बच्चे होते मन के सच्चे इस पंक्ति को लिखने वाले ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि ईश्वर की इस सुन्दर कृति पर कभी आफत भी आएगी। बचपन की अठखेलियां करते बच्चे भगवान का रूप माने जाते हैं, किन्तु समाज में ही रह रहे कुछ दरिन्दे देश के भविष्य को संकट में डाल रहे हैं। बच्चों को जुल्मोसितम से बचाने को सरकार ने कानून बनाकर अपनी गम्भीरता का परिचय तो दिया है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जिन बच्चों को हम अपना भविष्य मानते हैं उनके प्रति हमारे समाज का नजरिया क्यों बदल चुका है, बाल-अपराधों के आंकड़े हमारा मुंह क्यों चिढ़ा रहे हैं?
बच्चे हमारा भविष्य हैं। राष्ट्र की सम्पत्ति हैं। सभ्य समाज के निर्माण की पूंजी हैं लेकिन अफसोस उनका बचपन दांव पर है। वर्तमान में बाल अपराधों का ग्राफ इस कदर बढ़ चुका है कि देश की सर्वोच्च अदालत को उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर लगातार चिन्ता जतानी पड़ रही है। सरकारी आंकड़ों पर यकीन करें तो बीते तीन साल में लगभग दो लाख से अधिक बच्चे लापता हुए हैं जिनमें से अधिकतर बच्चों का इस्तेमाल बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसे धंधों में किया जा रहा है। देश में प्रतिदिन एक दर्जन से अधिक बच्चे लापता हो रहे हैं और उनकी सुध तक नहीं ली जा रही। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट भी चीख-चीख कर बताती है कि देश में हर साल चालीस हजार से अधिक बच्चे गुम होते हैं जिनमें से अधिकांश के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिलती। शर्मनाक यह भी कि देश में बड़े पैमाने पर जहां बच्चे बाल मजदूरी करने को विवश हैं वहीं उनका यौन शोषण भी हो रहा है। इस असंवेदनशील कृत्य का दायरा घर-परिवार से लेकर स्कूलों तक फैल चुका है। समाज की जड़ तक पहुंच चुकी इस बुराई को दूर भगाने के लिए सरकार ने कानून तो बना दिया लेकिन जरूरी उसके अनुपालन की है। कानूनी दण्ड यदि भय, सामाजिक बुराईयों तथा आपराधिक कृत्यों पर लगाम लगाने में कारगर होता तो बालश्रम कानून लागू होने के बाद बच्चों पर होने वाले अत्याचार जरूर कम हो जाते, जोकि नहीं हुए। देश में न केवल बाल श्रमिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है बल्कि उनके दैहिक शोषण के मामले भी बढ़े हैं। 20 नवम्बर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में बाल अधिकार समझौते को पारित किया गया था। इस साल 20 नवम्बर को इसके 25 साल पूरे हो चुके हैं। बाल अधिकार संधि ऐसा पहला अन्तरराष्ट्रीय समझौता है जो सभी बच्चों के नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है। इस समझौते पर दुनिया के 193 राष्ट्रों ने हस्ताक्षर करते हुए सभी बच्चों को जाति, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, सम्पत्ति, योग्यता आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के संरक्षण देने का वचन दिया है। बाल अधिकार संधि पर दो राष्ट्रों अमेरिका और सोमालिया ने अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत ने इस पर 1992 में हस्ताक्षर कर अपनी प्रतिबद्धता तो व्यक्त कर दी पर बच्चों का शोषण बदस्तूर जारी है। कहने को दुनिया के सभी बच्चों को जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास और सहभागिता का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन हकीकत चौंकाने वाली ही है।
समय दिन-तारीख देखकर आगे नहीं बढ़ता। बाल अधिकार संधि 25 साल की हो चुकी है। इस समझौते ने भारत सहित दुनिया भर के लोगों का बच्चों के प्रति नजरिया और विचार तो बदला है, लेकिन स्थिति अभी भी काफी चिन्ताजनक है। पिछले 25 वर्षों में मानवता आगे बढ़ी है और उसने बुलंदियों को छुआ है पर अभी भी हम ऐसी दुनिया नहीं बना पाए जो बच्चों के हितों और उनके सरोकारों के लिए सुरक्षित हो। हम अपने आस-पास देखने पर पाते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने की बजाय मेहनत-मजदूरी में लगे हैं। बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित