सोमवार, 2 मई 2016

साहित्य बने सामाजिक सम्बल

साहित्य समाज के दर्पण का कार्य करता है। समाज और मानव जीवन का सम्बन्ध न केवल प्रगाढ़ होता है बल्कि इनके बिना एक-दूजे की कल्पना ही नहीं की जा सकती। समाज और जीवन एक दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में मैं चाहती हूं कि क्यों न अपने साहित्य को सामाजिक दिशा दूं। ऐसी दिशा जिसमें सामाजिक चेतना का पुट हो। जिस प्रकार आदिकाल से हम मानव जीवन के रहन-सहन और उसकी संस्कृति से रू-ब-रू होते आए हैं कुछ इसी तरह साहित्य के माध्यम से हम अपने उस समाज को कुछ देना चाहते हैं जिसकी उसे जरूरत है। अच्छा साहित्य मानव जीवन के उत्थान और उसके चारित्रिक विकास में सदैव सहायक होता है। मैं चाहती हूं कि अपने समाज को कुछ ऐसा दूं जिससे उसका नजरिया तो बदले ही वह दूसरों को भी प्रेरित करे।
अच्छा साहित्य मानव के नैतिक गुणों में सुधार का हमेशा संवाहक रहा है। साहित्य में ही वह अद्भुत और महान शक्ति है जो मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। साहित्य ने अनेकानेक बार मनुष्य की विचारधारा को नई दिशा दी है। मौजूदा समय को देखते हुए मनुष्य की विचारधारा परिवर्तित करने के लिए साहित्य का आश्रय लेना निहायत जरूरी है। हम जिस सामाजिक चेतना का काम कई लोग मिलकर भी नहीं कर सकते वह काम साहित्य के माध्यम से बड़ी आसानी से किया जा सकता है। वैदिक काल में भारतीय सभ्यता अत्यंत उन्नत थी। आज उसमें क्षरण देखा जा रहा है। सामाजिक सभ्यता का यही क्षरण हमें यह सोचने को विवश करता है कि जो हम कल थे, आज वैसा क्यों नहीं हैं। साहित्य से जुड़ा हर शख्स अपने जीवन में जो दुःख, अवसाद, कटुता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य, दया आदि का अनुभव करता है, उन्हीं अनुभवों को वह साहित्य में उतारता है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी देशकाल में घटित होता है, जिस प्रकार का वातावरण और परिस्थितियां उसे देखने को मिलती हैं, वह भी उसके साहित्य में परिलक्षित होता है।

हम नहीं कहते कि अपने साहित्य के बूते सामाजिक क्रांति ला देंगे लेकिन यदि हमारे साहित्य को पढ़कर 10 फीसदी लोग भी सीख लेते हैं, तो यह हमारे लिए अपार खुशी की बात होगी। हमारे साहित्य का उद्देश्य उस राष्ट्र, राज्य तथा जनपद की जागृति है, जिसमें हम उन्मुक्त सांस लेते हैं। बिहार का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व है लेकिन मौजूदा हालातों पर जब कोई हमारी विरासत पर चुटकी लेता है, तो उससे असहनीय वेदना होती है। हम साहित्य के माध्यम से यदि अपनी गौरवशाली साहित्यिक विरासत को हासिल कर सकते हैं तो फिर इससे बड़ी सामाजिक सेवा भला दूसरी क्या हो सकती है। हमारा साहित्य सामाजिक सम्बल बने यही मेरे लेखन का परम उद्देश्य है।

1 टिप्पणी:

  1. साहित्य के द्वारा क्रांति का श्रीगणेश होता है । यह बात बिल्कुल सत्य है । आपके आलेख और सभी कवितायें बहुत ही उम्दा किस्म के है । जो नारी जागृति में अहम भूमिका निभाती है । मैं आपके बारे में जमशेदपुर के प्रभात खबर अखबर में पढ़ा । मुझे भी साहित्यिक रूचि है पर किसी साहित्यकार की छाया नहीं मिली । मैें भी कविता, कहानी, ब्लॉग लिखता हूँ । मेरा ब्लॉग है- शब्द क्रांति
    www.jphans.blogspot.com
    मैं भी आपके जैसे विचार रखता हूँ इसलिए ब्लॉग का नाम शब्द क्रांति रखा है ।

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