में पौष्टिकता और उनके सोने-जगने का समय। बच्चे की रुचि जानकर ही उसे किसी काम में लगाना चाहिए न कि उस पर दबाव बनाकर। जिस घर में एक से ज्यादा बच्चे हों, उनकी आपस में तुलना न करें क्योंकि सभी बच्चों की मानसिक क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। साथ-ही-साथ उनकी रुचियां भी भिन्न होती हैं। जैसे किसी की पढ़ने में अधिक रुचि होती है तो कोई खेलना-कूदना पसंद करता है तो कुछ बच्चे रचनात्मक कार्य में रुचि लेते हैं। ऐसे में बच्चों के मानसिक स्तर और रुझान को ध्यान में रखकर मां को उचित सलाह देना चाहिए। खेल, गीत-संगीत, लेखन ये सभी शिक्षा के अंतर्गत ही आते हैं। जैसे कोई बच्चा पढ़ने से ज्यादा खेलने में रुचि रखता है तो हमें परेशान नहीं होना चाहिए। बल्कि उस स्थिति में बच्चे की मन:स्थिति को अच्छी तरह जानना चाहिए न कि अतिरिक्त दबाव या शारीरिक दण्ड देने जैसी गलती की जाए। इसके दुष्प्रभाव यह होते हैं कि बच्चा मानसिक रूप से डर जाता है और वह ‘डिप्रेशन’ का शिकार हो जाता है, उसका अपेक्षाकृत विकास नहीं होता। समय-समय पर बच्चों की मूल्यांकन रिपोर्ट को चेक करना और उनके शिक्षक से बच्चे की गतिविधियों के बारे में बातचीत करना चाहिए ताकि घर से बाहर स्कूल में वह क्या करता है, इसका पता चलता रहे। अच्छे कामों के लिए बच्चों को प्रोत्साहित भी करना जरूरी है। उसे यथासम्भव कुछ ऐसा गिफ्ट दें जिसके उपयोग से वह कुछ सीखने की प्रेरणा ले और हरसम्भव अच्छा करने की कोशिश करे। मां को यह भी देखना होता है कि बच्चा कहीं किसी मानसिक या शारीरिक परेशानियों से तो नहीं गुजर रहा। ऐसे में मां का दायित्व बनता है कि वह बच्चे की उलझन को जानें और उससे मित्रवत व्यवहार करें। उसे उचित सलाह देकर उसकी मानसिक उलझनों को दूर करें ताकि वह अपना मन पठन-पाठन में लगा सके। बच्चों की शिक्षा में मां का दायित्व तो है ही, साथ ही साथ पूरे परिवार और समाज का भी सहयोग होता है। आस-पास का वातावरण भी बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करता है।

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