माने जाने वाला उनका अपना घर-स्कूल प्यार और शिक्षा की जगह उत्पीड़न बांट रहा है। घर में माता-पिता और स्कूल में शिक्षक बच्चों की पिटाई करते हैं। हमारा समाज बच्चियों को जन्म लेने से रोक रहा है। भारत दुनिया में 14 साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिकों वाला देश है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनिया भर में तकरीबन बीस करोड़ से अधिक बच्चे जोखिम भरे कार्य करते हैं और उनमें से सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की है। हमारी हुकूमतों ने तो फिर भी बच्चों के पक्ष में कुछ सकारात्मक पहल की है लेकिन एक समाज के रूप में हम अभी भी बच्चों और उनके अधिकारों को लेकर गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील ही हैं। भारत ने कुछ क्षेत्रों में अभूतपूर्व तरक्की की है। इसी वर्ष हमने मंगलयान की सफलता का जश्न मनाया है लेकिन बचपन की उजली तस्वीर पर कई दाग हैं। भ्रूण हत्या, बाल व्यापार, यौन दुर्व्यवहार, लिंग अनुपात, बाल विवाह, बालश्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण, मलेरिया, खसरा और निमोनिया जैसी बीमारियों से मरने वाले बच्चों के हिसाब से आज भारत का दुनिया के सबसे बदतर देशों में शुमार है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में अपने बच्चों को हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा, शोषण और तिरस्कार से निजात दिलाने में अभी तक कामयाब नहीं हो सके हैं।
भारत द्वारा बाल अधिकार समझौते को स्वीकार करने के बाद बच्चों की दृष्टि से उठाए गए कदमों, सफलता, असफलताओं की पड़ताल करें तो हम पाते हैं कि हम कुछ कदम आगे तो बढ़े हैं लेकिन अभी भी हमारे देश में बच्चों के विकास और सुरक्षा को लेकर चुनौतियों का पहाड़ है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि देश में कानून का राज होने के बाद भी आपराधिक तत्व बेलगाम हैं। इसकी मुख्य वजह कानून पालन में उदासीनता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में व्यवस्था दी गई है कि मानव तस्करी, बलात् श्रम के अलावा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने और जोखिम भरे कार्यों में नहीं लगाया जाए। अफसोस करोड़ों बच्चे आज भी बाल श्रमिक के रूप में जीवन बसर कर रहे हैं।
बच्चे हमारा भविष्य हैं। राष्ट्र की सम्पत्ति हैं। सभ्य समाज के निर्माण की पूंजी हैं लेकिन अफसोस उनका बचपन दांव पर है। वर्तमान में बाल अपराधों का ग्राफ इस कदर बढ़ चुका है कि देश की सर्वोच्च अदालत को उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर लगातार चिन्ता जतानी पड़ रही है। सरकारी आंकड़ों पर यकीन करें तो बीते तीन साल में लगभग दो लाख से अधिक बच्चे लापता हुए हैं जिनमें से अधिकतर बच्चों का इस्तेमाल बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसे धंधों में किया जा रहा है। देश में प्रतिदिन एक दर्जन से अधिक बच्चे लापता हो रहे हैं और उनकी सुध तक नहीं ली जा रही। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट भी चीख-चीख कर बताती है कि देश में हर साल चालीस हजार से अधिक बच्चे गुम होते हैं जिनमें से अधिकांश के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिलती। शर्मनाक यह भी कि देश में बड़े पैमाने पर जहां बच्चे बाल मजदूरी करने को विवश हैं वहीं उनका यौन शोषण भी हो रहा है। इस असंवेदनशील कृत्य का दायरा घर-परिवार से लेकर स्कूलों तक फैल चुका है। समाज की जड़ तक पहुंच चुकी इस बुराई को दूर भगाने के लिए सरकार ने कानून तो बना दिया लेकिन जरूरी उसके अनुपालन की है। कानूनी दण्ड यदि भय, सामाजिक बुराईयों तथा आपराधिक कृत्यों पर लगाम लगाने में कारगर होता तो बालश्रम कानून लागू होने के बाद बच्चों पर होने वाले अत्याचार जरूर कम हो जाते, जोकि नहीं हुए। देश में न केवल बाल श्रमिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है बल्कि उनके दैहिक शोषण के मामले भी बढ़े हैं। 20 नवम्बर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में बाल अधिकार समझौते को पारित किया गया था। इस साल 20 नवम्बर को इसके 25 साल पूरे हो चुके हैं। बाल अधिकार संधि ऐसा पहला अन्तरराष्ट्रीय समझौता है जो सभी बच्चों के नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है। इस समझौते पर दुनिया के 193 राष्ट्रों ने हस्ताक्षर करते हुए सभी बच्चों को जाति, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, सम्पत्ति, योग्यता आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के संरक्षण देने का वचन दिया है। बाल अधिकार संधि पर दो राष्ट्रों अमेरिका और सोमालिया ने अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत ने इस पर 1992 में हस्ताक्षर कर अपनी प्रतिबद्धता तो व्यक्त कर दी पर बच्चों का शोषण बदस्तूर जारी है। कहने को दुनिया के सभी बच्चों को जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास और सहभागिता का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन हकीकत चौंकाने वाली ही है।
समय दिन-तारीख देखकर आगे नहीं बढ़ता। बाल अधिकार संधि 25 साल की हो चुकी है। इस समझौते ने भारत सहित दुनिया भर के लोगों का बच्चों के प्रति नजरिया और विचार तो बदला है, लेकिन स्थिति अभी भी काफी चिन्ताजनक है। पिछले 25 वर्षों में मानवता आगे बढ़ी है और उसने बुलंदियों को छुआ है पर अभी भी हम ऐसी दुनिया नहीं बना पाए जो बच्चों के हितों और उनके सरोकारों के लिए सुरक्षित हो। हम अपने आस-पास देखने पर पाते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने की बजाय मेहनत-मजदूरी में लगे हैं। बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित माने जाने वाला उनका अपना घर-स्कूल प्यार और शिक्षा की जगह उत्पीड़न बांट रहा है। घर में माता-पिता और स्कूल में शिक्षक बच्चों की पिटाई करते हैं। हमारा समाज बच्चियों को जन्म लेने से रोक रहा है। भारत दुनिया में 14 साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिकों वाला देश है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनिया भर में तकरीबन बीस करोड़ से अधिक बच्चे जोखिम भरे कार्य करते हैं और उनमें से सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की है। हमारी हुकूमतों ने तो फिर भी बच्चों के पक्ष में कुछ सकारात्मक पहल की है लेकिन एक समाज के रूप में हम अभी भी बच्चों और उनके अधिकारों को लेकर गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील ही हैं। भारत ने कुछ क्षेत्रों में अभूतपूर्व तरक्की की है। इसी वर्ष हमने मंगलयान की सफलता का जश्न मनाया है लेकिन बचपन की उजली तस्वीर पर कई दाग हैं। भ्रूण हत्या, बाल व्यापार, यौन दुर्व्यवहार, लिंग अनुपात, बाल विवाह, बालश्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण, मलेरिया, खसरा और निमोनिया जैसी बीमारियों से मरने वाले बच्चों के हिसाब से आज भारत का दुनिया के सबसे बदतर देशों में शुमार है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में अपने बच्चों को हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा, शोषण और तिरस्कार से निजात दिलाने में अभी तक कामयाब नहीं हो सके हैं।
भारत द्वारा बाल अधिकार समझौते को स्वीकार करने के बाद बच्चों की दृष्टि से उठाए गए कदमों, सफलता, असफलताओं की पड़ताल करें तो हम पाते हैं कि हम कुछ कदम आगे तो बढ़े हैं लेकिन अभी भी हमारे देश में बच्चों के विकास और सुरक्षा को लेकर चुनौतियों का पहाड़ है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि देश में कानून का राज होने के बाद भी आपराधिक तत्व बेलगाम हैं। इसकी मुख्य वजह कानून पालन में उदासीनता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में व्यवस्था दी गई है कि मानव तस्करी, बलात् श्रम के अलावा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने और जोखिम भरे कार्यों में नहीं लगाया जाए। अफसोस करोड़ों बच्चे आज भी बाल श्रमिक के रूप में जीवन बसर कर रहे हैं।

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